आज ‘फादर्स डे’ (Fathers’ day) है । मदर्स डे की भांति यह भी पश्चिम से अपने देश में आयातित एक और पर्व-दिवस है, और उसी की तरह हालिया डेड़-दो दशकों में देश के मध्यम तथा उच्च वर्गीय शहरी नवयुवाओं में लोकप्रिय हो चला है । इसे क्यों और कैसे मनाया जाए जैसे कुछ सवाल हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए, इसलिए कि अपने यहां तो उत्सवों और दिवसों की पहले से ही भरमार है । उनकी तुलना में इन आयातित दिवसों को अधिक अहमियत देना क्या उचित माना जा सकता है इस बात की समीक्षा की जानी चाहिए । अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने से पहले मैं इस ‘दिवस’ के बारे में उपलब्ध किंचित् जानकारी का संक्षेप में जिक्र करना समीचीन समझता हूं ।
कहा जाता है कि ‘फादर्स डे’ मनाने का विचार प्रथम बार एक अमेरिकी महिला, सोनारा लुई स्मार्ट (Sonora Louise Smart), के मन में तब आया जब वह वेस्ट वर्जीनिया के फेयरमॉंट नगर ( Fairmont, West Virginia) के एक चर्च (आज का Central United Methodist Church) में धर्मोपदेश सुन रही थीं । उपदेष्टा ने अपने कथनों में प्रसंगवश ‘मदर्स डे’ की चर्चा की थी । उस चर्चा से प्रेरित होकर सुश्री सोनारा को विचार आया था कि क्यों नहीं मदर्स डे की भांति फादर्स डे भी मनाया जाए, जिस दिन लोग अपने पिताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें । वस्तुतः सोनारा अपने पिता से बहुत प्रभावित रहीं, जिनके प्रति उनके मन में अपार सम्मान था । मां की छत्रछाया तो वह किशोरावस्था में ही खो चुकी थीं और उनके जीवन का अधिकांश भाग पिता के ही संरक्षण एवं सान्निध्य में बीता था । फादर्स डे के मूल में यही तथ्य कारगर था ।
सोनारा (1882-1978) के पिता विलियम जैकसन स्मार्ट (William Jackson Smart, 1842-1919) थे, जिन्होंने 1862 के अमेरिकी गृहयुद्ध (civil war) में एक प्रमुख योद्धा के तौर पर कार्य किया था । सोनारा की मां एलन विक्टोरिया स्मार्ट (Ellen Victoria Smart, 1851-1898) का असामयिक निधन तब हो गया था जब वह करीब सोलह वर्ष की थीं । उसके बाद उन्होंने अपने सभी छोटे भाइयों की परवरिश में अपने पिता का हाथ बंटाया था । बाद में उनका विवाह जॉन ब्रूस डॉड (John Bruce Dodd, 1870-1945) नामक व्यक्ति से हुआ और वह सोनारा लुई डॉड कहलाईं ।
सोनारा ने अपने पिता के त्याग, प्रेम और साहस के प्रति अपनी श्रद्धा जताने के लिए उनके जन्मदिन, 19 जून 1810, पर सबसे पहला ‘फादर्स डे’ का समारोह मनाया था । और उसी के बाद ‘अमुक नाम से एक दिवस आधिकारिक तौर पर मनाया जाए’ इस आशय से अपने प्रयास करना आरंभ कर दिए । शुरुआत में इस दिवस के प्रति लोगों का नजरिया नकारात्मक रहा । इसे ‘मदर्स डे’ की तरह मान्यता देने के बजाय लोगों ने इसे मजाक के तौर पर लेना आरंभ किया । इसके प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ी तो जरूर पर इसे हंसी-मजाक के दिन के रूप में देखने लगे, कदाचित् अपने देश की होली के माफिक जब मर्यादाओं का उल्लंघन करने में लोग हिचकते नहीं । तब के समाचार माध्यमों की नजर में ‘फादर्स डे’ अन्य तमाम तरह के दिवसों का आरंभ बनने जा रहा था, जैसे ‘दादा-परदादा दिवस’ या ‘क्लीन योर डेस्क दिवस’ इत्यादि । शंका की जाने लगी कि लोग ‘फादर्स डे’ से आरंभ करते हुए तरह-तरह के दिवसों से साल का ‘कलेंडर’ भर देना चाहते हैं ।
