मेरे मतानुसार जिन मुद्दों को देश में नजरअंदाज किया जा रहा है उनमें से कुछ ये हैं:
1. जनसंख्या - मेरी नजर में बेतहासा बढ़ रही जनसंख्या देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है । हमारे समस्त संसाधन, प्रशासनिक व्यवस्था, भोजन-स्वास्थ-शिक्षा के इंतजामात, विकास कार्यों के परिणाम मौजूदा जनसंख्या के लिए ही अपर्याप्त हैं । लेकिन देश का दुर्भाग्य देखिये कि कोई राजनीतिक दल इसके बारे में एक शब्द तक नहीं बोलता है । हर किसी को वोट बैंक की चिंता है और हर कोई इसकी चर्चा करना सत्ता के रास्ते का अड़ंगा मानता है । हर किसी को उस दिन की प्रतीक्षा है, जब आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा करने वालों के मस्तिष्क में नियोजित परिवार की सद्बुद्धि का उदय हो । हम यह भूल करते आ रहे हैं कि जनसंख्या किसी दल-विशेष का मुद्दा नहीं है । यह देश का मुद्दा है और सभी दलों को मिलकर एक सुविचारित नीति अपनानी चाहिए । पर ऐसी सन्मति उन्हें आये तब न ?
2. भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार अब इस देश के सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है । देश के इस ‘संक्रामक सामाजिक रोग’ के सैद्धांतिक विरोध में बड़ी-बड़ी बातें राष्ट्रपति से लेकर अदना कार्यालय चपरासी तक करता है, किंतु उससे मुक्ति हेतु कोई भी एक कदम नहीं उठाना चाहता है । मैंने अब तक के जीवन में कई सरकारें देखी हैं, पर कभी किसी सरकार को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कृतसंकल्प नहीं पाया । आज कोई सरकारी महकमा नहीं जहां अवसरों के होते हुए भी भ्रष्टाचार न हो । जहां अवसर ही न हों वहां की ईमानदारी का दृष्टांत देना माने नहीं रखता है । कहीं भ्रष्टाचार खुलेआम जनता की नजर के सामने है, तो कहीं परदे के पीछे । ईश्वर सर्वव्यापी हो या न हो, भ्रष्टाचार तो सर्वत्र है, प्रायः सबके हृदय में बस चुका है । चाहे पुलिस भरती हो या सैनिक भरती, चाहे ‘बीपीएल’ कार्ड हो या ‘नरेगा’ के तहत काम, चाहे सरकारी संस्थाओं को खाद्य आपूर्ति का मामला हो या अस्पतालों में दवा खरीद का, कोई जगह बची नहीं है । देश के शीर्षस्थ पदों पर बैठे सभी को सब कुछ पता है, पर उन्हें कुछ करना नहीं होता । स्थिति तो यह है कि यदि कोई कभी भूले-भटके पकड़ में आ जाता है तो उसको सजा दिलाने वालों से कहीं अधिक बचाने वाले बीच में आ पड़ते हैं – राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी संगठन, वकालत पेशे के नामी-गिरामी नाम, आदि । तब फिर उम्मीद क्या की जाये ?
3. शिक्षा - एक शिक्षाविद् के नाते मैं महसूस करता आ रहा हूं कि हालात चिंताजनक हैं । सबसे दुःखद पहलू यह है कि सरकारों ने दोहरी शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया है । ‘एरिया स्कूलों’ की अवधारणा कई विकसित देशों में प्रचलित है, किंतु अपने देश में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर लोगों को पूरी छूट है कि वे अपने बच्चों को जहां चाहें पढ़ाएं । फलतः एक तरफ व्यावसायिक लाभ कमाने में लिप्त निजी ‘पब्लिक स्कूल’ समाज के अपेक्षया संपन्न वर्ग को स्तरीय शिक्षा दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे सरकारी स्कूल हैं जहां की व्यवस्था घ्वस्तप्राय है, जहां न समुचित संसाधन हैं, न पर्याप्त संख्या में अध्यापक और कार्य-संस्कृति का तो नितांत अभाव है । प्रशासन के जिन लोगों पर उनकी व्ववस्था का दायित्व है उनके अपने स्वयं के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, कतिपय अपवादों को छोड़कर । लिहाजा वहां के हालात पर उनको कोई चिंता नहीं रहती है । आज हालात यह हैं कि देश भर के इन सरकारी स्कूलों के करीब एक-तिहाई बच्चे ‘प्राइमरी’ पास करने के बाद भी अपना नाम लिख-पढ़ नहीं सकते हैं । (‘प्रथम’ नाम की गैरसरकारी संस्था के एक सर्वेक्षण से कभी मैंने यह जाना ।) ऐसे बच्चों को साक्षर कहा जा सकता है क्या ? हां, यदि आप स्वयं को भ्रम में रखना पसंद करें तो, अन्यथा वे निरक्षर ही कहे जायेंगे । इस देश ने झूठे आंकड़ों से संतोष पाने की आदत पाल ली है । कहां से आयेगी साक्षरता देश में ?
