इंडिया बनाम भारत

October 2, 2009

2 अक्टूबर, गांधी एवं शास्त्री जयंती – अहिंसा से आगे बहुत कुछ और भी

Gandhi-Shastriआज 2 अक्टूबर है, बापू यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (2 अक्टूबर, 1869 – 30 जनवरी, 1948) और देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री (2 अक्टूबर, 1904 – 11 जनवरी, 1966) की जन्मतिथि । दोनों का स्मरण करने और दोनों से किंचित् प्रेरणा लेने का दिन, हो सके तो ।

जहां तक शास्त्रीजी का सवाल है उन्हें उनकी निष्ठा, देशभक्ति और सादगी के लिए याद किया जाता है, भले ही वैयक्तिक स्तर पर कम ही लोगों के लिए ये बातें आज सार्थक रह गयी हैं । प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की काबिना के एक ईमानदार मंत्री के तौर पर उनकी पहचान अवश्य रही है । किंतु प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल संक्षिप्त ही रहा, अतः उस भूमिका में वे कितना सफल रहे होते कह पाना आसान नहीं ।

महात्मा गांधी की बात कुछ और ही रही है । उन्हें विश्व में अहिंसा के पुजारी के तौर पर जाना जाता है । संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) ने तो आज के दिन (2 अक्टूबर) को ‘अहिंसा दिवस’ (Non-Violence Day) घोषित कर रखा है ।

मैं समझ नहीं पाता कि गांधीजी के विचारों को केवल अहिंसा के संदर्भ में ही क्यों महत्त्व दिया जाता है । क्या इसलिए कि आज के समय में जब चारों ओर हिंसात्मक घटनाएं नजर आ रही हैं, हर कोई अपने को असुरक्षित अनुभव कर रहा है ? यूं भौतिक (दैहिक तथा पदार्थगत) स्तर की हिंसा मानव समाज में सदा से ही रही है, परिवार के भीतर, परिवार-परिवार के बीच, विभिन्न समुदायों के बीच, और देशों के बीच । किंतु आतंकवाद के रूप में एक नये प्रकार की हिंसा का उदय हालिया वर्षों में हुआ है, जिससे हर कोई डरा-सहमा-सा दिखता है । जिस प्रकार की हिंसा आज देखने को मिल रही है वह अमीर-गरीब, राजनेता, उच्चपदस्थ प्रशासनिक अधिकारी, और आम आदमी सभी में असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है । ऐसी स्थिति में हिंसात्मक घटनाओं की निंदा और अहिंसा की अहमियत पर जोर डालना ‘फैशनेबल’ बात बन गयी है । अन्यथा क्या मानव समाज के समक्ष अन्य प्रकार की अनेकों समस्याएं नहीं हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए और जिनके संदर्भ में गांधीजी के विचारों की चर्चा की जानी चाहिए ?
शेष के लिए यहां क्लिक करें

September 28, 2009

२७ सितंबर: शहीद भगतसिंह का जन्मदिन

भगत सिंह का जन्म कृषकों के एक सिख परिवार में बंगा (लायलपुर-अब पाकिस्तान) में 27 सितंबर 1907 को हुआ था। आपके परिवार में सभी देशभक्त, सुधारवादी तथा देश की आजादी के दीवाने थे। बड़ा होने पर …”
शेष के लिए समाचार पढ़ें - “दैनिक भास्कर” (क्लिक करें)

भगतसिंह का अंतिम पत्र अपने साथियों के नाम:

22 मार्च,1931,

“साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह”

मैं समझ नहीं पाता हूं कि वह कौन सी बात थी कि आज से ९०-१०० साल पूर्व कुछ लोग देश, समाज तथा जन्मभूमि के लिए अपने प्राण तक त्यागने को तैयार थे ? वह सब सच था, लेकिन आज के हालात देख विश्वास नहीं होता है कि ऐसे भी लोग कभी इस देश में पैदा हुए थे । आज त्याग की बात तो दूर, देश लूटने से भी कोई बाज नहीं आ रहा है । जिसको जहां मौका मिल रहा है वह केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगा है । इतना भी करने को लोग तैयार नहीं कि अपने हिस्से की जिम्मेदारी ही ईमानदारी से निभाएं, जिसके लिए समाज/शासन उन्हें वेतन देता है । अगर थोड़ी-सी निष्ठा होती, देश के हालात कुछ और होते । सरकारी तन्त्र का शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाता, चिकित्सक ईमानदारी से मरीजों का इलाज करता, पुलिस वाला ईमानदारी से फ़र्ज निभाता, राजनेता आपराधिक वारदातों में न सरीक होते और न ऐसी वृत्तियों में संलग्न तत्त्वों को संरक्षण देते, न्यायिक व्यवस्था में ईमानदारी होती, तो देश की तस्वीर कुछ और होती । काश ऐसा होता !

आज भगतसिंह का जन्मदिन है । बहुत कम लोगों को मालूम होगा । क्रिकेट या सिनेजगत की के किसी विशिष्ठ व्यक्ति ‘सेलेब्रिटी’ अथवा किसी बड़े राजनेता की बार होती तो पता चलता । पर भगत सिंह का खयाल किसे होगा ? उस शहीद के प्रति मेरी श्रद्धा-भावना – योगेन्द्र जोशी

September 21, 2009

सरकारी मितव्ययिता, राजसी ठाट और शशि थरूर का ‘कैटल क्लास’

पिछले कुछ दिनों से मैं समाचार माध्यमों के द्वारा प्रसारित एक खबर पर गौर कर रहा हूं । खबर है कि केंद्र सरकार के वर्तमान ‘माननीय’ विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने हवाई जहाजों के ‘इकॉनमी क्लास’ को ‘कैटल क्लास’ कहकर अपनी ही सरकार के ‘मितव्ययिता अभियान’ की खिल्ली उड़ाई है । (क्लिक करें एक तथा दो) देश में लगातार अबाध गति से बढ़ रही रोजमर्रा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए देश के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रालयों को सलाह दी है कि वे अपने खर्चों को घटायें । इस दिशा में एक कदम हवाई यात्राएं कम करने और आवश्यक होने पर ‘इक्जक्यूटिव क्लास’ के बदले ‘इकॉनमी क्लास’ में यात्रा करने की सलाह दी गयी है । श्रीमान् थरूर को यह सलाह रास नहीं आई और बोल पड़े कि वे ‘कैटल क्लास’ (‘इकॉनमी क्लास’) में यात्रा नहीं कर सकते ।

हवाई यात्रा के इकॉनमी क्लास को कैटल क्लास कहने पर श्री थरूर की खूब आलोचना हुई है । कैटल क्लास यानी गाय-भैंसों के लायक दर्जा ! एक अभिजात वर्ग के संपन्न व्यक्ति, जिसने अपनी जिंदगी का मूल्यवान समय अमेरिका में गुजारा हो और जो कांग्रेस पार्टी की मेहरबानी से देश वापसी पर पहली ही बार किसी प्रकार के कष्टप्रद राजनैतिक जीवन के अनुभव के बिना ही राजसी ठाट वाली राज्यमंत्री की कुर्सी पा गया हो, को तथाकथित कैटल क्लास कैसे स्वीकार्य हो सकता है ?

