पुनर्जन्म हिटलर का – चीन में पुरुषों के आनुवंशिक कूट-संकलन

शी जिनपिंग बनाम अडॉल्फ हिटलर

हिटलर कुख्यात शासक माना जाता है। शासकीय व्यवस्था में जहां कहीं ऐसा व्यक्ति दिखता है जो अपनी जिद में किसी भी हद तक जाने को तैयार हो, अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने की सोचता हो, उसे हिटलर की संज्ञा दे दी जाती है। हिटलर यहूदियों पर अत्याचार के लिए जाना जाता है; उन्हें गैस-चैंबर में ठूंसकर मारा गया यह इलजाम हिटलर पर लगाया जाता है। हिटलर दुनिया पर राज करना चाहता था और जर्मन “श्रेष्ठता” स्थापित करना चाहता था। लेकिन उसका अंत जर्मनी की बरबादी एवं विभाजन के साथ हुआ।

हिटलर की मृत्यु विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय १९४५ में हुई। तब से बहुत कुछ बदल चुका है। उस काल में डिजिटल तकनीकी जैसी कोई चीज नहीं थी। आज यह तकनीकी पर्याप्त विकसित है और राष्ट्रों की व्यवस्था काफी हद तक इसी तकनीकी पर निर्भर है। शांति स्थापित करना हो या युद्ध लड़ना हो निर्भरता इसी तकनीकी पर आ ठहरती है। इसलिए आज जिसे हिटलर कहा जाना हो उसके तौर-तरीके बीते जमाने के हिटलर से भिन्न होंगे ही। लेकिन ऐसे व्यक्ति की सोच तथा इरादे भिन्न नहीं होंगे। अपने इन विचारों के परिप्रेक्ष में मुझे चीन की साम्यवादी (कम्यूनिस्ट) पार्टी के महासचिव एवं देश के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) में मुझे हिटलर की छवि दिखाई देती है।

आठ-दस रोज पहले मुझे न्यूयॉर्क-टाइम्ज़ (New York Times)  की वेबसाइट पर एक लेख (अंग्रेजी में) पढ़ने को मिला। शीर्षक था

“China Is Collecting DNA From Tens Of Millions of Men And Boys, Using U.S. Equipment”

लेख की लेखिका हैं चीनी मूल की सुइ-ली वी (Sui-Lee Wee) जो बेजिंग में न्यू-यॉर्क टाइम्ज़ की संवाददाता हैं। उक्त लेख का आरंभिक अनुच्छेद/वाक्य ये हैः

“The police in China are collecting blood samples from men and boys from across the country to build a genetic map of its roughly 700 million males, giving the authorities a powerful new tool for their emerging high-tech surveillance state.”

जिसका हिंदी अनुवाद कुछ यों होगाः

“करीब 70 करोड़ पुरुषों के आनुवंशिक कूट तैयार करने के लिए चीन की पुलिस देश के कोने-कोने से आदमियों एवं बालकों से खून के नमूने इकट्ठा कर रही है जिससे उच्च तकनीक की निगरानी/चौकसी की उभरती प्रणाली अधिकारियों को मिल सके।”

क्या मकसद है इस पूरी कवायद का? मैं यही समझता हूं कि जीवन-पर्यन्त चीन के राष्ट्रपति बन चुके शी जिनपिंग हर प्रकार का विरोध कुचल सकें और स्वयं को दुनिया का सबसे ताकतबर नेता बन सकें। उनके अरमान अमेरिका के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र होने का “पद” छीन सकें। मकसद कमोबेश वही है जो हिटलर के थे। शी जिनपिंग हिटलर के आधुनिक अवतार हैं। 

इस लेख के कुछएक बिंदुओं को मैं पाठकों के सामने रख रहा हूं। जो किया जा रहा है और जो उसके संभावित उपयोग/दुरुपयोग होंगे उसका आकलन वे स्वयं कर सकते हैं।

लेख में ऑस्ट्रेलियन स्ट्रीटिजिक पॉलिसी इंस्टिट्यूट (Australian Strategic Policy Institute) का जिक्र करते हुए कहा गया है कि चीन में 2017 से ही नमूने संकलित करने का कार्य चल रहा है। इससे निर्मित आंकड़ाकोष (database) से किसी व्यक्ति के खून, लार एवं अन्य शारीरिक तत्वों के अध्ययन द्वारा उसके रिश्तेदारों का पता लग जायेगा।