4. स्वास्थ्य – शिक्षा की तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी कष्टप्रद है । संपन्न वर्ग के लिए निजी अस्पताल हैं, किंतु गरीबों के लिए तो सरकारी ही हैं, जहां सुविधाओं का अभाव आम बात है । कभी डाक्टर नहीं तो कभी नर्स नहीं । सरकार दावा करती है मुफ्त दवा देने की, पर वहां दवा होगी नहीं, यदि हो तो ‘इस्पायर्ड’ ! जांच के नाम पर मशीनें काम नहीं कर रही हैं की घोषणा । पैसा देकर बाहर जांच कराइये, जहां से डाक्टरों-कर्मियों को कमिशन मिलता है । देश में डाक्टरों का अभाव है, और जो हैं निजी प्रैक्टिस से धन कमाने को अधिक तवज्जू देते हैं । सरकारी नौकरी कर तो लेंगे लेकिन प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहेंगे, भले ही उसका भत्ता पाते हों । देश डाक्टर-इंजिनियर पैदा करके उनका ‘निर्यात’ करने में गर्व अनुभव करता है, पर भूल जाता है कि उनकी आवश्यकता तो यहां की जनता को है । समस्या का कोई समाधान है क्या ?
5. पुलिस – मुझे सबसे अधिक कष्ट होता है यहां की पुलिसिया तंत्र से । पुलिस का रवैया वही है जो अंगरेजों के जमाने में रहा होगा । सत्तासीन राजनेताओं की सेवा करना उसका धर्म है । उनके आदेश पर जनता पर जब चाहा जहां चाहा डंडे बरसाना उनका कर्तव्य बनता है । जो सत्ता पा गये वे खुद को नियम कानूनों से ऊपर शासक और जनता को शासित प्रजा के रूप में देखते हैं । अपने जनप्रतिनिधि होने का ध्यान उन्हें नहीं रहता है । जनता ने कहीं असंतोष व्यक्त किया नहीं कि डंडे से उन्हें काबू में लाने हेतु उनकी पुलिस है, न कि जनता के कष्टों को सुनने के लिए । आजकल रोज कहीं न कहीं से पुलिसिया तांडव की घटनाएं सुनने को मिल जाती हैं । पुलिस बल है कि निरपराध-निरीह के सामने तो शेर बनती है, और पैसा, राजनीतिक पहुंच, और प्रशासनिक रसूख वालों के सामने घुटने टेक देती है । ज्यादतियों की शिकायत लेकर आम आदमी किसकी शरण में जाये ?
6. आर्थिक विकास – विगत कुछ समय से सरकारें आठ-नौ प्रतिशत की आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीटती आ रही हैं । क्या है इस आर्थिक विकास का राज और निहितार्थ ? ऐसा लगता है कि जैसे ये आर्थिक प्रगति एक जादुई डंडा है, जिससे देश की समस्त समस्याएं सुलझ जायेंगी । जिन समस्याओं का मैंने उल्लेख किया है और जिनका जिक्र नहीं किया है, क्या उनसे मुक्ति मिल जायेगी ? क्या इस आर्थिक प्रगति से भूखे को भोजन मिल जायेगा, रोगी को दवा मिल जायेगी, अथवा गरीब को उचित शिक्षा मिल जायेगी ? जी नहीं, आज जो आर्थिक प्रगति हो रही है वह संपन्न वर्ग के आर्थिक निवेश पर आधारित है, जिससे पैदा होने वाली संपदा अधिकांशतः संबंधित गिने-चुने संपन्न लोगों में ही बंट जानी है । उससे न किसी रिक्शा वाले को कुछ मिलने का, न खेत के मजदूर को और न ही ईंटा ढोने वाले श्रमिक को । मौजूदा आर्थिक तंत्र बड़े-बड़े उद्योग-धधों को बढ़ावा देने वाला है, जिसके खिलाड़ी भी बड़े होते हैं । समाज के निचले तबके का भला तो तब होगा, जब उसके हितों से प्रत्यक्षतः जुड़े छोटे-मोटे धंधों को आगे बढ़ावा मिले । ऐसे धंधे किसी को खरबपति नहीं बना सकते, लेकिन जो भी संपदा अर्जित होगी वह बहुत न होकर भी सभी गरीबों को थोड़ा-थोड़ा अवश्य मिलेगा; उन्हें राहत तो मिलेगी । केवल सरकारें ही यह काम कर सकती हैं । क्या कभी इस विषय पर ईमानदारी से सोचेगा कोई ?