मेरी श्री थरूर के प्रति पूरी सहानुभूति है । बेचारे श्री थरूर की असल में कोई खास गलती नहीं है । गलती है तो यही कि उनका भाषाई ज्ञान ठीक नहीं है । वे यह भूल गये कि उनकी अंग्रेजी भारत मैं ठीक से नहीं समझी जा सकेगी । अपने देश में लोग अंग्रेजी के शब्दों का पहले अपनी भाषा में अनुवाद करते हैं और फिर अंग्रेजी वाक्यों का अर्थ निकालते हैं । वे नहीं जानते हैं कि कुछ शब्द/पदबंध अमेरिका में ऐसे अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं जिनसे अधिकांश हिंदुस्तानी अपरिचित नहीं रहते हैं । इस तथ्य का ज्ञान श्री थरूर को होना चाहिए था, जो उन्हें शायद नहीं है । होता भी कैसे जब जिंदगी अधिकांशतः अमेरिका में ही बीती हो । खोजने पर ऐसे कई अंग्रेजी शब्द/पदबंध मिल जायेंगे, जिनके शाब्दिक अर्थ अमेरिका में अस्वीकार्य होंगे, अथवा जिनके सही अर्थ हम हिंदुस्तानी शायद न जानते हों । ऐसा एक शब्द/पदबंध मेरे ध्यान में आ रहा है, और वह है ‘हॉट डाग्ज’ (hot dogs) जो पशु-मांस के बना एक प्रकार का भोज्य सैंडविच है, जिसका चलन यूरोप एवं अमेरिका में पर्याप्त है । अमेरिका में तो बैंगन को अक्सर ‘मैड ऐप्ल्’ (mad apple) अथवा एग्प्लांट (eggplant) कहते हैं, जिसका अनुमान हममें से कोई शायद ही लगा पाये । इसी प्रकार वहां की मुद्रा ‘डॉलर’ को कुछ लोग ग्रीनबैक (greenback) भी कहते हैं । वस्तुतः हमारी किताबी अंग्रेजी के कुछएक शब्द अमेरिका (और कभी-कभी ब्रिटेन) में कम या नहीं इस्तेमाल होते हैं । उनके बदले अन्य शब्द प्रचलन में हैं, जैसे okra (हमारी भिंडी या lady’s fingers), peanuts (हमारी मूंगफली या groundnuts), gas (हमारा petrol), आदि ।

और कैटल क्लास भी उपर्युक्त श्रेणी का एक पदबंध है जो अमेरिका में इकॉनमी क्लास इंगित करने के लिए प्रयोग में लिया जाता है । वे सहज भाव से कह सकते है कि अमुक व्यक्ति कैटल क्लास में यात्रा कर रहा है । किसी को बुरा नहीं लगेगा और न ही कोई कैटल शब्द के अर्थ का अनर्थ निकालेगा, इस तथ्य के बावजूद कि इकॉनमी क्लास एक असुविधाजनक व्यवस्था है जिसमें, अमेरिकियों के नजरिए से, लोग एक प्रकार से ठूंसे जाते हैं । पर अपने यहां तो शाब्दिक अर्थ लिए जायेंगे और तदनुसार किसी वक्तव्य की व्याख्या की जाएगी । श्री थरूर की गलती यही थी कि वे यह अंदाजा नहीं लगा सके कि उनका अमेरिकी अंग्रेजी ज्ञान अर्थ का अनर्थ कर सकता है ।

श्रीमान् थरूर को इस देश की वास्तविकता का ज्ञान शायद है ही नहीं । जिस अभावग्रस्त देश में लोग रेलगाड़ियों, बसों, आटोरिक्शों आदि में ठुंसकर आवागमन/यात्रा के आदी हों और जिनके लिए हवाई यात्रा साकार न हो सकने वाला एक सपना हो, उनके लिए हवाई यात्रा का इकॉनमी क्लास भला कैटल क्लास कैसे कहला सकता है ? एक अमेरिकी भले ही उसे कैटल क्लास कहे, आम हिंदुस्तानी के लिए तो वह अप्राप्य स्वर्गीय अनुभव की चीज है । कितने लोग हैं जो अपने देश में हवाई यात्रा करने की औकात रखते हों, अपने बल पर ! शायद पूरी आबादी का एक प्रतिशत (लगभग 1.15 करोड़) भी नहीं । जहां की करीब आधी आबादी दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में रातदिन खट रहा हो और जहां के लोग हवाई जहाज के भीतर का नजारा देखने के सुखद अवसर की भी कामना करने का साहस न रखते हों, वहां के लोगों के लिए इकॉनमी क्लास कैसे कैटल क्लास हो सकता है ? और हकीकत तो यह है कि सुख-सुविधओं के आदी अमेरिकी कुछ भी कहें, हवाई यात्रा तो अपने यहां की एसीयुक्त कार या बस और एसी-3 रेलयात्रा से तो कहीं अधिक सुखद होती है; आपकी सेवा में तत्पर कर्मचारी, चाय-नास्ते की उपलब्धता, शौचादि की सुविधा, मनोरंजन के लिए स्वतंत्र वीडियो, आदि । क्या ऐसी सुविधा को भेड़-बकरियों के योग्य व्यवस्था कहा जा सकता है ? भारतीय नजरिए से हरगिज नहीं । और वह कैसा जनप्रतिनिधि/सांसद जिसे आम आदमी की समझ का अंदाजा न हो और जो उनकी भावनाओं के अनुरूप बात करने की काबिलियत न रख्ता हो ? श्री शशि थरूर इसी अर्थ में अयोग्य ठहर जाते हैं । उनको विदेशों, विदेश-नीतियों के अनुरूप जितना भी ज्ञान हो, देशवासियों की आम सोच का ज्ञान नहीं है ।

