विजयादशमी के पर्व पर व्यक्त विचार: बेचारा रावण

अक्टूबर 6, 2011

विजयादशमी के पावन पर्व पर
सभी देशवासी एवं विदेशवासी भारतीयों को
मेरी मंगलकामनाएं

आज विजयादशमी का पर्व संपन्न हो चुका है । देश भर में अपने-अपने तरीके से इस मनाया गया है । इस पर्व पर देश के कई भागों में रावण के पुतले के दहन की परंपरा प्रचलन में है । कहा जाता है कि जब भगवान् श्रीराम ने रावण का वध करके लंका पर विजय पाई और वे अयोध्या लौटे तब नगरवासियों ने हर्षोल्लास के साथ विजय पर्व मनाया था । उसी घटना की स्मृति में यह पर्व रावण-दहन के रूप में मनाया जाता है ।

विजयादशमी बुराई के ऊपर अच्छाई की, असत्य के ऊपर सत्य की, अनर्थ के ऊपर अर्थ की, कदाचार के ऊपर सदाचार की, स्वोपकार के ऊपर परोपकार की, जीर के रूप में देखा जाता है । रावण को बुराई के प्रतीक के तौर पर प्रस्तुत करते हुए उसका दहन किया जाता है, और उस दहन को समाज में व्याप्त बुराइयों के खात्मे के संकेत के तौर पर देखा जाता है । रावण-दहन समाज की बुराइयों के खात्मे के संकल्प की याद दिलाता है, ऐसा समझा जा सकता है ।

क्या रावण-दहन वाकई में बुराइयों को दूर करने का संकल्प व्यक्त करता है, और क्या यह लोगों को अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे पाता है ? या यह एक विशुद्ध उत्सव भर है जिसे हम साल में इस दिन मनाते हैं और फिर अगले साल के उत्सव का इंतजार करते हैं । भले ही हम विजयादशमी के दिन संपन्न रावण-दहन की व्याख्या तरह-तरह से करें, हकीकत यह है कि यह भी होली-राखी के पर्व की तरह ही महज एक पर्व है – आज मनाया और साल भर के लिए भूल गए ।

मुझे नहीं लगता है कि लेखों-व्याख्यानों में कही जाने वाली ‘अच्छाई की जीत एवं बुराई की हार’ जैसी औपचारिक बातें वास्तविक जीवन से कोई ताल्लुक रखती हैं । मुझे तो यह मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों की तरह का एक और कार्यक्रम लगता है । बड़े-बड़े पुतले जलाओ, पटाखे छोड़ो, आतिशबाजी दिखओ, और एक दर्शनीय नजारा जुटी हुई भीड़ के सामने पेश करो, बस । बुद्धिजीवीगण राहण-दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर भले ही दर्ज करें, आम जन के लिए तो यह एक तमाशा भर है, जिसे देखने बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी भीड़ में शामिल होते हैं । रावण-दहन के बाद जिंदगी अपने ढर्रे पर चल निकलती है । जिसे घूस लेना है वह लेता रहेगा, जिसे दूसरे की संपदा हथियानी है वह हथियाएगा, जिसे कमजोर का शोषण करना है वह करता रहेगा, जिसे गुंडई-बदमाशी करनी है वह करेगा ही है । रावण का पुतला जले या न यह सब यथावत् चलता रहेगा । समाज में अच्छाई-बुराई का मिश्रण चलता रहेगा । फिर किस बात को लेकर बुराई पर अच्छाई की जीत कहें ? बुराई का प्रतीक तो जल जाता है, लेकिन बुराई बनी रहती है ! इस संसार का यही सच है ।

मैंने एसे अवसरों पर लोगों को कहते सुना है और लेखों में पढ़ा है कि हमें ‘यह करना चाहिए, वह करना चाहिए; ऐसा नहीं करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए’ आदि-आदि । क्या वयस्क मनुष्य इतना नादान होता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं का ज्ञान ही न हो ? अगर विशेषज्ञता स्तर की बात हो तो संभव है कि आम आदमी को बहुत कुछ समझाना पड़े । जैसे आदमी को यह बताने की आवश्यकता होती है कि हृद्रोग से कैसे बचा जाए, इंटरनेट कैसे काम करता है, केमिस्ट्री में पॉलिमराइजेशन क्या होता है, भौतिकी का सापेक्षता सिद्धांत क्या है, इत्यादि । लेकिन एक व्यक्ति के समाज के प्रति क्या कर्तव्य हैं यह भी कोई बताने की चीज है ? क्या यह भी किसी से कहा जाना चाहिए कि उसे नियम-कानूनों का पालन करना चाहिए और अपराध नहीं करना चाहिए । हम सब ये बातें बखूबी जानते हैं, लेकिन आदत से बाज नहीं आते हैं ।

इसमें दो राय नहीं कि यदि सभी लोग अपने-अपने हिस्से के कर्तव्य निभाएं तो समाज में बुराइयां ही न रहें । लेकिन ऐसा होता नहीं है । किसको क्या करना चाहिए यह तो सभी बता देते हैं, परंतु यह कोई नहीं बताता कि जब कोई कर्तव्य-पालन नहीं करता तो क्या करें । मुझे आज तक ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह बता सके कि तब क्या करें । आप अपराध करने वाले को सजा दे सकते हैं (वह भी इस देश में कम ही होता है !), लेकिन वह अपराध ही न करे, उस प्रवृत्ति से बचे, इसके लिए कोई क्या करे ? कुछ नहीं कर सकते न ! तब भ्रष्टाचार यथावत् बना रहेगा ।

रावण हर वर्ष जलेगा । बार-बार जलने के लिए उसे अस्तित्व में बना रहना है । रावण की अहमियत बनी रहे इसके लिए भ्रष्टाचार को भी बने रहना है । बेचारा रावण, समाज उसे बार-बार मरने को मजबूर करते आ रहे हैं । हा हा हा … ! जय हिंद – योगेन्द्र जोशी


क्या महात्मा गांधी की अहिंसा नीति वास्तव में व्यावहारिक है ?

अक्टूबर 1, 2011

गांधीजी और स्वाधीनता संघर्ष

कल 2 अक्टूबर गांधी जयंती है और साथ ही विश्व अहिंसा दिवस भी । वस्तुतः गांधीजी विश्व भर में उनके अहिंसात्मक आंदोलन के लिए जाने जाते हैं, और यह दिवस उनके प्रति वैश्विक स्तर पर सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है । यह आम धारणा लोगों में व्याप्त है कि गांधीजी के अहिंसक आंदोलन ने ही देश को स्वाधीनता दिलाई थी । मुझे इस मत को पूर्णतः स्वीकारने में हिचकिचाहट होती है । मेरी अपनी धारणा है कि उस संग्राम में अनेकों सेनानियों ने योगदान दिया था । उस काल में अंग्रेज सामाज्य कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था । एक ओर विश्वयुद्ध की समस्या पूरे यूरोप को घेरे थी तो दूसरी ओर विश्व के प्रायः सभी पराधीन देश अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए आंदोलनरत थे । ब्रितानी सरकार को यह अहसास हो चुका था कि अब अपने सामाज्य को यथावत् बनाए रखना आसान नहीं । याद करें कि उस कालखंड में अनेकों लोग यूरोप में मारे गये थे, और उन्हें ‘मैन-पावर’ की समस्या का सामना करना पड़ रहा था, जिस कारण से कालांतर में भारत-पाकिस्तान सरीखे देशों से कई-कई लोग पुरुष कर्मियों की कमी पूरा करने के लिए ब्रिटेन पहुंचे थे । ऐसे में ब्रितानी हुकूमत ने एक-एक कर विभिन्न देशों को स्वाधीनता देना आरंभ कर दिया था । गांधीजी के आंदोलन को अकेले फलदायक मान लेना उचित नहीं है । स्वाधीनता प्राप्ति में उन अनेकों लोगों का निर्विवाद योगदान भी शामिल था जो गांधीजी से मतभेद रखते थे ।

अगर यह मान भी लें कि गांधीजी का अहिंसक आंदोलन वस्तुतः कारगर रहा, तो भी इतने मात्र से उसकी प्रभाविता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उचित नहीं होगा । यद्यपि मैं व्यक्तिगत तौर पर अहिंसा का पक्षधर हूं, और कामना करता हूं कि सभी सांसारिक जन ऐसा ही करें, तथापि इस तथ्य को नकारना मैं नादानी मानता हूं और इस पर जोर डालता हूं कि ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा । मेरे अपने तर्क हैं; उन्हें प्रस्तुत करने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरे लिए महात्मा गांधी उन गिने-चुने ऐतिहासिक महापुरुषों – शायद दर्जन भर भी नहीं – में से एक हैं, जिनको मैं विशेष सम्मान की दृष्टि से देखता हूं । साफ-साफ कहूं तो इस सूची में उनके अलावा महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, ईसा मसीह, और यूनानी दार्शनिक सुकरात जैसे महापुरूष शामिल हैं । मैं इन सभी को उनकी सिद्धांतवादिता, स्पष्टवादिता, त्यागशीलता, आम जन के प्रति संवेदनशीलता, और इन सबसे अधिक अहम (भेड़चाल से हटकर) स्वतंत्र चिंतन की गुणवत्ता के कारण सम्मान देता हूं ।

हिंसा: स्वाभाविक प्रवृत्ति

अब मैं मुद्दे पर लौटता हूं । मनुष्य में तमाम प्रकार की स्वाभाविक प्रवृत्तियां अलग-अलग तीव्रता के साथ मौजूद रहती हैं । जो प्रवृत्तियां समाज के लिए किसी भी प्रकार से हितकर हों उन्हें सकारात्मक कहा जा सकता है, और जो अहितकर हों उन्हें नकारात्मक । किसी भी व्यक्ति में दोनों ही अलग-अलग मात्रा में मौजूद हो सकती हैं । परिस्थितियां नियत करती हैं कि कब कौन-सी प्रवृत्तियां हावी होंगी और कितने समय तक प्रभावी रहेंगी । इन प्रवृतियों में से एक हिंसा की प्रवृत्ति है, जो प्रायः सभी विकसित जीव-जन्तुओं में विद्यमान रहती है । वस्तुतः प्रकृति ने जीवधारियों में यह प्रवृत्ति अपनेे अस्तित्व को बनाए रखने के एक साधन के रूप में प्रदान किया है । इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि मनुष्य में भी यह स्वाभाविक तौर पर मौजूद रहती है । किंतु अन्य प्राणियों तथा मनुष्य में अंतर यह है कि मनुष्य हिंसात्मक प्रवृत्ति के नकारात्मक पहलू को समझ सकता है और यदि वह चाहे तो स्वयं को एक हद तक उससे मुक्त कर सकता है । ‘यदि वह चाहे तो’ एक महत्वपूर्ण शर्त है जो कम ही मौकों पर पूरी हो पाती है ।

कौन ऐसा है जो खुलकर एस बात की वकालत न करे कि समाज में संवेदनशीलता हो, परोपकार भावना हो, अन्य जनों पर हावी होने का भाव न हो, दूसरों के शोषण की प्रवृत्ति न हो, इत्यादि । पर क्या हमारे चाहने भर से ये बातें समाज में व्यापक स्तर पर दिखाई देती हैं ? विश्व के इतिहास में कितने महापुरुष हैं जो अपने अथक प्रयासों से समाज को इन गुणों के प्रति पे्ररित कर सके हों ? निश्चित ही एक बहुत बड़ा जनसमुदाय उन इतिहास-पुरुषों का प्रशंसक हो सकता है और स्वयं को उनका अनुयायी होने का दंभ भर सकता है । किंतु इसके यह अर्थ कतई नहीं है वह उन गुणों को अपनाने का संकल्प भी लिए हो । यह विडंबना ही है कि अनुयायी होने की बात अनेक जन करते हैं, परंतु तदनुरूप आचरण विरलों का ही होता है ।

मैं कहना चाहता हूं बहुत-से सामाजिक चिंतक/उपदेष्टा अहिंसा की बातें करते आए हैं, फिर भी हिंसा की प्रवृत्ति समाज में बनी हुई है और उससे लोग मुक्त नहीं हुए हैं । वास्तविकता के धरातल पर अहिंसा की बात कितनी सार्थक है यह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि किसी भी देश का शासन तंत्र हिंसा के प्रयोग पर टिका है । उनकी न्यायिक व्यवस्था मैं दंड का प्रावधान हिंसा पर आधारित है । शासन तंत्र नागरिकों में यह भय पैदा करता है कि यदि वे अनुचित कार्य करेंगे तो उन्हें दंडित होना पड़ेगा । चाहे परिवार के भीतर की बात हो या समाज की बात व्यक्ति को हिंसा का ही भय दिखाया जाता है, और लोगों को दंडित करके उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं । देश बाह्य सुरक्षा हो या आंतरिक, सेना एवं पुलिस का गठन ही हिंसा पर आधारित होता है ।

यह तर्क दिया जा सकता है कि उपर्युक्त मामलों को हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए । हिंसा परिभाषा ही बदलकर उसका औचित्य निर्धारण करना क्या उचित है यह विचारणीय एवं विवादास्पद विषय है । जब आप अहिंसक आंदोलनों की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि वे तभी सफल होते हैं जब दूसरा पक्ष – जो अक्सर शासन में होता है – भयभीत हो जाता है यह सोचते हुए कि आंदोलन उग्र होकर हिंसक रूप ले लेगा । हालिया अन्ना हजारे आंदोलन जब देशव्यापी हो गया तो सरकार को भय लगने लगा कि स्थिति विस्फोटक हो सकती है । अन्यथा कई जन अहिंसक विरोध का रास्ता अपनाते हैं, लेकिन असफल रहते हैं ।

