रिओ ओलंपिक पदक एवं खजाने की लूट: अंधेर नगरी चौपट राजा

Opening Rio Olympics 2016

अगस्त 5 से 21, 2016, तक चले सत्रह-दिवसीय रियो ओलंपिक खेलों में आरंभिक 13-14 दिनों तक तो भारतीय दल का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उस दौरान मेरी पत्नी एवं मुझ सरीखे कुछ लोगों को लगने लगा था कि कहीं ऐसा न हो कि 118-सदस्यीय भारतीय खिलाड़ियों के दल को एक भी पदक न मिले। (इस बार का दल अपेक्षया बड़ा था 2012 के 83-सदस्यीय दल की तुलना में।)

(विभिन्न देशों द्वारा प्राप्त पदकों की तालिका लेख के अंत में दी गयी है।)

दो पदकों पर जश्न

खैर देशवासियों की किस्मत अच्छी रही कि पहला पदक महिला कुश्ती खिलाड़ी साक्षी मलिक पाने में कामयाब रहीं। देश की जनता इस उपलब्धि पर इतनी खुश हुई कि जैसे ओलंपिक के सभी पदक देश की झोली में आ गये हों। लोग तुरंत जश्न मनाने में जुट गये। हरियाणा सरकार ने बिना देर किये साक्षी को 2.50 करोड़ का पुरस्कार भी दे डाला। भारतीय रेलवे ने भी समय गंवाये बिना 50/60 लाख के इनाम की घोषणा कर डाली और साथ में नौकरी में पदोन्नति भी। सुनने में आया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं अनूठे व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी ने भी दिल खोल के ईनाम देने का ऐलान कर दिया, एक करोड़ की राशि देने के वादे के साथ। (देखिए इकनॉमिक-टाइम्ज़ तथा इंडियन-एक्सप्रेस)

साक्षी की उपलब्धि पर देशवासी झूम ही रहे थे कि खबर आई कि बैडमिंटन खिलाड़ी पी वी सिंधु प्रतिस्पर्धा के क्वार्टर-फ़ाइनल की बाधा पर करके सेमी-फ़ाइनल में पहुंच गयीं हैं। बाद में सेमी-फ़ाइनल की बाधा पार करके उन्होंने अपने नाम एक पदक  पक्का कर लिया। इसके बाद देशवासियों को उम्मींद होने लगी कि स्वर्ण पदक उनके नाम होना है। स्वर्ण पदक लिए भजन-पूजन, हवन-यज्ञ और दुआओं का दौर भे चल पड़ा ताकि उन टोटकों से पदक की गारंटी में शक ही न रहे। दुर्भाग्य कि इन टोटकों ने कोई कमाल नहीं दिखाया और जैसा कहा जाता है विश्व की खिलाड़ी नंबर एक के सामने वह कमजोर ही रहीं। कुछ भी हो रजत पदक को तो वह बटोर के ले ही आईं । खैर पदकों के लिए तरसते देश के लिए यह मरुभूमि में पानी पाने की खुशी से कम नहीं था।

कांस्य पदक विजेता को 2.50 करोड़ तो रजत पदक विजेता का “रेट” अधिक होना ही था। तेलंगाना सरकार ने 3 करोड़ तो कुछ ऐसी या कम राशि आन्ध्र सरकार ने भी उनकी झोली में डाल दिए। केजरीवाल जी क्यों पीछे रहते? उन्होंने भी दिल खोल के पुरस्कृत कर दिया। इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार सिंधु को करीब 13 करोड़ की प्राप्ति हुई। समाचार है कि विज्ञापन कंपनियां उनसे अनुबंध के लिए कतार में खड़े हो चुके हैं।

इन दो खिलाड़ियों के लिए स्वागतार्थ समारोह और जलूस भी अपूर्व रहे। स्वागत में तो दीपा कर्माकर (जिमिनास्ट में चतुर्थ स्थान-प्राप्त) भी शामिल की गयीं यद्यपि उन पर खास धनवर्षा नहीं हुई।

पदक तालिका में इंडिया दैट इज़ भारत

उक्त रिओ ओलंपिक में भारत की स्थिति कितनी दयनीय रही इस हेतु मैंने उपलब्ध पदक-तालिका का अध्ययन किया और जनसंख्या के सापेक्ष विभिन्न देशों की स्थिति के लिये एक सूचकांक M/P = मेडल (पदक) संख्या प्रति लाख पोप्युलेशन (जनसंख्या) भी परिभाषित किया है। (देखिए तालिका लेख के अंत में।) तालिका में उन देशों के नाम नहीं हैं जिनको एक भी पदक नहीं मिला है।

गौरतलब है कि 6 स्वर्ण के साथ 11 पदक जीत कर 16वें क्रम पर स्थित जमैका (आबादी केवल 28 लाख) जैसे छोटे देश के लिए M/P = 0.3929 सर्वाधिक है। दरअसल छोटे देशों के लिए M/P अपेक्षया अधिक है। क्रम में 67वें स्थान पर भारत के लिए न्यूनतम, 0.0002 है। उसके ऊपर नाइजीरिया है M/P = 0.0005 के साथ। अन्य सभी देशों के लिए यह 0.0010 से अधिक है।

इस सूचकांक को मैं महत्वपूर्ण इसलिए मानता हूं क्योंकि सांख्यकीय सिद्धांतों के अनुसार मानव-कार्यकलाप के किसी भी क्षेत्र में दक्ष लोगों की संख्या आबादी के लगभग अनुपात में होगी ऐसी उम्मीद सामान्यतः की जाती है। इसे शब्दशः नहीं लिया जा सकता है किंतु बहुत बड़ी आबादी वाले देश में अधिक दक्ष लोग तो होने ही चाहिए। इसलिए भारत जैसा देश दो पदक भी मुश्किल से पा सका इसके निहितार्थ पर चिंतन तो होना ही चाहिए।

खजाने का दुरुपयोग

देश के नाम अधिक पदक नहीं आये इसका देशवासियों के लिए भावनात्मक महत्व है, किंतु इससे देश की व्यवस्था और खुशहाली पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। मुझे जिस बात पर घोर आपत्ति है वह है पदक-प्राप्त दोनों खिलाड़ियों को पुरस्कृत करने के लिए सरकारों द्वारा राजकोष यानी खजाना लुटाना । अधोलिखित बातों पर जरा विचार करें।

(1) मुझे याद नहीं आता कि पहले कभी खिलाड़ियों पर रातोंरात करोंड़ों रुपये लुटाये गये हों। एक समय था जब देश में क्रिकेट बेहद लोकप्रिय था (आज भी है), लेकिन खेल के माध्यम से उसके खिलाड़ी लाखों नहीं कमा सके (तब लाख ही बहुत होता था)। उनमें से अधिकतर स्टेट बैंक या रेलवे में नौकरी करते थे। उस काल में विज्ञापनों की दुनिया इतनी चमकदार नहीं थी। लेकिन आज के समय में विज्ञापन-दाता कंपनियां दिल खोल कर पैसा खर्च कर रही हैं और अपने विज्ञापनों के लिए लब्धप्रतिष्ठ खिलाड़ियों और सिने-टीवी कर्मियों आदि के साथ करोड़ों का अनुबंध स्वीकरती हैं। अब ऐसे खिलाड़ियों को नौकरी नहीं करनी होती है। जहां तक मेरा अनुमान है सचिन तेंदुलकर और अमिताभ बच्चन की करोड़ों की संपदा उनके व्यवसाय एवं विज्ञापनों से प्राप्त हुई है। ये दो नाम मात्र उदाहरण के लिए हैं, अन्यथा सूची तो लंबी होगी। सरकारी खजानों से उनको बहुत मिला हो मुझे नहीं लगता। जैसा पहले कहा है विज्ञापन-प्रदाता कंपनियां पदक-प्राप्त खिलाड़ियों से अनुबंध के लिए आतुर रहती हैं। अस्तु, चाहे पहले हो या आज, खिलाड़ियों पर सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाना उचित नहीं कहा जायेगा।

(2) मैं सोचता हूं कि 6 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 16 पदक जीतने वाले जमैका की सरकार ने खिलाड़ियों को कितने करोड़ों से नवाजा होगा? तुलना के लिए ध्यान रहे कि भारत की अनुमानित आबादी 130 करोड़ से ऊपर है और जमैका की मात्र 28 लाख। वहां की प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय है करीब 8000 डॉलर और भारत की करीब 5000 डॉलर।

(3) मेरे मन में यह प्रश्न भी उठता है कि यदि कई अन्य देशों की तरह अपने यहां भी 15-16 खिलाड़ियों ने पदक जीता होता तो उनको सरकारी खजानों से कितना-कितना मिला होता? और हमारे विशिष्ठ व्यक्तित्व के धनी केजरीवाल जी तब अपने खजाने से कितनों पर कितना लुटाते? ध्यान दें जिन दो पदक विजेताओं को उन्होंने करोड़ों से पुरस्कृत किया है उनका दिल्ली राज्य से सीधा संबंध नहीं। यह सवाल भी मेरे मन में उठता है कि क्या परिणाम होते यदि सभी राज्य सरकारें दिल खोलकर खजाना लुटाने चल देतीं? तब ये खिलाड़ी दो दिन में ही कितने करोड़ों के मालिक हो जाते?

(४) मेरी दृष्टि में सर्वाधिक आपत्तिजनक है राज्य के खजानों को लेकर सरकारों का रवैया। किसी जमाने में राजे-महाराजे राजकीय कोशों के मालिक होते थे। उनके लिए खजाना अपनी निजी संपत्ति होती थी। उसे जैसे चाहें वे खर्च करते थे। वे किसी पर खुश हो गये तो उसे गले का हार दे देते थे या खजांची को आदेश देते थे कि स्वर्ण मुद्राओं से उसे नवाजा जाये। क्या लोकतंत्र में शासन चलाने वाला जनप्रतिनिधि-मंडल अर्थात मंत्री-परिषद के साथ मुख्यमंत्री खजाने का मालिक होता है जिसे जैसे चाहे अपनी मरजी से खर्ज करे? अथवा वे राजकोष के रखवाले या संरक्षक होते हैं जिनसे अपेक्षा रहती है कि वे जनहित में उस कोष का इस्तेमाल करें – जनहित जो जनता की समझ में भी आवे? बिना किसी पूर्वनिर्धारित नियमों के जैसी मरजी हुई वैसे खजाना लुटा देने को भी जनहित कह देना न्यायसंगत कहा जायेगा क्या? जिन सरकारों ने खिलाड़ियों पर खुल कर खजाना लुटाया उन्होंने किन कायदे-कानूनों के तहत ये सब किया?