यह सब तो मुद्दे का एक पहलू है, शशि थरूर को लेकर । परंतु गहराई में उतरें तो वास्तविकता अधिक ही चिंतनीय नजर आती है । कहते हैं कि अपने देश में लोकतंत्र है, पर मुझे ऐसा लगता नहीं । मैं तो यहां की व्यवस्था को लोकतांत्रिक राजतंत्र मानता हूं । यहां वोट के माध्यम से राजाओं, राजकुमारों और सामंतों का चुनाव होता है जनप्रतिनिधि का बिल्ला मिल जाने पर उनके राजसी ठाटबाट की व्यवस्था शुरु हो जाती है । आम जन कितने ही कष्टों में जी रही हो, भूखे पेट सो रही हो, विपन्नता से पे्ररित हो आत्महत्या करने को मजबूर हो रही हो, इन जनप्रतिनिधियों को विशेष सुख-सुविधाएं मिलनी ही चाहिए । उनकी सुरक्षा व्यवस्था में, उनकी उच्चतम स्तर की आवासीय सुविधा में, उनकी यात्रा आदि में लाखों-करोड़ों का खर्च होना उनका विशेषाधिकार बन जाता है । इन सब के अभाव में वे भला जनसेवा कैसे कर सकते हैं ! कुछ दिन पहले हवाई यात्रा को लेकर एक अन्य केंद्रीय मंत्री, श्री आनंद शर्मा, के मुख से निकले ये उद्गार मैंने सुने थेः ‘इकॉनमी क्लास में यात्रा करके मैं जनता का कार्य कुशलता से नहीं कर सकता । उनका मंतव्य शायद यह होगा कि इकॉनमी क्लास की यात्रा की थकान के बाद उनमें इतनी शारीरिक क्षमता नहीं रह जाती कि वे जनसेवा कर सकें । देशवासियों को स्मरण रहे कि पूर्व में रेलमंत्री, अपने श्रीमान् लालूप्रसाद जी की रेल-सैलून के पंचसितारा सुविधाओं से लैस होकर ही जनसेवा करते थे । उनकी उस सुविधा को वर्तमान रेलमंत्री, सुश्री ममतादीदी, ने नकार दिया है । कुछ समय पहले तक मंत्रीद्वय, श्री एस एम कृष्णा और श्री शशि थरूर स्वयं, पंचसितारा होटल में आवास लेकर ही जनसेवा करते रहे हैं । एक खबर (क्लिक करें) दो रोज पहले मैंने पढ़ी कि अपने सांसदों के बंगलों की साज-सज्जा में ही कई-कई करोड़ का खर्चा हाल में हुआ है ।

कुल मिलाकर जनप्रतिनिधि सामंतों-राजकुमारों के तुल्य जीवन जीते हैं । शायद ही कोई अपवाद मिले जहां जनप्रतिनिधि सही अर्थों में आम जनों में से एक हो और उनके जैसी जिंदगी जीने का विचार रखता हो । मेरी दृष्टि में सभी चुने हुए राजा-महाराजा हैं, जिनके लिए पंचसितारा सुविधा देशवासियों को करनी चाहिए, भले ही अधिसंख्य को भूखा सोना पड़े । यह बात और है कि महात्मा गांधी की सादगी का गुणगान करने में वे कभी न थकते हों – ऐसे व्यक्ति का गुणगान जिसके विचारों का रत्ती भर भी अनुकरण करना उन्हें स्वीकार्य नहीं । खैर, अपना देश तो विरोधाभासों की खान ही है ! – योगेन्द्र

August 15, 2009

राष्ट्रीय पर्व पंद्रह अगस्त – रस्मअदायगी तक सिमटा अहमियत खोता हुआ एक दिवस (2)

आज (15 अगस्त) की पहली पोस्ट के आगे ।

मेरे मतानुसार जिन मुद्दों को देश में नजरअंदाज किया जा रहा है उनमें से कुछ ये हैं:

1. जनसंख्या - मेरी नजर में बेतहासा बढ़ रही जनसंख्या देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है । हमारे समस्त संसाधन, प्रशासनिक व्यवस्था, भोजन-स्वास्थ-शिक्षा के इंतजामात, विकास कार्यों के परिणाम मौजूदा जनसंख्या के लिए ही अपर्याप्त हैं । लेकिन देश का दुर्भाग्य देखिये कि कोई राजनीतिक दल इसके बारे में एक शब्द तक नहीं बोलता है । हर किसी को वोट बैंक की चिंता है और हर कोई इसकी चर्चा करना सत्ता के रास्ते का अड़ंगा मानता है । हर किसी को उस दिन की प्रतीक्षा है, जब आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा करने वालों के मस्तिष्क में नियोजित परिवार की सद्बुद्धि का उदय हो । हम यह भूल करते आ रहे हैं कि जनसंख्या किसी दल-विशेष का मुद्दा नहीं है । यह देश का मुद्दा है और सभी दलों को मिलकर एक सुविचारित नीति अपनानी चाहिए । पर ऐसी सन्मति उन्हें आये तब न ?

2. भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार अब इस देश के सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है । देश के इस ‘संक्रामक सामाजिक रोग’ के सैद्धांतिक विरोध में बड़ी-बड़ी बातें राष्ट्रपति से लेकर अदना कार्यालय चपरासी तक करता है, किंतु उससे मुक्ति हेतु कोई भी एक कदम नहीं उठाना चाहता है । मैंने अब तक के जीवन में कई सरकारें देखी हैं, पर कभी किसी सरकार को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कृतसंकल्प नहीं पाया । आज कोई सरकारी महकमा नहीं जहां अवसरों के होते हुए भी भ्रष्टाचार न हो । जहां अवसर ही न हों वहां की ईमानदारी का दृष्टांत देना माने नहीं रखता है । कहीं भ्रष्टाचार खुलेआम जनता की नजर के सामने है, तो कहीं परदे के पीछे । ईश्वर सर्वव्यापी हो या न हो, भ्रष्टाचार तो सर्वत्र है, प्रायः सबके हृदय में बस चुका है । चाहे पुलिस भरती हो या सैनिक भरती, चाहे ‘बीपीएल’ कार्ड हो या ‘नरेगा’ के तहत काम, चाहे सरकारी संस्थाओं को खाद्य आपूर्ति का मामला हो या अस्पतालों में दवा खरीद का, कोई जगह बची नहीं है । देश के शीर्षस्थ पदों पर बैठे सभी को सब कुछ पता है, पर उन्हें कुछ करना नहीं होता । स्थिति तो यह है कि यदि कोई कभी भूले-भटके पकड़ में आ जाता है तो उसको सजा दिलाने वालों से कहीं अधिक बचाने वाले बीच में आ पड़ते हैं – राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी संगठन, वकालत पेशे के नामी-गिरामी नाम, आदि । तब फिर उम्मीद क्या की जाये ?

