कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की ताजपोशी

 

चुनाव कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष का

समाचार माध्यमों के अनुसार श्री राहुल गांधी ने बीते 16 तारीख (दिसंबर) कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभाल लिया है। मेरी समझ से यह औपचारिकता 19 तारीख होनी चाहिए थी।

अध्यक्ष पद के चुनाव की पूरी प्रक्रिया इस बार जोर-शोर से प्रकाशित हुई और समाचार माध्यमों पर चर्चा का विषय बनी। कार्यक्रम के अनुसार इस माह (दिसंबर) की 1ली तारीख चुनाव की विज्ञप्ति जारी की गई;  नामांकन एवं उनकी जांच 5 तारीख और नाम-वापसी की तारीख 11 रखी गई। मतदान 16 को होना था जिसकी आश्यकता नहीं रह गई। चुनाव परिणाम 19 दिसंबर घोषित होने हैं जिस दिन राहुल गांधी को औपचारिक तौर पर पार्टी का नवनिर्वाचित अध्यक्ष घोषित कर दिया जाना था। (देखें इंडियन एक्सप्रैस समाचार)

ध्यान दें कि इस बार नेहरू-गांधी परिवार के इस वारिस की ताजपोशी के लिए अध्यक्ष पद का चुनाव निर्धारित प्रक्रियानुसार किया गया है। मेरी जानकारी में लंबे अरसे से पार्टी-अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही थी। राहुल के चुनाव की पूरी प्रक्रिया की बात मीडिया में इतनी क्यों छाई रही यह मेरी समझ से बाहर है। क्या कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि वह पूरी लोकतांत्रिक पद्धति से अध्यक्ष का चुनाव करती है? पहले भी यही गंभीरता दिखाई गई है क्या?

इस विषय पर आगे कुछ कहने से पहले पार्टी-संविधान के अनुसार क्या होना चाहिए इसकी चर्चा कर लूं। मेरी जानकारी हिन्दुस्तान अखबार

में छपी खबर पर आधारित है। पार्टी की शीर्ष समिति, कांग्रेस वर्किंग कमिटी, चुनाव का कार्यक्रम निर्धारित करती है। 10 या अधिक पार्टी-प्रतिनिधि इच्छुक प्रत्याशी का नामांकन करते हैं। राज्यों की वर्किंग कमिटियों के सदस्य प्रतिनिधि होते हैं। नामांकन की अंतिम तारीख के बाद कोई भी प्रत्याशी 7 दिनों के भीतर  नाम वापस ले सकता है। उसके बाद नियत तारीख पर आवश्यक होने पर मतदान होता है। 50% से अधिक मत पाने वाला निर्वाचित अध्यक्ष कहलाता है जो अगले अधिवेशन (जब भी हो) की अध्यक्षता करता है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। आवश्यक होने पर मतों में व्यक्त दूसरी वरीयता को भी शामिल किया जाता है। 4 दशक पूर्व तक यह  मात्र 1 वर्ष का होता था।

कांग्रेस संविधान की एक बात महत्वपूर्ण है: कांग्रेस वर्किंग कमिटी को यह अधिकार है कि समय पर चुनाव न करवा पाने पर वह अनंतिम (provisional) या अस्थाई तौर पर किसी को भी अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर सकती है। मैं समझता हूं कि यह प्राविधान कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए स्वीकारा गया होगा। लेकिन इसका भरपूर – और मेरी दृष्टि में बेजा – इस्तेमाल नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के लिए किया गया है। इसी प्राविधान के तहत ही इंदिरा, राजीव (जब तक ये दो जीवित रहे), और सोनिया गांधी लंबे अरसे तक पार्टी अध्यक्ष बने रहे। सोनिया गांधी तो लगातार 19 वर्षों तक शीर्ष पद पर बनी रहीं। अवश्य ही सन् 2000 में कांग्रेस नेता जितेन्द्र प्रसाद उनके विरुद्ध चुनाव लड़े परंतु उन्हें  बहुत बुरी हार मिली।

विगत काल के कांग्रेस अध्य्क्ष

इस आलेख के अंत में सन् 1885 से अब तक के कांग्रेस अध्यक्षों की सूची शामिल की गई है। इस विषय की जानकारी ऑल इंडिया कांग्रेसआईएनसी (इंडियन नैशनल कांग्रेस), एवं विकीपीडिया आदि की वेबसाइटों पर मिल सकती है।

सूची में लाल रंग एवं कोष्टक में अंकित संख्या कोई व्यक्ति कितनी बार अध्यक्ष चुना गया इसकी जानकारी देता है। गौर से देखने पर कुछ बातें साफ नजर आएंगी। स्वातंत्र्य पूर्व अध्यक्षों का कार्यकाल एक वर्ष का होता था। विशेष परिस्थितियों में कार्यकाल कुछ माह का या साल भर से भी अधिक का होता होगा ऐसा मेरा सोचना है। उदाहरण के तौर पर 1918 में आयोजित विशेष अधिवेशन (बम्बई) की अध्यक्षता सैयद हसन इमाम (Syed Hasan Imam) ने की थी और उसी वर्ष के दूसरे अधिवेशन में मदन मोहन मालवीय (Madan Mohan Malaviyav) ने अध्यक्षता की।