(4) मेरी आपत्ति और भी गंभीर हो जाती है जब ये सरकारें स्कूलों, अस्पतालों, की हालत सुधारने में धन खर्च नहीं करतीं, वेतन बचाने के चक्कर में खाली पड़े पदों को नहीं भरतीं, असंपन्न किसानों के छोटे-मोटे कर्जों को माफ़ करके उन्हें आत्महत्या से नहीं बचाती। सरकारी लापरवाही से हुए हादसों में परिवारों के कमाऊ सदस्य चल बसते हैं, सरकारें उनके लिए भी 2-3 लाख का मुवावजा बहुत समझती हैं। और खिलाड़ियों पर करोड़ों? वाह मेरे देश का लोकतंत्र! जरा सोचिए सफ़ाई कर्मियों को तनख्वाह देने में केजरीवाल जी जल्दी नहीं करते परंतु खिलाड़ियों पर धन लुटाने में उन्हें देर नहीं लगती।

(5) प्रबुद्ध जन इस तथ्य पर विचार करें कि विश्व का सर्वाधिक चर्चित पुरस्कार भी गत वर्ष केवल 6.5 करोड़ का था। वह भी स्वीडन की सरकार नहीं बल्कि आल्फ़्रेड नोबेल की दानराशि से स्वीडिश अकादमी देती है। मेरी जानकारी में किसी नोबेल पुरस्कार विजेता पर संबंधित देश की सरकार धनवर्षा नहीं करती। क्या हमारी कोई सरकार धनवर्षा करेगी यदि कोई नोबेल पुरस्कार जीते? इस पर भी गौर करें कि केंद्रीय सरकार का सबसे बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार भी केवल 25 लाख रुपये का है। प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार (साहित्य) मात्र 11 लाख रुपये का है। देश में बड़ा वैज्ञानिक पुरस्कार गैर-सरकारी संस्था इंफ़ोसिस साइंस फ़ाउन्डेशन देती है वह भी 55 लाख का है। तब सवाल उठता है कि क्या ओलंपिक पदक की अहमियत विज्ञान, साहित्य आदि की उपलब्धियों से बड़ी है?

अंधेर नगरी

ऐसी विकृत शासकीय व्यवस्था को भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी ने कभी “अंधेर नगरी चौपट राजा” के विशेषण से संबोधित किया था।

Olympic Medals Tally

गोरक्षा का सच: सड़कों पर आवारा गायें और सांड़ गोरक्षकों को नजर क्यों नहीं आते?

मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद हैं जब मेरे पिताजी ने गांव में गाय पाल रखी थी। चूंकि मेरी मां की पहले ही इहलोकलीला समाप्त हो चुकी थी, अतः गाय की देखभाल, दाना-पानी और दूध दुहने आदि के प्रायः सभी कार्य वे अकेले स्वयं ही करते थे। घर पर हम बच्चे यथासंभव उनका हाथ बंटा देते थे। उत्तराखंड के मेरे उस पहाड़ी गांव में गाय-बैलों की उस काल में काफी अहमियत थी, क्योंकि वे दूध के स्त्रोत के अतिरिक्त कृषि-कार्यों के लिए भी आवश्यक होते थे। उनके गोबर-मूत्र से बने खाद का प्रयोग खेतों में होता था। उस काल में हम रासायनिक खाद से अनभिज्ञ थे। हां, तो मैं बता रहा था कि मेरे पिताजी गाय दुहने का कार्य स्वयं करते थे। उन्होंने नियम बना रखा था कि गाय के थन से उतरने वाला आधा दूध उसके बच्चे – बछिया हो या बछड़ा – को मिले। प्रचलित परंपरा के अनुसार हम लोग बच्चा जनने के २२ दिनों तक गाय का दूध प्रयोग में नहीं लेते थे। उस अंतराल में गाय का बच्चा भरपूर दूध पा जाता था। बाद में आधा दूध उसका और आधा हमारा। उसको घास तथा खाद्य वनस्पति की मुलायम पत्तियां खाना सिखाया जाता था। वह भी एक समय था जब गायें या बैल बूढ़े होने पर भी पलते रहते थे। वे तब भी पूरी तरह निरुपयोगी नहीं होते थे क्योंकि उनका गोबर-मूत्र खाद के काम आता था। उन्हें छोड़ना चाहे कोई तो कहां छोड़ा जाता? छुट्टा छोड़ने का मतलब खेत चरने की छूट। (आवारा छोड़े गये पालतू पशुओं को वाराणसी में छुट्टा कहा जाता है।) मेरे पिताजी तो धार्मिक प्रवृत्ति के थे इसलिए गाय की सेवा कर्तव्य मानते थे। वे तो कुछएक शारीरिक व्याधियों के निराकरण हेतु भी पंचगव्य के सेवन में आस्था रखते थे।

     यह बात कोई पचास-पचपन वर्ष पहले की है। अब न मेरे पिताजी इस लोक में  रह गये हैं और न वे गायें और न ही मैं अब गांव में हूं। किंतु गाय-बैलों की उपयोगिता तो वहां अभी भी है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्र के सीड़ीनुमा खेतों के लिए ट्रक्टर जैसे साधनों की व्यवस्था एवं उपयोग सामान्यतः संभव नहीं।

गोपालकों की गली सुन्दरपुर वाराणसी

 

 

 

 

 

 

वाराणसी में छुट्टा/आवारा गायें 

अब मैं आज के शहरों के गोवंश की बाबत अपने अनुभव की बात करता हूं। मेरा अनुभव मुख्यतया अपनी तथाकथित धार्मिक नगरी (वस्तुत: धर्म के नाम पर पाखंड में अनुरक्त) वाराणसी से जुड़ा है। फिर भी यह कह सकता हूं आवारा या छुट्टा गायों और सांड़ों को मैंने कई शहरों में देखा है और उन शहरों की स्थिति वाराणसी से परिमाणात्मक स्तर पर बेहतर हो सकती है किंतु गुणात्मक स्तर पर नहीं। निश्चय ही वाराणसी की स्थिति अत्यंत दयनीय है।

जहां तक आवारा जानवरों का सवाल है उसमें गायें एवं साड़ों के अतिरिक्त अन्य पालतू पशु भी देखने को मिल जाते हैं, जैसे सुअर, बकरे, गधे तथा खच्चर। आवारा कुत्तों को भी उसमें शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा वाराणसी के कई मोहल्लों में और मंदिरों के आसपास बंदरों की फौज़ के दर्शन भी आपको हो जायेंगे। इन सबका कोई इलाज मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में होने से रहा; किसी को भी इस दुर्व्यवस्था से परहेज नहीं।

भारतीयों की खासियत यही है कि अवांछित वस्तुस्थिति से कैसे सामंजस्य बिठाएं इसे वे जन्म के तुरंत बाद ही सीख जाते हैं। जिंदगी ऐसे ही चलते रहनी है।

     जहां तक गायों और साड़ों की बात है मैं बताता हूं वे कहां से आ टपकते हैं। दरअसल इस शहर के गली-कूचों में कई लोग गायें पालते हैं। कुछ ने ताजा एवं “शुद्ध” दूध के लिए निजी तौर पर एक या कभी दो गायें पाल रखी हैं। इसके अलावा कुछ का गोपालन करके दूध का कारोबार करना रोजी-रोटी का साधन है। ऐसे अधिकांश जनों ने अपने पुस्तैनी मकान को और उससे लगे गली-कूचे को ही इस कार्य हेतु प्रयोग में लिया है। इसके लिए कोई पक्का ढांचा गली में खड़ा नहीं करना पड़ता है। इसे आप अतिक्रमण कहेंगे या नहीं मैं नहीं जानता। किंतु प्रशासनिक तंत्र इस व्यवस्था को निर्लिप्त भाव से देखता है। यह भी सच है कि इन लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना भी प्रशासन नहीं कर सकता। यों पिछले बीस-बाइस सालों से मैं वाराणसी में नये-नये आने वाले सक्षम (कानूनन सक्षम लेकिन व्यवहार में अक्षम!) अधिकारियों को सुनते आ रहा हूं कि शहर के किसी कोने में गोशालाएं स्थापित की जायेंगी। आज तक उस दिशा में कभी कोई प्रयास किया गया होगा ऐसा मैं नहीं समझता। अधिकारी दो-तीन वर्ष यहां की हवा में घुल चुके भांग के प्रभाव में रहते हैं, फिर चले जाते हैं।

इन गोपालकों में कुछ ऐसे होते हैं जो प्रातःकाल गाय दुहने के बाद उसे दिन भर के लिए छोड़ देते हैं। वह गाय सड़कों के किनारे की घास चरती है और सड़क के किनारे खुले में पड़े कूड़े-कचरे में कहीं कोई खाद्य सामग्री मिल जाये तो उसे भी खा जाती है। ऐसा खाद्य अक्सर पोलिथीन की थैलियों में रखकर लोग कूड़े में डाल देते हैं। खाद्य को खाते-खाते वह कभी-कभार पोलिथीन ही को निगल जाती है। मैं समझता हूं पोलिथीन खाने के मामले बहुत नहीं होते होंगे। अगर होते तो गायें और सांड़ आये दिन मर रहे होते। मैंने तो २-४ वर्षों तक इन जानवरों को सड़कों पर जीवित देखा है। सड़क पर विचरण करने वाली गाय संध्याकाल को अपने मालिक के पास लौट आती हैं। स्पष्ट है उसे पालने में गोपालक को कम मेहनत पड़ती है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ये गायें बच्चे जनने की उम्र पार कर जाती हैं और दुधारू नहीं रह जाती हैं। गोपालक गोसेवक तो होते नहीं कि वे बूढ़े माता-पिता की भांति इन्हें पालें। उनका उद्देश्य तो उनसे दूध पाना होता है जिसे एक प्रकार से गोशोषण कहा जा सकता है। क्यों, यह भी मैं बताऊंगा। अशक्त तथा निरुपयोगी हो चुकीं इन गायों को छोड़ दिया जाता। बेघरबार इंसान की तरह इनका ठिकाना सड़कें हो जाती हैं। दुधारु अवस्था में इन्हें चारा भी मिल जाता था; वह अब कहां से इन्हें नसीब हो? ये हैं गायें जो सड़कों पर इधर-उधर घूमती फ़िरती हैं। जो कुछ भी सड़क में मिल जाये उसे खा लेती हैं। इनके गोबर को देखकर पता चलता है कि उसमें घास का अंश नाममात्र ही होता है। मेरे घर के प्रवेशद्वार (गेट) पर कभी-कभी कोई गाय गोबर कर जाती है। जब मैं उसे साफ करता हूं तो देखता हूं कि वह इंसान के मल के समान बदबू करता है। जिस गोबर से मैं बचपन से वाकिफ़ रहा हूं उस जैसा तो वह हरगिज नहीं होता है। पहले ही उम्र खा चुकी ऐसी गायें अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहतीं। मैंने ऐसी ही एक गाय की व्यथा लघुकथा के रूप में अपने अन्य चिट्ठा-आलेख में लिखी है। (देखें: कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा)

http://jindageebasyaheehai.wordpress.com/2014/09/06/

वाराणसी में आवारा सांड़

अब आइये अपनी नगरी की गलियों-सड़कों पर विचरण करते सांड़ों की बात पर। हिन्दी में एक कहावत है: “रांड़, सांड़, सीढ़ी औ’ सन्यासी, इनसे बचे सो सेवे काशी।” अर्थात्  सांड़ों की उपस्थिति इस नगरी में कोई नई बात नहीं। पहले वे कहां से आते थे मैं नहीं कह सकता, किंतु आजकल तो वे इन्हीं गोपालकों की देन हैं। होता यह है कि जब गाय बछिया जनती है तो उसे पाल लिया जाता है, क्योंकि वह दो-तीन सालों बाद दुधारू गाय बन सकती है। परंतु जब वह बछड़ा जनती है तो उसका क्या किया जाये? वह बैल बन सकता है। शहरों में किसे जरूरत है बैलों की? अब तो उनकी जरूरत गांवों में भी नहीं रह गयी; उनकी जगह ट्रैक्टर ले चुके हैं। इसलिए नवजात बछड़ा अवांछित होता है। फिर भी कुछ दिनों तक उसे भी पाला ही जाता है ताकि उसकी मौजूदगी से गाय दुहने में आसानी हो। गोपालक उसे यथासंभव कम दूध पीने देते हैं और जैसे ही गाय के थन से दूध उतरने लगता है उसे हटा दिया जाता है। गोपालक गाय को उससे दूर करना शुरू करते हैं और कालान्तर में वह बिना बछड़े के दूध देने लगती है। अपर्याप्त भोजन पाने वाला ऐसा बछड़ा अक्सर कुछ दिनों में मौत का शिकार हो जाता है। यदि वह नहीं मरता है तो उसे सड़क पर छोड़ दिया जाता है। उसकी किस्मत ठीक हुई तो सड़क किनारे की घास तथा अन्य चीजें खाकर जिन्दा रह जाता है और बाद के काल में सांड़ के तौर पर जीवित रहता है। अन्यथा वह भूख अथवा दुर्घटना का शिकार होकर परलोक सिधार जाता है।

