पिछले दो-तीन दिनों से 2जी स्पेक्ट्रम के तथाकथित घोटाले का मुद्दा फिर से गरमाया है । बिना राज्य के ए. राजा देश के सुप्रसिद्ध कारागार तिहाड़ जेल में कई अन्य साथियों के साथ आजकल पिकनिक मना रहे हैं, या स्वाथ्यलाभ कर रहे हैं । सुनते हैं वहां की व्यवस्था उच्चतम श्रेणी की है । आप-हम जैसों को उस दिव्यस्थल के दर्शन भी पाना कठिन है, किंतु इन महानुभावों को वहां की हर सेवा उपलब्ध है । किस्मत अपनी-अपनी !
टीवी पर उक्त ‘घोटाले’ की असीमित चर्चा ने मेरे दिमाग पर पूरा कब्जा कर लिया है । उससे संबंधित सभी नेताओं-अभिनेताओं की बातें सोते-जागते खयालों में घूमती रहती हैं । कल ही रात नींद में मुझे सपना दिखा कि कैसे श्री चिदंबरम से पूछताछ होती है ।
सपने में देखता हूं कि विपक्ष के चिदंबरम-विरोध के मद्देनजर डा. सुब्रमण्यम स्वामी की इस मांग को शीर्षस्थ अदालत ने मान लिया है कि देश की सर्वाधिक ‘कार्यकुशल’ पूछताछ संस्था सीबीआई श्री चिदंबरम से पूछताछ करे । वैसे तो वे ग्रहमंत्री हैं, लेकिन तथाकथित घोटाले के दौरान वे ही वित्तमंत्री थे । बतौर वित्तमंत्री के उन्होंने अवश्य ही घोटाले में अहम भूमिका निभाई होगी ऐसा डा. स्वामी का कहना है । बहरहाल अदालत ने सीबीआइ को आदेश दिया कि जाओ श्री चिदंबरम से पूछो कि उन्होंने राजा की क्या मदद की थी ।
बेचारी सीबीआइ करे क्या ? वह तो श्री चिदंबरम के अधीनस्थ ग्रहमंत्रालय का एक अंग भर है । उसे हिम्मत तो नहीं कि अपने मालिक से कुछ पूछे, लेकिन कुछ तो करना ही था, आखिर अदालत को जवाब जो देना था । हिम्मत करके सीबीआइ के निदेशक महोदय अधिकारियों का एक दल गठित करते हैं । हर कोई ना-नुकुर करता है और जांचदल में शामिल होने से बचता है । निदेशक जी को कुछ पर तरस भी आता है, और वे उन्हें छूट भी दे देते हैं और दल में तेजतर्रार समझे जाने वाले कुछएक अधिकारी शामिल कर लिए जाते हैं । दल में शामिल ये लोग अपनी किस्मत को कोसते हैं कि कहां फंस गये, किंतु अपनी तेजतर्रार होने की छबि बचाए रखने के लिए हांमी भर देते हैं । उनमें से श्री हिकलानी को दल का नेता घोषित कर दिया जाता है ।
जांचदल दो-एक दिन ‘होमवर्क’ करने में जुटा रहता है, क्या करना है, क्या सवाल पूछने हैं, इत्यादि । और उसके बाद निकल पड़ता है श्री चिदंबरम से मिलने उनके कार्यालय । अपना परिचय देने हुए दल के नेता श्री हिकलानी मंत्री महोदय के निजी सचिव से मुलाकात की व्यवस्था करने को कहते हैं । अपना परिचय तो उन्होंने औपचारिकतावश दिया, अन्यथा उनके मंत्रालय के सभी अधिकारी तो उन्हें जानते ही हैं । मंत्रीजी के कक्ष में पहले से चल रही बैठक पूरी होने तक सचिव जी उनसे प्रतीक्षा करने को कहते हैं । दल के सदस्य अतिथि-कक्ष में इंतिजार करने लगते हैं ।
बैठक की समाप्ति के उपरांत मंत्री महोदय उन्हें अपने कक्ष में बुलाते हैं । सहमे-से हिकलानी जी अपने दल के साथ अंदर दाखिल होते हैं । मंत्री जी आरामदेह कुर्सी के सहारे पीठ टिकाए हुए उनकी ओर मुखातिब होते हैं और मुस्कुराते हुए सवालिया अंदाज में बोलते है, “कहिए हिकलानी जी, कैसे आना हुआ, वह भी इतने जनों के साथ ? सब खैरियत तो है न ?”