दी गई सूची में उन कांग्रेस नेताओं के नाम लाल रंग से इंगित हैं जो एक से अधिक बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता पूर्व भारत में दादाभाई नरौजी,  मदन मोहन मालवीय, जवाहर लाल नेहरू अधिकतम 3 बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता के बाद भी नेहरूजी 3 बार (लगातार) अध्यक्ष बने थे। इस प्रकार नेहरूजी कुल 6 बार अध्यक्ष बने। अन्यथा सूची से यह ज्ञात होता है कि धेबर महोदय 5 बार अध्यक्ष चुने गए। धेबर को छोड़ कोई भी इस पद पर लगातार 5 साल से अधिक नहीं रहा।

कांग्रेस के अध्यक्षों की एक वर्ष के कार्यकाल की परंपरा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कुछ समय तक चलती रही। लेकिन जब इंदिरा गांधी कांग्रेस राजनीति में ताकतबर नेता के तौर पर उभरीं और 1966 में देश की प्रधानमंत्री बनी तो यह सिलसिला गड़बड़ाने लगा। सन्‍ 1969 से अध्यक्ष का कार्यकाल 3-3 वर्ष का देखने को मिलता है।

पंचवर्षीय कार्यकाल

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का कार्यकाल आजकल 5 वर्ष का है। मेरा ख्याल है कि यह तबदीली इंदिरा गांधी के समय (1978) से हो गया था। वे 1978 में और फिर 1983 में अध्यक्ष बनी। लेकिन 1984  में उनकी हत्या हो गई। तत्पश्चात्‍ कुछ माह के लिए अनंतिम तौर पर कोई अध्यक्ष रहा या नहीं मुझे पता नहीं। अवश्य ही वरिष्ठतम उपाध्यक्ष ने पद संभाला होगा। बाद में 1985 के बंबई अधिवेशन में राजीव गांधी अध्यक्ष चुने गए, लेकिन उनकी हत्या (मई 21, 1991) के बाद यह पद कुछ समय खाली रहा।

इंदिरा गांधी के काल में ही यह सुनिश्चित हो गया था कि अध्यक्ष पद नेहरू-गांधी परिवार में ही रहना है। कमोबेश सभी कांग्रेस-जनों को यह स्वीकार्य था। यदि राजीव गांधी जीवित होते तो शायद आज भी वही पार्टी अध्यक्ष होते, या अपने जीवन काल ही में वे राहुल को गद्दी सोंप दिए होते।

राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में उक्त परिवार का कोई भी सदस्य नहीं रह गया था। कांग्रेस दल में एक प्रकार की रिक्तता छा गई। यह मौका था जब कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार के आभामंडल से बाहर निकल सकते थे। ऐसा हुआ भी लेकिन प्रयोग सफल नहीं हुआ। 1992 में पी.वी. नरसिम्हाराव अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने सत्ता भी संभाली। 5 वर्ष के कार्यकाल के दौरान तमाम आरोप लगे। विपक्षियों का विरोध तो उन्हें झेलना पड़ा, उसके अलावा कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष भी पनपने लगा।

सन्‍ 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस को हार का मुख देखना पड़ा। विपक्षी दलों (भाजपा को छोड़कर) के गठबंधन ने सरकार बनाई जो लगभग दो वर्षों के भीतर ही अपने अंतर्विरोधों के चलते बिखर गई। 1997 में वरिष्ठ नेता सीताराम केसरी ने अध्यक्ष पद संभाला किंतु उसके पहले के 5-6 सालों के अंतराल में कांग्रेस के भीतर यह विचार जड़ें जमा चुका था कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य के बिना पार्टी का उद्धार कोई नहीं कर सकता। अतः सोनिया गांधी को मनाया जाने लगा। कांग्रेस जनों के दबाव या प्रार्थना के बावजूद वह लंबे समय तक राजनीति से दूर रह रही थीं, किंतु अंततः 1997 के अंत आते-आते उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली और लगभग दो माह बाद केसरी को पद से हटाकर 1998 के आरंभ में उन्हें अध्यक्ष की गद्दी सोंप दी गई। तब से वह अभी तक (19 वर्ष) इस पर काबिज हैं, हालांकि 2000 में जितेन्द्र प्रसाद ने उन्हें चुनौती दी थी।

वर्तमान कांग्रेस की राजनैतिक संस्कृति

विगत कुछ दशकों में स्पष्टतः परिभाषित एवं मीडिया में प्रकाशित चुनाव-प्रक्रिया कितनी बार अपनाई गई यह मैं नहीं जानता। अगर अपनाई भी गई हो तो वह खानापूर्ति से अधिक कुछ भी नहीं रही होगी। हर बार मीडिया में खबर छप जाती थी कि अमुक व्यक्ति (आवश्यक रूप से नेहरू परिवार का सदस्य) पार्टी-अध्यक्ष चुन लिया गया है।