तो यह है हमारे गोपालकों/गोसेवकों/गोशोषकों का सच।

     मेरे देशवासी, विशेषतः हिन्दू जन, इस तथ्य को स्वीकारने से कतराते हैं कि हम आडंबरों के साथ जीने के आदी हैं।  हमारी कथनी में आदर्श की खूब बातें होती हैं परन्तु करनी में हम वस्तुस्थिति का भरपूर शोषण करते हैं। गोसेवा एक ढकोसले से भिन्न नहीं है। कुछ ही लोग अपवाद होंगे जो इस कार्य को ईमानदारी से करते हों। – योगेन्द्र जोशी

स्वतंत्रता दिवस 2016: देश ने वह नहीं पाया जिसकी उम्मीद थी

सूचनात्मक टिप्पणी

यह आलेख मैंने कल १५ अगस्त के उपलक्ष पर इसी ब्लॉग के लिए लि्खा था। किंतु इसे मैं अपने दूसरे चिट्ठे (http://jindageebasyaheehai.wordpress.com) पर पोस्ट कर बैठा। यह गलती कैसे हुई, मेरा ध्यान कहां था,  मैं कह नहीं सकता। आज नजर आने पर इसे वहां से यहां स्थानांतरित कर रहा हूं। पाठकों से क्षमायाचना।

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“मेरा मन हो स्वदेशी, मेरा तन हो स्वदेशी। मर जाऊं तो भी मेरा होवे कफ़न स्वदेशी।”

– पं राम प्रसाद बिस्मिल

“मेरी जीवनशैली हो विदेशी, मेरी भाषा हो विदेशी। या खुदा मौका मिले जो मुझे खुद बन जाऊं विदेशी।”

ऐसा सोचने वाले भी मिल जायेंगे देश में; कौन और कितने, अंदाजा लगाइये।

अपना देश भारत या इंडिया जो आप ठीक समझें 70वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। मुझसे यह अपेक्षा की जायेगी कि मैं देशवासियों को प्रणाम करूं, बधाई दूं, और भविष्य की मंगलकामना प्रेषित करूं। शुभकामना !

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15 अगस्त

आज देश को स्वाधीन हुए 69 वर्ष हो रहे हैं। इस दिन सर्वत्र जश्न मनाया जा रहा है। शीर्षस्थ पदों पर विराजमान राजनेता, उच्च प्रशासनिक अधिकारी, अपनी-अपनी संस्थाओं में ध्वजोत्तोलन करने, देश की उपलब्धियों का बढ़चढ़कर बखान करने, और उपदेश देने के कार्य में लगे हैं।

क्या कोई उपलब्धियों का निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ आकलन करने को तैयार है? क्या उसके बारे में सुनने को भी तैयार है? या हकीकत जानने के बाद भी उसकी अनदेखी करके खुश होना चाहता है?

मेरी दृष्टि में हमने इस काल में बहुत कुछ खोया है। और पाया है वह इतना कम है कि उसे खोये हुए की भरपाई मानना उचित नहीं होगा। मेरे लेख से विचलित होकर कुछ लोग मुझे बुरा-भला भी कहेंगे। लेकिन यह कोई स्पष्ट नहीं करेगा कि मैं गलत कहां पर हूं।

चलिए मैं अपनी बात कहता हूं। यही स्वतंत्रता तो मुझे मिली है कि मैं अपने खयालात पेश करूं। जिसे नापसंद हो बह कान बंद कर लेगा। इस स्वतंत्र देश में लोग एक दूसरे के साथ गाली-गलौज कर सकते हैं। मैं तो यथासंभव शिष्ट भाषा में अपने बातें कहने की सोच रहा हूं।

उपलब्धियां

क्या हैं उपलब्धियां? हमारे राजनेता सीना तानकर कहने लगेंगे कि हमने नाभिकीय विस्फोट करके अपने को “न्यूक्लियर-पावर-संपन्न” देशों में शामिल किया है। अपनी मिसाइलें बनाकर दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराया है। चंद्रमा में चन्द्रयान भेजकर अपने वैज्ञानिक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया है। मंगलयान की बात हमारे अंतरिक्ष अध्ययन/अभियान की योजना का अंग है। इस्रो (ISRO) जैसी हमारी संस्था उत्कृष्ट कार्य करके विश्व के कई देशों के कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ रही है। ओएनजीसी (ONGC) खनिज तेल की खोज अपने दम पर देश एवं विदेश में कर रही है। सेना को आधुनिकतम हथियारों से लैस किया जा रहा है।

अन्न उत्पादन के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बन चुके हैं। स्वातंत्र्य पूर्व हमारी स्थिति दयनीय थी। उस समय एवं उसके बाद भी कुछ समय तक अमेरिकी घटिया गेहूं (पीएल 480 योजना के तहत) पर हम निर्भर थे। आज देश में भोजन की कमी नहीं है।

शासकीय-प्रशासकीय तंत्र में अंकीय तकनीकी (digital technology) का प्रयोग बढ़ रहा है। बहुत से स्थलों पर कंप्यूटरीकृत वातावरण में कार्य हो रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीकी के साथ रोग-निदान एवं रोगोपचार किया जा रहा है। यह देश के लिए क्या गर्व की बात नहीं है कि विदेशी भी चिकित्सा के लिए यहां आ रहे हैं? अवश्य है, लेकिन …

आज़ाद भारत (इंडिया?) में लोगों की संपन्नता बढ़ी है। लोगों के लिए अब सुख-सुविधा के साधन प्राप्त करना संभव हो गया है। सड़कों पर अनेक जन कारें दौड़ा रहे हैं यह क्या कभी सोचा भी जाता था? सड़कें फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन की बन रही हैं और फ़्लाइ-ओवरों का जाल बिछ रहा है। घर-घर में टीवी, फ़्रिज, धुलाई मशीन पहुंच रहे हैं। हर हाथ में अब स्मार्टफोन पहुंच रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं।

लेकिन सवाल है इन उपलब्धियों का लाभ किसको पूरा-पूरा या अधिकांशतः मिल रहा है? इस प्रश्न पर भी विचार होना चाहिए।

उपर्युक्त और तत्सदृश जिन अन्य उपलब्धियों को राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी एवं बुद्धिजीवी गिना सकते हैं उनमें से अधिकतर स्वाभाविक रूप से होने ही थे। उनको होने देना एक प्रकार की विवशता ही थी। जब दुनिया भर में कंप्यूटरों एवं डिजिटल तकनीकी का प्रयोग होने लगा तो हम उससे कैसे अछूते रह सकते थे? जब उस तकनीक के माध्यम से विश्व में संपर्क-साधन हो रहा हो और उसके बिना व्यावसायिक कार्यकलाप असंभव-से होते जा रहे हों तो उसका हमारी भी आवश्यकता बनना स्वाभाविक ही था। समाज के सबसे आम आदमी का भला होगा इस विचार से इनको अपनाया गया होगा यह मैं नहीं मानता। हो सकता है गरीब व्यक्ति तक लाभ पहुंच रहा हो। तब उसे मैं “बिल्ली के भाग से छींका टूटने” के समान मानता हूं।

मैं दावा नहीं करता कि पूरे देश की स्थिति का मुझे पूर्ण ज्ञान है। मेरा अनुभव अधिकांशतः उत्तर प्रदेश और उसके भीतर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है जहां मैं रहता हूं। देश के अन्य शहरों से भी मैं कुछ हद तक वाकिफ़ हूं, क्योंकि मैं यदा-कदा देशाटन पर निकल पड़ता हूं। आजकल तो समाचार माध्यम तमाम तरह की जानकारी आम जन तक पहुंचा रहे हैं। इसलिए ध्यान देने वाले के लिए बहुत कुछ जानना आसान है।

इन उपलब्धियां का सीधा लाभ समाज के संपन्न वर्ग को हुआ है और उन्हीं के लिए बहुत कुछ हुआ है ऐसा मेरा मानना है। कार संस्कृति उन्हीं के लिए तो है। उन्हीं के लिए कार-उद्योग हैं। और जब कारें सड़क पर दौड़ें तो फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन सड़कें और फ़्लाई-ओवर बनने ही हैं। वे आम जनों की समस्या सुलझाने के लिए नहीं बनी हैं। यदि आम जन का हित हमारे देश के शासकों, नीतिनिर्धारकों के जेहन में होता तो सड़क के किनारे फ़ुटपाथ बन रहे होते, और सड़क पर पैदल चलने वालों का अधिकार पहले होता, उसके बाद वाहनों का जैसा कि विकसित देशों में होता है। वाराणसी में जितनी सड़कें पिछले तीनएक दशकों में बनी हैं उनके किनारे फ़ुटपाथ हैं ही नहीं।

चंद्रयान, मंगल-अभियान जैसी योजनाओं का आम जन के लिए कोई महत्व नहीं। एक वैज्ञानिक होने के बावजूद मैं इनको प्राथमिकता में निम्न स्तर पर रखना चाहूंगा। इनसे कहीं अधिक महत्व की समस्याएं देश के सामने हैं। इसलिए आम जन के सापेक्ष इनको उपलब्धि मानता अनुचित होगा।

अवश्य ही अनाज उत्पादन में हुई प्रगति प्रशंसनीय कही जायेगी। अन्यथा दुनिया भर में हो रहे व्यावसायिक परिवर्तन हमारे देश में होने ही थे। परिवर्तन न करते तो क्या करते? कैसे विश्व के सामने टिकते? वैश्विक परिवर्तन का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ना स्वाभाविक था।

मेरी निराशा

मेरी निराशा के मूल में उक्त उपलब्धियों की अर्थवत्ता कम या अधिक होना नहीं है। मैं स्वतंत्रता का आकलन उन बिन्दुओं के सापेक्ष करना चाहूंगा जिनको ध्यान में रखते हुए शासकीय व्यवस्था को उत्तरोत्तर बेहतर बनाने के संकल्प के साथ स्वतंत्रता अर्जित की गयी थी। तब न डिजिटल टेक्नॉलॉजी थी, न उसको लेकर देश का कोई संकल्प। जिस उम्मीद को लेकर चले थे वह थी उत्तरोत्तर बेहतर शासकीय व्यवस्था की स्थापना। क्या हमारी व्यवस्था में सुधार हुआ है? कुल मिलाकर इस प्रश्न का क्या जवाब होगा?