अहिंसक विरोध: संदिग्ध सफलता

मेरा अनुभव यह है कि अहिंसक विरोध/आंदोलन तभी सफल होता है जब उठाया गया मुद्दा समाज को व्यापक स्तर पर उद्वेलित करता है । स्वाधीनता-पूर्व गांधीजी का आंदोलन, आठवें दशक का जेपी आंदोलन, और हालिया अन्ना हजारे का आंदोलन इसलिए सफल हुए – अगर आप सफल मानते हों तो – क्योंकि उठाया गया मुद्दा लोगों की सहभागिता पा सका और उन्हें आंदोलन से जोड़ सका । लेकिन जब मुद्दा क्षेत्रीय स्तर की अहमियत रखता हो या एक सीमित जनसमुदाय की दिलचस्पी का हो, तब सफलता की संभावना घट जाती है । वास्तव में जैसे-जैसे मुद्दे की व्यापकता घटती जाती है, वैसे-वैसे अहिंसक आंदोलन/विरोध की सफलता भी कम होते जाती है । देखने में तो यही आता है कि जब विरोध करने वाला अकेला या केवल दो-चार व्यक्तियों का समूह होता है, तब वह असफल ही हो जाता है । हरिद्वार में गंगा बालू उत्खनन रोकने के लिए अनशनरत स्वामी निगमानंद की मृत्यु इसी तथ्य की पुष्टि करता है । ऐसे अवसरों पर हिंसक आंदोलन ही कुछ हद तक सफल होते हैं, या शासन उनको दंड के सहारे दबा देता है, जो उसकी हिंसक नीति दर्शाता है ।

अहिंसक आंदोलन तभी सफल होता है जब विरोधी पक्ष में किंचित् संवेदना, लज्जा, विनम्रता एवं दायित्व भाव हो । जिसमें ये न हों उसका मन आंदोलन को देख पसीजेगा यह सोचना ही मुर्खता है । आज के विशुद्ध भौतिकवादी युग में लोग निहायत स्वार्थी एवं संवेदनशून्य होते जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में अहिंसा की वकालत करना बेमानी हो जाता है ऐसा मेरा दृढ मत है ।

गांधी दर्शन: केवल अहिंसा ही नहीं

गांधीजी की चर्चा अहिंसा के पुजारी के तौर पर की जाती है । लोग यह भूल जाते हैं कि गांधीजी के अन्य बातें मानव समाज के लिए अहिंसा से कम अहमियत नहीं रखती हैं । वे शारीरिक परिश्रम के पक्षधर थे । वे आ बात पर जोर देते थे हर इंसान को अपना निजी कार्य को यथासंभव स्वयं ही करना चाहिए । वे मानव-मानव के बीच असमानता के विरोधी थे । उनके मतानुसार हमारी नीतियां आर्थिक विषमता को घटाने वाली होनी चाहिए । वे ग्रामीण विकास, कृषि, एवं घरेलू उद्योगों की वकालत करते हैं । दुर्भाग्य से वर्तमान भारतीय समाज इन मूल्यों को भुला चुका है । कहां हैं गांधीजी अब ?योगेन्द्र जोशी


‘सीबीआइ की गृहमंत्री श्री चिदंबरम से पूछताछ’

सितम्बर 25, 2011

पिछले दो-तीन दिनों से 2जी स्पेक्ट्रम के तथाकथित घोटाले का मुद्दा फिर से गरमाया है । बिना राज्य के ए. राजा देश के सुप्रसिद्ध कारागार तिहाड़ जेल में कई अन्य साथियों के साथ आजकल पिकनिक मना रहे हैं, या स्वाथ्यलाभ कर रहे हैं । सुनते हैं वहां की व्यवस्था उच्चतम श्रेणी की है । आप-हम जैसों को उस दिव्यस्थल के दर्शन भी पाना कठिन है, किंतु इन महानुभावों को वहां की हर सेवा उपलब्ध है । किस्मत अपनी-अपनी !

टीवी पर उक्त ‘घोटाले’ की असीमित चर्चा ने मेरे दिमाग पर पूरा कब्जा कर लिया है । उससे संबंधित सभी नेताओं-अभिनेताओं की बातें सोते-जागते खयालों में घूमती रहती हैं । कल ही रात नींद में मुझे सपना दिखा कि कैसे श्री चिदंबरम से पूछताछ होती है ।

सपने में देखता हूं कि विपक्ष के चिदंबरम-विरोध के मद्देनजर डा. सुब्रमण्यम स्वामी की इस मांग को शीर्षस्थ अदालत ने मान लिया है कि देश की सर्वाधिक ‘कार्यकुशल’ पूछताछ संस्था सीबीआई श्री चिदंबरम से पूछताछ करे । वैसे तो वे ग्रहमंत्री हैं, लेकिन तथाकथित घोटाले के दौरान वे ही वित्तमंत्री थे । बतौर वित्तमंत्री के उन्होंने अवश्य ही घोटाले में अहम भूमिका निभाई होगी ऐसा डा. स्वामी का कहना है । बहरहाल अदालत ने सीबीआइ को आदेश दिया कि जाओ श्री चिदंबरम से पूछो कि उन्होंने राजा की क्या मदद की थी ।

बेचारी सीबीआइ करे क्या ? वह तो श्री चिदंबरम के अधीनस्थ ग्रहमंत्रालय का एक अंग भर है । उसे हिम्मत तो नहीं कि अपने मालिक से कुछ पूछे, लेकिन कुछ तो करना ही था, आखिर अदालत को जवाब जो देना था ।  हिम्मत करके सीबीआइ के निदेशक महोदय अधिकारियों का एक दल गठित करते हैं । हर कोई ना-नुकुर करता है और जांचदल में शामिल होने से बचता है । निदेशक जी को कुछ पर तरस भी आता है, और वे उन्हें छूट भी दे देते हैं और दल में तेजतर्रार समझे जाने वाले कुछएक अधिकारी शामिल कर लिए जाते हैं । दल में शामिल ये लोग अपनी किस्मत को कोसते हैं कि कहां फंस गये, किंतु अपनी तेजतर्रार होने की छबि बचाए रखने के लिए हांमी भर देते हैं । उनमें से श्री हिकलानी को दल का नेता घोषित कर दिया जाता है ।

जांचदल दो-एक दिन ‘होमवर्क’ करने में जुटा रहता है, क्या करना है, क्या सवाल पूछने हैं, इत्यादि । और उसके बाद निकल पड़ता है श्री चिदंबरम से मिलने उनके कार्यालय । अपना परिचय देने हुए दल के नेता श्री हिकलानी मंत्री महोदय के निजी सचिव से मुलाकात की व्यवस्था करने को कहते हैं । अपना परिचय तो उन्होंने औपचारिकतावश दिया, अन्यथा उनके मंत्रालय के सभी अधिकारी तो उन्हें जानते ही हैं । मंत्रीजी के कक्ष में पहले से चल रही बैठक पूरी होने तक सचिव जी उनसे प्रतीक्षा करने को कहते हैं । दल के सदस्य अतिथि-कक्ष में इंतिजार करने लगते हैं ।

बैठक की समाप्ति के उपरांत मंत्री महोदय उन्हें अपने कक्ष में बुलाते हैं । सहमे-से हिकलानी जी अपने दल के साथ अंदर दाखिल होते हैं । मंत्री जी आरामदेह कुर्सी के सहारे पीठ टिकाए हुए उनकी ओर मुखातिब होते हैं और मुस्कुराते हुए सवालिया अंदाज में बोलते है, “कहिए हिकलानी जी, कैसे आना हुआ, वह भी इतने जनों के साथ ? सब खैरियत तो है न ?”

दल के प्रमुख जवाब देते हैं, “वैसे तो सब ठीक है सर, लेकिन …”, और क्षण भर के लिए चुप हो जाते हैं । मंत्री जी उन्हें आश्वस्त करते हुए पूछते हैं, “लेकिन क्या ? बेहिचक बताइए, मैं मदद करने की भरसक कोशिश करूंगा । आखिर देश का एक अहम महकमा है आपका, उसके कर्मी परेशानी में हों तो मैं भला निश्चिंत कैसे रह सकता हूं ?”

“सर, बात ये है कि देश की उच्च अदालत ने हमें परेशानी में डाल दिया है । अदालत कहती है कि पूर्व वित्तमंत्री और अब वर्तमान गृहमंत्री, यानी आप, से भी पूछो कि 2जी स्पेक्ट्रम में उनकी क्या भूमिका रही है । पता लगाओ कि उन्होंने ए. राजा की कितनी मदद की थी । अब आप ही बताएं हम आपसे क्या पूछें ?” दल के मुखिया ने कहा ।

“अरे इतनी-सी बात ? इसमें परेशान होने की क्या बात ? जो मैं बताऊं वह कोर्ट में जाकर उगल देना ।”

“वह तो ठीक है, सर । लेकिन खानापूरी के लिए कुछ सवाल-जवाब तो करने ही पड़ेंगे । हमने कुछ सवाल तैयार किए हैं । आप कहें तो आपके सामने पेश करें ?”

“ठीक है, पूछिए जो पूछना हो, मुझे क्या परेशानी होगी भला ।”

“वो तो हम भी जानते हैं, सर, कि मामले से आपका कुछ लेना-देना नहीं है । लेकिन करें क्या, हमारी भी मजबूरी है ।”

और फिर शुरू होता है सवाल-जवाबों का सिलसिला । मंत्री जी बिलाझिझक सवालों का जवाब फटाफट देने लगते हैं । अधिकतर सवालों के जवाब वे हां या ना में ही देते हैं, और कुछ के बारे में “मुझे नहीं मालूम” कहकर सीबीआइ को संतुष्ट करते हैं । एक सवाल के उत्तर में वे थोड़ा विचलित होते हैं और कहते हैं, “मुझे याद नहीं ।” और फिर उल्टे अधिकारियों से ही पूछ बैठते हैं, “अरे भई, आदमी की याददास्त इतनी मजबूत नहीं होती कि हर बात याद रह सके । आप ही बताइए कि पिछले महीने की 20 तारीख डिनर में आपने क्या लिया था ? याद नहीं ना ? फिर सोचिए कि बरसों पहले किससे क्या बात हुई यह कैसे मुझे याद आ सकता है ? लिखित रूप में कहीं कुछ बचा हो तो कह नहीं सकता ।”

दल के सदस्य समवेत स्वर में हां में हां मिलाते हुए कक्ष से निकलने को उद्यत होने लगते हैं । तब तक वहां चाय और कुछ स्नैक्स आ चुकते हैं । मंत्री जी चाय की चुस्की लेने का आग्रह करते हुए कहते हैं, “ये जरूर देख लीजिएगा कि भूल से आप कोर्ट में कुछ उल्टा-सीधा जवाब न दे बैठें ।”

फिर समवेत स्वर में उत्तर मिलता है, “यह सब कहने की जरूरत नहीं आपको, आप निश्चिंत रहें ।”

सपने के दृश्य अभी चल ही रहे थे कि मेरी आंख खुलती है और देखता हूं कि श्रीमती जी नींबू की चाय हाथ में लिए हुए मुझे जगा रही हैं ।

(नोटः वैसे तो मैं ही आम तौर पर सुबह की नींबू-चाय बनाता हूं और श्रीमती जी को भी पिलाता हूं । लेकिन इस बार संयोग से देर तक सोता ही रह गया, और रोज की मेरी भूमिका उन्होंने ही निभा ली । आगे यह भी स्पष्ट कर दूं कि यह सब मेरे सपने में घटित बात है, और इस वर्णन पर मेरा ‘कॉपीराइट’ है ! कह नहीं सकता कि यह सब हकीकत में कभी घटेगा कि नहीं ।) – योगेन्द्र जोशी


बेटे की करतूत – बाप की शर्मिंदगी (चीन की खबर)

सितम्बर 10, 2011

“चीनी सेना के एक जनरल और गायक ने उस जोड़े से माफ़ी मांगी है जिसे उनके पुत्र ने सड़क पर हुई लड़ाई के दौरान पीट दिया था.”
ये हैं बीबीसी की इंटरनेट साइट (BBC website) पर छ्पी एक खबर के आरंभिक शब्द। खबर के अनुसार चीनी सेना के एक जनरल के बेटे और उसके साथी का सड़क पर एक दंपती से झगड़ा हो गया, जिसके बाद उन्होंने दंपती की पिटाई कर दी। घायल पति-पत्नी को अस्पताल में भरती कराना पड़ा। जनरल महोदय स्वयं अस्पताल पहुंचे जहां उन्होंने माफ़ी मांगते हुए ये शब्द भी बोले:
“पिता के तौर पर मैं अपने पुत्र के व्यवहार की ज़िम्मेदारी लेता हूं. मैं इतना शर्मिंदा हूं कि अब आप चाहें तो मेरी पिटाई कर दें. मैं अपने बेटे की ग़लतियों का पक्ष नहीं लूंगा.”