लेकिन इस बार इतना ढिंढोरा क्यों पीटा गया? इसका कारण है।

पिछले कुछ वर्षों से सोनिया गांधी अस्वस्थ चल रही हैं। वे अध्यक्ष के कार्यभार से मुक्त होना चाहती थीं। अपनी विरासत किसे सोंपें? राहुल गांधी से बेहतर (उनके लिए) कौन वारिस हो सकता हैं? यों पुत्री प्रियंका (वाड्रा) को अधिक कांग्रेसी चाहते हैं ऐसा मालूम पड़ता है। कदाचित् पुत्रमोह उन्हें राहुल को पार्टी के शीर्ष पद पर स्थापित करने को प्रेरित करता है। यों भी गांधी के नाम से प्रियंका नहीं जानी जाएंगी जो एक प्रकार से दिक्कत की बात हो सकती है। राहुल को तैयार करने के लिए सोनिया गांधी ने उन्हें अपने अधिकार कुछ हद तक सोंप दिए थे। राहुल कहने को उपाध्यक्ष थे लेकिन अघोषित तौर पर कार्यकारी अध्यक्ष बने हुए थे।

कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी से कहीं अधिक वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता रहे हैं लेकिन उनमें से किसी को भी वे विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हो सके जो राहुल गांधी को प्राप्त रहे हैं। दरअसल इंदिरा गांधी के समय ही यह परंपरा स्थापित हो गई थी कि अध्यक्ष का पद नेहरू-गांधी परिवार के लिए आरक्षित रहेगा। राहुल गांधी को एक कार्यकर्ता की हैसियत से कोई अनुभव एवं योग्यता प्राप्त न होने बावजूद उन्हें 2004 में सीधे महासचिव और तत्पश्चात् 2013 में (वरिष्ठ्तम?) उपाध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेसजन बंधुआ नेताओं की तरह सब हंसते हुए, खुशी मनाते हुए, स्वीकार करते आ रहे हैं (बंधुआ नेता – बंधुआ मजदूरों के माफिक)।

कांग्रसजनों का तर्क सदैव यह रहा है: “नेहरू-गांधी परिवार ने इस देश के लिए जो त्याग किया है, बलिदान दिया है, उससे किसी और की तुलना नहीं की जा सकती। इसलिए कांग्रेस की हो बागडोर या देश की वह तो नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में ही होनी चाहिए।”

यह तर्क (या कुतर्क?) यह मान के चलता है कि पुरखों के योगदानों का फल उनकी आने वाली पीढ़ियों को मिलते रहना चाहिए। यह मान भी लें कि उक्त परिवार के सदस्यों का योगदान अविस्मरणीय रहा है, लेकिन क्या अन्य परिवारों ने देश के लिए बलिदान नहीं दिए? उनमें से कितनों को कांग्रेसियों ने महत्व दिया है? कहां हैं वे और क्या हैसियत है उनकी आज के कांग्रेस दल में? उसी नेहरू-गांधी परिवार के तो मेनका गांधी और वरुण गांधी भी हैं। उनको उस परिवार के योगदानों का श्रेय और लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है?

राहुल की ताजपोशी : चुनाव का दिखावा?

राहुल की ताजपोशी की बात लंबे अरसे से चल रही थी। विगत कुछ समय से यह सुनने में आता रहा है कि राहुल अमुक तारीख तक अध्यक्ष पद ग्रहण कर लेंगे; और वह तारीख टलती जा रही थी। राहुल का कहना था, “अभी मुझे पार्टी के बारे में बहुत कुछ समझना है, बहुत कुछ सीखना है।” कांग्रेसजनों ने तो मन बना ही रखा था कि जब राहुल तैयार हो जाएंगे और चाहेंगे उनको अध्यक्ष पद सोंप दिया जाएगा। वह घड़ी आ गई, राहुल ने हांमी भर दी, और कांग्रेसियों की ख्वाहिश पूरी हो गई।

पूरा देश जानता था जब भी होगा राहुल को ही अध्यक्ष बनना हैं। तब निर्वाचन की प्रक्रिया का दिखावा क्यों? उसका भी कारण है। राहुल कहते आ रहे थे कि वह पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करेंगे और पार्टी के संविधान के अनुसार कार्य निबटाएंगे। क्या अभी तक आंतरिक लोकतंत्र नहीं था?

अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया दिखावा भर है यह बात शहज़ाद पूनावाला की बातों से स्पष्ट है। शहज़ाद कांग्रेस का सदस्य और महाराष्ट्र राज्य में पार्टी-सचिव हैं। अभी तक उन्होंने राहुल के लिए ही कार्य किया है। लेकिन इस बार उन्हें लगा कि कांग्रेस की संस्कृति के अनुसार कोई भी अन्य कांग्रेसी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कर ही नहीं सकता। हर कोई यह मान के चलता है कि जब तक नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य उपलब्ध हो किसी और को चुनाव लड़ने की सोचनी ही नहीं चाहिए। जब स्थिति इतनी स्पष्ट थी तो चुनाव का ढोंग रचने की आवश्यकता ही क्या थी? और यदि लोकतांत्रिकता का प्रदर्शन करना ही था तो किसी और को भी नामांकन के लिए प्रेरित करना चहिए था – दिखावे के लिए ही सही।

कांग्रेसजनों का नेहरू-गांधी परिवार के प्रति कितनी अंधभक्ति है इसका ज्वलंत उदाहरण शहज़ाद के बड़े भाई तहसीन पूनावाला (वे भी कांग्रेस सदस्य) ने पेश किया है। उन्होंने और उनके परिवार ने शहजाद से परिवारिक नाते ही तोड़ दिए। “तुम्हारी ये हिम्मत कैसे हो गई?”

खैर, “कोई अध्यक्ष होय हमें का हानि!”

भारतीय यानी इंडियन लोकतंत्र

भारत यानी इंडिया विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन यह महान् लोकतंत्र नहीं है। बड़ा होना इसकी उपलब्धि नहीं बल्कि विवशता है। जब आबादी अमेरिका से करीब 4 गुना हो तब बड़ा तो होना ही है। किंतु महान् बनने के लिए आबादी नहीं लोकतंत्र की गुणवत्ता माने रखती है। अपनी उम्र के 70 वर्ष के पड़ाव पर यही कह सकता हूं कि समय के साथ लोकतंत्र में गिरावट ही आई है। तब महानता के लक्षण कहां?  देश में अनेक राजनैतिक दल चुनाव लड़ते हैं। उनमें से कितनों में आंतरिक लोकतंत्र है? कदाचित् 10% में भी नहीं। सभी में सामन्ती व्यवस्था है। कांग्रेस ने भी उसी व्यवस्था को अपना लिया है।

असल में कांग्रेस पार्टी में यह धारणा घर गई है कि इसके बिखराव को केवल नेहरू-गांधी परिवार ही रोक सकता है। – योगेन्द्र जोशी

List of Past Presidents of Indian National Congress (INC, Congress in short)

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संक्षेप में कांग्रेस) के विगत-काल के अध्यक्षों की सूची

 

स्वातंत्र्यपूर्व भारत Pre-Independence India
1885 (Bombay बम्बई) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (1)
1886 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (1)
1887(Madras मद्रास) Badruddin Tyabji बदरुद्दीन तैयबजी
1888 (Allahabad इलाहाबाद) George Yule ज्यॉर्ज यूल
1889 (Bombay बम्बई) William Wedderburn विलिअम वेडरबर्न
1890 (Calcutta कलकत्ता) Pherozeshah Mehta फ़िरोज़शाह मेहता
1891 (Nagpur नागपुर) P. Ananda Charlu पी. आनन्द चार्लू
1892 (Allahabad इलाहाबाद) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (2)
1893 (Lahore लाहौर) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (2)
1894 (Madras मद्रास) Alfred Webb आलफ़्रेड वेब
1895 (Poona पूना ) Surendranath Banerjea  सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1896 (Calcutta कलकत्ता) Rahimtulla M. Sayani   रहीमतुल्ला एम. सयानी
1897 (Amraoti अमरावती) C. Sankaran Nair सी. शंकरन नायर
1898 (Madras, मद्रास) Ananda Mohan Bose आनंद मोहन बोस
1899 (Lucknow, लखनऊ) Romesh Chunder Dutt रमेश चंद्र दत्त
1900 (Lahore लाहौर) Narayan Ganesh Chandavarkar नारायण गणेश चंदावरकर
1901 (Calcutta, कलकत्ता) Dinshaw Edulji Wacha  दिनशॉ एदुलजी वाचा
1902 (Ahmedabad अहमदाबाद) Surendranath Banerjea सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1903 (Madras, मद्रास) Lalmohan Ghosh  लालमोहन घोष
1904 (Bombay, बम्बई) Henry Cotton हेनरी कॉटन
1905 (Benares बनारस) Gopal Krishna Gokhale गोपाल कृष्ण गोखले
1906 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (3)
1907 (Surat सूरत) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (1)
1908 (Madras मद्रास) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (2)
1909 (Lahore लाहौर) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (1)
1910 (Allahabad इलाहाबाद) William Wedderburn  विलिअम वेडरबर्न
1911 (Calcutta कलकत्ता) Bishan Narayan Dar  बिशन नारायन डार
1912 (Bankipur बांकीपुर) Rao Bahadur Raghunath Narasinha Mudholkar