जवाब आप स्वयं समझ लीजिए। मैं वस्तुनिष्ठ कुछ तथ्यों को आपके समक्ष रख रहा हूं।

जनसंख्या वृद्धि

     मेरी दृष्टि में देश की विकटतम समस्या निरंतर हो रही जनसंख्या वृद्धि है। उम्रदराज देशवासियों को याद होगा 1960 के दशक का समय जब उत्साह एवं गंभीरता से जनसंख्या पर अंकुश लगाने और परिवार-नियोजन के प्रयास किये गये थे। उसके परिणाम कितने अच्छे रहे होते यदि वे प्रयास यथावत चलते रहते? दुर्भाग्य था 1970 के दशक के पूर्वार्ध में संजय गांधी का असंवैधानिक शक्ति के रूप में अवतरित होना। उस व्यक्ति ने ऐसा सख्त रवैया अपनाया कि कार्यक्रम पटरी से उतर गया और राजनैतिक भूचाल आया आपात्काल के रूप में। जनसंख्या के मुद्दे से राजनेताओं/नौकरशाही ने मुख मोड़ लिया। तब से आज तक जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है, किंतु प्रयास बेमन से हो रहे हैं। आज तमिलनाडु एवं केरल जैसे राज्यों ने अवश्य प्रगति की है, लेकिन पहले से ही बहुत बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश, बिहार की आबादी पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है।

हमारे शासक यह भूल जाते हैं कि हमारे संसाधन इतने नहीं कि बढ़ती आबादी को झेल सकें। हम मौजूदा नागरिकों को ही शिक्षित नहीं कर पा रहे, उनके स्वास्थ्य के लिए न पर्याप्त अस्पताल हैं और न डॉक्टर, कुपोषण अपनी जगह है, युवाओं के लिए रोजगार नहीं, रेल-बस सुविधा अपर्याप्त हैं, सबके लिए बिजली-पानी मुहैया नहीं करा सकते, इत्यादि। फिर भी जनसंख्या वृद्धि के प्रति लापरवाह हैं। यही हाल रहा तो अगले 10-15 सालों में हम चीन से आगे निकल जायेंगे। यही हमारी उपलब्धि होगी क्या?

इस विषय पर यह विचारणीय है कि जो संपन्न दंपती हैं उनके एक या अधिक से अधिक दो बच्चे हो रहे हैं। कुछ ने तो कोई बच्चा नहीं की नीति अपना ली है। लेकिन जो गरीब हैं, अशिक्षित हैं, उनके 4-4, 6-6 बच्चे हो रहे। गरीबी और बढ़ती आबादी में गहरा संबंध है। आगे आप खुद सोचिए क्या होगा।

अनुशासनहीनता

      यह देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश देशवासियों के लिए स्वतंत्रता के माने हैं अनुशासनहीनता, स्वच्छंदता, उच्छृंखलता, निरंकुशता, आदि। कायदे-कानूनों को न मानना देशवासियों का शगल बन चुका है। वाराणसी में रहते मैं यही कहूंगा। अहिष्णुता इसी निरंकुशता की देन है। अंध-आस्था इसमें घी का कार्य करती है। धार्मिक स्वतंत्रता के अर्थ लिए जाते हैं: “मेरी आस्था पहले, दूसरों का हित बाद में। आस्था के प्रदर्शन में कोई रुकावट न डाले चाहे उसकी जान चली जाये।” यह भावना यहां व्याप्त है। राजनीति अंकुश लगाने के बदले ऐसी आस्था को बढ़ावा देती है। संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों मे कहा गया है सरकारें अंधविश्वास समाप्त करने और लोगों में वैज्ञानिक सोच बढ़ाने के प्रयास करेंगी। हुए हैं ऐसे प्रयास?

कायदे-कानूनों का क्या महत्व है यह तो इसी से स्पष्ट है सड़क पर किसी वहन से दुर्घटना हो जाये तो उसे ही नहीं, गुजरने वाले हर वाहन को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसमें एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी भीड़ की भागीदारी होती है। कोई नहीं कहता कि यह क्या अनर्थ कर रहे हो। किसी पर चोरी का शक हो जाये तो उसे पीट-पीट्कर मारने पर किसी को आतमग्लानि नहीं होती है। ऐसी अनेकों वारदातें प्रकाश में आती हैं। आज तक प्रभावी शासकीय व्यवस्था विकसित नहीं हुई।

इसे भी क्या उपलब्धि कहेंगे?

शिक्षा

मेरी प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 5 तक, 1950-60 के बीच के काल में) अपने गांव (अब उत्तराखंड में) के पास की सरकारी पाठशाला में हुई थी। तीन शिक्षक थे और पाठशाला का पक्का भवन। बहुत सुविधाएं नहीं थीं, फ़िर भी उसी में मैंने और मेरे सहछात्रों ने बहुत कुछ सीखा। कृषि की बातें, मिट्टी के खिलौने बनाना, सुलेख लिखना। आज भी उस समय की पुस्तकों के कुछ चित्र स्मृति पटल पर आ जाते हैं। उस काल में मेरी ही तरह अनेक लोगों ने गांवों में शिक्षा पाई और मेरी तरह विश्वविद्यालय के शिक्षक बने। आज क्या स्थिति है सरकारी स्कूलों की? कहीं, भवन नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं, शिक्षक हैं तो स्कूल से नदारद। छात्रों की स्थिति यह हो चुकी है कि पांचवीं पास करने के बाद भी पढ़-लिख नहीं सकते।

आज कोई भी सरकारी स्कूल में बच्चों को नहीं भेजना चाहता। निजी विद्यालयों – तथाकथित अंगरेजी माध्यम स्कूलों – की बाढ़ आ चुकी है। जो गरीब उनकी फ़ीस नहीं चुका सकता वही सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजता है।

जिस समय मैंने हाईस्कूल की परीक्षा दी (1962), मुझे एक दिन सुनने को मिला कि फलां परीक्षा केंद्र पर एक परीक्षार्थी नकल करते पकड़ा गया है। वह भी एक जमाना था नकल की एक भी घटना समाचार बनती थी। नकल करने से सभी डरते थे। आज क्या हाल हैं उत्तर प्रदेश, बिहार में? सामूहिक नकल का बोलबाला है। छात्र ही नहीं उनके अभिभावक, शिक्षक, पुलिस बल सब नकल करवाते देखे-सुने जाते हैं। सरकारें हैं कि नकल-माफ़ियाओं के सामने घुटने टेक देती हैं। जहां छात्र/छात्रा को विषय का ज्ञान तक न होने पर टॉपर बनाया जा सकता है (बिहार राज्य में), उस देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी?

हमारी सरकारों ने इंडिया और भारत के विभाजन को और पुष्ट किया है। एक तरफ संपन्न लोगों की अंगरेजी-आधारित शिक्षा है तो दूसरी समाज के कमजोर तबके के लिए क्षेत्रीय भाषा की कुव्यवस्थित शिक्षा। किसी को शर्म आती है? हमारी शिक्षा ऐसे ही चलनी चाहिए? यही उपलब्धि है हमारी? सोचें!

जिस अंगरेजी से मुक्त होने की स्वतंत्रता सेनानियों ने सोचा था आज वही अंगरेजी अपरिहार्य बन चुकी है, जीवन का आधार बन चुकी है। विडंबना नहीं है?

चिकित्सा व्यवस्था

देश में डॉक्टरों की कमी है। सरकारी खर्चे पर छात्र डॉक्टर बनते हैं, फिर  विदेशों की राह पकड़ने की कोशिश करते हैं, अन्यथा निजी अस्पतालों के चिकित्सक बनते हैं। सरकारी नौकरी में कम जाते हैं और जो जाते हैं प्राइवेट प्रैक्टिस से धन कमाने में जुट जाते हैं। बहुत कम (शायद ही कोई) होंगे जो ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हों। बहुत से तो महीनों सरकारी अस्पताल से गायब रहते हैं। कहने को सरकारी अस्पतालों में बहुत कुछ है, लेकिन हकीकत एकदम निराशाप्रद! हालात क्या होंगे यह इसी दृष्टांत से समझा जा सकता है कि अभी दो-चार दिन पहले एक गरीब का बच्चा इसलिए चल बसा कि वह परिवार 20 रुपये की घूस नर्स को नहीं दे पाया। कुछ समय पहले एक घटना के बारे में सुना जिसमें एक बच्चे के पैर के घाव का इलाज वार्डब्वॉय ने किया बाद में उस बच्चे का पैर काटना पड़ा। ऐसे मामलों में जांच समिति बैठा दी जाती है मामलों को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए। किसी कर्मचारी/डॉक्टर को दंडित किया जाता हो सुनने में नहीं आता है।

एक समय था जब सरकारी खर्चे पर सरकारी मुलाजिम का इलाज सरकारी अस्पताल में ही अनुमत था। तब सरकारी अस्पतालों की हालत कुछ बेहतर थी। जब से निजी अस्पतालों की सुविधा मुलाजिमों को मिलने लगी, स्थिति बदतर हो गयी।

डॉक्टरों ने धन कमाई का नायाब तरीका अपना लिया है। वे अनावश्यक जांच करवाते हैं और वह भी अपने “बंधे हुए” जांच-केंद्र पर। सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था होने पर भी वहां भी यह होता है। जांच केंद्र से डॉक्टरों को रकम मिल जाती है। वाह क्या चरित्र है और हिपोक्रेटीज़ शपथ (Hippocratic oath) का सम्मान। स्थिति इतनी निराशाजनक पहले नहीं थी।

सड़क दुर्घटना एवं वाहन-चालन लाइसेंस

अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या कितनी भयावह है इसके आंकड़े अंतरजाल पर आसानी से मिल जायेंगे। यातायात के नियमों का पालन होता है कहीं? क्या पालन होगा जब नियम ही लोगों को मालूम नहीं हों। और मालूम भी हो तो उनके प्रति सम्मान किसके मन में है? नियमों का उल्लंघन अधिकांश लोग करते हैं। ट्वूह्वीलर वाहनों के लिए हेल्मेट का नियम है, कितने लोग उसे पहनते हैं? वाराणसी में तो अपवाद-स्वरूप ही पहनते हैं। पूछने पर न पहनने वाला कहता है “कोई देखता थोड़े है?” कारों में सीटबेल्ट का प्रावधान है, उसे भी चालक नहीं पहनते हैं, उत्तर वही। मतलब यह कि देखने वाला कोई न हो तो इनकी जरूरत नहीं।

यह हमारे लोगों का कायदे-कानूनों का सम्मान न करने की मानसिकता का द्योतक है।

आगे देखिए वाराणसी की सड़कों पर 12-14 वर्ष की आयु के बच्चे मोटर-वाहन चलाते दिख जायेंगे? उनके माता-पिता के लिए यह उपलब्धि होती है, वे इसमें अपनी प्रतिष्ठा देखते हैं, यह उनकी हैसियत का परिचायक होता है। नियमों को तोड़ना किसी की भी नजर में बुरा नहीं होता। ऐसी सोच के लिए जिम्मेदार कौन? कोई तो जिम्मेदार होगा?

हमारे यहां ड्राइविंग लाइसेंस आलू-प्याज की तरह खरीदे बेचे-खरीदे जाते हैं। अपने बनारस में तो मैंने ऐसा ही देखा। मेरा स्कूटर वाला लाइसेंस खत्म हो चुका है, अब जरूरत नहीं समझता। इसलिए आज की हालत क्या है मालूम नहीं। पर जब मैंने पहली बार लाइसेंस लिया तो न कोई लिखित और न कोई सड़क पर वाहन-चालन का परीक्षण। गये, लाइसेंस मांगा और मिल गया। कुछ पैसा मांगा मैंने दे दिया, गलत कहें या सही। तब मुझे लगा कि अंधा-लूला-बहरा, हर कोई लाइसेंस पा सकता है। दलाल को पैसा दीजिए साइसेंस आपके हाथ। मैं समझता हूं कि आज भी दलालों काम यथावत चल रहा होगा। क्या यही हमारी शासकीय व्यवस्था होनी चाहिए? फिर रोइये कि देश में सड़क हादसे बहुत होते हैं। अभी हाल में मेरे बेटे ने कनाडा में लाइसेंस लेना चाहा। वह प्रशिक्षण में एक-डेड़ लाख खर्च कर चुका था। वाहन चालन परीक्षण में असफल हो गया। गलती यह कि पार्किंग करने में सफेद रेखा को अगला पहिया छू गया। एक-दो ऐसी ही छोटी-मोटी गलतियां! बस इतना काफी था। यहां कोई सोच सकता है कि ऐसा भी कहीं होता है?