3. शिक्षा - एक शिक्षाविद् के नाते मैं महसूस करता आ रहा हूं कि हालात चिंताजनक हैं । सबसे दुःखद पहलू यह है कि सरकारों ने दोहरी शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया है । ‘एरिया स्कूलों’ की अवधारणा कई विकसित देशों में प्रचलित है, किंतु अपने देश में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर लोगों को पूरी छूट है कि वे अपने बच्चों को जहां चाहें पढ़ाएं । फलतः एक तरफ व्यावसायिक लाभ कमाने में लिप्त निजी ‘पब्लिक स्कूल’ समाज के अपेक्षया संपन्न वर्ग को स्तरीय शिक्षा दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे सरकारी स्कूल हैं जहां की व्यवस्था घ्वस्तप्राय है, जहां न समुचित संसाधन हैं, न पर्याप्त संख्या में अध्यापक और कार्य-संस्कृति का तो नितांत अभाव है । प्रशासन के जिन लोगों पर उनकी व्ववस्था का दायित्व है उनके अपने स्वयं के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, कतिपय अपवादों को छोड़कर । लिहाजा वहां के हालात पर उनको कोई चिंता नहीं रहती है । आज हालात यह हैं कि देश भर के इन सरकारी स्कूलों के करीब एक-तिहाई बच्चे ‘प्राइमरी’ पास करने के बाद भी अपना नाम लिख-पढ़ नहीं सकते हैं । (‘प्रथम’ नाम की गैरसरकारी संस्था के एक सर्वेक्षण से कभी मैंने यह जाना ।) ऐसे बच्चों को साक्षर कहा जा सकता है क्या ? हां, यदि आप स्वयं को भ्रम में रखना पसंद करें तो, अन्यथा वे निरक्षर ही कहे जायेंगे । इस देश ने झूठे आंकड़ों से संतोष पाने की आदत पाल ली है । कहां से आयेगी साक्षरता देश में ?

4. स्वास्थ्य – शिक्षा की तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी कष्टप्रद है । संपन्न वर्ग के लिए निजी अस्पताल हैं, किंतु गरीबों के लिए तो सरकारी ही हैं, जहां सुविधाओं का अभाव आम बात है । कभी डाक्टर नहीं तो कभी नर्स नहीं । सरकार दावा करती है मुफ्त दवा देने की, पर वहां दवा होगी नहीं, यदि हो तो ‘इस्पायर्ड’ ! जांच के नाम पर मशीनें काम नहीं कर रही हैं की घोषणा । पैसा देकर बाहर जांच कराइये, जहां से डाक्टरों-कर्मियों को कमिशन मिलता है । देश में डाक्टरों का अभाव है, और जो हैं निजी प्रैक्टिस से धन कमाने को अधिक तवज्जू देते हैं । सरकारी नौकरी कर तो लेंगे लेकिन प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहेंगे, भले ही उसका भत्ता पाते हों । देश डाक्टर-इंजिनियर पैदा करके उनका ‘निर्यात’ करने में गर्व अनुभव करता है, पर भूल जाता है कि उनकी आवश्यकता तो यहां की जनता को है । समस्या का कोई समाधान है क्या ?

5. पुलिस – मुझे सबसे अधिक कष्ट होता है यहां की पुलिसिया तंत्र से । पुलिस का रवैया वही है जो अंगरेजों के जमाने में रहा होगा । सत्तासीन राजनेताओं की सेवा करना उसका धर्म है । उनके आदेश पर जनता पर जब चाहा जहां चाहा डंडे बरसाना उनका कर्तव्य बनता है । जो सत्ता पा गये वे खुद को नियम कानूनों से ऊपर शासक और जनता को शासित प्रजा के रूप में देखते हैं । अपने जनप्रतिनिधि होने का ध्यान उन्हें नहीं रहता है । जनता ने कहीं असंतोष व्यक्त किया नहीं कि डंडे से उन्हें काबू में लाने हेतु उनकी पुलिस है, न कि जनता के कष्टों को सुनने के लिए । आजकल रोज कहीं न कहीं से पुलिसिया तांडव की घटनाएं सुनने को मिल जाती हैं । पुलिस बल है कि निरपराध-निरीह के सामने तो शेर बनती है, और पैसा, राजनीतिक पहुंच, और प्रशासनिक रसूख वालों के सामने घुटने टेक देती है । ज्यादतियों की शिकायत लेकर आम आदमी किसकी शरण में जाये ?

6. आर्थिक विकास – विगत कुछ समय से सरकारें आठ-नौ प्रतिशत की आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीटती आ रही हैं । क्या है इस आर्थिक विकास का राज और निहितार्थ ? ऐसा लगता है कि जैसे ये आर्थिक प्रगति एक जादुई डंडा है, जिससे देश की समस्त समस्याएं सुलझ जायेंगी । जिन समस्याओं का मैंने उल्लेख किया है और जिनका जिक्र नहीं किया है, क्या उनसे मुक्ति मिल जायेगी ? क्या इस आर्थिक प्रगति से भूखे को भोजन मिल जायेगा, रोगी को दवा मिल जायेगी, अथवा गरीब को उचित शिक्षा मिल जायेगी ? जी नहीं, आज जो आर्थिक प्रगति हो रही है वह संपन्न वर्ग के आर्थिक निवेश पर आधारित है, जिससे पैदा होने वाली संपदा अधिकांशतः संबंधित गिने-चुने संपन्न लोगों में ही बंट जानी है । उससे न किसी रिक्शा वाले को कुछ मिलने का, न खेत के मजदूर को और न ही ईंटा ढोने वाले श्रमिक को । मौजूदा आर्थिक तंत्र बड़े-बड़े उद्योग-धधों को बढ़ावा देने वाला है, जिसके खिलाड़ी भी बड़े होते हैं । समाज के निचले तबके का भला तो तब होगा, जब उसके हितों से प्रत्यक्षतः जुड़े छोटे-मोटे धंधों को आगे बढ़ावा मिले । ऐसे धंधे किसी को खरबपति नहीं बना सकते, लेकिन जो भी संपदा अर्जित होगी वह बहुत न होकर भी सभी गरीबों को थोड़ा-थोड़ा अवश्य मिलेगा; उन्हें राहत तो मिलेगी । केवल सरकारें ही यह काम कर सकती हैं । क्या कभी इस विषय पर ईमानदारी से सोचेगा कोई ?