लेकिन सोनारा के प्रयास जारी रहे और 1913 में इस दिवस को आधिकारिक मान्यता देने संबंधी एक बिल तत्कालीन अमेरिकी सरकार ने विचारार्थ स्वीकार कर लिया । सन् 1916 में इस प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति, वुड्रो विल्सन (Woodrow Wilson), की सहमति मिल गई, लेकिन बिल पास होने में उसके बाद भी वक्त लगा । तत्पश्चात् राष्ट्रपति कैल्विन कूलिज ( Calvin Coolidge) के कार्यकाल में तत्संबंधित कोशिशें और तेज हुईं । तब (1626) न्यू यॉर्क शहर में राष्ट्रीय फादर्स डे समिति (National Father’s Day Committee) का गठन भी किया गया । लेकिन उसके बाद भी अमेरिकी कांग्रेस ने ‘फादर्स डे संबंधी संकल्प’ लेने में 30 वर्ष का वक्त लिया । और उसके बाद भी अतिरिक्त 16 वर्ष समय बीता, जिसके बाद अंततः राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) ने 1972 में जून माह के तीसरे रविवार को राष्ट्रीय स्तर पर ‘फादर्स डे’ के तौर पर घोषित कर दिया । इसी के साथ अमेरिका में ‘फादर्स डे’ एक पर्व के रूप में स्थापित हो गया । (विश्व में कुछ स्थानों पर यह दिन ‘अंताराष्ट्रीय पुरुष दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है ।)
तो ऐसे हुई ‘फादर्स डे’ की शुरुआत अमेरिका में । हमें इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि अमेरिकी समाज एक खिचड़ी समाज है जिसके पास अमेरिकी भूखंड के वासी होने के नाते कोई उल्लेखनीय सांस्कृतिक-सामाजिक विरासत नहीं है । वहां के लोगों के पास विरासत के नाम पर वही कुछ है जो उन्हें यूरोपीय मूल के होने के नाते मिला है । भारत, चीन आदि से बाद में पहुंचे लोगों को भी अपने मूल देश की सांस्कृतिक विरासत का सहारा लेना पड़ता है । ‘मदर्स डे’ और ‘फादर्स डे’ जैसे पर्व ही ऐसी बातें जिन्हें वहां का आधुनिक समाज ‘हमारा मौलिक कुछ’ है कह सकता है । परंतु भारत-चीन जैसे देशों की बात कुछ और ही है । उनके पास सुसंपन्न ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत है, जिसमें इतना कुछ है कि उन्हें अमेरिका से पर्वों को आयात करने की आवश्यकता नहीं है । फिर भी कोई भारतीय इन दिवसों को मनाने में रुचि ले तो रोका नहीं जा सकता है । लेकिन उनके उत्साह के प्रति एक सवाल अवश्य मन में उठ सकता है । सामाजिक-सांस्कृतिक प्रकृति का बहुत कुछ ऐसा है जिसे अमेरिका तथा यूरोप से आयात किया जा सकता है और जो स्वयं में मूल्यवान है । उसे छोड़ हम क्यों ‘फादर्स डे’ तथा तत्सदृश अन्य दिवसों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं यह प्रश्न जरूर पूछा जा सकता है ।
वह क्या बात है जिसके चलते ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’, वैलेंटाइन डे’ आदि को हमारे युवा वर्ग में तेजी से लोकप्रियता मिल रही है । कुछ बिंदु हैं जिन पर विचार होना चाहिए । अगली पोस्ट में यह चर्चा जारी रहेगी । – योगेन्द्र




आपको पिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ…
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चाँद, बादल और शाम | गुलाबी कोंपलें
Comment by विनय — June 22, 2009 @ 12:18 am |
जानकारी का आभार.
Comment by समीर लाल — June 22, 2009 @ 3:14 am |
बढ़िया जानकारी! ये तो हिन्दी विकीपिडिया में सहेजी जा सकती है।
Comment by nitin — June 22, 2009 @ 3:28 am |