दिल्ली के रामलीला मैदान पर भूख-हड़ताल पर बैठे अण्णा हजारे जी ने कल पूर्वाह्न करीब 10 बजे अपना अनशन तोड़ दिया, और उसी के साथ भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके अभियान का पहला एवं अहम चरण पूरा हुआ । आगे का कार्य देश के जनप्रतिनिधियों के हाथ में है । उम्मीद की जानी चाहिए कि वे टालमटोल का रास्ता न अपनाकर यथाशीघ्र (जन) लोकपाल बिल का अंतिम मसौदा तैयार करके उसे पास कर पायेंगे ।
अण्णा के अनशन तोड़ते समय उनको शहद एवं नारियल पानी पिलाने का कार्य किया दो छोटी बच्चियां: इकरा, 4 साल, समीना बेगम तथा शहाबुद्दीन की बेटी, और सिमरन, 5 साल, रेखा तथा बच्चू सिंह की बेटी ने । पहली मुस्लिम समुदाय की तो दूसरी हिंदू दलित वर्ग की थी । क्या राज था इनको खास तौर पर चुनने का ? खुलकर शायद कहा न जा रहा हो, लेकिन बात छिपी नहीं है ।
दिल्ली के रामलीला मैदान में चल रहे अनशन के दौरान टीवी चैनलों के माध्यम से एक बात मेरे देखने में आई । मुस्लिम समुदाय तथा हिंदू दलित वर्ग के कुछ जन अण्णा के आंदोलन से नाखुश नजर आये, यहां तक कि वे विरोधी स्वर व्यक्त करने से भी नहीं बचे । कुछ जन तो यह भी कह बैठे कि यह आंदोलन दलित विरोधी है । उनका कहना था कि आंदोलन हिंदू सवर्णों के द्वारा चलाया गया है और उसमें दलितों एवं मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नहीं है । ऐसे खयालात इन समुदायों के आम लोग कहते तो मैं उनकी बातों को तवज्जू न देता । लेकिन कहने वालों में बुद्धिजीवी भी शामिल थे ।
मुझे उनके तर्क हास्यास्पद और बेमानी नजर आते हैं । इस संदर्भ में निम्नांकित बिंदुओं पर तनिक विचार करेंः
■ (1)
अण्णा का आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध था और उसके निवारण के लिए सरकार पर दबाव डालने हेतु वे अनशन पर बैठे थे । उसके अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचने में अभी कितनी अड़चनें आएंगी कहना मुश्किल है । भ्रष्टाचार का मामला देश के किसी समुदाय से जुड़ा नहीं हैं । देश के अधिकांश लोग, विशेषकर कमजोर नागरिक जिनके पास धन, बाहुबल, राजनैतिक पहुंच या प्रशासनिक संरक्षण नहीं है, वे भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं । उक्त आंदोलन उसके निवारण की दिशा में उठाया गया कदम है । यह किसी तबके के हित-साधन में नहीं किया गया । तब किस आधार पर कुछ दलितों/मुस्लिमों को इससे विरोध था ?
■ (2)
मैं समझता हूं कि आंदोलन का विचार समाज के 5-10 संवेदनशील जनों में पैदा हुआ होगा, और उन्होंने कुछ और लोगों को स्वयं से जोड़ते हुए अण्णा के नेतृत्व में मुहिम छेड़ दी होगी । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने समाज के किसी वर्ग विशेष से साथ देने के लिए सदस्यों को नहीं चुना होगा । जिसमें दिलचस्पी जगी होगी और जिसे भी सहभागिता निभाने में पर्याप्त समय तथा ऊर्जा लगाने की सामर्थ्य लगी होगी वह जुड़ा होगा । संयोग से यदि किसी समुदाय विशेष का कोई कार्यकर्ता इस मुहिम में नहीं शामिल हो सका हो तो इससे यह कहना कि यह आंदोलन उस खास समुदाय के विरुद्ध है सर्वथा अनुचित है । अगर किसी दलित/मुस्लिम ने आगे बढ़कर इसमें सहभागिता निभाने की बात की होती और उसको मना कर दिया होता तो वह विरोध का आधार बन सकता था । मुझे विश्वास है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा । ध्यान रहे कि आंदोलन उसकी व्यवस्था करने वालों तक सीमित नहीं था । दिल्ली तथा अन्यत्र आंदोलन में सम्मिलित होने वाले विशाल जन समुदाय में तो सभी तबकों के लोग थे । फिर विरोध कैसा ?