उक्त समाचार यह भी बताता है कि ऐसी ही एक घटना पिछ्ले वर्ष भी हुई थी जिसमें एक पुलीस उच्चाधिकारी के बेटे ने दो छात्रों को रौंदा था, जिसमें एक की बाद में मौत हो गयी। मीडिया में तब भी खूब चर्चा हुई थी और अपराधी को सजा भी दी गयी।

समाचार के अनुसार चीन में भी भारत की तरह उच्चपदस्थ अधिकारियों के बच्चे अपने बाप का रुतवा दिखाकर अपराधों से बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन वहां के सख्त कानून के सामने वे हारमान हो जाते हैं। अपने यहां तो ऐसे बिगड़ैल युवकों के उच्च संबंध उन्हें बचाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं, और ये युवक बच निकलते हैं। यहां के बापों का माफ़ी मांगना तो असंभव-सा है। चीन में अपने बच्चों की गलत हरकतों के लिए माफ़ी तो मांगी जाती है। यहां तो चोरी और उपर से सीनाजोरी चलती है। कुछ फ़र्क तो है ही चीन और अपने महान्‌ देश में! – योगेन्द्र जोशी


अण्णा के अनशन की समाप्ति और सिमरन-इकरा की भूमिका

अगस्त 29, 2011

दिल्ली के रामलीला मैदान पर भूख-हड़ताल पर बैठे अण्णा हजारे जी ने कल पूर्वाह्न करीब 10 बजे अपना अनशन तोड़ दिया, और उसी के साथ भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके अभियान का पहला एवं अहम चरण पूरा हुआ । आगे का कार्य देश के जनप्रतिनिधियों के हाथ में है । उम्मीद की जानी चाहिए कि वे टालमटोल का रास्ता न अपनाकर यथाशीघ्र (जन) लोकपाल बिल का अंतिम मसौदा तैयार करके उसे पास कर पायेंगे ।

अण्णा के अनशन तोड़ते समय उनको शहद एवं नारियल पानी पिलाने का कार्य किया दो छोटी बच्चियां: इकरा, 4 साल, समीना बेगम तथा शहाबुद्दीन की बेटी, और सिमरन, 5 साल, रेखा तथा बच्चू सिंह की बेटी ने । पहली मुस्लिम समुदाय की तो दूसरी हिंदू दलित वर्ग की थी । क्या राज था इनको खास तौर पर चुनने का ? खुलकर शायद कहा न जा रहा हो, लेकिन बात छिपी नहीं है ।

दिल्ली के रामलीला मैदान में चल रहे अनशन के दौरान टीवी चैनलों के माध्यम से एक बात मेरे देखने में आई । मुस्लिम समुदाय तथा हिंदू दलित वर्ग के कुछ जन अण्णा के आंदोलन से नाखुश नजर आये, यहां तक कि वे विरोधी स्वर व्यक्त करने से भी नहीं बचे । कुछ जन तो यह भी कह बैठे कि यह आंदोलन दलित विरोधी है । उनका कहना था कि आंदोलन हिंदू सवर्णों के द्वारा चलाया गया है और उसमें दलितों एवं मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नहीं है । ऐसे खयालात इन समुदायों के आम लोग कहते तो मैं उनकी बातों को तवज्जू न देता । लेकिन कहने वालों में बुद्धिजीवी भी शामिल थे ।

मुझे उनके तर्क हास्यास्पद और बेमानी नजर आते हैं । इस संदर्भ में निम्नांकित बिंदुओं पर तनिक विचार करेंः

■ (1)  

अण्णा का आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध था और उसके निवारण के लिए सरकार पर दबाव डालने हेतु वे अनशन पर बैठे थे । उसके अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचने में अभी कितनी अड़चनें आएंगी कहना मुश्किल है । भ्रष्टाचार का मामला देश के किसी समुदाय से जुड़ा नहीं हैं । देश के अधिकांश लोग, विशेषकर कमजोर नागरिक जिनके पास धन, बाहुबल, राजनैतिक पहुंच या प्रशासनिक संरक्षण नहीं है, वे भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं । उक्त आंदोलन उसके निवारण की दिशा में उठाया गया कदम है । यह किसी तबके के हित-साधन में नहीं किया गया । तब किस आधार पर कुछ दलितों/मुस्लिमों को इससे विरोध था ?

■ (2)    

मैं समझता हूं कि आंदोलन का विचार समाज के 5-10 संवेदनशील जनों में पैदा हुआ होगा, और उन्होंने कुछ और लोगों को स्वयं से जोड़ते हुए अण्णा के नेतृत्व में मुहिम छेड़ दी होगी । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने समाज के किसी वर्ग विशेष से साथ देने के लिए सदस्यों को नहीं चुना होगा । जिसमें दिलचस्पी जगी होगी और जिसे भी सहभागिता निभाने में पर्याप्त समय तथा ऊर्जा लगाने की सामर्थ्य लगी होगी वह जुड़ा होगा । संयोग से यदि किसी समुदाय विशेष का कोई कार्यकर्ता इस मुहिम में नहीं शामिल हो सका हो तो इससे यह कहना कि यह आंदोलन उस खास समुदाय के विरुद्ध है सर्वथा अनुचित है । अगर किसी दलित/मुस्लिम ने आगे बढ़कर इसमें सहभागिता निभाने की बात की होती और उसको मना कर दिया होता तो वह विरोध का आधार बन सकता था । मुझे विश्वास है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा । ध्यान रहे कि आंदोलन उसकी व्यवस्था करने वालों तक सीमित नहीं था । दिल्ली तथा अन्यत्र आंदोलन में सम्मिलित होने वाले विशाल जन समुदाय में तो सभी तबकों के लोग थे । फिर विरोध कैसा ?

■ (3)    

जहां तक आंदोलन के कर्ताधर्ताओं में दलितों या मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व का सवाल है, इस पर भी ध्यान देें कि कई अन्य समुदायों या सामाजिक तबकों के मामले में भी यह कहा जा सकता है । मुझे आंदोलन की केंद्रीय समिति में कोई सिख, इसाई या बौद्ध नहीं दिखा । ओर क्षेत्रीयता की बात करें तो कोई, बंगाली, असमी या कन्नड़ भी उसमें नहीं था । वे भी विरोध के पक्ष में तर्क दे सकते थे । तब फिर दलितों/मुस्लिमों को ही मौजूदा मामला नागवार क्यों  गुजरा ?

■  (4)    

इस संदर्भ में एक विचारणीय तथ्य यह है कि जिन मुद्दों पर जनांदोलन होते हैं उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है । पहली श्रेणी में वे आते हैं जो किसी खास सामाजिक वर्ग या भौगोलिक क्षेत्र से सरोकार रखते हों । मुस्लिम वर्ग के लिए आरक्षण की आजकल की जा रही वकालत और अलग तेलंगाना राज्य की मांग इस प्रकार के मुद्दे हैं । ऐसे मुद्दे देश के सभी नागरिकों को आकर्षित नहीं करते हैं । इसलिए इन मामलों में राष्ट्रव्यापी जनसमर्थन की आशा नहीं की जाती है । इनके विपरीत दूसरी श्रेणी में वे मुद्दे आते हैं जिनका ताल्लुक किसी खास समुदाय से या क्षेत्रविशेष से नहीं होता । महंगाई का मुद्दा इस श्रेणी का ज्वलंत उदाहरण है । भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे से अण्णा के आंदोलन का संबंध रहा है वह भी सभी से सरोकार रखता है । इन दोनों के मामले में जनसमर्थन देश के हर कोने से और हर तबके के नागरिक से मिल सकता है । इन मुद्दों को सवर्णों अथवा केवल हिंदुओं से जोड़ना किसी भी तरह से उचित नहीं है ।

अण्णा आंदोलन में मुस्लिमों या दलितों की सहभागिता के न दिखाई देने का कारण मुद्दे का संकीर्ण होना नहीं है । मेरा अनुभव यह है कि इन सामाजिक तबकों के सामाजिक कार्यकर्ता आम तौर पर केवल उन्हीं मुद्दों में दिलचस्पी लेते जो इन तबकों से संबंध रखते हों । वे अक्सर दलितों या मुस्लिमों के हितों तक ही अपने कार्य सीमित रखते हैं । ऐसे दलित/मुस्लिम कार्यकर्ता अधिक नहीं होंगे जो अपने-अपने समुदायों के हटकर सभी नागरिकों के हितों की बात करते हों । ऐसी स्थिति में इन समुदायों के लोगों की भागीदारी अण्णा आंदोलन के प्रबंधन में यदि नहीं दिखी तो इसमें आश्चर्य नहीं है ।

अंत में इस बात पर आपका ध्यान खींचता हूं कि अण्णा के अनशन तोड़ने में दो बच्चियों, सिमरन एवं इकरा, की खास भूमिका दलित एवं मुस्लिम वर्गों को यह बताने के लिए रही होगी कि आंदोलन के कर्ताधर्ताओं को इन समुदायों से कोई परहेज नहीं । उनका समर्थन सहर्ष स्वीकारा जाएगा यह संदेश उक्त घटना में निहित है । – योगेन्द्र जोशी


अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

अगस्त 14, 2011

अभी स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या है । कल देशवासी इस दिवस पर जश्न मनाएंगे । इस अवसर पर

आज देश को स्वाधीन हुए 64 साल हो रहे हैं । इस मौके पर कुछ लोग – मेरा खयाल है कि बहुत नहीं – उत्साहित हो रहे होंगे, उमंग में होंगे, प्रगति करते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहे राष्ट्र का सपना देख रहे होंगे, इत्यादि । मैं सोचता हूं कि कदाचित् अधिकांश जनों की नजर में यह दिवस औपचारिकता में मनाए जाने वाला दिन हो चुका होगा । और मेरे जैसे कुछ गिने-चुने जनों – जिन्हें आप भ्रमित या सनकी मानने में देरी नहीं करेंगे – की दृष्टि में यह अपनी सार्थकता खो चुका दिवस बनकर रह गया है । मुझे इस दिन कुछ भी नया नजर नहीं आता । कुछ ऐसा नहीं देख पाता हूं जो मुझे आशान्वित कर सके । सोचने लगता हूं कि क्या यह देश ऐसे ही चलता रहेगा ?

देश को आजाद हुए इतना समय बीत चुका है, जिसमें दो पीढ़ियां पैदा हो चुकी हैं । जिन्होंने देश को आजादी पाते देखा था उनमें से कई अब इस धरती पर नहीं रहे, और जो अभी हैं उनके अपने भविष्य के लिए इस आजादी के सार्थकता समाप्तप्राय मानी जा सकती है । स्वाधीनता की अर्थवत्ता तो उनके लिए है जिन्हें जिंदगी का सफर अभी तय करना है । क्या वे उस भारत को देख पाएंगे जिसका सपना उन लोगों ने देखा था, जिन्होंने छोटी-छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी तक कुर्बानियां दी थीं ? मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती । पिछले करीब चार दशकों से मैं इस देश के लोकतंत्र को देख रहा हूं, और इसकी गुणवत्ता में लगातार आ रही गिरावट को अनुभव करता आ रहा हूं । आज की तस्वीर वह नहीं है जिसे स्वाधीनता-संग्रामियों ने 1947 में अपने-अपने जेहन में संजोयी थी ।

कुछ लोग विभिन्न क्षेत्रों में देश की प्रगति की चर्चा करते हुए जरूर संतोष जताएंगे । वे लोग मेरे जैसे ‘वैचारिक अल्पसंख्यकों’ की सोच को बेतुकी, बेमानी, हास्यास्पद और निराधार इत्यादि कहने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे । वे कहेंगे कि देश ने न्यूक्लियर टेक्नालाजी (नाभिकीय तकनीकी) में महारत हासिल करके दुनिया को अपनी क्षमता दिखा दी है । उसने अपनी स्वयं की संचार सैटेलाइट एवं राकेट तकनीकी विकसित कर डाले हैं । देश अपने द्वारा विकसित मिसाइलों से शत्रुओं का सामना करने में समर्थ हो रहा है । और इन बातों के आगे जाकर, 8-9 फीसदी आर्थिक विकास दर से बढ़ते हुए ‘सुपरपावर’ बनने जा रहा है । इस प्रकार तमाम दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए देश की स्वाधीनता एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता सिद्ध करेंगे ।

निःसंदेह इस प्रकार की उपलब्धियों का अपना महत्त्व है, जिसे मैं अस्वीकार नहीं करता । किंतु ये स्वतंत्रता की सार्थकता एवं लोकतंत्र की सफलता के आकलन के लिए उपयुक्त मापदंड नहीं माने जा सकते । स्वाधीनता संग्रामियों ने इस विचार के साथ संधर्ष नहीं किया था कि एक दिन देश सफल पोखरन विस्फोट कर पाएगा, या अग्नि मिसाइल विकसित करके अपनी क्षमता दिखा पाएगा, या चंद्रमा पर चंद्रयान उतारने में सफलता प्राप्त कर लेगा, इत्यादि । अगर देश आजाद न हुआ होता तो भी ऐसी चीजें शायद इस देश में हो जातीं, क्योंकि अंग्रेजों के लिए यह विशाल देश ऐसे वैज्ञानिक तंत्रों के विकास के लिए उपयुक्त भूक्षेत्र होता । वे अपनी सामरिक एवं संचार संबंधी आवश्यकताओं के लिए ऐसा कदाचित् करते ही, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने रेल पटरियों का जाल देश में विछाया, टेलीफोन एवं तारघरों की स्थापना की, विद्युत् आपूर्ति आंरभ की । इन सबकी शुरुआत स्वतंत्र भारत में नहीं हुई; हमने जो विरासत में पाया उसे आगे बढ़ाया । इस प्रकार के विकास कार्य विदेशी शासक भी अपने हित-साधन में अवश्य करते यह मेरी समझ कहती है । ऐसा होता या न इस बात की अहमियत उतनी नहीं जितनी वे बातें जिनका मैं जिक्र करने जा रहा हूं ।

याद रहे स्वाधीनता संघर्ष का मूल लक्ष्य था ऐसी शासकीय व्यवस्था स्थापित करना जो पूर्णतः देशवासियों के हाथ में हो, जिस पर हमारे देशवासियों का नियंत्रण हो, जो जनाकांक्षाओं के अनुरूप होतत्कालीन जननेताओं का सपना था ऐसे भारत का निर्माण करना, जहां लोगों के बीच समानता हो, लोग शिक्षित हों, जाति, धर्म एवं क्षेत्र के नाम पर सामाजिक भेदभाव न हो, न्यायिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त हो ताकि न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें न खानी पड़े, भ्रष्टाचार न हो, राजनीति में पारदर्शिता और शुचिता हो, चिकित्सा सेवा निर्धनों को भी मिल सके, आर्थिक विषमता न्यूनतम हो, और जहां सरकारें जरूरतमंदों पर सबसे अधिक ध्यान दे । इस प्रकार के अनेकों बिंदु गिनाए जा सकते हैं जिनके आधार पर शासकीय व्यवस्था की सफलता का आकलन किया जाना चाहिए । ये वे बिंदु हैं जिनकी अहमियत आम आदमी की जिंदगी में हर क्षण बनी रहती है । चंद्रयान जैसे अभियानों से आम आदमी की जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता है ।