राव बहादुर रघुनाथ नरसिंह मुधोलकर

1913 (Karachi करांची) Nawab Syed Mohammad Bahadur

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर

1914 (Madras मद्रास) Bhupendra Nath Bose  भूपेन्द्र नाथ बोस
1915 (Bombay, बम्बई) Satyendra Prasanna Sinha सत्येन्द्र प्रसन्ना सिंहा
1916 (Lucknow लखनऊ) Ambica Charan Mazumdar अंबिका चरन मजुमदार
1917 (Calcutta, कलकत्ता) Annie Besant  एनी बेसंट
1918 (Bombay, बम्बई) Syed Hasan Imam सैयद हसन इमाम
1918 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviyav मदन मोहन मालवीय (2)
1919 (Amritsar अमृतसर) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (1)
1920 (Calcutta, कलकत्ता) Lala Lajpat Rai  लाला लाजपत राय
1920 (Nagpur नागपुर ) C. Vijayaraghavachariar  सी. विजय राघवाचारियार
1921 (Ahmedabad अहमदाबाद) Hakim Ajmal Khan  हकीम अजमल ख़ान
1922 (Gaya गया) Chittaranjan Das  चित्तरंजन दास
1923 (Cocanada काकीनाड) Maulana Mohammad Ali  मौलाना मुहम्मद अली
1923 (Delhi दिल्ली) Maulana Abul Kalam Azad  मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1)
1924 (Belgaum बेलगाम) Mohandas Karamchand Gandhi  मोहनदास करमचंद गांधी
1925 (Kanpur कानपुर) Sarojini Naidu  सरोजिनी नायडू
1926 (Gauhati गुवाहाटी S. Srinivasa Iyengar एस. श्रीनिवास आयंगर
1927 (Madras मद्रास) Mukhtar Ahmad Ansari  मुख़्तार अहमद अंसारी
1928 (Calcutta, कलकत्ता) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (2)
1929 (Lahore लाहौर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (1)
1931 (Karachi करांची) Vallabhbhai Patel  बल्लभभाई पटेल
1932 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (3)
1933 (Calcutta, कलकत्ता) Nellie Sen Gupta नेली सेन गुप्ता
1934 (Bombay, बम्बई) Rajendra Prasad राजेन्द्र प्रसाद
1935 (Lucknow लखनऊ) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (2)
1936 (Faizpur फ़ैज़पुर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (3)
1938 (Haripura हरीपुरा) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (1)
1939 (Tripuri त्रिपुरी) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (2)
1940 (Ramgarh रामगढ़) Maulana Abul Kalam Azad मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (2)
1946 (Meerut मेरठ) J. B. Kripalani  जे. बी. कृपलानी
स्वातंत्र्योत्तर भारत Post-Independence India
1948 (Jaipur जयपुर) Pattabhi Sitaramayya  पट्टाभि सीतारमैय्या
1950 (Nasik नासिक) Purshottam Das Tandon  पुरुषोत्तम दास टंडन
1951 (New Delhi नई दिल्ली) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (4)
1953 (Hyderabad हैदराबाद) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (5)
1954 (Kalyani कल्याणी) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (6)
1955 (Avadi अवादी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (1)
1956 (Amritsar अमृतसर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (2)
1957 (Indore इंदौर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (3)
1958 (Gauhati गुवाहाटी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (4)
1959 (Nagpur नागपुर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (5)
1960 (Bangalore बंगलौर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (1)
1961 (Bhavnagar भावनगर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (2)
1962 (Patna पटना) Neelam Sanjeeva Reddy नीलम संजीव रेड्डी (3)
1964 (Bhubaneswar भुवनेश्वर) K. Kamaraj के. कामराज (1)
1965 (Durgapur दुर्गापुर) K. Kamaraj के. कामराज (2)
1966 (Jaipur जयपुर) K. Kamaraj के. कामराज (3)
1968 (Hyderabad हैदराबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (1)
1969 (Faridabad फ़रीदाबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (2)
1969 (Bombay बम्बई) Jagjivan Ram  जगजीवन राम
1972 (Calcutta कलकत्ता) Shankar Dayal Sharma  शंकर दयाल शर्मा
1975 (Chandigarh चंडीगढ़) Dev Kanta Borooah देवकांत बरुआ
1978 (New Delhi नई दिल्ली) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (1)
1983 (Calcutta, कलकत्ता) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (2)
1985 (Bombay बम्बई) Rajiv Gandhi राजीव गांधी
1992 (Tirupati तिरुपति) P. V. Narasimha  Rao पी.वी. नरसिम्हाराव
1997 (Calcutta कलकत्ता) Sitaram Kesri सीताराम केसरी
1998 (New Delhi नई दिल्ली) Sonia Gandhi सोनिया गांधी

 

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Why one should opt for NOTA : Its importance in Elections

Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति

Independence Day, August 15

My Good Wishes to all Countrymen

This on the Occasion of Independent Day

Voter’s right: Voting for no Candidate

The term NOTA is an acronym for “None Of The above” option available to voters in elections who find no candidate to their satisfaction. The Ballot Paper earlier and Electronic Voting Machine (EVM) now lists, from top to Bottom in some prescribed order, Names and Symbols of all Candidates fighting an Election. One selects the candidate from that list and puts one’s seal (a Cross Mark) against that candidate’s name on Ballot Paper, or one presses the button against that name on the EVM.