7. राजनेता – यूं तो जिन समस्याओं पर मेरा ध्यान जाता है वे कई हैं । यहां मैं उदाहरण रूप में कुछएक का जिक्र कर रहा हूं । मेरी दृष्टि में सभी के मूल में है हमारी विकारग्रस्त हो रही बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था । यह शिकायत तो स्वयं राजनेता भी करने लगे हैं कि राजनीतिक दलों का अपराधीकरण हो चुका है । विडंबना देखिये कि सुधार तथा परिष्कार करने से सभी बच रहे हैं, कारण सामूहिक संकल्प का अभाव । प्रायः सभी दलों में ऐसे तत्व हैं जो खुद को नियम-कानूनों से परे मानते हैं । हमारे नेता उनका उल्लंघन अथवा उनकी अवहेलना करना अपनी ताकत का द्योतक मानते हैं । वे सोचते हैं कि अगर नियम-कानूनों से वे भी वैसे ही बंधे रहंे जैसे आम आदमी, तो फिर वे ‘विशेष’ कहां रह जायेंगे ? लोकतंत्र है पर सामंती सोच बरकरार है । यह तो है हकीकत का एक पहलू । दूसरा है मनमरजी का तंत्र । अपने यहां यह प्रथा चल चुकी है कि सत्ता पर कब्जा पाने के बाद हर दल नीति संबंधी अपने किस्म के प्रयोग आरंभ कर देता है, बिना इस पर ध्यान दिये कि उसकी नीतियां सत्ता परिवर्तन के बाद मान्य रहेंगी कि नहीं । मैं अपनी बात समझाने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण देता हूं । आजकल प्रदेश की मुख्यमंत्री महोदया उच्च प्राथमिकता के साथ ‘गरीबों के सामाजिक उत्थान के लिए’ पार्क बनवाने तथा मूर्तियां लगवाने में जुटी हैं । इन मूर्तियों को बसपा के चुनावचिह्न से जोड़कर देखा जा रहा है । अगर भविष्य में ‘सपा’ सत्ता में आई तो संभव है कि वे मूर्तियों को ही तोड़ डालें । अगर नहीं, तो वे पार्कों और मूर्तियों के रखरखाव के लिए तो धन आबंटित करने से रहे । रखरखाव के अभाव में वे खुदबखुद ध्वस्त होने लगेंगी । सोचिये कि करोड़ों रुपये खर्च करके आज जो किया जा रहा है वह उचित है, जब उसे आदरभाव से नहीं देखा ही नहीं जा रहा है । कैसा लोकतंत्र है यह जिसमें ‘मेरी मरजी’ के सिद्धांत से शासन चल रहा हो । लोग क्या चाहते हैं इस पर विचार हो रहा है कहीं ? हमारी प्राथमिकताएं ऐसे ही तय होने लगें तो देश रसातल को नहीं जायेगा क्या ?

बहुत कुछ और कहा जा सकता है । अंत नहीं बातों का । पर बानगी के तौर पर इतना कुछ ही बहुत है । देश की तस्वीर इसी में काफी झलक जाती है ।

कुछ भी हो ‘स्वतंत्रता दिवस’ की दुबारा शुभेच्छाएं । क्या पता देश में शनैः-शनैः सन्मति का उदय हो और तस्वीर बदले । यही उम्मीद पाल लेता हूं । आमीन ! - योगेन्द्र जोशी

राष्ट्रीय पर्व पंद्रह अगस्त – रस्मअदायगी तक सिमटा अहमियत खोता हुआ एक दिवस (1)

आज पंद्रह अगस्त है, देश की स्वतंत्रता की याद दिलाने वाला एक राष्ट्रीय पर्व । एक ऐसा दिवस, जब स्कूल-कालेजों में मिठाई बंटती है, जिसका इंतजार बच्चों को रहता है – बच्चे जो अपने प्रधानाध्यापकों की उपदेशात्मक बातों के अर्थ और महत्त्व को शायद ही समझ पाते हों । एक ऐसा दिवस, जब सरकारी कार्यालयों-संस्थानों में शीर्षस्थ अधिकारी द्वारा अधीनस्थ मुलाजिमों को देश के प्रति उनके कर्तव्यों की याद दिलाई जाती है, गोया कि वे इतने नादान और नासमझ हों कि याद न दिलाने पर उचित आचरण और कर्तव्य-निर्वाह का उन्हें ध्यान ही न रहे । मैं आज तक नहीं समझ पाया कि लच्छेदार भाषा में आदर्शों की बातें क्या वाकई में किसी के दिल में गहरे उतरती है ? यह ऐसा दिवस है जिसकी पूर्वसंध्या पर राष्ट्रपति आम जनता को ‘उनकी भाषा’ में आशावाद का संचार करने वाली देश की लुभावनी तस्वीर पेश करता/करती है । ऐसा दिवस, जब लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री देश को उन योजनाओं का संदेश देते हैं, जो आम जन को सुखद भविष्य का दिलासा देते हैं, लेकिन जिनका क्रियान्वयन महज कागजी बनकर रह जाता है, हकीकत से कोसों दूर । राष्ट्रीय स्तर के उन संबोधनों को सुनकर एकबारगी आम आदमी को भी यह लगने लगता है कि अब उसकी किस्मत बदलने वाली है, किंतु उसका मोहभंग होने में कोई देर नहीं लगती ।

अस्तु, यह दिन है जश्न मनाने का, परस्पर बधाई देने का और देश के सफल भविष्य के सपने (पूर्वराष्ट्रपति डा. कलाम के शब्दों में) देखने का । मेरा भी कर्तव्य बनता है कि देश के नागरिकों को बधाई दूं और उनके सपनों के साकार होने की कामना करूं ।परंतु ऐसा करते समय दिल के कोने में शंका जगती है कि जो होना ही नहीं उसकी कामना करने का तुक ही क्या ? सवाल सिद्धांततः क्या हो सकता है का नहीं है; सवाल है कि परिस्थितियों की वास्तविकता किस संभावना की ओर संकेत करती है ? जो देश ‘स्वतंत्रता’ के माने भूल चुका हो, जहां स्वतंत्रता के अर्थ स्वच्छंदता, निरंकुशता, अनुशासनहीनता, उच्छृंखता, मनमरजी, और न जाने क्या-क्या लिया जाने लगा हो, वहां क्या और कितनी उम्मींद की जा सकती है ?