इस कार्य में अमेरिका की थर्मो-फिशर कंपनी परीक्षण-किट मुहैया करा रही है।

इस परियोजना (प्रॉजेक्ट) का उद्येश्य चीन की आधुनिकतम तकनीकी के प्रयोग से  लोगों, विशेषतः लक्षित प्रजाति समुदायों (ethnic communities), को नियंत्रण में रखने की विधियों को विस्तार देना है। उन्नत कैमरों, मुखाकृति पहचान, और कृतिम बुद्धि (AI) का इस्तेमाल पुलिस बल पहले से ही कर रहा है।

पुलिस का कहना है उन्हें ऐसे आंकड़ाकोष की आवश्यकता है। इसकी मदद से अपराधियों को पकड़ना आसान होगा। कुछ अधिकारी एवं देश के बाहर के मानवाधिकार समूह चिंता व्यक्त करते हैं कि निजता में हस्तक्षेप और असहमतों (असंतुष्टों, dissidents) के संबंधियों को परेशान करने में इसका दुरुपयोग होगा। ये नमूने व्यक्ति की सहमति के साथ नहीं लिए जा रहे हैं। अधिकारवादी शासन में किसी का असहमत होना माने नहीं रखता। वैसे अधिकांश लोग विरोध में है।

“ह्यूमन राइट्स वॉच” की माया वांग (Maya Wang) के अनुसार किसी सक्रिय जन से कौन अतिनिकटता से संबंधित है यह पता लगाने का विचार ही सिहरन पैदा करता है।

यह कार्यक्रम स्कूलों में भी चल रहा है। जो कोई खून का नमूना नहीं देगा उसके परिवार को “काली सूची” (black household) दर्ज होगा और उसे शासन-प्रदत्त लाभों से वंचित होना पड़ेगा।

नजर रखना चीनी पुरुषों पर

मान्यता है पुरुषों में अपराधी अधिक होते हैं। लेख में एक उदाहरण दिया है कि किस प्रकार जीन-तकनीकी के प्रयोग से चीनी मंगोलिया के 11 किशोरियोँ-युवतियों के हत्यारे को 2016 में पकड़ा गया। हत्यारे का DNA नमूना तो मिला लेकिन उसकी पहचान नहीं हो पाई। 2016 घूस के मामले में एक व्यक्ति पकड़ा गया जिसका DNA नमूना उस अपराधी के सन्निकट था। इस DNA परीक्षण से उस अपराधी तक पहुंचना संभव हुआ जो इस व्यक्ति से संबंधित निकला।

चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा आनुवंशिक आंकड़ा भंडार है। संदिग्ध अपराधियों के आंकड़े इकट्ठे किए जाते रहे हैं ताकि वे कहीं अस्थिरता न फैलाएं। पुलिस ने उईगर (वीगुर, Uyghurs) मुस्लिम समुदाय तथा तिब्बतियों के आंकड़ों को खास तौर पर एकत्रित किया है ताकि उन पर साम्यवादियों (communists) का नियंत्रण बना रहे। हाल में पुरुषॉ के आनुवंशिक नमूने लेने में तत्परता बढ़ गयी है। आबादी के 5 से 10 प्रतिशत पुरुषों के नमूने इकट्ठा करने का लक्ष है। इनकी मदद से अन्य पुरुषों (संबंधीजनों) के DNA चरित्र की जानकारी मिल जाएगी। पुलिस ने डॉंग्लान एवं गुआंक्शी क्षेत्र से करीब 10% पुरुषों के नमूना पा लिये हैं।

परिक्षण-साधन चीन की कंपनियों से खरीदे गये लेकिन कुछ का ऑर्डर अमेरिकी थर्मो-फिशर को भी मिला। थर्मो-फिशर को विशेष चिन्हक (gene-marker) के लिए चुना है ऐसा कंपनी का दावा है। आनुवंशिक चिह्नकों को चीनी मानव-प्रजातियों विशेष तौर पर वीगुर मुस्लिमों एवं तिब्बतियों को ध्यान में रखकर चुना गया है। थर्मो-फिशर के परीक्षण-साधन के संदर्भ में वैज्ञानिकों, नीतिशास्त्रीजनों (ethicists), मानवाधिकारवादियों का मत है कि इस विधा का दुरुपयोग सामाजिक नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।

निजता एवं सहमति

अभी आंकड़ा-भडांर बढ़ाया जा रहा है, किंतु इसका उपयोग शुरू हो चुका है। चीनी पुलिस का एक तंत्र “डीएनए स्काईनेट” (DNA Skynet) है जिसमें इसका इस्तेमाल चौकसी (surveillance) के लिए होने जा रहा है। शार्प आई (Sharp Eye) नामक परियोजना में इसे इस्तेमाल किया जाएगा।