प्रशासनिक कुव्यवस्था

देश जब आज़ाद हुआ तो यह उम्मीद थी हम साफ-सुथरी एवं जनता के प्रति जवाबदेह शासकीय व्यवस्था विकसित करेंगे। किंतु ऐसा हुआ क्या? हमारी नौकरशाही जनता के सेवक रूप में खुद को नहीं देखती, बल्कि वह अपने को उनका मालिक समझती है। काम के प्रति लापरवाही, टालमटोल, घटिया काम और कदाचार को वह अपना अधिकार मानती है। आये दिन नये-नये घोटालों का खुलासा होता है, पर क्या मजाल कि किसी को जिम्मेदार ठहराया जाता हो, दंडित किया जाता हो। अधिक से अधिक कुछ दिनों के लिए किसी को निलंबित करके शासन जनता की आंख में धूल झोंकता है। याद रहे निलंबन सजा नहीं होता है। यह तो जांच-पड़ताल की प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। दंडित करने का काम तो न्यायालय करता है जहां मामला जाता ही नहीं और गया भी तो वर्षों तक कोई निर्णय नहीं होता है। उस बीच आरोपित कभी-कभी स्वर्ग (नरक?) भी सिधार जाता है।

सरकारी तंत्र में खूसखोरी आम बात है। मुझे ऐसे लोग मिलते है जो कहते है कि अधिकारियों को देने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नही था इसलिए वह सरकारी नौकरी नहीं पा सका। नियुक्ति-पत्र तक तभी मिलता है जब आप पैसा खर्च करते हैं। सालों पहले में एक बार ट्रेजरी कार्यालय गया। वहां शरीर से कमजोर उम्रदराज पेंशनरों को बीस-बीस रुपये पेंशन-बुक में रखकर देते हुए देखा था। आज वह रेट 200-250 रुपये होगा। पिकेट-ड्यूटी पर लगे पुलिस-मैन को प्रतिबंधित गाड़ी आगे बढ़ने देने के लिए पैसे लेते हुए देखा है। लोग बताते हैं कि जब वे स्वयं 100-50 हजार की घूस देकर नौकरी पाये हैं तो उसकी भरपाई उन्हें ऐसी वसूली से ही करनी होती है।

कितना साफ-सुथरा शासन-तंत्र विकसित किया है आज के शासकों ने? पहले घूस लेना चोरी-छिपे होता है और अब खुलकर होता है। घूस के भी रेट बने हैं। मुझे कभी एक बुजुर्ग एंजीनियर ने बताया कि बेईमानी तो पहले भी होती थी पर इतनी नहीं। वे बताते थे कि किसी कार्य के खर्चे का आकलन (एस्टिमेट) बढ़ा-चढ़कर पेश किया जाता था जैसे 100 की जगह 120 रुपये। तब 100 का कार्य हो जाता था और 20 रुपया जेबों में जाता था। कार्य की गुणवत्ता बनी रहती थी। आजकल एस्टिमेट तो 120 रुपये का बनेगा और खर्चा केवल 50, शेष 70 जेबों में। कार्य की गुणवत्ता कैसी होगी सोच सकते हैं। यह वाराणसी की सड़कें देखकर समझ में आ जयेगा जो पहली बरसात को झेल जायें तो समझिए कि चमत्कार हो गया।

विदेश यात्रा को जीते-जी स्वर्ग यात्रा के समान देखने वाले हमारी प्रशासनिक अधिकारी मौके खोजते हैं कि किस बहाने विदेश जाया जाये। कभी वे वहां की कानून-व्यवस्था का अध्ययन करते हैं तो कभी वहां के प्रशासन का अनुभव पाने, कभी खेल-आयोजन कैसे करते हैं इसे सीखने और कभी यातायत व्यवस्था की जानकारी लेने। कोई भी बहाना चलेगा, बस विदेश भ्रमण करने से मतलब। अब देखिए कल-परसों अपने प्रदेश के खेल मंत्री गये हैं ओलंपिक स्थल रियो द जनीरो कुश्ती खिलाड़ी नरसिंह यादव की हौसला आफ़जाई करने। विदेश भ्रमण का बहाना। सरकारी खर्चे पर इकनॉमी क्लास में तो वे जायेंगे नहीं, एक्जेक्टिव क्लास में जायेंगे। अपनी जेब से तो कुछ लगना नहीं। प्रदेश के खजाने की परवाह किसे? वाह!

इस प्रकार के अनेक उदाहरण आपको यत्रतत्र मिलेंगे। सब इसे जानते हैं, परंतु हर कोई आश्वस्त रहता है कि सुधार होना नहीं है।

यही उपलब्धि है न स्वतंत्र भारत की?

पुलिस तंत्र

स्वतंत्र भारत का शासकीय तंत्र सुधारने के प्रति आज के शासक कितने गंभीर हैं इसे समझना कठिन नहीं। वर्षों से प्रशासनिक सुधारों की बातें की जा रही है। लेकिन आज तक कुछ किया नहीं गया। पुलिस तंत्र में सुधार की बातें भी होती रही हैं, उसे भी टाला जा रहा है। उच्चतम न्यायालय इस बारे में बार-बार याद दिलाता आ रहा है, लेकिन शासक वर्ग को कोई रुचि नहीं। तो क्या देश के शासक अंगरेजों की भांति डंडे से जनता पर राज करना चाहते हैं? जी हां, वे सुधार नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि जहां जनता से उन्हें असुविधा लगे उन पर डंडा बरसाकर चुप करा दो। प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के कोई कारगर उपाय आज तक नहीं हुए। नित नये कानून बनाकर जनता को मूर्ख बनाते आ रहे हैं वे। कानूनों का कार्यान्वयन प्रभावी न हो इसका भी वह साथ में इंतजाम करते हैं। जब किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे तो न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति वे टालते हैं, महीनों, वर्षों तक। त्वरित निर्णय का तो सवाल ही नहीं।

लचर न्यायिक व्यवस्था यथावत बनाये रखना भी शासकों का इरादा रहा है। दो रोज पूर्व ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि पिछले छः माह से न्यायालयों की नियुक्ति क्यों टाली जा रही है। सुधारों को टालना सरकारों की नीयत रही है।

राजनेतओं की साख

क्षमा करें यदि मैं यह कहूं आज के किसी राजनेता के प्रति मेरे मन में सम्मान नहीं है। यह सोचने की स्वतंत्रता मुझे है। मैं किसी को अपशब्द नहीं कहूंगा, मिलने पर सामान्य शिष्टाचार भी निभाऊंगा। लेकिन मेरे मन में उनके प्रति सम्मान हो इसकी बाध्यता कहीं नहीं है।

स्वतंत्रता के आरंभिक काल के राजनेताओं की तुलना में आज के राजनेताओं को किस स्तर पर रखेंगे आप? आकलन करते समय क्या आप सोचेंगे कि वे कितने अनुशासित हैं, देशहित के प्रति समर्पित हैं, सत्तालोलुपता कितनी है, आपराधिक वृत्ति के नेताओं के प्रति उनका क्या रवैया है, इत्यादि। मेरे अपने उत्तर हैं “निराश करने वाले”।

स्वार्थलिप्सा और सत्तालोलुपता हमारे राजनेताओं के चरित्र का अपरिहार्य अंग बन चुका है। सत्ता हथियाने के लिए सभी हथकंडे सभी दलों के नेता अपनाते हैं। देश के ज्वलंत मुद्दों की अनदेखी करके सभी जातीयता, धार्मिकता, क्षेत्रियता की भावना उभाड़कर वोटबैंक बनाने में जुटे हुए हैं। है कोई राजनैतिक दल जो आपराधिक छबि वाले से परहेज करता हो,जो बाहुबल एवं धनबल का सहारा न लेता हो, जो तरह-तरह से मतदाताओं को न लुभाता हो (जैसे शराब पिलाना, पैसे की घूस देना)। जिन्हें आप साफ-सुथरे कहेंगे वे कैसे इस अनर्थ को सहते हैं।

राजनीति में सिद्धांतहीनता व्याप्त है। सुबह तक जो कम्युनल हो वह शाम तक सेक्युलर हो जाता है। कल तक जो समाजवादी हो वह आज दक्षिणपंथी बन जाता है। सिद्धांत बस एक है: जहां बेहतर अवसर दिखें वहां चल पड़ो। आप ऐसे सिद्धांतहीनों से क्या उम्मीद रखते हैं?

आज़ादी के 69 वर्ष बीतते-बीतते हमारे अधिकतर राजनैतिक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा परिवार की निजी व्यावसायिक संस्था बन चुके हैं। एक बेहद घटिया परंपरा इस क्षेत्र में स्थापित हो चुकी है। मुलायम सिंह, लालू यादव, मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि आदि सब उदाहरण हैं। अपने समय में ये लोग बाप-दादों के बल पर नेता नहीं बने थे, पर अब अपने परिवारी जनों को को राजनेता बनाने की परंपरा स्थापित कर रहे हैं, पूरी बेशर्मी के साथ। कार्यकर्ताओं की हैसियत बंधुआ मजदूर की बन चुकी है। कभी कांग्रेस इस श्रेणी में नहीं थी लेकिन अब वह सोनिया-राहुल-प्रियंका की निजी संपदा बन गयी है। क्या मजाल कि दल के मुखिया से कोई असहमत हो। जो असहमत हो वह दल से निकाला जायेगा या निकल जायेगा। दलों में न आंतरिक लोकतंत्र है और न वैकल्पिक नेतृत्व पनपने देने की परंपरा। इसमें आपको विरोधाभास नहीं दिखता कि आंतरिक लोकतंत्र के विरोधी देश का लोकतंत्र चला रहे हैं?

राजनीति में उत्तरोत्तर सुधार के बदले गिरावट आ रही है यह मेरी धारणा है।

वर्ष 1950 के आगे-पीछे चीन को भारत की तुलना में पिछड़ा एवं गरीब माना जाता था। आज वह हमसे मीलों आगे निकल चुका है, हर क्षेत्र में। उसकी “प्रति व्यक्ति (औसत) आय” (per capita income) हमारी (लगभग $1600) तुलना में करीब पांच गुना अधिक है| स्वतंत्रता के समय एक रुपया एक डॉलर के लगभग था। आज वह घटते-घटते $0.015 के बराबर हो चुका है। इस प्रकार की घटनाएं क्यों हुईं? हमारी शासकीय व्यवस्था में कहीं खोट रहा होगा न?