“Conduct of Elections Rules, 1961” gives a voter the Right of NOT Voting in favour of any Candidate. But it also states that the number of such “No Votes” would not affect the outcome of the Election Results. That means

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“सरकार का काम” – कविता  : एक प्रयोग

हिन्दी तथा कुछ और भी

मुझे, तुझे, हम सब को चाहिए सुरक्षा,

सुरक्षा मुहैया कराना सरकार का काम।

मेरी, तेरी, हमारी कोई जिम्मेवारी नहीं,

सुरक्षा करना-कराना सरकार का काम।

हम घर खुला छोड़ दें चल दें कहीं भी

चोरी न हो, उसे रोकना सरकार का काम।

कान में फोन लगाए रेल-पटरी पार करें

तब हमें चेताना-बचाना सरकार का काम

नदी-सागर के बीच सेल्फी लेने लगें हम

अनहोनी से बचाना भी सरकार का काम

उड़ा नियमों की धज्जी वाहन चलाएं हम,

फिर कहें हादसे रोकना सरकार का काम।

सड़कपै बेखौफ वाहन चलाएं लगाएं जाम,

जाम से निजात दिलाना सरकार का काम।

बात-बात पै गुस्से से नुकसान पहुंचाएं हम

उसका मुआवजा भरना सरकार का काम।

सड़क पर कचरा बिखेरें ये हमारी मरजी,

सड़क साफ रहे यह तो सरकार का काम।

पान खाएं पीक थूकें जहां-तहां सड़क पर

सड़क की धुलाई करना सरकार का काम

किस-किस की छूट मिले कहना है मुश्किल

मनमरजी से जीने दे यही सरकार…

View original post 49 और  शब्द

11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी

 

“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से…

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India’s Population Surpasses China’s by 2024 – Should we Rejoice or Regret?

2024 तक भारत की आबादी चीन के बराबर या अधिक हो जायेगी (यू.एन. रिपोर्ट)। इस विषय पर मेरे विचार (आलेख अंग्रेजी में)।

Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति

UN Report on World Population

The United Nations (UN) has recently released its report on World Population Prospects.  The report presents a disappointing picture of many Asian and African countries. Regarding India it says:India’s population is likely to exceed that of China by around 2024. When I came across this news item my reaction to it was something like this:

Should we countrymen rejoice on that news, or just regret?

Rejoice? Yes, after that date, we shall be the biggest country on this planet. We shall then be known to be not only the biggest democracy but also population-wise the biggest country. Would not that be a matter of pride for us?

Regret? The country is already riddled with numerous problems. Ever -increasing population is going to add more and more to them. Have we enough resources to solve the population-caused problems? No. Then this population growth must…

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उत्तर प्रदेश में योगी-राज: अभी तक तो असफल होता दिख रहा है

मेरी कुमाउंनी बोली (उत्तराखंड) में एक कहावत है: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब बताने से पहले सोचता हूं कि इसमें एक कड़ी और जोड़ दूं: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि चेलि थैं कै, चेलिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब कुछ यों समझ सकते हैं: किसी कार्य को निबटाने के लिए सास ने बहू (पुत्रवधु) से कहा; बहू ने उसे करने के लिए बेटी को कहा; अल्पवयस्क बेटी ने कार्य की गंभीरता समझे बिना कुत्ते से कहा; और कुत्ते ने स्वभाव के अनुकूल पूंछ हिला दिया। कार्य जैसा का तैसा रह गया।

शासन – अंतर नहीं दिखता

ऊपर्युक्त कहावत हमारे शासकीय तंत्र के चरित्र पर काफी हद तक लागू होती है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता सम्हाले योगी आदित्यनाथ को अब तीन माह होने को हैं। इस अल्पावधि में वे जनता की तमाम उम्मीदों को पूरा करते हुए दिखने लगें ऐसी अपेक्षा मैं नहीं रखता। फिर भी कुछ बातें हैं जिनकी झलक नये शासकीय तंत्र में दिखनी ही चाहिए थीं। मैं यह उम्मीद करता था कि जो भाजपा चुनावों के दौरान जोरशोर से कहती थी कि प्रदेश में जंगलराज चल रहा है और अपराधी खुले घूम रहे हैं उसी दल के नेता और कार्यकर्ता अब अपनी अराजकता दिखा रहे हैं। अगर आप समाचार माध्यमों पर विश्वास करें तो ऐसी वारदातें सुनने-देखने में आई हैं जिनमें किसी न किसी बहाने भाजपा के नेता-कार्यकर्ता कानून व्यवस्था अपने हाथ में लिए हों। बसपा एवं सपा की पूर्ववर्ती सरकारों में आपराधिक छवि वाले उनके कार्यकर्ता असामाजिक कृत्यों में लिप्त रहते थे। अब वैसा ही कुछ भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं। नयी शासकीय व्यवस्था में भाजपा के लोगों को अनुशासित होकर आम जन के समक्ष दल की अच्छी छवि पेश करनी चाहिए थी। ऐसा हुआ क्या?