अवश्य ही किसी राष्ट्र के पुनर्निमाण के लिए 64 वर्ष का समय बहुत नहीं है । किंतु यह इतना समय तो है ही कि हमारा राजनैतिक नेतृत्व सही दिशा में आगे वढ़ रहा है इस बात के प्रति देशवासी आश्वस्त हो पायें । क्या आज के हालात बेहतर कल का विश्वास दिला पा रहे हैं ? यह देश दो भागों में - इंडिया एवं भारत – में बंट चुका है इसे अब खुलकर कहा जाने लगा है । क्यों ? क्या देश में राजनीति में साफ-सुथरे छवि वाले नेताओं की संख्या घट नहीं रही है, और उसमें आपराधिक छवि के लोगों की संख्या क्या लगातार नहीं बढ़ रही है ? क्या जातीय, धार्मिक एवं क्षेत्रीय आधार पर लोगों को बांटकर अपने-अपने वोटबैंक बनाने की प्रवृत्ति घटने के बजाय बढ़ नही रही है ? क्या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार दिन-ब-दिन बढता नहीं जा रहा है ? क्या पुलिस बल लोगों की सहायक संस्था बनने के बजाय सत्तासीन राजनेताओं के हाथ में दमन का हथियार नहीं बन रहा है ? किसी ने सरकारी नीतियों एवं कार्यशैली का विरोध किया नहीं कि उस पर पुलिस का डंडा चल जाता है ! क्या सरकारी शिक्षा-संस्थानों की व्यवस्था चरमरा नहीं रही है, और उनकी जगह ‘प्राइवेट’ संस्थानों ने नहीं ले ली है, जो केवल पैसे वालों को शिक्षा देने और धनोपार्जन करने में विश्वास करती हैं ? क्या चिकित्सा व्यवस्था भी निजी व्यवसाय नहीं बन चका है, जिसका लाभ केवल राजनेताओं, सरकारी कर्मचारियों एवं अमीरों को मिल सकता है किंतु आम आदमी को नहीं ? उसके लिए जो अस्पताल हैं उनके हाल छिपे नहीं है ।

ये तो सवालों की बानगी है, असल में इस प्रकार के अनेकों सवाल मेरे जेहन में उठते हैं और उनका उत्तर मुझे नकारात्मक और बेचैन करने वाला ही मिलता है । अगर आपको ऐसा कुछ भी नहीं लगता है, और चारों ओर अच्छा ही अच्छा नजर आता है तो मैं आपको भाग्यशाली मानता हूं । काश कि मेरी ‘वैचारिक दृष्टि’ इतनी धुंधली हो पाती कि हकीकत नजर न आ सके !

यह कैसा लोकतंत्र है इस पर गौर करिए । हमारे जनप्रतिनिधियों की विकृत सोच क्या है यह बताता हूं । कांग्रेस के नेता तो अब खुलकर कहते हैं कि आम आदमी का सोचने का अधिकार उसके वोट डालने तक ही सीमित है । उसके बाद उसकी सोच 5 साल तक जनप्रतिनिधि के हाथ गिरवी हो जाती है । क्या सही है और क्या गलत, क्या होना चाहिए और क्या नहीं, कैसे कानून बनने चाहिए और कैसे नहीं इन बातों पर अपनी राय देने का उसे अधिकार नहीं है; उसके विचारों की कोई अहमियत नहीं है । केवल प्रनिनिधि ही सोचने का अधिकार रखता है, और उसे भी अपने दल की विचारधारा के अनुसार ही मत व्यक्त करने का अधिकार है । उनके अनुसार हमारा संविधान कहता है (?) कि चुन लिए जाने के बाद समस्त अधिकार जनप्रतिनिधि को मिल जाते हैं और आम आदमी न मत व्यक्त कर सकता है न उसको लेकर विरोध प्रकट कर सकता है । सत्तासीन दल जो कहेगा उसे ही आम आदमी को अपनी राय समझनी होगी । कुल मिलाकर उसके विचारों का अपने लोकतंत्र कोई स्थान नहीं है । क्या लोकतंत्र की इसी परिभाषा प्रतिष्ठापित करने के लिए स्वाधीनता हासिल की गयी थी ?

सोचें और तनिक अपने वैचारिक ‘कोकून’ से बाहर निकलकर भी देखें । वंदे मातरम् । – योगेन्द्र जोशी


हादसों का देश – लापरवाही, नियम-कानूनों की अनदेखी, संवेदनहीनता आदि-आदि का दुष्परिणाम

जुलाई 20, 2011

अनूठा देश

अपना देश वाकई अनूठा है, चामत्कारिक है, अपने किस्म का अकेला है । यहां ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है जिसकी संभावना दुनिया के उन प्रमुख देशों में नहीं के बराबर रहती है जिनके स्तर पर पहुंचने का हम ख्वाब देखते हैं । यह चमत्कारों का देश है, लापरवाही का देश है, कर्तव्यहीनता का देश है, भ्रष्टाचार का देश है, प्रशासनिक संवेदनहीनता का देश है, और इस सब के ऊपर, नियम-कानूनों एवं सलाह-मशविरा को न मानने वाला देश है ।

इस प्रकार के खयाल मेरे मन में तब उठने लगते हैं जब कभी दुर्घटनाओं की बात टेलीविजन चैनलों पर देखता हूं । मेरे मत में अधिकांश दुर्घटनाएं आम आदमी अथवा सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही की वजह से होते हैं । अलग-अलग स्तरों पर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो यह न हों । आम आदमी लापरवाह न हो और प्रशासन संवेदनशून्यता तथा कर्तव्यहीनता का बुरी तरह शिकार न हो तो ये न घटनाएं न घटें । लेकिन किसी से भी कुछ कहना बेकार है । अपने देशवासियों पर तो “भैंस के आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराय” की उक्ति सटीक बैठती है ।

दर्दनाक हादसा

परसों सुबह एक दर्दनाक दुर्घटना की खबर किसी टीवी चैनल पर देखने-सुनने को मिली । बाद में मैंने पाया कि संबंधित खबर एवं वीडियो एनडीटीवी चैनल की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है । (देखें एनडीटीवी समाचार) परसों की खबर थी कि इंदौर के पास पातालपानी नामक झरने के पास एक परिवार पिकनिक मनाने पहुंचा था । संबंधित नदी के बीच धारा में एक चट्टान पर परिवार के पांच सदस्य खड़े होकर फोटो खिंचवाने के लिए उत्सुक थे । इसी बीच पानी का जलस्तर बढ़ने लगा । चट्टानों पर खड़े पर्यटक दौड़कर नदी के किनारे पहुंच गये । लोंगों ने उन्हें भी आगाह किया, लेकिन वे इस गलतफहमी के साथ वहीं पर डटे रहे कि वे सुरक्षित रह जाएंगे । एक-दूसरे को सहारा देते हुए वे वहां पर कुछ देर तक तो खडे़ रह सके । लेकिन नदी थी कि उसने अपना विकराल रूप दिखा ही दिया । नदी का जलस्तर बढ़ता गया और उसका प्रवाह झेलना उन लोगों के सामर्थ्य से बाहर हो गया । परिणाम दुःखद – सभी बह गये और आगे जलप्रपात से नीचे गिर गये । एक लाश तो जल्दी मिल गयी शेष की खोज चलने लगी ।

मुझे इस बात का अंदाजा है कि बरसात में किस प्रकार पहाड़ी नदी का प्रवाह कभी-कभी इतना तेज हो जाता है कि उसमें खड़े रह पाना असंभव-सा हो जाता है । अपने बचपन में मैंने घर (उत्तराखंड) के आसपास की नदियों की भयावहता का अनुभव किया है । हमें हिदायतें होती थीं कि किसी अनुभवी सयाने व्यक्ति की मदद के बिना उसे पार करने का दुस्साहस न करें । बरसात के दिनों में धोखे की बहुत गुंजाइश रहती है । ऐसा हो सकता है कि आप जहां खड़े हों उस क्षेत्र में पानी न बरस रहा हो, किंतु नदी के उद्गम की ओर कहीं अन्यत्र तेज पानी बरस रहा हो । तब वर्षा का वह पानी चारों ओर से पहाड़ी ढलान पर मिट्टी-कंकड़-पत्थर लेते हुए एक साथ उतरकर नदी में जलस्तर अनायास बहुत अधिक बढ़ा देता है । इस बढ़े हुए जलस्तर का अग्रभाग साफ पहचान में आ जाता है और देखना दिलचस्प होता कि कैसे यह पूरी ताकत से उस स्थान तक पहुचता है जहां आप खड़े हों । जिसे इस बात का अंदाजा न हो कि कहीं अन्यत्र पानी बरस रहा होगा वह ऐसे अवसरों पर धोखा खा सकता है ।

पिकनिक पर गये उस अभागे परिवार को बरसात में पहाड़ी नदी के इस व्यवहार का अंदाजा नहीं रहा होगा । लेकिन आसपास खड़े लोगों ने उन्हें आगाह तो किया ही था । वे अपने दुस्साहस के शिकार हुए । इसे मैं लापरवाही का परिणाम मानता हूं । दुस्साहस जीवन के ध्येय के लिए तो समझ में आता है, किंतु महज मौजमस्ती के लिए मूर्खता ही मानी जानी चाहिए ।

दुर्घटनाएं और दुर्घटनाएं

कल-परसों ही कहीं एक बस इसी प्रकार नदी में बह गयी एक बच्चे को छोड़कर सभी बच गये, लेकिन बस उलटते-पलटते बीच धारा में फंस गयी । इसी प्रकार चंद रोज पहले किसी लेखपाल महोदय के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ । नदी पार करते-करते पानी का स्तर बढ़ गया और उनकी जीप मझदार में फंस गयी । भला हो आसपास के लोगों का कि वे उनकी मदद कर सके । असल में छोटी नदियों में सामान्यतः पानी काफी कम रहता है । कई जगहों पर साल के अधिकांश समय के लिए पत्थरों की दीवार खड़ी करके नदी के ऊपर सड़क बना ली जाती है । पानी उसके नीचे पत्थरों के बीच छोड़ी गयी खाली जगहों से होते हुए बह जाता है । बरसात में कभी-कभी जलस्तर के अनायास बढ़ जाने पर पानी उस सड़क के ऊपर बहने लगता है । तब सड़क अधिक दिनों तक नहीं टिक पाती है । लेकिन जब तक वह कामचलाऊ दिखती है, वाहन चलते हैं और प्रवाह तेज होने पर वह अनियंत्रित होते हुए सड़क के किनारे पहुचकर पलट जाती है । ऐसे मौकों पर वाहनचालक का गलत अनुमान या अति साहस ही हादसे का कारण होता है

चिंता एवं पीड़ा की बात यह है कि अपने यहां हर प्रकार के हादसे होते रहते हैं । कल ही नौइडा/गाजियाबाद में एक कार चलते-चलते सड़क पर आठ-दस फुट नीचे धंस गयी । चलते-चलते चालक को लगा कि सड़क धंस रही है, और जब तक वह कुछ समझ पाता सड़क पर कार के नीचे गड्ढा हो चुका था । बाद में क्रेन की मदद से कार निकाली गयी । यही गनीमत रही कि बेचारा वाहनमालिक चालक बच गया । बताते हैं कि अभी चंद रोज पहले ही उस सड़क का निर्माण था । इसमें दो राय नहीं कि ठेकेदार तथा सरकारी अभियंताओं की घोर लापरवाही और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार का ही यह परिणाम था । लेकिन अपने देश के सरकारी तंत्र में यह सब क्षम्य है । किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता । न शर्मिंदगी न आत्मग्लानि । धन्य हैं ऐसे राष्ट्रभक्त नागरिक !

आजकल पूरे उत्तर प्रदेश में सड़कें खुदी हुई हैं, या यों कहिए कि प्रदेशवासियों की किस्मतें खुदी हैं । बनारस में सदाबहार गड्ढेदार सड़कें रहती हैं और लोग उनसे भलीभांति परिचित रहते हैं । इसलिए गंभीर दुर्घटनाएं कम ही होती हैं । फिर भी पूरे शहर का मुआयना करने निकलें तो आप को कहीं न कहीं कोई वाहन गड्ढे में धंसा दिख ही जाएगा । क्यों होता है ऐसा, यह सोचने की बात है ।

कल-परसों ही एक लगभग पूर्णतः निर्मित इमारत ढह गयी, कहां यह ठीक-से याद नहीं आ रहा । कहा जाता है उसमें प्लास्टर का कार्य चल रहा था । पानी बरसा और इमारत ढह गयी । संवाददाता दिखा रहा था कि उसमें प्रयुक्त बालू-सीमेंट कैसे भुरभुरी होकर गिर रही थी । एक दो जने गिरफ्तार किए गये हैं, लेकिन बिल्डर भाग गया । गिरफ्तारी सरकारी स्तर की रस्मअदायगी के लिए की जाती है, ताकि लोगों को लगे कि कुछ हो रहा है । कुछ दिनों बाद बात भुला दी जाती है, और पकड़े गये लोग अगली दुर्घटना को अंजाम देने निकल पड़ते हैं, पूरी बेहयाई के साथ । वा रे मेरा ‘महान्’ देश !