इस पर्व के प्रति मैं एक वयस्क के नाते बहुत उत्साहित कभी नहीं रहा । किशोरावस्था में अवश्य ही कुछ जोश रहा होगा, पर अब याद नहीं । किंतु पिछले कुछ वर्षों से उत्साह नाम की चीज ही गायब हो चुकी है । मेरे लिए यह अन्य आम दिनों की तरह एक साधारण दिन बनकर रह गया है, क्योंकि यह अपनी अर्थवत्ता खो चुका है । चूंकि बासठ (या इकसठ?) साल पहले एक परंपरा चल पड़ी, सो उसे हम सब अब बस निभाते चले आ रहे हैं । आगे भी निभाएंगे, परंतु कोई मकसद रह नहीं गया है ऐसा मुझे लगने लगा है । शायद मेरी आंखें ही धुंधली हो चुकी हैं कि मुझे मकसद दिखता नहीं ! मैं इस दिवस को दीपावली/ईद आदि जैसे धार्मिक उत्सव अथवा नानकजयंती/बुद्धपूर्णिमा आदि की तरह स्मरणीय दिवस के रूप में नहीं देखता । मेरी दृष्टि में ‘स्वतंत्रता दिवस’ और ‘गणतंत्र दिवस’ मिठाई बांटकर तथा भाषण के कुछ शब्द सुनाकर और ‘जन गण …’ के बोल गाकर रस्मअदायगी हेतु मनाये जाने के लिए नहीं है । मेरी नजर में तो ये दिन वैयक्तिक स्तर पर आत्म-चिंतन और दायित्व-निर्वाह के आकलन के लिए हैं और सामूहिक तथा सामुदायिक स्तर पर यह जांचने-परखने के लिए हैं कि देश कहां जा रहा है, हमारा शासनतंत्र आम आदमी की आकांक्षाओं की पूर्ति कर पा रहा है क्या, हमारी प्राथमिकताएं समाज के सबसे निचले तबके के हितों से जुड़ी हैं क्या ? आदि आदि ।

जब में गंभीर समीक्षा करता हूं तो देखता हूं सब उल्टा-पुल्टा चल रहा है । बस देश चल रहा है, भगवान् भरोसे । संतोष करने को कम और चिंतित होने के लिए बहुत कुछ दिखाई देता है । स्वाधीनता-संघर्ष में जिन्होंने देश के प्रति बहुत कुछ न्यौछावर किया, जीवन दांव पर लगाया, सुख-सुविधाएं त्यागीं, उन्होंने स्वतंत्र राष्ट्र की जो तस्वीर खींची वह, मुझे लगता है, कहीं मिट गयी और उसकी जगह उभर आयी एकदम अलग और निराशाप्रद तस्वीर । देश चलाने वालों ने उन मूल समस्याओं की ही अनदेखी कर दी, जिन पर प्राथमिकता के आधार पर विचार होना चाहिए था । क्या हैं वे समस्याएं जो मेरी नजर में माने रखती हैं ? उनकी सूची प्रस्तुत करने से पहले यह टिप्पणी कर लूं कि आज दुर्योग से देश अनायास एक नहीं, दो नहीं, कई-कई आपदाओं से घिरा है । तथाकथित आतंकवाद से तो देश लंबे अरसे से जूझ ही रहा है । उसके साथ ही तमाम अन्य घटनाएं भी आज देश को आतंकित कर रही हैं । नक्सलवाद खतरनाक रूप लेने की तैयारी में है । उसके ऊपर से इस बार की विकट अनावृष्टि अपना कहर ढा रही है, जिससे कृषि-उपज तो प्रभावित होनी है । पानी का अकाल सन्निकिट है, क्योंकि भूजल स्तर खतरनाक हालत को पहुंच रहा है । रही सही कसर ‘स्वाइन फ्लू’ का प्रकोप पूरा कर रहा है । देश क नौजवान बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर हैं । समाज के एक बहुत बड़े किंतु तिरस्कृत तबके को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं, उनके जीवन की अन्य आवश्यकताओं की बात करना ही फिजूल है । अमीर और गरीब के बीच की आर्थिक खाई निरंतर बढ़ रही है, जो देर-सबेर विकराल सामाजिक संघर्ष का रूप धारण कर सकती है । वस्तुतः ‘छिद्रेषु अनर्था बहुलीभवन्ति’ की उक्ति मौजूदा हालात पर लागू होती है । तब जश्न मनाने के हालात कहां हैं ?

मेरा इरादा उन कुछएक समस्याओं का जिक्र करना है, जिन्हें अरसे से नजरअंदाज किया जा रहा है, जब कि उनका त्वरित समाधान खोजा जाना चाहिए । इनका जिक्र बस इसे पोस्ट के चंद मिनटों या घंटा-डेड़-घंटे के बाद की पास्ट में । – योगेन्द्र जोशी

July 21, 2009

माननीय पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम की तलाशी – कुछ भी अजूबा नहीं !

खबर है कि विगत 24 अप्रैल की तारीख दिल्ली के इंदिरा गांधी अंताराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अपने पूर्व राष्ट्रपति माननीय डा. कलाम महोदय की सुरक्षा जांच की गयी । जांच करने वाले थे अमेरिकी हवाई सेवा ‘कांटिनेंटल एअरलाइंस’ के कर्मचारी । कहा जाता है कि भारतीय अधिकारियों ने उन्हें पूरी तौर पर समझाया कि पूर्व राष्ट्रपति सुरक्षा जांच के दायरे में नहीं आते हैं । कई अन्य अतिमहत्त्वपूर्ण गिने-चुने व्यक्तियों की भांति वे इस प्रक्रिया से मुक्त रखे जाने के हकदार हैं । लेकिन भारतीय नियम कानूनों की अनदेखी करते हुए अमेरिकी कंपनी के अधिकारियों ने वही किया जिसे करना वे अपना अधिकार समझते हैं ।

खबर तो बहुत बासी है और मुझे याद नहीं कि अपने समाचार माध्यमों ने इसका पहले कभी जिक्र किया हो । अगर किसी ने दो-चार शब्द छापे हों तो वे चर्चा में नहीं आये । बात खुली आज जब संसद में इस बात को लेकर सदस्यों ने सरकार से समुचित काररवाही करने की बात कही । हो सकता है सरकार को मालूम हो और वह चुप्पी साधे रहना चाहती हो । लेकिन जब विपक्ष ने बात छेड़ ही दी तो उसे तो कुछ कहना ही था । कड़ा विरोध जताने की बात हो रही है ।