योगी जी ने जब सत्ता सम्हाली तो उन्होंने गरजते हुए घोषणा की कि अपराधी तत्व प्रदेश छोड़कर चले जायें अन्यथा वे सींखचों के पीछे जाने के लिए तैयार रहें। इस संदेश से अपराधियों के बीच भय की भावना जगनी चाहिए थी। ऐसा हुआ नहीं। आपराधिक घटनाएं कमोबेश वैसी ही हो रही हैं जैसी बीते समय में हो रही थीं। जो सपा शासन आपराधिक वारदातों के लिए बदनाम रही है वह भी अब कह रही है, “कहां हुए अपराध कम?”

मेरी जानकारी में योगी जी का कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं रहा है। पूर्णतः अनुभवहीन व्यक्ति को समुचित निर्णय लेने में दिक्कत हो सकती है। हमारे लोकतंत्र में यह अघोषित परंपरा रही है कि जिम्मेदार पद पर बैठे अनुभवहीन व्यक्ति के लिए पर्दे के पीछे से मार्गदर्शन करने वाला कोई न कोई रहता है। सुना ही होगा कि कैसे महिला ग्रामप्रधानों के कार्य संपादन उनके पतिवृंद करते आए हैं। बिहार में श्रीमती रावड़ी मुख्यमंत्री बनीं (बनाई गयीं) तो उनके पति लालू जी ही दरअसल राजकाज में मदद कर रहे थे। जब अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बिठाया गया था तो उनके पीछे पिता मुलायम जी का मार्गदर्शन था। लेकिन ऐसा कुछ योगी जी के साथ नहीं है यही मैं समझ रहा हूं। ऐसा नहीं कि इतिहास में सदैव अनुभवी ही सफल होते आये हों। कई बार एकदम नया व्यक्ति भी सफल शासक सिद्ध होते हैं। योगी जी उस श्रेणी में हैं ऐसा नहीं लगता।

प्रशासनिक तंत्र

योगी जी ने सत्ता पर काबिज होते ही अनेकानेक निर्देश अपने प्रशासनिक अधिकारियों को दिए। उन निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है इसे वे क्या समझ पाये हैं? और जो अधिकारी निर्देशों के अनुसार नहीं चल रहा हो उसके विरुद्ध क्या कार्यवाही की गयी? लेख के आरंभ में जो मैंने सुनाया, “सास ने बहू से …” वह प्रशासनिक तंत्र पर लागू होता  है। मुख्यमंत्री शीर्षस्थ अधिकारियों को निर्देश देते हैं, वे कनिष्ठ अधिकारियों को, वे अपने मातहतों को, …।” ये सिलसिला चल निकलता है, और सबसे नीचले पायदान पर का व्यक्ति, “अरे ऐसे आदेश तो आते ही रहते हैं” की भावना से पुराने ढर्रे पर ही चलता रहता है। मेरी समझ में यही कारण होगा कि योगी-राज में अभी कोई खास अंतर दिखाई नहीं देता है।  

निर्देशों की बात पर मुझे अपने वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षक के रवैये का स्मरण हो आता है। बात सालों पहले की है जब मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत था। मेरे विषय भौतिकी (फिज़िक्स) की प्रायोगिक कक्षा में वे अक्सर विलंब से पहुंचते थे। तब कहते थे, “अरे यार, भूल गये कि क्लास है।” कभी-कभी प्रयोगशाला-परिचर (लैब अटॆंडेंट) उन्हें बुलाने भी चला जाता था। मैं शिष्टता के नाते कुछ कहता नहीं था, लेकिन उनके भूलने को मैं “सुविधानुसार विस्मृति” (फ़गेटफ़ुलनेस ऑव्‍ कन्वीनिअंस) मानता था। मैं समझ नहीं पाता था कि जिस दायित्व के लिए व्यक्ति ने नियुक्ति स्वीकारी हो उसे उस दायित्व की याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

योगीजी को यह क्यों कहना पड़ता है कि शिक्षक समय पर कक्षा में जायें, चिकित्सक परामर्श कक्ष में समय पर पहुंचें, पुलिस चौकी प्रभारी वारदात की एफ़आईआर दर्ज करें, आदि-आदि। यह तो संबधित अधिकारियों-कर्मियों के दायित्वों में निहित है। यह सब तो उन्हें करना ही करना है अपनी सेवा-शर्तों के अनुरूप। योगी जी को निर्देश निर्गत करने के बजाय यह पूछना चाहिए कि वे दायित्वों के अनुसार कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं। अगर उन्हें अपने दायित्वों का ही ज्ञान न हो और उसमें रुचि ही न लें तो फिर शासकीय सेवा में क्यों हैं?