प्रशासनिक भ्रष्टाचार

राजमार्गों/सड़कों पर कारों-बसों आदि की दुर्घटनाओं के समाचार आम बातें हैं । दो वाहन आपने-सामने से टकरा गये, बस अनियंत्रित होकर पुल से नीचे गिर गयी, चालक को झपकी आने से कार गड्ढे में गिर गयी या पेड़ से जा टकराई, जैसी खबरें समाचार माध्यमों पर देखने-सुनने को मिलती रहती हैं । या खबर मिलेगी की हाइटेंशन तार की चपेट में आने से बस आग का गोला बन गयी । इस प्रकार की घटनाएं अपने देश में आम हैं, जब कि प्रमुख देशों में वे शायद ही कभी घटती हैं, और जब घटती हैं तो उन्हें संजीदगी से लिया जाता है । हमारे नेता हों या सरकारी मुलाजिम बेशरमी से कहते हैं कि हादसे तो होते रहते हैं । अपने देश में आदमी के जान की कोई अहमियत नहीं । अधिक से अधिक लाख-दो-लाख के मुआवजे की कोरी घोषणा कर दी और बात खत्म । मुआवजा भी सरकारी मुलाजिम डकार जाते हों तो कोई आश्चर्य नहीं ।

पिछले कुछ समय से रेल हादसों की बाढ़ आ गयी है । लेकिन न तो रेलमंत्री और न ही प्रधानमंत्री के चेहरे पर चिंता एवं आत्मग्लानि के भाव उभरते दिखई देते हैं । उनका रवैया साफ रहता है – हमारा क्या नुकसान हुआ है जो हम आंसू बहाएं । वाह रे भारत के राजनेतागण ! इनकी अपनी सुरक्षा के लिए न धन की कमी रहती है और न त्वरित कार्य-निष्पादन की । लेकिन जब रेल सुरक्षा की बात होती है तो उनकी लापरवाही की कोई सीमा नहीं रहती है । लेबल-क्रासिंग पर वाहन रेलगाड़ियों से टकरा जाती हैं, लेकिन किसी को समुचित कदम उठाने की चिंता कहां ?

आजकल अग्निकांडों की खबरें भी खूब मिलती हैं । कल ही दिल्ली के कनाटप्लेस में एलआइसी की बहुमंजिली इमारत में आग लग गयी । ऐसे अवसरों पर जब कुछ समझ में नहीं आता है तो कह दिया जाता है कि शार्ट-सर्किट से आग लगी । बेचारी बिजली पर दोष मढ़ना सबसे आसान है । गलती तो बिजली की है, फिर भला कोई आदमी दोषी कैसे हो सकता है ? शार्ट-सर्किट हो या कुछ, आजकल ऐसे साधन उपलब्ध हैं जो तुरंत चेतावनी दे देते हैं । भवनों में आग बुझाने के साधन तैयार रहने चाहिए । ऐसी बातें कही तो जाती हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं होता । किसे दोष दें इस लापरवाही के लिए ? सरकारों को या आम आदमी को या दोनों को ? किंतु लापरवाही तो भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है !

सभी प्रमुख देशों में वाहन-चालन का लाइसेंस तभी मिलता है जब आवेदक लिखित तथा प्रायोगिक परीक्षा पास कर लेता है । इन परीक्षणों को गंभीरता से लिया जाता है । आवेदक को कभी-कभी दो या अधिक बार परीक्षा देनी पड़ती है । (पढ़िये मेरा एक अनुभव) परंतु अपने देश में लाइसेंस का मामला गंभीरता से नहीं लिया जाता है । मैं किसी व्यक्ति को नहीं जानता जिसने ‘ड्राइविंग टेस्ट’ देकर लाइसेंस पाया हो । लाइसेंस लेना सब्जीमंडी से आलू खरीदने जैसा है । दलाल को आर्डर दीजिए, और घर बैठे लाइसेंस लीजिए । कम से कम वाराणसी में तो यही चलता है । यह व्यवस्था लापरवाही का संकेतक नहीं है क्या ? कौन है जिम्मेदार ? दरअसल सरकारी तंत्र और आम आदमी, दोनों ही । परिणाम यह है कि लाइसेंस-धारक को स्टियरिंग घुमाने, एक्सीलरेटर दबाने और ब्रेक लगाने से अधिक जानकारी वाहन-चालन के बारे में नहीं होती है । ऐसे चालकों द्वारा दुर्घटना होना आश्चर्य की बात नहीं है ।

भगवान भरोसे

कुल मिलाकर यह देश भगवान भरोसे चल रहा है । यहां सभी नियम-कानून कागजों तक सिमटकर रह जाते हैं । व्यवहार में हर कोई ‘मेरी मरजी’ की नीति पर चलता है । तब आये दिन हादसे होना कोई नहीं रोक सकता है । या खुदा, लोगों की अक्ल का ताला कभी खुलेगा क्या ! – योगेन्द्र जोशी


प्रधानमंत्रीः “इंडिया अमेरिका नहीं है”, बेशक! और सरकारः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं”, क्या वाकई?

मई 27, 2011

इंडिया अमेरिका नहीं है

अपनी हालिया अफगानिस्तान यात्रा के दौरान देश के माननीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहनजी ने आतंकवाद के संदर्भ में है कहा था कि इंडिया अमेरिका नहीं है (ऐसी ही खबर सुनने को मिली थी) । ये बात प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे कि अपने देशवासियों को यह गलतफहमी हो कि अब हम विश्व महाशक्ति बन चुके हैं और अमेरिका की बराबरी पर पहुंच चुके हैं । मुझे पूरा विश्वास है कि किसी को भी ऐसी गलतफहमी नहीं रही होगी, न अपने देशवासियों को न ही विदेशियों को । जो कोई भी अमेरिका के बारे में थोड़ा-बहुत जानता है वह भली भांति समझता है कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ अभी अमेरिका से कोसों दूर है । अमेरिका की बराबरी पर यह देश कभी आ भी सकेगा यह संदेहास्पद है । फिलहाल अभी आगामी 2-3 पीढ़ियों तक तो कोई उम्मीद नहीं है । हो सकता है कि 8-10 फीसदी की आर्थिक विकासदर की वजह से कुछ लोग गलतफहमी के शिकार हों ।

निःसंदेह प्रधानमंत्रीजी के उद्गार व्यापक संदर्भ में नहीं थे । दुनिया के तथाकथित सबसे बड़े आतंकी ओसामा को अमेरिका द्वारा मौत के घाट उतारे जाने पर पत्रकारों की जिज्ञासा पर उन्होंने यह बात कही थी । लोग शायद यह जानना चाहते थे कि क्या पाकिस्तान स्थित आतंकियों पर अपना देश भी कुछ वैसे ही कदम उठाने की सोच सकता है जैसे अमेरिका ने उठाए । उनका दो टूक उत्तर “इंडिया अमेरिका नहीं है” इस बात को स्पष्ट करता है कि हमारे पास अमेरिका की भांति संसाधन नहीं हैं । यह भी सच है कि अमेरिका मित्र देशों तथा समुद्र से घिरा है, जब यह देश शत्रु देशों अथवा उन देशों से घिरा है जिनकी मित्रता संदिग्ध है । लेकिन सबसे बड़ी बात जो प्रधानमंत्रीजी के मंतव्य में निहित रही है वह है कि हमारे पास अमेरिका की भांति दृढ़ इच्छाशक्ति तो है ही नहीं । हमारी सोच जब वैसी है ही नहीं तो किसी भी प्रकार की कार्यवाही का सवाल ही नहीं उठता । हम बंदरघुड़की दे सकते हैं, लेकिन उसके आगे कुछ नहीं कर सकते हैं ।

सरकार आतंकवाद पर गंभीर?

मैं आगे कुछ और कहूं इसके पहले इस बात का भी जिक्र कर दूं कि दो-चार दिन पहले सरकार का यह वक्तव्य सुनने को मिला थाः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” क्या वाकई में? गंभीरता का मतलब क्या है? देश के मुखिया, डा. मनमोहन सिंह, सदा ही गंभीर नजर आते हैं । उनके मुख पर आम तौर पर न खुशी के भाव नजर आते हैं और न ही चिंता के । वे किसी भी अवसर पर बोलने से कतराते हैं; चुप्पी साधे रहना उनकी आदत है । गंभीरता के अर्थ क्या उनके इसी रवैये से है?  गंभीर बने रहो, न कुछ बोलो और न कुछ सुनो, न ही कुछ देखो । रोजमर्रा की जिंदगी में लोग ऐसे व्यक्ति को गंभीर कहते हैं, जो खुशी में न खिलखिलाकर हंस सके और न ही तकलीफ होने पर आह भर सके । देश तमाम तरह की घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन वे चुप बैठे रहते हैं । अधिक से अधिक मुझे खेद है का वक्तव्य दे दो, बस ।

लेकिन जब सरकार कहती है “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” तो अवश्य ही उसके अर्थ मात्र शाब्दिक नहीं होंगे । सरकार यह जताना चाहती होगी कि वह आतंकवाद को लेकर मात्र चिंतित ही नहीं है, बल्कि उससे निबटने के लिए कारगर कदम उठाने का संकल्प ले रही है । लेकिन कारगर उपाय क्या हो सकते हैं इस बात का कहीं कोई संकेत नहीं मिलते हैं । अभी तक का जो अनुभव रहा है उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि सरकार का दावा कोरे आश्वासन के अधिक कुछ नहीं हो सकता है । जो कुछ अभी तक होता आया है वही आगे भी होगा । आतंकियों को जहां मौका मिलेगा वे वारदात को अंजाम देंगे ही । वे पक्के इरादे लेकर चलते हैं । उनकी अपनी जान निकल भी जाए तो कोई बात नहीं, बस घटना को अंजाम देना है यह विचार उनके नियंताओं द्वारा उनकी सोच में गहरे बिठा दी जाती है । तब आप कर क्या सकते हैं?

शायद सरकार अपने खुफिया तंत्रों को अधिक सुदृढ़ करने का विचार कर रही है । ऐसा करने से कहां आतंकी घटना होने जा रही है इसकी पूर्व सूचना मिल जाएगी और घटना को रोका जा सकेगा । अवश्य ही ऐसा करना वांछित होगा, पर इतना क्या पर्याप्त होगा? क्या यह आवश्यक है कि किसी संभव वारदात की जानकारी सदैव जुटाई जा सके? क्या खुफिया विभागों में सुयोग्य लोग भरे पड़े हैं, और वह भी पर्याप्त संख्या में? जिस देश में सर्वत्र भ्रष्टाचार फैला हो वहां क्या साफ-सुथरे खुफिया तंत्र की उम्मीद की जानी चाहिए? उनकी ईमानदारी पर भरोसा भी कर लें तो भी क्या आम जनता से पर्याप्त सहयोग मिल सकता है? आम जनता तो रोजमर्रा की जिंदगी में भी लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को नहीं रोक पाती है; उससे भला कितनी उम्मीद करें? सरकारी रवैया यह है कि जब वारदात हो जाती है तो संबंधित सरकारी मुलाजिम हरकत में आ जाते है और सर्वत्र चेतावनी जारी कर दी जाती है, गोया कि अब किस क्षण, कहां पर अगली वारदात होने जा रही है यह पता चल गया हो । लेकिन दो-चार दिनों में ही सब ढीले पड़ जाते हैं, और तब तक आतंकी अगली वारदात के लिए तैयार हो जाते हैं । यही सिलसिला बदस्तूर चलता आ रहा है ।

आक्रामकता का अभाव

आतंकी वारदातों में मोबाइल फोनों की अहम भूमिका पायी गयी है । लेकिन सरकारी तंत्र की गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि हमारे यहां मोबाइल नंबरों का कोई सत्यापन नहीं होता है । कागजों में शायद बहुत कुछ हो रहा होगा, परंतु वास्तविकता में नहीं । नकली दस्तावेजों के आधार पर मोबाइल पा लेना बहुत मुश्किल काम नहीं है । आतंकियों के पास मोबाइल पहुंचते कैसे हैं? इतना ही नहीं, दुपहिया-चौपहिया वाहनों के मालिकों तक का पता पुलिस नहीं लगा पाती है । चंद्रमा में उतरने के ख्वाब देख रहे देश में आज भी यह व्यवस्था नहीं है कि एक क्लिक पर वाहन-स्वामी का नाम-पता-ठिकाना मालूम हो जाए, या उसके चोरी हो चुकने की जानकारी मिल जाए । क्या सरकार की गंभीरता में वांछित ‘डाटा-बेस’ की कोई अहमियत है? केवल कागजी योजनाएं बनाकर बैठ जाना बेमानी है ।

लगता है कि सरकार आतंकी वारदातों के संदर्भ में रोकथाम के तरीके ईजाद कर रही है । ऐसा करना ‘बचाव मार्ग या डिफेंसिव अप्रोच’ है, जो उपयोगी तो है, किंतु पर्याप्त नहीं । अमेरिका भी बचाव के सभी रास्ते अपना रहा है । लेकिन वह साथ में ‘आक्रामक या ऑफेंसिव’ तरीका भी अपनाते आ रहा है । जब भी उसे लगता है कि फलां-फलां खतरे बन सकते हैं तो वह उन्हें ठिकाने लगाने से भी पीछे नहीं रहता है । ओसामा के मामले में उसने बड़ी बारीकी से ऐसा किया और उसका काम तमाम कर दिया । अमेरिका ओसामा का नाम तो नहीं मिटा सकता, लेकिन उसकी कोई निशानी बचने न पाए इसकी पूरी कोशिश की । उसके शव समुद्र में कहां ठिकाने लगाया इसका पता तक नहीं ।

निश्चय ही इंडिया अमेरिका नहीं है । मुझे पूरा विश्वास है कि अमेरिका ने ओसामा को जिंदा न पकड़ने का प्रयास जानबूझ कर किया । ओसामा को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया, ताकि कानूनी लड़ाई का अवसर देकर कोई नयी आफत न मोल लेनी पड़े । ऐसे आतंकी के शव को ज्ञात स्थान पर दफनाना तक अमेरिका को गवारा नहीं था । आतंकियों को कड़ा संदेश देना अमेरिका जरूरी मानता है, भले ही आतंकियों पर उसका असर न पड़े । किंतु रियायत किसी भी हाल में नहीं ।

कड़ा संदेश नहीं

लेकिन ‘इंडिया’ ने आतंकियों को यह संदेश कभी नहीं दिया कि उनके साथ कड़ाई से पेश आया जाएगा । हम केवल उनकी सही-गलत लिस्ट बनाते हैं और पाकिस्तान को पेश करके इंतिजार करते हैं कि वे इस देश को सौंपे जाएंगे । कानूनी प्रक्रिया के समय और उसके बाद भी वे हमारे जेलों में मेहमान की तरह रखे जाएंगे । उनकी सुरक्षा पर लाखों-करोड़ों खर्च किया जाएंगे; उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुना दे, फिर भी उन्हें फांसी नहीं दी जाएगी ।

क्या वजह है कि यह देश कसाब और अफजल को फांसी देने तक की हिम्मत नहीं कर पाता? जब कोई आतंकी घोषित हो चुका हो, उसे फांसी की सजा सुना दी जा चुकी हो, तो फिर उस पर कैसा रहम? यदि हम सजा का कार्यान्वयन नहीं कर सकते तो आतंकियों को क्या संदेश जाता है? उन्हें क्या हम यह बताना चाहते हैं कि हम तुम्हें क्षमा कर सकते हैं? आतंकवाद के प्रति यह किस गंभीरता का द्योतक है? वारदात को रोकना सही है, लेकिन घट चुकी वारदात के लिए जिम्मेदार लोगों को त्वरित सजा निहायत जरूरी है, यदि आप सच में गंभीर हैं तो । क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि कल ऐसे आतंकियों को छुड़ाने के लिए अपहरण जैसी घटना घटे और देश को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़े?