दल के प्रमुख जवाब देते हैं, “वैसे तो सब ठीक है सर, लेकिन …”, और क्षण भर के लिए चुप हो जाते हैं । मंत्री जी उन्हें आश्वस्त करते हुए पूछते हैं, “लेकिन क्या ? बेहिचक बताइए, मैं मदद करने की भरसक कोशिश करूंगा । आखिर देश का एक अहम महकमा है आपका, उसके कर्मी परेशानी में हों तो मैं भला निश्चिंत कैसे रह सकता हूं ?”
“सर, बात ये है कि देश की उच्च अदालत ने हमें परेशानी में डाल दिया है । अदालत कहती है कि पूर्व वित्तमंत्री और अब वर्तमान गृहमंत्री, यानी आप, से भी पूछो कि 2जी स्पेक्ट्रम में उनकी क्या भूमिका रही है । पता लगाओ कि उन्होंने ए. राजा की कितनी मदद की थी । अब आप ही बताएं हम आपसे क्या पूछें ?” दल के मुखिया ने कहा ।
“अरे इतनी-सी बात ? इसमें परेशान होने की क्या बात ? जो मैं बताऊं वह कोर्ट में जाकर उगल देना ।”
“वह तो ठीक है, सर । लेकिन खानापूरी के लिए कुछ सवाल-जवाब तो करने ही पड़ेंगे । हमने कुछ सवाल तैयार किए हैं । आप कहें तो आपके सामने पेश करें ?”
“ठीक है, पूछिए जो पूछना हो, मुझे क्या परेशानी होगी भला ।”
“वो तो हम भी जानते हैं, सर, कि मामले से आपका कुछ लेना-देना नहीं है । लेकिन करें क्या, हमारी भी मजबूरी है ।”
और फिर शुरू होता है सवाल-जवाबों का सिलसिला । मंत्री जी बिलाझिझक सवालों का जवाब फटाफट देने लगते हैं । अधिकतर सवालों के जवाब वे हां या ना में ही देते हैं, और कुछ के बारे में “मुझे नहीं मालूम” कहकर सीबीआइ को संतुष्ट करते हैं । एक सवाल के उत्तर में वे थोड़ा विचलित होते हैं और कहते हैं, “मुझे याद नहीं ।” और फिर उल्टे अधिकारियों से ही पूछ बैठते हैं, “अरे भई, आदमी की याददास्त इतनी मजबूत नहीं होती कि हर बात याद रह सके । आप ही बताइए कि पिछले महीने की 20 तारीख डिनर में आपने क्या लिया था ? याद नहीं ना ? फिर सोचिए कि बरसों पहले किससे क्या बात हुई यह कैसे मुझे याद आ सकता है ? लिखित रूप में कहीं कुछ बचा हो तो कह नहीं सकता ।”
दल के सदस्य समवेत स्वर में हां में हां मिलाते हुए कक्ष से निकलने को उद्यत होने लगते हैं । तब तक वहां चाय और कुछ स्नैक्स आ चुकते हैं । मंत्री जी चाय की चुस्की लेने का आग्रह करते हुए कहते हैं, “ये जरूर देख लीजिएगा कि भूल से आप कोर्ट में कुछ उल्टा-सीधा जवाब न दे बैठें ।”
फिर समवेत स्वर में उत्तर मिलता है, “यह सब कहने की जरूरत नहीं आपको, आप निश्चिंत रहें ।”
सपने के दृश्य अभी चल ही रहे थे कि मेरी आंख खुलती है और देखता हूं कि श्रीमती जी नींबू की चाय हाथ में लिए हुए मुझे जगा रही हैं ।
(नोटः वैसे तो मैं ही आम तौर पर सुबह की नींबू-चाय बनाता हूं और श्रीमती जी को भी पिलाता हूं । लेकिन इस बार संयोग से देर तक सोता ही रह गया, और रोज की मेरी भूमिका उन्होंने ही निभा ली । आगे यह भी स्पष्ट कर दूं कि यह सब मेरे सपने में घटित बात है, और इस वर्णन पर मेरा ‘कॉपीराइट’ है ! कह नहीं सकता कि यह सब हकीकत में कभी घटेगा कि नहीं ।) – योगेन्द्र जोशी