अंततः

     मैं उन देशवासियों को बधाई देता हूं जिनको विगत उपलब्धियां संतोशप्रद, आशाजनक लगती हैं। मुझे उनसे ईर्ष्या है कि काश मुझे भी ऐसा ही लगा होता।

लेख अपेक्षा से अधिक लंबा हो चला है। कहने को बहुत कुछ है, किंतु कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही चाहिए। अतः पटाक्षेप।

आप पाठकों को पुन: बधाई, शुभेच्छाएं। शान्तिः सर्वत्र प्रसरेत् । – योगेन्द्र जोशी

विडंबना: उच्च अदालतों का स्वदेशी नामकरण किंतु देश का नाम इंडिया ही रहेगा

हाईकोर्टों के नाम-परिवर्तन का निर्णय

बॉम्बे एवं मद्रास उच्च न्यायालयों का नाम बदलकर क्रमशः मुम्बई तथा चेन्नै न्यायालय करने के निर्णय को केन्द्र सरकार की कैबिनेट कमिटी (काबिना समिति?) ने मंजूरी दे दी है ऐसा समाचार मीडिया में देखने-पढ़ने को मिल रहा है । समाचार के अनुसार विचार तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के नाम के स्वदेशीकरण का भी था, किंतु वह अभी शायद उस आदेश में शामिल नहीं है । समाचार कितना पुष्ट है यह मैं नहीं जानता, किंतु निराधार तो नहीं ही होना चाहिए । मैंने तत्संबंधित समाचार हिन्दी में दैनिक जागरण एवं दैनिक भाष्कर नामक अखबारों में पढ़ा । अंगरेजी अखबारों में भी उक्त समाचार उपलब्ध है । उदाहरणार्थ द हिन्दू में इस शीर्षक के साथ समाचार छपा हैः Now, Bombay, Madras and Calcutta High Courts to bear city names.

उक्त समाचार को ब्रितानी अखबार दि टेलीग्राफ ने Bombay and Madras High Courts to abandon British colonial names शीर्षक के साथ समाचार को प्रमुखता दी है । इस शीर्षक के अनुसार अदालतों के ब्रितानी उपनिवेशीय नामों को हटाकर उनको देशज यानी स्वदेशी नाम देना जनभावना के अनुरूप है । अखबार ने शिवसेना नेता अरविन्द सावन्त के हवाले से कहा है “यह तो सरकारी मुलाजिम हैं जिन्होंने समस्या पैदा की है । अदालतें भी बदलाव चाहती हैं । सरकार की नौकरशाही ऐसा करना नहीं चाहती है । इसमें अभी और पांच वर्ष लग सकते हैं ।”

नाम बदलने की परंपरा

अपने देश में राज्यों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम बदलने की परंपरा काफी पुरानी है । अभी कुछ दिन पूर्व हरियाणा के शहर गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्रामकर दिया गया । इस बदलाव पर लोगों ने नकारात्मक प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त की थीं । नाम बदलाव का सरकारी तर्क था कि यह उसका प्राचीन नाम रहा है । रहा होगा, लेकिन आज तक तो वहां के लोग शहर को गुड़गांव ही कहते आ रहे हैं । नाम बदलाव का विचार किसके दिमाग की उपज थी और उसके विषय में कितनों के विचार जाने गये यह मुझे नहीं मालूम ।

एक बार मैंने जिज्ञासावश कुछ नाम-परिवर्तनों को इंटरनेट (अंतरजाल) पर खोजा था । उनमें से कुछ का उल्लेख करना समीचीन होगाः

राज्य असम (आसाम), ओडिशा (उड़ीसा), पश्चिम बंग (वैस्ट बंगाल), पुदुच्चेरी (पांडुचेरी)|

शहर कन्याकुमारी (केप कोमारिन), कोज़ीकोड (कालीकट), कोलकाता (कैलकटाध्कलकत्ता), गुवाहाटी (गौहाटी), चेन्नै (मद्रास), तिरुअनंतपुरम (त्रिवेन्द्रम), पणजी (पंजिम), पुणे (पूना), बंगलूरु (बैंगलोर), मुम्बई (बॉम्बे), विशाखापत्तनम (वालटेयर), विजयपुर (बीजापुर)| (पुराने नाम कोष्ठकों में)

परिवर्तित नामों की सूची लंबी होगी; उसे ढूंढ़ने का अधिक प्रयास मैंने नहीं किया । कई शहरों के राजमार्गों के नाम भी बदले ही गये होंगे । अपने उत्तर प्रदेश राज्य के हाल ये हैं एक सरकार किसी जिले का पसंदीदा नाम चुनती है तो दूसरी सरकार उसे बदलने की कोशिश करती है । संस्थानों के साथ भी यह खिलवाड़ होता रहता है ।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस दल की नीति रही थी (अभी भी होगी) कि हर नयी संस्था, मार्ग, पुल, आदि का नाम यथासंभव प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू एवं उनके वंशजों के नाम पर होवे, गोया कि यह देश उस एकल परिवार की बपौती हो । जनोपयोगी योजनाओं के साथ भी यही किया गया । अब मौजूदा सरकार यथासंभव उन्हें बदलने की कोशिश कर रही है ऐसा मुझे प्रतीत होता है । मुझे याद आता है कि कभी दिल्ली के कनॉट सर्किल एवं कनॉट प्लेस को इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी के नाम पर नया नाम दिया गया था । वे नाम किसी को याद भी हैं इस पर मुझे शंका है । दिल्ली जाइए और उन्हीं पुराने नामों को लोकमुख से सुनिए ।

नाम-परिवर्तनो की आम जनों में कितनी स्वीकार्यता है इस पर मुझे शंका है । यह देश की आवश्यकता है या महज वोट के खातिर जनता को लुभाने की कोशिश ? या सामाजिक सक्रियता के शौकीन और “राष्ट्रीयता” की भावना से उत्साहित लोगों के मांग का परिणाम ?

अंगरेजी का वर्चस्व ठीक, अंगरेजी नाम नहीं !

वापस बात उच्च न्यायालयों के नाम परिवर्तन के मुद्दे पर । अधिकतर लोग अदालतों को न्यायालय न कहकर कोर्ट ही कहते हैं यह मेरा मानना है । बहुत हुआ तो उन्हें अदालत कह दिया । न्यायालय तो आम बोलचाल में कम ही लोग कहते है । आज के अंगरेजी स्कूलों में पढ़े युवाओं को तो यह शब्द मालूम न हो तो आश्चर्य नहीं होगा ।

नाम बदलने का विचार राजनेताओं से शुरु होता है और जनभावनाओं के उभार के रूप में आगे बढ़ता है । बदलाव के पीछे बहुत गंभीर कारण रहते हों और बदलाव की उपयोगिता को आंका जाता हो ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जैसा आरंभ में उल्लिखित द टेलीग्राफ अखबार में कहा गया है नाम-परिवर्तन के पीछे का सशक्त तर्क यह है कि अंगरेज उपनिवेश काल की पहचान रखने वाले नामों का देशीकरण होना चाहिए । मैं स्वयं इसका पक्षधर हूं किंतु इस कार्य में विसंगति कितनी है इस पर विचार किए बिना नहीं ।

गुड़ खाये और गुलगुले से परहेज

(पाठकवृन्द क्षमा करें मुझे मुहावरा ठीक-से याद नहीं ।) अंगरेजी विरासत के तौर पर जो नाम देश में प्रचलित हैं उनको देशज नामों से संबोधित किया जाए यह बात कहने-सुनने में अच्छी लगती है । परंतु इस कार्य में मुझे विसंगति के दर्शन होते हैं । जिस देश में पग-पग पर अंगरेजी का साक्षत्कार होता हो, प्रायः सभी दस्तावेजी कार्य अंगरेजी में किए जाते हों, जिस देश का संविधान अंगरेजी में हो, उच्चतम न्यायालय का कार्य अंगरेजी में होता हो, अंगरेजी स्कूलों की बाढ़ आ रही हो, देशज भाषाओं के विद्यालय बंद होने के कगार पर हों, वहां अंगरेजी नामों को बदलने का औचित्य ही क्या है । अब तो हालात यह हैं कि हिन्दीभाषी हिन्दी में अपनी बात नहीं कह सकते बिना अंगरेजी शब्दों के प्रयोग के । जब देशवासियों को अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं तो अंगरेजी नामों से परहेज क्यों ?

यह देश है ही विचित्र । यदि नाम ही बदलना है तो सबसे पहले देश का नाम बदला जाना चाहिए । इस देश का नाम “भारत” होना चाहिए या “इंडिया”?  इंडिया नाम अंगरेजों का दिया हुआ है न कि इस देश का मौलिक या प्राचीन नाम है । विष्णुपुराण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग को भारतवर्ष या भारत कहा गया है । तब हम इसे भारत क्यों नहीं कहते ? सब जगह इंडिया ही क्यों सुनने को मिलता है ? यहां तक कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी भी अपने नारे इंडिया के नाम ही गढ़ते है, “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, आदि-आदि । ऐसी स्थिति में अदालतों और अन्य संस्थाओं के अंगरेजी नाम हटाने का आडंबर क्यों ?

पहले इस देश का नाम “भारत” किया जाना चाहिए तब अन्य नाम बदलने का तुक बनता है । इस बारे में मेरे अपने तर्क हैं और प्राचीन ग्रंथों का आधार भी, जिनकी चर्चा मैंने अपने ब्लॉग (दिनांक 15 जून 2016) में की है ।

अदालतों के ब्रितानी नाम बदल दो किंतु देश को इंडिया ही कहते रहो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है । – योगेन्द्र जोशी

और प्रसंग से कुछ हटकर   

यह देश भारत, जिसे विदेशी ही नहीं देशवासी भी इंडिया नाम से संबोधित करना पसंद करते हैं, विविधताओं, विचित्रताओं, विसंगतियों और विरोधाभासों का देश है । यहां इतना कुछ एक साथ देखने को मिल सकता है जो विश्व के किसी अन्य देश में संभव नहीं लगता, न चीन में और न ही संयुक्त राज्य अमरीका  में; छोटे देशों में तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती । अतः मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि अपने आप में अद्भुत, अद्वितीय, अनूठे देश में जन्मा हूं मैं, जिसे प्राचीन मनीषियों ने भारतवर्ष नाम दिया था और जिस नाम से मैं स्वयं इसे संबोधित करना चाहूंगा । – योगेन्द्र जोशी

देश का संविधान-सम्मत नाम “इंडिया”; तब “भारत” नाम की जरूरत  क्यों आ पड़ी?

लंबे अंतराल से  मैं एक प्रश्न का उत्तर पाने की इच्छा रखते आया हूं। अभी तक मेरी दृष्टि में जानकारी का ऐसा स्रोत नहीं आया जो मेरी समस्या का संतोषप्रद समाधान प्रस्तुत कर सके। समस्या है कि इस देश के दो नाम क्यों हैं? क्या दो नामों की कोई उपयोगिता है, विशेषतः जब प्रायः सर्वत्र एक ही नाम सुनने-पढ़ने में आ रहा हो। 

देश का संविधान अंगरेजी में लिखा गया है और उसी को उसकी प्रामाणिक प्रति माना जायेगा यह भी स्पष्ट किया गया है। किसी अन्य भाषा (तथाकथित बेचारी राजभाषा हिन्दी भी शामिल) में लिखित (अनूदित/अनुवादित) प्रति अमान्य होगी यदि कानूनी व्याख्या में अंगरेजी मूल और अन्य भाषा में कहीं फ़र्क दिखने में आवे।

अंगरेजी में लिखित इस संविधान के आरंभ में दिए गये PREAMBLE (प्रस्तावना, भूमिका, प्राक्कथन जो भी अनुवादकगण कहते हों) के शब्द ये हैं:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:

JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(हिन्दी में यों आरंभिक शब्द होंगे: “हम इंडिया के लोग …”

ध्यान दें कि इस PREAMBLE में “भारत” का प्रयोग या उल्लेख नहीं है। तब क्या इस देश को भारत कहना संवैधानिक दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जायेगा?