सरकार के ऐसे नरम रवैये के पीछे मुझे एक कारण नजर आता है । आप उसे नहीं मानेंगे; शायद ही कोई मेरी ‘थ्यौरी’ पर भरोसा करेगा । मेरा सोचना कि भारत का हर राजनैतिक दल मुस्लिम समुदाय से डरा सहमा रहता है । अफजल-कसाब मुस्लिम समाज से आते हैं और प्रायः हर दल सोचता है कि इनको फांसी देने पर उक्त समुदाय दंगे-फसाद पर उतर आएगा । न भी दंगा करे तो भी चुनावों में वोट नहीं देगा । सत्ता पर टिके रहने के लिए उनकी अनुकंपा आवश्यक है, अतः उन्हें नाखुश नहीं किया जाना चाहिए । बेचारा मुस्लिम समुदाय वास्तव में क्या सोचता है यह कोई जानने की कोशिश नहीं करता । उन्हें अफजल-कसाब से कुछ लेना-देना नहीं होगा, किंतु हमारे सियासी दल आश्वस्त नहीं रहते हैं । अन्यथा उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुनाए फिर भी वर्षों उस पर अमल न हो यह समझ से परे है, खासकर जब मामला आतंकी वारदात से जुड़ा  हो । क्या कोई आतंकी रहम के काबिल हो सकता है? हमारी सरकारें टालमटोल की नीति पर चलती है, त्वरित निर्णय लेकर जोखिम उठाने का माद्दा किसी भी दल में नहीं है ।

सरकार ऐसा कुछ भी करने में सफल नहीं है जिससे आतंकी संगठन भयभीत हो सकें । इसके विपरीत देश उनसे भयभीत है और बचाव के रास्ते खोजता रहता है । यही सब तो आतंकियों का मकसद है । वे सफल हैं! – योगेन्द्र जोशी


भारत के अभी तक के प्रधानमंत्रियों में भ्रष्टतम कौन?

अप्रैल 6, 2011

‘फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन’

दुनिया की सबसे बड़ी डिमॉक्रसी या लोकतंत्र कहलाने वाले अपने देश इंडिया दैट इज भारत का नागरिक होने का एक अविवादित लाभ यह है कि आप यहां पूरी तरह स्वतंत्र है । आपको अमर्यादित स्वछंदता हासिल है कि आप जो चाहे कर लें । भ्रष्टाचार के नाले में जब चाहें जितना चाहें नहाने की छूट यदि आपको मिली हो, तो भला सच-झूट, सार्थक-निरर्थक, मीठा-कड़ुआ, कुछ भी बोलने का अधिकार तो मिलना ही है न ? आपको खाने को मिले या न मिले, पास में पहनने-ओड़ने को कुछ रहे या न रहे, खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़े या नहीं, लेकिन कुछ भी बोलने की छूट तो हर किसी को मिली ही है । बोलने की छूट ही नहीं,  बोलने पर ‘मैंने ऐसा नहीं कहा’ कहने की भी छूट आपको प्राप्त है । ऐसी ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ अर्थात् ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपने नागरिकों को मिली है । इस जीवन में भला कुछ और क्या चाहिए ? इसी ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ का लाभ लेते हुए मैं कुछ कहने जा रहा हूं । क्षमा करें यदि आप ‘ऑफेंडेड’ या आहत हों । ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ नामक अधिकार का ही तो प्रयोग कर रहा हूं, क्या गलत कर रहा हूं?

मैं अपनी बात विशेष अवसर पर कर रहा हूं । बीते कल सुप्रतिष्ठित समाजसेवी माननीय अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठे चुके हैं । उन्होंने यह कदम देश में निरंतर बढ़ रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज के तौर पर उठाया है । उनकी मांग है कि सरकार प्रभावी लोकपाल बिल पास कराए और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कारगर कदम उठाए । उनको अनेकों सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का समर्थन मिल रहा है । क्या वजह है कि उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है? क्या वजह है कि सरकार खुदबखुद उसके नाक के नीचे घट रहे भ्रष्टाचार पर नजर नहीं डालती है? क्या वजह है कि वे भ्रष्ट व्यक्तियों के विरुद्ध तब तक कदम नहीं उठाती है, जब तक कि जनता सड़क पर नहीं उतरती और उच्चतम न्यायालय घटनाओं को संज्ञान में लेते हुए समुचित आदेश नहीं देती?

मेरी नजर में यह सब इसलिए है क्योंकि इस देश की बागडोर इस समय आज तक के सबसे भ्रष्ट प्रधानमंत्री के हाथ में है । दुर्भाग्य से राजकाज ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जो साफ-सुथरी छवि का मुखौटा पहने हुए भ्रष्टाचार को अपने पांव फैलाने दे रहा है । जी हां, मौजूदा प्रधानमंत्री को मैं अभी तक के सभी प्रधानमंत्रियों में भ्रष्टतम मानता हूं । मेरे अपने तर्क हैं । आपको उन तर्कों को सिरे से नकारने की स्वतंत्रता है, ठीक वैसे ही जैसे मुझे उन्हें पेश करने की । यदि आप मेरी बात से आहत हों तो यहीं थमकर आगे की बात पढ़ना बंद कर दें ।  अपनी बात कहना शुरु करूं इसके पहले मैं अभी तक के सभी प्रधानमंत्रियों की सूची प्रस्तुत करता हूं:

भारत के अभी तक के प्रधानमंत्री (अगस्त 1947 – मार्च 2011)

1. पंडित जवाहरलाल नेहरू, 15 अगस्त 1947 – 27 मई 1964, करीब 15 साल 9 महीने [Pundit  Jawaharlal Nehru, 15 Aug. 1947 - 27 May 1964, 15 years 9 months]
*** श्री गुलजारीलाल नंदा, 27 मई 1964 – 9 जून 1964, 14 दिन [Sri Guljarilal Nanda, 27 May 1964 - 9 June 1964, 14 days]
2. श्री लालबहादुर शास्त्री, 9 जून 1964 – 11 जन. 1966, करीब 1 साल 7 महीने [Sri Lal Bahadur Shastri, 9 June 1964 - 11 Jan. 1966, about 1 year 7 months]
*** श्री गुलजारीलाल नंदा, 11 जन. 1966 – 24 जन. 1966, 14 दिन [Sri Guljarilal Nanda, 11 Jan. 1966 - 24 Jan. 1966, 1 4 days]
3. श्रीमती इंदिरा गांधी, 24 जन. 1966 – 24 मार्च 1977, करीब 11 साल 2 महीने [Srimati Indira Gandhi, 24 Jan. 1966 - 24 March 1977, about 11 years 2 months]
4. श्री मोरारजी देसाई, 24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979, करीब 2 साल 4 महीने [Sri Morarjee Desai, 24 March 1977 - 28 July 1979, about 2 years 4 months]
5. श्री चरण सिंह, 28-7-1979 – 14 जन. 1980, करीब 6 महीने [Sri Charan Singh, 28 July 1979 - 14 Jan. 1980, about 6 months]
3. श्रीमती इंदिरा गांधी, 14 जन. 1980 – 31 अक्टू. 1984, करीब 4 साल 10 महीने [Srimati Indira Gandhi, 14 Jan. 1980 - 31 Oct. 1984, about 4 years 10 months]
6. श्री राजीव गांधी, 31 अक्टू. 1984 – 2 दिस. 1989, करीब 5 साल 1 महीना [Sri Raajiv Gandhi, 31 Oct. 1984 - 2 Dec. 1989, about 5 years 1 month]
7. श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, 2 दिस. 1989 – 10 नव. 1990, करीब 11 महीने [Sri Vishwanath Pratap Singh, 2 Dec. 1989 - 10 Nov. 1990, about 11 months]
8. श्री चंद्रशेखर, 10 नव. 1990 – 21 जून 1991, करीब 7 महीने [Sri Chandrasekhar Singh, 10 Nov. 1990 - 21 June 1991, about 7 months]
9. श्री पी. वी. नरसिम्हाराव, 21 जून 1991 – 16 मई 1996, करीब 4 साल 11 महीने [Sri P. V. Narsimharao, 21 June 1991 - 16 May 1996, about 4 years 11 months]
10. श्री अटल बिहारी बाजपाई, 16 मई 1996 – 1 जून 1996, करीब 17 दिन [Sri Atal Bihari Bajpayee, 16 May 1996 - 1 June 1996, 17 days]
11. श्री एच. डी. देवगौढा 1 जून 1996 – 21 अप्रैल 1997, करीब 11 महीने [Sri H. D. Deve Gauda 1 June 1996 - 21 April 1997, about 11 months]
12. श्री इंदर कुमार गुजराल, 21 अप्रैल 1997 – 19 मार्च 1998, करीब 11 महीने [Sri Inder Kumar Gujral, 21 April 1997 - 19 March 1998, about 11 months]
10. श्री अटल बिहारी बाजपाई, 19-3-1998 – 22 मई 2004, करीब 6 साल 2 महीने [Sri Atal Bihari Bajpayee, 19 March 1998 - 22 May 2004, about 6 years 2 months]
13. श्री मनमोहन सिंह, 22 मई 2004 से पद पर, करीब 6 साल 9 महीने [Sri Manmohan Singh, 22 May 2004 onward, 6 years 9 months completed]

अभी तक कुल 13 प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल इस देश ने देखा है । इसके अतिरिक्त श्री गुलजारीलाल नंदा भी इस कुर्सी पर बैठ चुके हैं, किंतु दुर्भाग्य से वे तात्कालिक अवश्यकताओं के कारण दो बार केवल कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर टिक पाए, पहली बार जब पंडित नेहरू का देहावसान हुआ, और दूसरी बार जब शास्त्रीजी की ताशकंद (तत्कालीन सोवियत रूस) में आकस्मिक मृत्यु हुई । दोनों बार वरिष्ठतम राजनेता होने के बावजूद प्रधानमंत्री पद के औपचारिक चुनाव के बाद उन्हें चयनित व्यक्ति के लिए पद छोड़ना पड़ा । इसलिए उन्हें असल प्रधानमंत्रियों की सूची में नहीं गिना जाता है ।

अगर यह सवाल उठे कि इस देश के आज तक के सभी प्रधानमंत्री क्या पूर्णतः ईमानदार रहे हैं, तो मेरा उत्तर ‘नहीं’ में होगा । (आप यदि ऐसा नहीं मानते तो आपको मैं एक सौभाग्यशाली व्यक्ति कहूंगा, क्योंकि ऐसा भ्रम पालकर सुखी रह पाना हर किसी के नसीब में नहीं हो सकता ।) उदाहरण के तौर पर यदि श्रीमती इंदिरा गांधी साफ-सुथरी ही मानी गयी होतीं, तो जयप्रकाशजी को उनके विरुद्ध आंदोलन न छेड़ना पड़ता, उन्हें अपनी गद्दी बचाए रखने के लिए आपात्काल घोषित न करना पड़ता, और कालांतर में (1977 में) कांग्रेस के बदले जनता पार्टी केंद्रीय सत्ता पर काबिज न होती, इत्यादि । यदि उक्त सभी को इमानदारों की श्रेणी में माना जाएं, तब कम भ्रष्ट एवं अधिक भ्रष्ट का सवाल ही नहीं रह जाता है । उसके आगे तुलना में कुछ कहने को रह ही क्या जाता है?

ईमानदार कौन?