■ (3)
जहां तक आंदोलन के कर्ताधर्ताओं में दलितों या मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व का सवाल है, इस पर भी ध्यान देें कि कई अन्य समुदायों या सामाजिक तबकों के मामले में भी यह कहा जा सकता है । मुझे आंदोलन की केंद्रीय समिति में कोई सिख, इसाई या बौद्ध नहीं दिखा । ओर क्षेत्रीयता की बात करें तो कोई, बंगाली, असमी या कन्नड़ भी उसमें नहीं था । वे भी विरोध के पक्ष में तर्क दे सकते थे । तब फिर दलितों/मुस्लिमों को ही मौजूदा मामला नागवार क्यों गुजरा ?
■ (4)
इस संदर्भ में एक विचारणीय तथ्य यह है कि जिन मुद्दों पर जनांदोलन होते हैं उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है । पहली श्रेणी में वे आते हैं जो किसी खास सामाजिक वर्ग या भौगोलिक क्षेत्र से सरोकार रखते हों । मुस्लिम वर्ग के लिए आरक्षण की आजकल की जा रही वकालत और अलग तेलंगाना राज्य की मांग इस प्रकार के मुद्दे हैं । ऐसे मुद्दे देश के सभी नागरिकों को आकर्षित नहीं करते हैं । इसलिए इन मामलों में राष्ट्रव्यापी जनसमर्थन की आशा नहीं की जाती है । इनके विपरीत दूसरी श्रेणी में वे मुद्दे आते हैं जिनका ताल्लुक किसी खास समुदाय से या क्षेत्रविशेष से नहीं होता । महंगाई का मुद्दा इस श्रेणी का ज्वलंत उदाहरण है । भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे से अण्णा के आंदोलन का संबंध रहा है वह भी सभी से सरोकार रखता है । इन दोनों के मामले में जनसमर्थन देश के हर कोने से और हर तबके के नागरिक से मिल सकता है । इन मुद्दों को सवर्णों अथवा केवल हिंदुओं से जोड़ना किसी भी तरह से उचित नहीं है ।
अण्णा आंदोलन में मुस्लिमों या दलितों की सहभागिता के न दिखाई देने का कारण मुद्दे का संकीर्ण होना नहीं है । मेरा अनुभव यह है कि इन सामाजिक तबकों के सामाजिक कार्यकर्ता आम तौर पर केवल उन्हीं मुद्दों में दिलचस्पी लेते जो इन तबकों से संबंध रखते हों । वे अक्सर दलितों या मुस्लिमों के हितों तक ही अपने कार्य सीमित रखते हैं । ऐसे दलित/मुस्लिम कार्यकर्ता अधिक नहीं होंगे जो अपने-अपने समुदायों के हटकर सभी नागरिकों के हितों की बात करते हों । ऐसी स्थिति में इन समुदायों के लोगों की भागीदारी अण्णा आंदोलन के प्रबंधन में यदि नहीं दिखी तो इसमें आश्चर्य नहीं है ।
अंत में इस बात पर आपका ध्यान खींचता हूं कि अण्णा के अनशन तोड़ने में दो बच्चियों, सिमरन एवं इकरा, की खास भूमिका दलित एवं मुस्लिम वर्गों को यह बताने के लिए रही होगी कि आंदोलन के कर्ताधर्ताओं को इन समुदायों से कोई परहेज नहीं । उनका समर्थन सहर्ष स्वीकारा जाएगा यह संदेश उक्त घटना में निहित है । – योगेन्द्र जोशी