अगर हिन्दी में इस PREAMBLE के शब्द कहे जाने हों तो कैसे शुरुआत करेंगे? हम क्या यों आरंभ करेंगे: “हम इंडिया के लोग …” अथवा हम कहेंगे: “हम भारत के लोग …”? यहां यह प्रश्न उठेगा कि क्या किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा-शब्द (नाम, proper name) का अनुवाद किया जाता है? यह सभी जानते हैं कि किसी भी भाषा में बात करने पर व्यक्तिवाचक या भाववाचक संबोधन का अनुवाद नहीं किया जाता है। तब उक्त अनुवाद में इंडिया के बदले भारत कैसे कहा जा सकता है।

प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है जब हिन्दी अथवा देवनागरी लिपि वाली भाषाओं से इतर भाषाओं में इस देश का जिक्र किया जाना हो। यथा तमिल में क्या कहेंगे, सिन्धी में क्या कहेंगे, सिंहली (श्रीलंका की भाषा – विदेशी, संस्कृत शब्दों की बहुलता वाला) में क्या होगा, थाई (थाइलैंड की भाषा) में क्या होगा, इत्यादि इत्यादि। मेरी जानकारी के अनुसार संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि हिन्दी में “भारत” होगा। लिखा भी हो तो भी तमाम अन्य भारतीय/विदेशी भाषाओं में क्या कहेंगे यह तो नहीं ही स्पष्ट है।

ऐसी दुविधा किसी ऐसे देश के मामले में हो सकती है जिसके एकाधिक नाम हों। मैं यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इस राष्ट्र को अनौपचारिक रूप से हिन्दुस्तान, हिंद, आदि कहा ही जाता है, उसी प्रकार भारत कहना भी अनौपचारिक तौर पर स्वीकार्य माना जायेगा। लेकिन कानूनी दस्तावेजों में भारत कहना अनुचित नहीं होगा क्या? देशवासी बात-बात पर संविधान की दुहाई देते हैं, लेकिन वे इस विसंगति की चर्चा क्यों नहीं करते हैं?

यह भी विचारणीय है कि प्राचीन काल में यहां के बाशिन्दों ने इस भूभाग को “भारत” नाम दिया। विष्णुपुराण में कहा गया है:

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। (विष्णुपुराण, 2.3.1)

अर्थात् जो देश (वर्ष – देश का पर्याय) समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में स्थित है उसका नाम है भारत और उसकी संतानें हैं भारती ।

मेरा मानना है कि यह पौराणिक नाम “यूरोपवासियों” के संबोधन “इंडिया” से अधिक प्राचीन रहा ही होगा।

स्पष्ट है कि भारत नाम हमारे पुरखों ने प्राचीन काल में इस भूभाग को दिया था जो आज एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर स्थापित है। अंगरेजों ने अपने आधिपत्य के अधीन इस भूभाग को इंडिया कहा अपनी सुविधा से न कि यहां की जनता से पूछकर । उन्होंने “India as a sovereign nation” के तौर पर राज नहीं किया; यह तो उनके ब्रितानी साम्राज्य का हिस्सा था। हमने राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल की लेकिन अपना स्वयं का दिया हुआ नाम भूलकर उनके द्वारा दिया हुआ नाम स्वीकार कर लिया। यह कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कोई विलायत में रहे और विलायतियों के उच्चारण की सुविधा के अनुसार उनके संबोधन को ही अपना नाम मान ले और अपने परिवार द्वारा प्रदत्त मूल नाम भूल जाए।

इस राष्ट्र को “भारत” संबोधित न कहकर “इंडिया” क्यों कहा गया यह मेरी समझ से परे है। यह ठीक है कि अंगरेजों ने इस देश को इंडिया कहा और शासकीय व्यवस्था में अपनी जरूरत के अनुसार अंगरेजी भाषा तथा अंगरेजियत का प्रसार किया। विडंबना यह है कि जब देश स्वतंत्र हुआ तो अंगरेजों से तो हम मुक्त हुए, लेकिन गुलामी की निशानी उनकी अन्य बातों के प्रति देशवासी सम्मोहित बने रहे। फलतः देश इंडिया बना रहा, भारत नहीं बन सका संविधान की दृष्टि में।

इस समय इस देश को भारत कहने वाले नगण्य हो चले हैं। अखबारों/टीवी चैनलों में प्रसारित होने वाले विज्ञापनों में इंडिया ही प्रयुक्त होता है। प्र.मं. मोदी तक “डिजिटल इंडिया”, “स्किल इंडिया”, “मेक इन इंडिया” जैसे नारे गढ़ते हैं और उसके बाद उन नारों के हिन्दी रूपान्तरों मे भारत प्रयुक्त होता है। जब मौलिक रूप से “इंडिया” ही इस्तेमाल होना है तो “भारत” की आवश्यकता क्या है?

यहां इतना तो बता ही दें कि ‘केंद्र शासन की स्थापना के लिए 1949 में जिस अधिनियम को पारित किया गया उसके अनुच्छेद 1(1) का पाठ यों है (अंगरेजी में): “1(1) India, that is Bharat, shall be a Union of States”, जिसका हिन्दी रूपान्तर यों दिया जा सकता है: “इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का संघ होगा ।” ध्यान दें कि इस स्थल पर देश का नाम ‘इंडिया’ के साथ-साथ ‘भारत’ भी घोषित कर दिया है । ऐसा करने की आवश्यकता क्या थी यह भी मेरे समझ से परे है। ऐसा करना ही था तो जैसे संविधान के ४२वें संशोधन (1976) में “SECULAR” शब्द जोड़ा गया वैसे ही संविधान संशोधन के जरिये “भारत” शब्द भी जोड़ा जा सकता था। पर ऐसा किया नहीं गया। कारण? मेरे लिए अज्ञात! – योगेन्द्र जोशी

शहर वाराणसी – “स्मार्ट सिटी” बनने का ख्वाब, ध्वस्त कूड़ा-कचरा-निस्तारण, और मेरी निजी व्यवस्था

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1 - कूड़े-कचरे की तस्वीरें

क्योटो या स्मार्ट्सिटी या सिर्फ़ बनारस?

जब मोदीजी मेरे शहर वाराणसी के सांसद, तत्पश्चात् प्रधानमंत्री, चुने गये तो उन्होंने शहर को जापानी नगरी क्योटो की तर्ज पर विकसित करने का विचार पेश किया । जापान पहले से ही वाराणसी के विकास कार्य हेतु आर्थिक और तकनीकी मदद देता आ रहा है । मोदी के प्र.मं. बनने पर जापान की  वाराणसी पर दिलचस्पी और बढ़ गई । वहां से विशेषज्ञों का यहां आने और यहां के अधिकारियों का वहां जाने का सिलसिला भी चल निकला । अभी तक क्या हासिल हुआ पता नहीं । मुझे तो कहीं कोई खास प्रगति का पता नहीं चला । पैसा जरूर खर्च हो रहा है ।

शहर क्योटो बना कि नहीं यह इस नगरी का नागरिक होने के बावजूद मैं नहीं जान पाया । क्योटो भूलकर इसे “स्मार्ट सिटी” बनाने की कवायद की बात आजकल जरूर सुन रहा हूं । क्या होती है स्मार्ट सिटी यह मैं नहीं जानता, न ही मेरे परिचित समझ पाए हैं । सभी स्मार्ट सिटी “ऐसी होती होगी”, “वैसी होती होगी ” का कयास लगाते हैं, किंतु कोई ठीक-से नहीं जानता । सभी यही सोचते हैं कि ऐसे शहर की व्यवस्था उच्च कोटी की होगी ।

वाराणसी या कोई अन्य शहर “स्मार्ट” सिटी बने या न, कम से कम, साफ-सुथरा, पर्याप्त सुविधाओं से लैस तो बन ही सकता है, जहां के बाशिंदे अपने नागरिक दायित्वों के प्रति सचेत, नियम-कानूनों के प्रति निष्ठावान हों और प्रशासन जिम्मेदारियों के प्रति संमर्पित हो । उसे स्मार्ट सिटी नाम दें या केवल “अच्छा शहर” कहें, क्या फर्क पड़ता है ?

उक्त बातों का अभाव मैं इस नगरी में देखता आ रहा हूं । तदनुसार वाराणसी “अच्छे शहर” की श्रेणी में फिलहाल नहीं और और वैसा बनने में उसे सालों लग सकते हैं । यहां हर वांछित परिवर्तन मंथर गति से होता है । 43 वर्षों के अपने वाराणसी निवास के दौरान मैंने यहां व्यवस्थात्मक गिरावट ही देखी है । उम्मीद किस आधार पर की जाए ? अकेले पैसा फूंकने से चीजें सुधर जाती हैं क्या ? पैसा उतना जरूरी नहीं जितना सुधरने-सुधारने का संकल्प जो यहां के न नागरिकों में दिखता है और न ही प्रशासन में ।

मैं इस नगरी के “अच्छा शहर” अथवा “क्योटो” या “स्मार्ट सिटी” बनने की उम्मीद ले के नहीं चल पा रहा हूं । उम्मीद कैसे घटती है इसे मैं स्पष्ट करता हूं कूड़े-कचरे के उदाहरण से । पहले यह बता दूं कि इस शहर में कूड़े-कचरे के निस्तारण की सुचारु व्यवस्था आज तक नहीं हो सकी है ।

आज (12 दिसंबर) मोदीजी वाराणसी पधारने वाले हैं जापानी प्र.मं. शिंजो आबे के साथ । उनके आगमन के कारण शहर के कुछ हिस्सों को अस्थाई तौर पर चमकाया जा रहा है यह अखबारों में पढ़ने को मिल रहा है । कोई भी घूमफिर के देख सकता है कि सबकुछ ताजा-ताजा है और आगन्तुकद्वय के सम्मान में हो रहा है । बाद में स्थिति वही पुरानी हो जानी है । मेरे इलाके में मोदी जी को आना नहीं इसलिए परसों तक तो यहां कचरे की तस्वीर वही थी जो आम तौर पर सदा रहती है । तस्वीर कैसी रहती है यह मैं लेख के आरंभ में पेश कर चुका हूं ।

वापस कूड़े-कचरे की चर्चा पर ।

कूड़े-कचरे के निस्तरण की कारगर व्यवस्था इस शहर में कभी रही नहीं । एक समय था जब नयी-नयी कॉलोनियों में कई प्लॉट खाली पड़े रहते थे । जो भी मकान बनाकर रहने लगा उसने पास के खाली पड़े प्लाटों में कचरा डालकर काम चला लिया । समय के साथ मकान बनते गए और बाशिंदों ने सड़क पर जहां जगह दिखी वहीं कचरा डालकर काम चला लिया । प्रशासन ने मुख्य सड़कों पर कहीं-कहीं इस हेतु कंटेनर भी रख दिए जो आज भी दिख जाते हैं । कोई उसमें कचरा डालता है तो कोई उसके बाहर । छुट्टा जानवर, आवारा कुत्ते, और बंदर उन कंटेनरों में भोज्य पदार्थ की तलाश करते हैं और कचरा बिखेर देते हैं । अंजाम आप सोच सकते हैं ।