‘बेचारे’ गुलजारीलाल जी सही माने में प्रधानमंत्री नहीं बन सके, अन्यथा वे शायद सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री माने जाते । मैं यह बात इस आधार पर कह रहा हूं कि एक कांग्रेसी राजनेता के तौर वे बेहद ईमानदार व्यक्ति कहे जाते थे, सही अर्थों में गांधीवादी और पूरी सादगी के साथ जीवनयापन करने वाले । (उन दिनों मैं कालेज/विश्वविद्यालय स्तर का छात्र हुआ करता था, इसलिए राजनीति की बातों को समझने लगा था ।)

विगत प्रधानमंत्रियों की ईमानदारी के संदर्भ में परस्पर तुलना तभी सार्थक हो सकती है जब उनके कार्यकालों की अवधि पर भी विचार हो । गौर करें कि केंद्र की सत्ता पर लंबे अरसे तक कांग्रेस का ही कब्जा रहा है । कांग्रेस से संबद्ध सभी प्रधानमंत्रियों (क्रमशः पंडित नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री नरसिम्हाराव, डा. सिंह) ने करीब 5 साल या उससे कहीं अधिक समय तक कुर्सी संभाली है । इतने लंबे अंतराल के प्रधानमंत्रित्व का गैरकांग्रेसी अपवाद एकमात्र बाजपाईजी रहे हैं ।

श्री शास्त्रीजी एवं श्री देसाईजी का कार्यकाल भी बमुश्किल ढाई साल या उससे भी कम रहा है । शेष अर्थात् सर्वश्री चरण सिंह, विश्वनाथ सिंह, चंद्रशेखर, देवगौढा, गुजराल तो साल-साल भर भी नहीं टिक पाए । इन लोगों का कार्यकाल जोड़तोड़ तथा मौके के फायदे से कुर्सी हथियाने और उस पर टिकने की रही है, किंतु सफल कोई नहीं रहा । इनका कार्यकाल इतना छोटा रहा कि उसके आधार पर उनकी ईमानदारी आंकना ही बेमानी है । इनके राजकाज में भ्रष्टाचार की बातें कम रहीं और ‘अब किसकी बारी है, कौन कब लुड़केगा, कौन किसे लंगड़ी मारेगा’ आदि के लिए अधिक जाना जाएगा । अतः भ्रष्टाचार विषयक तुलना के लिए इनके नामों पर विचार का अर्थ नहीं है ।

शास्त्री भी एक ईमानदार व्यक्ति माने जाते थे । ताशकंद में चली ‘भारत-पाक’ समझौते की बैठक में न जाने क्या हुआ कि उनका निधन वहीं हो गया । उनकी मृत्यु रहस्यमयी ही रही है । बेचारे अगर जीवित रहते तो शायद अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध होते । जितना कुछ मुझे याद पड़ता है, उसके अनुसार उन पर शायद ही अंगुली उठाई गयी हो ।

देसाईजी के प्रति मुझे सहानुभूति है । 1977 में जनता दल की सरकार तो बन गयी, किंतु बतौर प्रधानमंत्री देसाईजी टिकाऊ नहीं सिद्ध नहीं हो सके । दरअसल तब चौधरी चरण सिंह और श्री जगजीवन राम असंतुष्ट बने रहे । नेताओं में कुर्सी हथियाने की लालसा परोक्ष रूप से कार्यशील रही और अंत में श्री चरण सिंह ने श्रीमती गांधी की मदद से पद पा लिया, जिस पर श्रीमती गांधी ने उन्हें अधिक दिनों तक टिकने नहीं दिया (श्रीमती गांधी की ईमानदारी!)। बेचारे देसाईजी इतना समय ही न पा सके कि देश का भला-बुरा कुछ कर पाते । बहरहाल यही कह सकता हूं कि वे भ्रष्ट नहीं माने जाते थे ।

भ्रष्टतम प्रधानमंत्री?

अतः भ्रष्टतम का निर्धारण करने के लिए आपके सामने बाजपाई जी के अलावा केवल कांग्रेससंबद्ध प्रधानमंत्री रह जाते हैं । इनमें से किसी को भी पूरी तरह पाकसाफ कहना अनुचित होगा । नेहरू जी के समय भी घोटाले हुए थे ऐसा मेरे ध्यान में है । तब भी वे बदनाम नहीं हुए । श्रीमती गांधी राजनीतिक रूप से साफ नहीं रही हैं, परंतु उनके होते हुए गंभीर आर्थिक घोटाले हुए हों ऐसा शायद ही कोई कहेगा । श्री राजीव गांधी पर घोटाले का दाग सुविख्यात है, और उसी के बल पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कुर्सी पा सके । अपनी कुर्सी बचाने के लिए हथकंडे अपनाने के लिए श्री नरसिम्हाराव भी बदनाम रह चुके हैं । अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के आरोप बाजपाईजी पर भी लगे ही हैं ।

इतना सब होने पर भी एक-से-बढ़कर-एक आर्थिक घोटालों की बात इन सबके कार्यकाल के संदर्भ में नहीं कही जाती है (बोफोर्स घोटाले को छोड़ दें तो) । लेकिन अब डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल की जो तस्वीर साफ हो रही है वह अवश्य ही घबड़ाहट एवं निराशा पैदा करने वाली है । और इसीलिए मैं उन्हें भ्रष्टतम प्रधानमंत्री कहता हूं ।

अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं अपनी इस मान्यता पर जोर डालना जरूरी समझता हूं कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी के लिए वही मापदंड नहीं अपनाए जा सकते हैं जो किसी रिक्शे वाले या सड़क किनारे ठेले पर सामान बेचने वाले या आफिस के चपरासी जैसे आम जनों पर लागू किए जाएं । यह कहना कि मौजूदा प्रधानमंत्री ‘व्यक्तिगत तौर पर’ एक साफ-सुथरे व्यक्ति हैं निरर्थक/बेमानी बात है । ऐसे वक्तव्य शिष्टाचार के नाते दिये जाते हैं । उच्च पदस्थ व्यक्ति के मामले में उसके पद की गरिमा का विचार भी ऐसे में बहुत कुछ कहने से हमें रोकता है ।

डा. मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री

याद रखें कि प्रधानमंत्री पूरे देश के राजकाज को करीने से चलाने के लिए होता है । अगर वह बेईमान लोगों को साथ लेकर चल रहा हो, उनको जो जी में आए उसे करने की छूट देता हो, उनके क्रियाकलापों की समीक्षा करने से कतराता हो, तो उसे साफ नहीं कहा जा सकता है । कोई भी ईमानदार व्यक्ति बेईमान लोगों की शर्तों पर राजकाज चलाने को तैयार नहीं हो सकता है । भ्रष्टाचार बढ़ता जाए, लोग ‘त्राहि माम’ कहने लगें फिर भी प्रधानमंत्री ‘गठबंधन धर्म’ जैसे भ्रामक शब्द बोलकर अपने असली दायित्व से बचते रहें, तब उन्हें ‘स्वच्छ छवि वाला’ कहना निहायत बचकानी बात होगी । क्या होता है ये गठबंधन धर्म? किस धर्मग्रंथ में है इसका जिक्र? किस राजनीतिशास्त्र में लिखा है कि सरकार चलाने के लिए, अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए, हर समझौता स्वीकारा जाना चाहिए? क्या सरकार चलाने का मौलिक उद्येश्य देश के हित साधना है, या राजनीतिक दलों के सिद्धांतहीन गठजोड़ को बनाए रखना, भले ही देश रसातल को चला जाए? एक ईमानदार व्यक्ति अपने दायित्वों के मामले में ढुलमुल रवैया नहीं अपना सकता । लेकिन डा. मनमोहन सिंह का रवैया ऐसा ही अवांछित है ।

मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के सभी रिकार्ड टूटे हैं, और वे चुप्पी साधे रहे हैं । “ मैं क्या करूं”, “मुझे नहीं मालूम” जैसी बचकानी बातें करके अपना बचाव करते आए हैं । प्रधानमंत्री लाचार तो देश का क्या होगा?

कभी-कभी मुझे लगता है कि डा. सिंह महात्मा गांधी के अनुयायी तो नहीं हैं, परंतु गांधीजी के ‘तीन बंदरों’ के अनुयायी अवश्य हैं । उन बंदरों की तरह भ्रष्टाचार के बारे में वे “न कुछ देखते हैं”, “न कुछ सुनते हैं”, और “न कुछ बोलते हैं” । चुप्पी लगा लो और समय के साथ सब शांत हो जाएगा के सिद्धांत पर वे चलते हैं ।

डा. सिंह कितने ईमानदार हैं इसकी सर्वोत्तम बानगी उनके द्वारा की गयी चीफ विजिलेंस कमिश्नर (सीवीसी) की नियुक्ति का मामला है । जिसकी नियुक्ति हुई उस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और न्यायालय में मामला विचाराधीन है । प्रधानमंत्री लंबे अर्से तक नियुक्ति को उचित ठहराते रहे, जब तक कि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्ति अवैध घोषित न हो गयी । अब वे गले से न उतरने वाला तर्क देते हैं कि संबंधित अधिकारियों ने उन्हें अंधेरे में रखा । यह तो हास्यास्पद है कि उन्हीं के अधीनस्थों की यह हिम्मत कि उन्हें धोखा दें । ऐसे अधिकारियों को घंटों के भीतर निकाल बाहर किया जाना चाहिए, लेकिन वाह रे अपने लाचार प्रधानमंत्री । किंतु समझ से परे तो यह वाकया है कि नियुक्ति समिति की सदस्या, श्रीमती सुषमा स्वराज (नेता विपक्ष), ने जब मामले की गंभीरता की ओर उनका घ्यान खींचा तो वस्तुस्थिति को ठीक-से जांचने के लिए 24 घंटे का भी समय नहीं लगाया । इसके विपरीत आनन-फानन में नेता विपक्ष को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने गलत निर्णय ले ही लिया । आप उसे गलती नहीं कह सकते, क्योंकि उनको गलती का एहसास दिलाया जा रहा था । ऐसा आनन-फानन का निर्णय एक भ्रष्ट व्यक्ति ही ले सकता है

ऊपर का उदाहरण अकेला नहीं हैं । हाल के महीनों में मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के अनेकों मामले उजागर हुए हैं, और हर मामले में उनकी चुप्पी रहस्यमय रही है । पूर्व संचारमंत्री ए. राजा का ही मामला ले लीजिए, जिनकी शिकायतें उन्हें मिलती रहीं, और वे राजा का बचाव तब तक करते रहे जब तक संभव था । एक ईमानदार प्रधानमंत्री क्या ऐसा कर सकता है ?

देश का दुर्भाग्य है कि इसका शासन एक मूलतः नौकरशाह के हाथ में है । डा. सिंह कि खासियत यह है कि वे कभी जननेता नहीं रहे हैं, उनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं रही है, वे कभी भी एक सक्रिय नेता की भांति आम लोगों के बीच नहीं रहे हैं, उन्होंने कभी भी आम लोगों की लड़ाई नहीं लड़ी है, और मेरा मानना है कि उनकी प्रतिबद्धता आम लोगों के प्रति कम और नेहरू-गांधी परिवार के प्रति अधिक है । मेरे मत में उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि नौकरशाहों की बिरादरी के प्रति वे अति उदार हैं । वे नहीं चाहेंगे कि कोई नौकरशाह कभी सजा पाए, चाहे वह कितना ही भ्रष्ट हो !

माननीय अन्ना हजारे अनशन पर बैठे हैं । आगे क्या होगा यह कोई ज्योतिषी नहीं बता सकता है । लेकिन यह सुनिश्चित है कि अपने प्रधानमंत्री एड़ी-चोटी का जोर लगायेंगे कि ऐसा लोकपाल बिल पास होवे जो निष्प्रभावी एवं निर्बल हो, ताकि न कोई राजनेता और न ही कोई नौकरशाह जीते-जी दंडित हो सके । वाह, क्या ईमानदारी है ।

भगवान् भरोसे है यह देश ! – योगेन्द्र


पागलपन की हद पार कर चुकी क्रिकेट की दीवानगी

अप्रैल 3, 2011

“अतिसर्वत्र वर्जितम्” – चिंतकों-विचारकों के सर्वकालिक वचन

मैं उन गिने-चुने लोगों में से एक हूं जिसे क्रिकेट में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं । क्रिकेट का बल्ला शायद ही कभी मैंने पकड़ा होगा, कंमेंटरी भी शायद ही गौर से सुनी होगी, और क्रिकेट मैच तो शर्तिया कभी नहीं देखा । यदि किसी ने मुझे क्रिकेट विश्व कप का टिकट भेंट किया होता और साथ में कीमती उपहार भी दिये होते तो भी मैं विनम्र भाव से मना कर देता । 8-9 घंटों की मैच देखने की सजा मुझे स्वीकार्य नहीं । पर यह सब मेरी बात है । कई लोगों को क्रिकेट में बेहद रुचि रहती है, खास तौर पर युवा वर्ग के लोगों को, जिसमें आज की तारीख में युवतियां भी अच्छी-खासी संख्या में शामिल हैं । शौक होना समझ में आता है, लेकिन वह पागलपन की हदें पार कर ले तो वह मेरी नजर में चिंताजनक है । सद्यःसंपन्न विश्व कप मैचों के दौरान मैंने क्रिकेट का जो जनून मैंने लोगों में देखा वह मेरी समझ से परे है ।

चिरकालिक प्रतिद्वंदी पाकिस्तान

विगत बुधवार, 30 मार्च, के भारत-पाकिस्तान (जिसे लोग इंडिया-पाकिस्तान कहना अधिक ठीक समझते हैं) सेमीफाइनल मैच में पागलपन का जो नजारा मैंने देखा वह वाकई दिलचस्प था । जब भी भारत एवं पाकिस्तान के बीच क्रिकेट या हाकी मैच होता है (अन्य कोई मैच तो शायद ही कभी होता हो!), तब ऐसा लगता है कि मानो बॉर्डर पर तोपों-मिसाइलों के साथ दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया हो । यदि वाकई युद्ध छिड़े तो भी उतने लोग इस कदर उत्सुक, बेचैन या चिंतित नहीं होंगे जितने कि क्रिकेट मैच के मामले में । लोगों की दिलचस्पी खेल की बारीकियों, खिलाड़ियों के अंदाज, उनकी कलाकारी आदि में उतनी नहीं रहती है जितनी कि अपने ‘पुस्तैनी प्रतिद्वंदी’ देश को हराकर विजयी मुद्रा अख्तियार करने में । हम कितना ही भारत-पाक मैत्री की बात कर लें, दोनों देशों के मैच में परस्पर ‘दुश्मन’ होने का भाव साफ झलकता है । हम भले ही खुलकर बोलने से परहेज करते दिखें, किंतु पाकिस्तान के प्रति मन में छाए ‘घृणा भाव’ से मुक्त नहीं हो सके हैं । (भारत के प्रति पाकिस्तान का रवैया भी कुछ ऐसा ही है ।) अपने अनुभव से मुझे यही लगता रहा है कि पाकिस्तान बनाम किसी अन्य देश के मैच में हम देशवासियों की दिली इच्छा यही रहती है कि पाकिस्तान हार जाये । सच क्या है इसका दावा मैं नही करता । बीते बुधवार के सेमीफाइनल के प्रति लोगों के बीच जो दिलचस्पी मैंने देखी वह कल, 2 अप्रैल, के फाइनल मैच से कम नहीं थी, जब कि कल का मैच अहम एवं निर्णायक मैच था – विश्व कप विजेता बनने के लिए । जाहिर है कि पाकिस्तान के साथ ‘लड़ाई’ के माने ही कुछ खास हैं !