सरकारी ‘सेवा’ बल्लेबल्ले

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था क्यों घटिया दर्जे की है इसे समझना जरूरी है। सरकारी नौकरी में आर्थिक सुरक्षा उच्चतम श्रेणी की रहती है। ठीकठाक वेतन के अलावा कई प्रकार के लाभ और रियायतें, सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, आदि इस नौकरी की खासियतें हैं। जब इतना सब किसी को मिल रहा हो तो दायित्व-निर्वाह में ईमानदारी तो बरतनी ही चाहिए। परंतु दुर्भाग्य है कि नौकरी के लाभ तो सभी चाहते हैं किंतु बदले में निष्ठा से काम भी करें यह भावना प्रायः गायब रहती है।

निजी क्षेत्रों में व्यक्ति की अक्षमता माफ नहीं होती, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। लेकिन सरकारे नौकरी में निर्देश पर निर्देश दिए जाते हैं, या तबादला कर दिया जाता है, अथवा कुछ काल के लिए निलंबन। तबादला का मतलब यह है कि निकम्मेपन की जरूरत ‘यहां’ नहीं लेकिन ‘वहां’ है। वाह! लोगों को यह एहसास नहीं है कि निलंबन दंड नहीं होता है। यह तो महज एक प्रक्रिया है तथ्यों की छानबीन के लिए, ताकि दंडित करने न करने का निर्णय लिया जा सके। आम तौर पर 90 दिनों के अंतराल पर निलंबन वापस हो जाता है, और मुलाजिम बाइज्जत अपनी कुर्सी पर!

आजकल सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी देखी जाती है। इच्छुक जन हर प्रकार के हथकंडे अपनाते देखे जाते हैं। सत्ता पर बैठे लोग और प्रशासनिक अधिकारी जन अपने-अपने चहेतों को नियुक्ति देते/दिलाते है। जातिवाद, भाई-भतीजाबाद, क्षेत्रवाद आदि की भूमिका अहम रहती है। जब नियुक्तियां ऐसी हों तो अच्छे की उम्मीद क्षीण हो जाती है।

सरकारी नियुक्तियां

नियुक्तियों में शैक्षिक एवं शारीरिक योग्यता (जहां और जैसी उसकी अहमियत हो) तो देखी जाती है, लेकिन किसी भी सरकारी विभाग में नियुक्तियों में आवेदक के बौद्धिक स्तर (इंटेलिजेंस कोशंट) एवं भावात्मक स्तर (इमोशनल कोशंट) का आकलन नहीं किया जाता है। मेरा मानना है कि इन दोनों का गंभीर आकलन नियुक्तियों में होना चाहिए। पुलिस बल में तो इनकी आवश्यकता कुछ अधिक ही है। ऐसे पुलिसकर्मियों की खबरें सुनने को मिलती हैं जिनकी हिरासत से अपराधी चकमा देकर भाग जाते हैं। साफ जाहिर है उनका बौद्धिक स्तर कम ही रहता है। इसी प्रकार वे कभी-कभी एफ़आइआर तक नहीं दर्ज करते हैं, खास तौर पर रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध, क्योंकि वे संवेदनशील नहीं होते हैं। हमें आम जनों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए यह भावना उनके मन में होनी चाहिए कि नहीं? अक्सर देखा गया है कि वे भुक्तभोगी का शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं।

जब संवेदेनाहीन व्यक्ति सरकारी तंत्र में हो तो वह आम जन के प्रति ही नहीं अपितु अपने आधिकारिक कर्तव्यों के प्रति भी लापरवाह होता है। और यही इस उत्तर प्रदेश में हो रहा है। यह धारणा सरकारी मुलाजिमों के दिलों में गहरे बैठ चुकी है कि उन्हें उनके निकम्मेपन के लिए दंडित नहीं किया जायेगा। वस्तुतः प्रशासनिक तंत्र के संदर्भ में लापरवाही, कामचोरी, नकारापन, आदि सभी कुछ जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। एक बार नौकरी में घुस जाओ और जिन्दगी मजे में गुजार लो। बस अपने ऊपर के अधिकारियों को खुश रखो; काम करो या न, बस काम करते हुए-से दिखो।

पिछले 25-30 वर्षों में प्रदेश प्रशासनिक गिरावट के दौर से गुजर चुका है। उसे पटरी पर लाना आसान काम नहीं है। महज निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नही होने का यह योगी जी अभी तक समझ नहीं पाये हैं। उन्हें देखना चाहिए कि काम क्यों नहीं हो रहा है। यदि हो रहा है तो घटिया स्तर का क्यों हो रहा है। कुछ को दंडित करके दिखाएं; निलंबन से कुछ नहीं होने वाला।

निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नहीं होगा। निर्देश देना यानी “सास ने बहू से कहा, बाहू ने …”।

तंत्र वही है। उसका चरित्र अभी तो अपरिवर्तित ही है। इसलिए योगीराज की सफलता संदिग्ध है। – योगेन्द्र जोशी