7. राजनेता – यूं तो जिन समस्याओं पर मेरा ध्यान जाता है वे कई हैं । यहां मैं उदाहरण रूप में कुछएक का जिक्र कर रहा हूं । मेरी दृष्टि में सभी के मूल में है हमारी विकारग्रस्त हो रही बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था । यह शिकायत तो स्वयं राजनेता भी करने लगे हैं कि राजनीतिक दलों का अपराधीकरण हो चुका है । विडंबना देखिये कि सुधार तथा परिष्कार करने से सभी बच रहे हैं, कारण सामूहिक संकल्प का अभाव । प्रायः सभी दलों में ऐसे तत्व हैं जो खुद को नियम-कानूनों से परे मानते हैं । हमारे नेता उनका उल्लंघन अथवा उनकी अवहेलना करना अपनी ताकत का द्योतक मानते हैं । वे सोचते हैं कि अगर नियम-कानूनों से वे भी वैसे ही बंधे रहंे जैसे आम आदमी, तो फिर वे ‘विशेष’ कहां रह जायेंगे ? लोकतंत्र है पर सामंती सोच बरकरार है । यह तो है हकीकत का एक पहलू । दूसरा है मनमरजी का तंत्र । अपने यहां यह प्रथा चल चुकी है कि सत्ता पर कब्जा पाने के बाद हर दल नीति संबंधी अपने किस्म के प्रयोग आरंभ कर देता है, बिना इस पर ध्यान दिये कि उसकी नीतियां सत्ता परिवर्तन के बाद मान्य रहेंगी कि नहीं । मैं अपनी बात समझाने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण देता हूं । आजकल प्रदेश की मुख्यमंत्री महोदया उच्च प्राथमिकता के साथ ‘गरीबों के सामाजिक उत्थान के लिए’ पार्क बनवाने तथा मूर्तियां लगवाने में जुटी हैं । इन मूर्तियों को बसपा के चुनावचिह्न से जोड़कर देखा जा रहा है । अगर भविष्य में ‘सपा’ सत्ता में आई तो संभव है कि वे मूर्तियों को ही तोड़ डालें । अगर नहीं, तो वे पार्कों और मूर्तियों के रखरखाव के लिए तो धन आबंटित करने से रहे । रखरखाव के अभाव में वे खुदबखुद ध्वस्त होने लगेंगी । सोचिये कि करोड़ों रुपये खर्च करके आज जो किया जा रहा है वह उचित है, जब उसे आदरभाव से नहीं देखा ही नहीं जा रहा है । कैसा लोकतंत्र है यह जिसमें ‘मेरी मरजी’ के सिद्धांत से शासन चल रहा हो । लोग क्या चाहते हैं इस पर विचार हो रहा है कहीं ? हमारी प्राथमिकताएं ऐसे ही तय होने लगें तो देश रसातल को नहीं जायेगा क्या ?
बहुत कुछ और कहा जा सकता है । अंत नहीं बातों का । पर बानगी के तौर पर इतना कुछ ही बहुत है । देश की तस्वीर इसी में काफी झलक जाती है ।
कुछ भी हो ‘स्वतंत्रता दिवस’ की दुबारा शुभेच्छाएं । क्या पता देश में शनैः-शनैः सन्मति का उदय हो और तस्वीर बदले । यही उम्मीद पाल लेता हूं । आमीन ! - योगेन्द्र जोशी