क्रिकेट – ब्रिटिश राज की निशानी

खैर, यह तो हुई पाकिस्तान के संदर्भ में अनुभव की जाने वाली खास बात । लेकिन हम भारतीयों का क्रिकेट-बुखार तो बहुत व्यापक है, पाकिस्तान मैदान में हो न हो । आगे अपनी बात कहूं इससे पहले बता दूं कि जिज्ञासावश मैंने इंटरनेट से कुछ जानकारी जुटाई । एक वेबसाइट पर मुझे यह रोचक टिप्पणी पढ़ने को मिली (देखें http://www.worldcricketblog.com/world-cricket/why-still-so-few-countries-play-cricket):

“Countries like Bangladesh, Kenya, Bermuda, Netherlands, Ireland etc etc should not be considered cricket playing countries because they are poor performers. But to save face of cricket boards, they are entered into world cups and other big profile tournaments only so that the sport officials can declare that now many countries play cricket.” (बांग्लादेश, केन्या, बरमूडा, नेदरलैंड, आयरलैंड इत्यादि सरीखों को क्रिकेट खेलने वाले देश नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि इनका खेल निम्नस्तरीय है । लेकिन क्रिकेट बोर्डों की साख रखने के लिए उनको विश्व कपों एवं अन्य नामी-गिरामी टूर्नामेंटों में शामिल किया जाता है, ताकि खेल अधिकारी कह सकंे कि बहुत सारे देश क्रिकेट खेलते हैं ।)

निःसंदेह उपर्युक्त देश क्रिकेट के मामले में कहीं नहीं टिकते हैं । बांग्लादेश के बारे में लोग शायद एकमत न हों । किंतु एक बात तो सभी मानेंगे कि क्रिकेट केवल कुछ ही देशों में खेला जाता है और उनमें से सभी, नेदरलैंड को छोड़कर, ब्रितानी राज के हिस्से रहे हैं । शायद उसी राज के अंतर्गत क्रिकेट ने इन देशों में अपने पांव पसारे, और कालांतर में वहां की जनता को अपने मोहपाश में बांध लिया । ये देश राजकाज की दृष्टि से स्वतंत्र तो हो गये, लेकिन दो चीजों से मुक्ति नहीं पा सके । ये दो चीजें हैं:  क्रिकेट एवं अंग्रेजी ।

क्रिकेट में लेशमात्र भी रुचि न होने के बावजूद मैंने इंटरनेट से यह जानकारी हासिल की कि इस खेल की स्पर्धाओं पर नियंत्रण रखने वाली विश्वस्तरीय संस्था ‘अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद्’ (International Cricket Council, कार्यालय दुबई में) है जिसके केवल 10 ‘पूर्ण’ सदस्य हैं: (1) आस्ट्रेलिया, (2) बांग्लादेश, (3) इंग्लैंड (ब्रिटेन नहीं!), (4) ‘इंडिया’, (5) न्यूजीलैंड, (6) पाकिस्तान, (7) साउथ अफ्रिका, (8) श्रीलंका, (9) वेस्ट इंडीज – उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका के मध्य के द्वीप समूह, और (10) जिम्बाब्वे (पूर्व में रोडेसिया) । (देखें http://en.wikipedia.org/wiki/Cricket)

गौर करें कि ये सभी देश पूर्व में ब्रितानी राज के अधीन थे । मेरी नजर में क्रिकेट अंग्रेजी की भांति हमारी गुलामी की निशानी है, जिसे हम बड़े गर्व से अपनाए रखना चाहते हैं !

उपरिलिखित के अलावा अफगानिस्तान, आयरलैंड, स्कॉटलैंड सरीखे 94 ‘एसोसिएट/एफिलिएट’ सदस्यों की बात भी की जाती है, किंतु क्रिकेट के क्षेत्र में इनका नाम शायद ही कोई लेता है । बहरहाल क्रिकेट वहां लोकप्रिय तो नहीं ही है ।

क्रिकेट – दीवानगी की कोई हद नहीं

क्रिकेट की दीवानगी उस इंग्लैंड में भी नहीं है जिसे इसका जन्मस्थल माना जाता है । इंग्लैंड और प्रायः पूरे यूरोप में फुटबॉल सर्वाधिक लोकप्रिय है । आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड में भी रग्बी की लोकप्रियता क्रिकेट के ऊपर आंकी जाती है । मेरे मतानुसार विश्व के प्रमुख देशों में लोगों की वैयक्तिक रुचि विभिन्न खेलों में देखी जाती है, अपने भारतीय उपमहाद्वीप के देशों की तरह क्रिकेट और केवल क्रिकेट में नहीं । चीन, जापान, रूस, जर्मनी, स्पेन, ब्र्राजील आदि देशों में क्रिकेट की स्थिति वैसी ही होगी जैसी तमाम अन्य खेलों की, जिनमें आम आदमी की खास रुचि नहीं रहती; दीवानगी तो हरगिज नहीं ।

मैं कभी-कभी उन कारणों को जानने-समझने की कोशिश करता हूं, जिनके चलते इस देश में क्रिकेट की दीवानगी पागलपन की हदें पार कर चुकी है । क्रिकेट का रोग इस देश को वर्षों से लगा हुआ है । मुझे अपनी युवावस्था के दिन याद हैं, जब केवल 5-दिनी टेस्ट क्रिकेट खेला जाता था, और लोग रेडियो से चिपके रहते थे, या स्कूल-कालेज-आफिस आते-जाते चौराहों पर स्कोर जानने या कमेंटरी सुनने के लिए भीड़ लगाते थे । बीच-बीच में चौके-छक्के लगने या खिलाड़ी के आउट होने पर तालियां बजतीं या हल्ला मचता । दिन-ही-दिन में खेल आरंभ और समाप्त होते । लिहाजा तब न पटाखे छूटते थे और न ही समाचारों में क्रिकेट छाया रहता था । प्रायः सभी खिलाड़ी ‘स्टेट बैंक’ जैसी संस्थाओं के कर्मी होते थे, जिनकी आमदनी लाखों करोड़ों में नहीं होती थी । या फिर वे धनी परिवारों से होते थे जैसी नवाब पटौदी । उस जमाने में टेलिविजन भी नहीं था और आम आदमी के मनोरंजन के लिए सिनेमा था या फिर क्रिकेट । आज मनोरंजन के अनेकों साधन हैं, किंतु क्रिकेट की महत्ता घटने के बजाय बढ़ती जा रही है । क्यों ?

क्रिकेट – आर्थिक लाभ की खान

क्योंकि समय के साथ क्रिकेट खेल कम और धन-कमाऊ धंधा अधिक बन चुका है । गरीब देश भारत का क्रिकेट बोर्ड तो दुनिया का सर्वाधिक धनी बोर्ड बन चुका है । क्रिकेट कार्पोरेट व्यवसाय का रूप धारण कर चुका है, जो हर उस व्यक्ति का व्यावसायिक हित साधता है जो उससे जुड़ा है, दर्शक को छोड़कर । खिलाड़ी खेल से नहीं विज्ञापनों से अब मालामाल हो रहे हैं, क्योंकि टेलीविजन घर-घर पहुंच चुका है । खिलाड़ी और टीमें बिकने लगी हैं, सट्टेबाजी और मैच-फिक्सिंग इस ‘बिजनेस’ का हिस्सा बन चुके हैं । खेल खेल नहीं रह गया है । इस धंधे के केंद्र में है दर्शक । वह नहीं न रहे तो पूरा धंधा चौपट । इसलिए उसकी भावनात्मक कमजोरी का भरपूर लाभ उठाकर उसे क्रिकेट का अंधभक्त बनाए रखना आवश्यक है, ताकि वह क्रिकेट के सामने सब कुछ भूल जाए । क्रिकेट एक तरफ और सारी दुनिया दूसरी तरफ । मैं महसूस करता हूं कि दर्शकों का ‘ब्रेन-वाश’ करने की तमाम कोशिशें इस समय चल रही हैं, परोक्ष तौर पर, कुछ ऐसे कि उन्हें पता न चले, जैसे ठगी का धंधा चलता है ।

हर कोई इस समय क्रिकेट के प्रति समर्पित है, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से लेकर आम शहरी तक । ऐसा लगता है कि हमारी विदेश नीति भी क्रिकेट तय करेगी । पिछले कुछ दिनों से मैं टेलीविजन पर समाचारों के लिए तरस गया हूं । हर न्यूज चैनल पर क्रिकेट ! यूं टीवी चैनल जितना समय अकेले क्रिकेट को देते हैं उतना अल्पांश भी किसी और मुद्दे को नहीं । अखबारों के भी दो-तीन पृष्ठ क्रिकेट को ही समर्पित रहते हैं । ‘गेम्ज एंड स्पोर्ट‌स’ के नाम पर भी केवल क्रिकेट । इधर क्रिकेट, उधर क्रिकेट, सर्वत्र क्रिकेट । और बीते दिनों तो प्रथम पृष्ठ भी क्रिकेट की बातों से रंगा देखा है । क्या क्रिकेट को छोड़कर कुछ भी अब हमारे लिए अहम नहीं रह गया है ?

आप कहेंगे कि भारतीयों का क्रिकेट के प्रति लगाव ही बहुत अधिक है तो हम उसकी बात क्यों नहीं करेंगे । वे चाहते ही क्रिकेट चर्चा या समाचार । लेकिन आप विचार करें कि यह तथाकथित लगाव पैदा किया किसने ? दरअसल सवाल पहले अंडा कि मुर्गी का है । आप बचपन से ही किसी को शराब पिलाए, सिगरेट पिलाएं, नशे की दवाएं खिलाएं और फिर बाद में कहें कि वह तो इनका आदी है । क्या आपने कभी किसी और खेल की बातें उसी प्रकार से की हैं जैसे क्रिकेट की करते हैं । देश के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक जिस उत्साह से और सम्मान भाव से क्रिकेट खिलाड़ियों से मिलते हैं उतना अपने राष्ट्रीय खेल हाकी खिलाड़ियों से भी नहीं मिलते । जैसे कल के फाइनल मैच में राजनीति और अन्य क्षेत्रों की ‘टाप सेलेब्रिटीज’ स्टेडियम में मौजूद थे, उनकी वैसी दिलचस्पी अन्यत्र देखने को मिल सकती है क्या ? आप क्रिकेट को परोसते हुए उसका नशा लोगों में पैदा करते चलें और फिर कहें कि हम क्या करें । क्रिकेट का व्यवसाय में पैसा ही पैसा है, और ऐसे बहाने उसे आगे बढ़ाने में मददगार होते हैं । मीडिया तक उसमें शामिल है । सच यही है, और आप इसे हरगिज नहीं मानेंगे ।

क्या वजह है कि आप क्रिकेट संबंधी प्रसारण को सनसनीखेज बना के प्रस्तुत करते हैं ? क्यों सचिन को क्रिकेट का भगवान कहते हैं ? अपने-अपने क्षेत्रों में महारत हासिल करने वाले कई लोग आज तक पैदा हो चुके हैं । उनके लिए भी कभी ऐसे शब्द इस्तेमाल किया है क्या ? क्रिकेट के फाइनल को महायुद्ध क्यों कहते हैं ? यह युद्ध नहीं एक खेल है, रोमांचक । दुनिया फतह कर ली जैसे उद्गार क्यों मुख से निकलते हैं ? विश्व कप जीतते हैं, कोई फतह नहीं करते, किसी भी क्षेत्र में नहीं । फिर ऐसे शब्द किसको आकर्षित करने के लिए कहते हैं ? और क्रिकेट का विश्व कप तो नाम भर को वैश्विक है, अंग्रेजों के गुलाम रह चुके देशों तक सीमित । किसी और देश को यह जानने की भी फुरसत नहीं होगी कि कौन जीता कौन हारा । देश की प्रतिष्ठा की झूठी बात करते हैं । ओलल्पिक में हमारे हालात पतले रहते हैं, तब प्रतिष्ठा की बात क्यों भूल जाते है । केवल क्रिकेट ही प्रतिष्ठा का द्योतक क्यों है ? क्योंकि इससे पैसा जुड़ा है ! प्रतिष्ठा के लिए अन्य क्षेत्र कहीं अधिक अहम हैं ।

पिछले कुछ दिनों से मैं पुणे प्रवास पर हूं, एक बहु-आवासीय संकुल में अपने मेजमान के साथ । क्रिकेट कप के बीते सेमीफाइनल-फाइनल की जीतों पर रात्रि 11-12 बजे जो शोर-शराबे और आतिशबाजी का दौर चला वह मेरे लिए असह्य था । आसपास बूढ़ों, छोटे बच्चों, मरीजों पर क्या बीत सकती है इसकी किसी को भी चिंता नहीं । दीवाली पर्व पर अपीलें होती हैं कि पटाखे न छोड़े, वायु-ध्वनि प्रदूषण से बचें, आदि । कई शहरों में रात्रि 10 बजे के बाद शोर-शराबे की खास मनाही है । किंतु क्रिकेट के नाम पर सब माफ है । वाह रे स्वतंत्रता की ‘इंडियन’ परिभाषा ! जश्न के नाम पर जिसकी जो मर्जी वह करे ।

क्रिकेट के नाम पर टोटके भी

और जिस बात को लेकर मेरी हंसी रुक नहीं पाती है वह है कि लोगबाग क्रिकेट कप जीतने के लिए हर टोटका अपनाने को तैयार थे । यज्ञ-यागादि, भजन-कीर्तन, पूजापाठ, गंगास्नान और न जाने क्या-क्या का किया गया । क्रिकेट का विश्व कप क्या हो गया जीवन-मरण का खेल बन गया । यदि ये टोटके कारगर ही होते हों तो क्यों नहीं उन्हें देश की ज्वलंत समस्याओं को सुलझाने में किया जाता है ? क्यों नहीं क्रिकेट के लिए चिंतित ये लोग भुखमरी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, अपराध आदि से मुक्ति पाने के लिए इन टोटकों को अपनाते हैं ? ऐसी हरकतों को मैं पागलपन या अव्वल दर्जे की मूर्खता न कहूं तो क्या कहूं ? – योगेन्द्र जोशी


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