अपनी आदत के अनुसार सरकार सदा ही ‘सख्त रवैया’ अपनाने की बात करती है, चाहे वह अमेरिका का मामला हो या पाकिस्तान, चीन और यहां तक कि नेपाल का । पर देश कर कुछ सकता नहीं ! कोई बताये कर ही क्या सकता है कोई ? वह भी अमेरिका के मामले में ? हम ईरान, उत्तर कोरिया या सद्दाम के समय का इराक तो हैं नहीं । हमें अमेरिका को नाराज नहीं करना है, भले ही बातें बड़े जोर-शोर से करें । असल में चुपचाप सब कुछ सह जाना हमारी नियति है । हम बाहरी देशों पर बुरी तरह निर्भर हैं । हमारी युवा पीढ़ी रोजी-रोटी के लिए बाहरी देशों भर निर्भर रहने लगी है । जहां उच्च शिक्षा और व्यावसायिक दक्षता वाले अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया का रूख करते हैं, तो कम योग्यता वाले अरब देश चुनते हैं । कोई इंजिनियर डाक्टर बनकर बाहर जाता है, तो कोई घरेलू नौकर बनकर । कोई उल्टे हमारे यहां नहीं आता न ? हम भला कैसे किसी को नाखुश कर सकते हैं ?

अमेरिका हमारी हैशियत समझता है । अमेरिकियों की नजर में हम भिक्षुक देश हैं । माफ करें आपको अवश्य ही मेरा ऐसा कहना अक्षम्य लगेगा । मैं जानता हूं, परंतु इस शब्द के प्रयोग के बिना मैं अपनी बात कैसे कहूं ? वैसे भी अमेरिका किसी को घास नहीं डालता है । उसके अपने नियम हैं हर क्षेत्र में । खास तौर पर सुरक्षा मामले में तो वह किसी की सुन ही नहीं सकता । आप उसके नियम मानिये; नहीं मानते तो फल भुगतिये । अमेरिका पूरी तरह हांकेगा आपको अपने तरीके से । नहीं मानेंगे तो कुछ न कुछ करने की कोशिश करेगा । लेकिन वह भी देवता तो नहीं कि जो चाहे करने में सफल हो ही जाये । कुछ न कर पाना उसके साथ भी हो सकता है, फिर भी वह अपनी ताकत दिखाने की हर संभव कोशिश करेगा ही ।

सरकार विरोध जतायेगी । अमेरिकी अधिकारी माफी मांग लेंगे, किंतु इसका मतलब यह नहीं कि वे बदल जायेंगे । अहंकार के मामले में अमेरिका की बराबरी कोई कर पायेगा । हम श्रेष्ठतम हैं और हमारा वर्चस्व निर्विरोध सभी ने स्वीकारना चाहिए यही अमेरिकी मानसिकता है । अपने लोग तो यूं भी पाश्चात्य जगत् की श्रेष्ठता को मूक भाव से स्वीकारते आये हैं । तभी तो उनके जैसा बनने की हर कोशिश की जा रही है । ‘मनमोहन’ सरकार पर यह इलजाम तो लगते आ रहे कि उसने अमेरिका के आगे झुकने की नीति अपना रखी है । जब कुछ कारगर कर ही नहीं सकते, तो ऐसे वाकयों की चुपचाप अनदेखी कर देनी चाहिए । – योगेन्द्र

July 11, 2009

अव्वल दर्जे की आबादी वाला देश हिंदुस्तान, आज नहीं तो कल !

आज विश्व जनसंख्या दिवस है, 11 जुलाई ।

लीजिए जश्न मनाइए, विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या भारत (इंडिया?) की । चौंकिए नहीं ! अगर आंकड़ों पर भरोसा (?) करें तो आज के दिन ऐसा नहीं है, पर कल तो हो ही जायेगा । अभी तक चीन की आबादी ही सबसे अधिक है । लेकिन चीन में जनसंख्या बहुत नियंत्रित जल रही है । अब आप वहां लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के न होने को इस बात के लिए श्रेय दें या वहां के औसत नागरिक की समझदारी को, अथवा दोनों को मिलाकर । अभी चीन की जनसंख्या हम (लगभग 115 करोड़) से करीब 18-20 करोड़ अधिक है । जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार जैसी चल रहीं है वैसी चलती रहे तो इस अंतर को हम बीस-एक साल में पाट लेंगे, इतने में नहीं तो पच्चीस-तीस साल में पाटने में सफल हो ही जायेंगे । नंबर एक बनने से चीन को छोड़ भला कौन रोक सकता है हमें । और वह है कि ‘कॉम्प्टीशन्’ से हटने की सोच रहा है । तब नंबर एक ! कहीं किसी बात में तो नंबर एक होने का गर्व कर सकेंगे ।

लेकिन एक शर्त है, कोई व्यापक प्राकृतिक आपदा देश पर कहर न बरपा डाले या भयंकर संक्रामक रोग अपने पांव न पसार बैठे । यदि अवर्षण जैसे कारणों से अकाल या दुर्भिक्ष की स्थिति व्यापक स्तर पर पैदा हो गई तो हमारी सरकारें उसे संभाल नहीं पायेंगी । कहां से भरेंगे लोगों के पेट ? थोड़ा भोजन भंडार पास में हो भी और कुछ बाहर से आयातित हो भी जाये, तो भी अधिसंख्य ग्रामीणों के जीवन के आधार कृषि और पशुधन को कैसे बचाया जाएगा ? हर बीतते वर्ष के साथ जो हालात देश में बनते हुए नजर आ रहे हैं उसमें हमारे समक्ष गंभीर जलसंकट के आसार दिखाई दे रहे हैं । देश के कई हिस्सों में पानी को लेकर अभी ही प्रदर्शन-दंगे हो रहे हैं, दुर्भिक्ष के समय क्या होगा ? गंभीर रोग-संक्रमण होने पर भी हालात बेकाबू हो सकते हैं । सरकारी अस्पतालों की दशा आज ही दयनीय है । आर्थिक दृष्टि से असमर्थ कितने लोगों को संतोषप्रद इलाज वहां मिलता है ? उन्हें अक्सर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है । तब व्यापक संक्रमण के फैलने पर हालात बेकाबू हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा । आप या मैं चाहें या न, तब जनसंख्या पर असर पड़ेगा ही । प्रकृति तो अपने तरीके से निबटेगी ही ।

शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

July 7, 2009

और अब ई.वी.एम. (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर हमला

एक-डेड़ माह पूर्व संपन्न चुनावों में पराजित दो-एक प्रत्याशियों ने अपनी हार का कारण इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को ठहरा दिया । हुआ यह था कि अहमियत रखने वाले कुछ राजनेता (जैसे माननीय चिदंबरम, श्रीमती मेनका गांधी) हारते-हारते जीत गये । मामूली अंतर से हार रहे इन नेताओं ने जब दुबारा मतगणना की मांग की थी और उनकी मांग मान ली गयी तो ये विजयी घोषित हो गये । परिणामों के इस प्रकार उलट जाने के कारण ही शायद कुछ प्रत्याशियों को ई.वी.एम. के प्रति शंका हो गयी होगी । रोचक तथ्य यह है कि मशीन पर लगाया गये उनके आरोपों को अन्य राजनेताओं ने नजरअंदाज करने के बजाय उस शंका के प्रति समर्थन देना आंरभ कर दिया । भाजपा के श्री आडवाणी और सीपीएम के श्री यचूरी आदि जैसे धुरंधर राजनेताओं ने एक बहस ही छेड़ दी है । क्रांग्रेस ने इस शंका को पूर्णतः निराधार कह दिया है । मुझे लगता है कि चुनाव में जिन प्रत्याशियों या दलों को अच्छे परिणाम मिले हैं वे चुप हैं, और नतीजे जिनके पक्ष में नहीं रहे उन्होंने बेचारे ई.वी.एम. पर ही दोष मढ़ना शुरू कर दिया है । अब सवाल यह है कि क्या ये मशीनें गड़बड़ करती हैं, कर सकती हैं ? मुझे अधोलिखित संभावनाएं नजर आती हैं:

शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

July 3, 2009

लोकलुभावन वायदों वाला भारतीय रेलवे बजट 2009 और सम्मोहित जनता

“पहली तारीख है जी पहली तारीख है । खुश है जमाना आज पहली तारीख है । …”

ये बोल हैं किसी बहुत पुराने सिनेमा के गाने के हैं, कुछ सही कुछ गलत जैसा मुझे याद है । न मैंने वह फिल्म देखी और न ही उसकी कहानी मुझे मालूम है । लेकिन मेरा अनुमान है कि कहानी में साधारण आमदनी वाले एक नौकरीशुदा आदमी के मुख से निकले बोल हैं ये बोल । कदाचित् उसका परिवार गिने-चुने पैसों के सहारे किसी तरह महीना बिताता है और जब पहली तारीख पर घर का मुखिया तनख्वाह बटोर कर आता है तो सभी के चेहरे पर खुशियां छा जाती हैं । हाथ में पैसा जो है, जिससे सभी अरमान पूरे होने हैं । उस समय वे अपने कष्ट कुछ समय के लिए भूल जाते हैं । पर वह खुशियां एक-दो दिन या हफ्ता भर में काफूर हो जाती हैं, और फिर चल पड़ता है सिलसिला अगली तनख्वाह के इंतजार का । जिंदगी की तकलीफदेह हकीकत अधिक दिनों तक नहीं छिपी-दबी रह पाती है ।

मुझे गीत के ये बोल याद आये आज के रेल बजट की खबर सुनते समय । कभी किसी एक टीवी चैनल पर तो कभी दूसरे पर भटकता रहा मैं । कहीं संसद में मंत्री महोदया के ‘उद्गार’ सुनने को मिल रहे थे, तो कहीं ‘आम’ लोगों की राय, तो कहीं अन्यत्र रेलवे बोर्ड से मौजूदा समय में या पहले कभी जुड़े विशेषज्ञों की टिप्पणियां । मुझे खेद है कि सब कुछ एक साथ मैं देख-सुन नहीं सकता था । खैर, कुल मिलाकर ‘पब्लिक’ खुश थी । लग रहा था कि लोगों को खुश करने वाले तोहफे ही तोहफे बांटे जा रहे थे । लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा कि जो वायदे पेश किए जा रहे थे वे पूरे हो सकेंगे । पूरे हो भी सकते हैं ? मैं खुद को नाउम्मीद पा रहा था, डर रहा था कि हम देश चलाते समय दूर की (जी हां, समय में दूर की) क्यों नहीं सोच पाते हैं । और मेरे डर को बढ़ा रहे थे वे ‘एक्सपर्ट’

शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

June 21, 2009

आज 21 जून फादर्स डे – जून का तृतीय रविवार

आज ‘फादर्स डे’ (Fathers’ day) है । मदर्स डे की भांति यह भी पश्चिम से अपने देश में आयातित एक और पर्व-दिवस है, और उसी की तरह हालिया डेड़-दो दशकों में देश के मध्यम तथा उच्च वर्गीय शहरी नवयुवाओं में लोकप्रिय हो चला है । इसे क्यों और कैसे मनाया जाए जैसे कुछ सवाल हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए, इसलिए कि अपने यहां तो उत्सवों और दिवसों की पहले से ही भरमार है । उनकी तुलना में इन आयातित दिवसों को अधिक अहमियत देना क्या उचित माना जा सकता है इस बात की समीक्षा की जानी चाहिए । अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने से पहले मैं इस ‘दिवस’ के बारे में उपलब्ध किंचित् जानकारी का संक्षेप में जिक्र करना समीचीन समझता हूं ।

कहा जाता है कि ‘फादर्स डे’ मनाने का विचार प्रथम बार एक अमेरिकी महिला, सोनारा लुई स्मार्ट (Sonora Louise Smart), के मन में तब आया जब वह वेस्ट वर्जीनिया के फेयरमॉंट नगर ( Fairmont, West Virginia) के एक चर्च (आज का Central United Methodist Church) में धर्मोपदेश सुन रही थीं । उपदेष्टा ने अपने कथनों में प्रसंगवश ‘मदर्स डे’ की चर्चा की थी । उस चर्चा से प्रेरित होकर सुश्री सोनारा को विचार आया था कि क्यों नहीं मदर्स डे की भांति फादर्स डे भी मनाया जाए, जिस दिन लोग अपने पिताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें । वस्तुतः सोनारा अपने पिता से बहुत प्रभावित रहीं, जिनके प्रति उनके मन में अपार सम्मान था । मां की छत्रछाया तो वह किशोरावस्था में ही खो चुकी थीं और उनके जीवन का अधिकांश भाग पिता के ही संरक्षण एवं सान्निध्य में बीता था । फादर्स डे के मूल में यही तथ्य कारगर था ।

शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

Next Page »

Blog at WordPress.com.