कोई 6-7 साल पहले नगर-प्रशासन ने घर-घर कूड़ा-कचरा-उठान की व्यवस्था आरंभ की । ए-टु-जेड नाम की संस्था को यह जिम्मा सोंपा गया जिसे हर घर से 30 रुपये/माह की वसूली का भी जिम्मा सोंपा गया । करीब डेड़-दो साल तक ठीक-ठाक चलता रहा । फिर प्रशासन एवं उस संस्था के बीच क्या विवाद हुआ कि संस्था काम छोड़कर चली गई । कुछ महीनों के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और नागरिकों ने राहत की सांस ली । लेकिन फिर कुछ हुआ और साल भर के भीतर संस्था ने काम छोड़ दिया । एक बार पुनः समझौता हुआ और खबर मिली कि वही संस्था काम पर लौट आई है । हो सकता है शहर के कुछ स्थानों पर कार्य होने लगा हो पर मेरे मोहल्ले में नहीं । समझौता टिका नहीं, विवाद बढ़ा और मामला अदालत में चला गया । उसके बाद क्या हुआ मुझे पता नहीं; हां सफाई का जिम्मा नगर निगम ने अपने हाथ में ले लिया । लेकिन व्यवस्था कितनी सफल रही यह आरंभ में दिये गये तस्वीर से ही स्पष्ट होता है ।

नगर की सफाई व्यवस्था चरमराई है और चरमराई रहेगी इसका विश्वास मुझे 3-4 साल पहले हो चुका था । मुझे सड़क में कूड़ा फेंकना अटपटा और नागवार लगता ही था, अतः सोचा कि अब मुझे अपनी निजी व्यवस्था करनी ही होगी ।

मैंने क्या किया उसे बताता हूं । यहां दी गई तस्वीर से अंदाजा लग जाएगा ।

2 - कचरा निस्तारण व्यवस्था

मैंने सड़ने-गलने वाली चीजों (साग-सब्जियों, फल-फूलों के छिलके आदि) के लिए अपने अहाते के एक कोने में कचराघर बनाया, ईंटे-गारे से स्वयं अपने हाथ से । (मुझे ऐसे छोटे-मोटे कार्य अपने हाथ से करने का शौक है और उसके लिए मैंने पर्याप्त साधन जुटा रखे हैं ।) चित्र के बांये तथा मध्य में कचराघर की बाहर एवं भीतर की तस्वीरें हैं, और अंत में उससे प्राप्त होने वाली खाद की तस्वीर है जो गमलों या कच्ची जमीन के पेड़-पौधों पर इस्तेमाल हो जाती है ।

जहां तक कूड़ा-कबाड़ का सवाल है उसकी व्यवस्था भी मैंने की है । इसके लिए भी तस्वीर प्रस्तुत है ।

3 - कूड़े-कबाड़ का इंतिजाम

फेरी लगाकर कबाड़ ले जाने वाले अखबार-पत्रिकाएं, प्लास्टिक एवं शीशे के बेकार हो चुके सामान, लोहे-तांबे आदि के सामान, इत्यादि ले जाते हैं । मैं ये चीजें मुफ्त में दे देता हूं कभी एक को तो अगली बार किसी दूसरे को । चित्र के प्रथम हिस्से में इस प्रकार के सामान की तस्वीर है ।

चित्र के मध्य भाग में पॉलिथीन-बैगों का का चित्र है । यों तो मैं किराने का सामान तथा फल-सब्जियां कपड़े के छोले में लाता हूं, फिर भी छोटी-मोटी चीजें पॉलिथीन थैलियों में ही मिलती हैं । मैं इन थैलियों को फेंकता नहीं हूं, बल्कि उनका पुनःचक्रमण (रिसाइकिल) करता हूं । थैलियों को करीने से तहाकर और उनकी गड्ढी बनाकर किसी दुकानदार या सब्जी-फल वाले  को सोंप देता हूं । जरूरत पड़ने पर उनको धो-सुखा लेता हूं ।

इतने सब के बाद भी बहुत कुछ बच जाता है जो आसानी से सड़ता-गलता नहीं और न ही कबाड़ आले लेते हैं । चित्र के अंतिम भाग में ऐसे कूड़े की तस्वीर है । विवश होकर उसे मैं जला देता हूं । मुझे नगर-निगमकर्मी भी कूड़ा जलाते अक्सर दिख जाते हैं ।

मुझे इस बात की तसल्ली है कि कम-से-कम मेरी बजह से वाराणसी गंदा नहीं है ।

अवश्य ही मैं नगरवासियों और प्रशासन को सुधार नहीं सकता । – योगेन्द्र जोशी

असहिष्णुता पर निरर्थक बहस

अहिष्णुता मानव समाज के लिए कोई नयी बात नहीं है। यह तो मानव स्वभाव का अपरिहार्य हिस्सा रही है। कोई समाज और कोई काल नहीं रहा जब असहिष्णूता नहीं रही है। उसके स्वरूप और मात्रा में अवश्य ही उतार-चढ़ाव होते रहे हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों का जिक्र मिलता है जो उसी असहिष्णुता का द्योतक है। सभ्य समाज में इस पर काफी हद तक आत्मनियंत्रण रखते आये हैं लोग। फिर भी कुछ अपवाद बने गिने-चुने लोगों की दूसरे लोगों के प्रति घृणा असहिष्णुता के रूप में यदा-कदा प्रदर्शित हो ही जाती है। जिस देश में 120-25 करोड़ लोग रहते हों वहां ऐसे सिरफिरे हजारों में हों तो आश्चर्य नहीं।

इधर अहिष्णुता की बात जिस तरह की जा रही है वह हैरान करने वाली है, गोया कि उसमें अप्रत्याशित तौर पर इजाफा हो गया हो। कितनी नयी घटनाएं हो गयी हैं कि कहा जाये कि ऐसा अनर्थ पहले से नहीं होता आया है? बेमतलब की इस बहस में लोगों को कूदते देख मुझे समझ नहीं आता कि ये बुद्धिजीवी हैं या उधमी जन।

मुझे अब, इन दो-चार दिनों में, लगने लगा है कि मोदी – मेरी दृष्टि में बेचारे मोदी – को निशाना बना रहे हैं ये सब, मानो कि सब मोदी ही करवा रहा है। दोष देना ही है तो राज्य सरकारों को भी दोष क्यों नहीं देते जहां वारदातें होती हैं? गुजरात में हुई 2002 की घटना ने बेचारे मोदी को ऐसा बदनाम कर दिया कि अब वे ही हर असामाजिक घटना के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

ठीक है; पर मोदी से क्या उम्मीद कर रहे हैं ये लोग? साफ-साफ बतायें कि मोदी ऐसी बातों पर नियंत्रण कैसे करें? क्या वे रोज चीखते हुए कहें कि बस अब ये सब बंद करो? क्या आपराधिक सोच वाले को उपदेश देकर रोका जा सकता है? इस देश में तो ऐसे उपदेशकों की सदा से भरमार रही है, फिर भी क्या लोग सुधर पाये हैं?

आप अपराध कर चुके व्यक्ति को सजा दे सकते है, किंतु उस व्यक्ति को कैसे रोक सकते हैं जो मन में अपराध का इरादा पाले बैठा हो – मंशा जो उजागर न हुई हो? क्या आप मानव-बम बनने को तैयार व्यक्ति को अपना इरादा छोड़ने को कह सकते हैं? इस देश से आईएसआईएस में शामिल होने गये युवाओं को अग्रिम तौर पर पहचान सके आप?

मुझे लगने लगा है कि कुछ बुद्धिजीवी मोदीफोबिया से ग्रस्त हैं और उन्हें केवल मोदी और उनकी टीम के लोगों में ही दोष दिखते हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक लेखक ने कह दिया था कि मोदी प्र.मं. बने तो वे देश छोड़ देंगे। दुराग्रह से पीड़ित व्यक्ति के बोल सहिष्णुता के द्योतक हैं क्या? क्या यह माना जाये कि वे सब विकृत सोच के लोग थे जिन्होंने मोदी को कुर्सी पर पहुंचाया, और यह कि केवल उक्त लेखक महोदय ऐसी विद्वता रखते थे कि किसी की योग्यता का आकलन केवल वही सही-सही कर सक्ते हैं? बाद में वे बोले कि वे भावुकतावश वह सब कह बैठे। क्या असहिष्णुता की जोर-शोर से की जा रही बात भी उसी भावुकता का द्योतक नहीं हो सकता? क्या जो बातें कही जा रही  हैं वे वस्तुनिष्ठ है या महज वैयक्तिक भावुकताजनित?

इन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि आये दिन देश में तमाम असामाजिक घटनाएं होती आ रही हैं। कही कोई किसी का कत्ल कर दे रहा है शत्रुतावश या लूटपाट या रंगदारी में, कहीं अपहरण की घटनाएं हो रही हैं, आये दिन स्त्रीजाति का दुष्कर्म हो रहा है, कहीं पुलिस ज्यादती में लोग प्राण खो रहे हैं, कहीं कोई दबंग कमजोर को दबा रहा है, राह चलते छोटी-मोटी बात पर ही लोगों की जान ले ली जा रही है, आदि-आदि। लेकिन ये सब घटनाएं उनको सह्य नजर आती हैं; किंतु दो-तीन अन्य अप्रिय घटनाएं हो गयीं तो देश असहिष्णु हो गया। कमाल करते हैं ये बुद्धिजीवी।

और समाचार माध्यमों का रवैया देखिए कि किसी घटना की चर्चा घंटों या दिनों तक होती है और किसी घटना का जिक्र तक नहीं होता है। लगता है कि वे चुन-चुन कर जनता के सामने पेश करते हैं घटनाओं को। ऐसी पत्रकारिता को निष्पक्ष कहें क्या? पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर तो पेड-न्यूज़ का आरोप भी लगता आया है। देश के सामने जो गंभीर समस्याएं हैं उन पर चर्चा क्यों नहीं करते हैं ये लोग? पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर बहस हो रही है। यह विश्व के समक्ष गंभीर समस्या है। इस मुद्दे पर अच्छी-खासी कारगर बहस क्यों नहीं हो रही है? मुद्दे एक नहीं अनेक मिलेंगे, पर सनसनीखेज समाचार नहीं बनेंगे। मीडिया उनमें दिलचस्पी नहीं लेता है।

जब कोई बात हिन्दुओं की मान्यताओं के विरुद्ध की जाये तो उसे चुपचाप सुन लिया जाना चाहिए ऐसा सहिष्णुता के पक्षधर मानते हैं; किंतु जब अन्य धर्मावलंबियों के मान्यताओं के विरुद्ध हो तो उसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।

देश के सामने अनेकों गंभीर समस्याएं मुंह बांये खड़ी हैं, यथा अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, करोड़ों लोगों की गरीबी, 45-50% बच्चों का कुपोषण, बदहाल सरकारी स्कूल, अस्पताल जहां गरीबों को इलाज नसीब नहीं होता, आदि-आदि। बुद्धिजीवियों को इन पर बहस करनी चाहिए और उसके लिए अभियान छेड़ना चाहिए। किंतु उनका पेट तो भरा रहता है। उन्हें इन समस्याओं से नहीं जूझना पड़ता है, उनके काम तो हो ही जाते हैं। उनकी समस्या केवल असुरक्षा है जिसका सामना उन्हें करना पड़ सकता है। लगता है कि मामला निहित स्वार्थ से प्रेरित है।

कुछ भी हो वे बतायें कि अगर वे मोदी की जगह होते तो कौन-सा जादुई डंडा घुमाते कि सर्वत्र सहिष्णुता का राज हो जाता? अच्छा होगा कि वे उस रास्ते की सलाह मोदी को दें जिसे वे खुद अपनाते। सुस्पष्ट कार्ययोजना की प्रस्तुति होनी चाहिए। कोई अपराध न कर सके यह कैसे हो यह स्पष्ट बताया जाना चाहिए । महज ये नहीं होना चाहिए, वह होना चाहिए जैसी बातों से काम नहीं चलेगा। – योगेन्द्र जोशी

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