चीन के लोग उनके इंटरनेट-प्रयोग तथा अन्य कार्यों में सरकरी दखलंदाजी को स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन मौजूदा DNA नमूनों के मामले में विरोध अवश्य दिख रहा है। इस मामले में अभी कोई कानून नहीं है। मार्च माह में चीन की शीर्ष सभा (Parliament) में दो प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि जैसे-जैसे तकनीकी आगे बढ़ती है वैसे-वैसे उपयोक्ताओं के अधिकारों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। [चीन में विरोध तो कर नहीं सकते, सरकार की मेहरवानी की आस रहती है।]

अधिकारी देहाती क्षेत्रों में नमूने लेने के लिए चुपचाप आगे बढ़ रहे है जहां इस प्रोग्राम और उसके निहितार्थ की समझ लोगों में नहीं है। इन इलाकों में अधिकारी गर्वान्वित दिखाए देते हैं और स्कूलों के बच्चों के खून-नमूने लेते हुए फोटो प्रचारित करते हैं। इन फोटो में दिख रहे लोग खून के नमूने लेने का प्रयोजन शायद ही ठीक से समझते हैं। साक्षात्कारों एव सोशल मीडिया की पोस्टों से लगता है कि नमूना न देने पर सजा हो सकती है।

जियांग नाम के कम्प्यूटर एन्जीनियर के कथनानुसार खून का नमूना देने के लिए उसे अपने गांव जाने को कहा गया। वह अस्पताल गया और उसे भुगतान करना पड़ा था। न उसने नमूना लेने का कारण पूछा और न ही उसे बताया गया। चीनी लोगों को अपना पहचान पत्र सदैव साथ रखना पड़ता है इसलिए अधिकारियों से पहचान छिप नहीं सकती।

जनसामान्य के अधिकारों के लिए सक्रिय लोगों का कहना है कि आनुवंशिकी विज्ञान ने चीनी अधिकारियों को नापसंद जनों पर अभियोग चलाने के मौके दे दिये हैं। उन्हें शंका है कि DNA आंकड़े को असंतुष्टों [राजनैतिक dissidents] के विरुद्ध पुख्ता सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता। बीजिंग पुलिस ने कुछ मामलों में ऐसा प्रयोग किया भी है।

निजता के पक्षधर एक चीनी नागरिक ली वेइ (Li Wei) की बात लेख में पेश है। ली का कहना है कि खून या लार आदि के ममूने पुलिस के पास हों तो वे आपराधिक बारदाद के स्थान पर छोड़े जा सकते हैं और उनका दुरुपयोग व्यक्ति को फंसाने में हो सकता है। अपने खुद का अनुभव उन्होंने बताया कि कैसे एक होटल में पुलिस उनके पास पहुंची और पुलिस स्टेशन चलने की और DNA नमूने की मांग करने लगी। उन्होंने मना किया; उन्हें मारा-पीटा गया, पर वे माने नहीं।

ऐंबर वांग (Amber Wang) तथा लियु यी (Liu Yi) के शोधकार्य का लेख को योगदान रहा है। लेख में कई फोटो शामिल हैं जिन्हें मैं यहां नहीं प्रस्तुत कर रहा हूं। उनके लिए मूल लेख देखना पड़ेगा। – योगेंद्र जोशी

लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार (२)

इस समय बेंगलूरु में हूं गृहनगर वाराणसी से दूरलॉकडाउन में कुछ ढील मिल चुकी है। कहने को रेलयात्रा एवं हवाईयात्रा की सुविधा आरंभ हो चुकी है। लेकिन भ्रम इतना फैला है कि वापसी यात्रा की तिथि तय नहीं हो पा रही है। मैं २४ घंटे व्यस्तता से बिता सकता हूं, परंतु दो-अढाई मास के इस अनियोजित प्रवास में अपनी आम दैनिक चर्या से वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है। यहां बहुमंजिली २३ इमारतों वाले विस्तृत परिसर के चारों ओर टहलने में सुबह-शाम आधा-आधा घंटा लग जाता है। टहलते समय परिसर के पर्यावरण, परिसर-निवासियों भाषा-जीवनशैली, कोरोना महामारी, लॉकडाउन एवं समाचारों को लेकर तरह-तरह के विचार मन में उठते हैं। परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे हुए विचार पूर्ववर्ती आलेख तथा इस स्थल पर कलमबद्ध हैं।

[१]

छिद्रेषु अनर्था बहुलीभवन्ति

यह संस्कृत साहित्य की एक उक्ति है जिसका सीधा अर्थ यह है कि विपत्तियां अकेले नहीं आती हैं। अंग्रेजी में इसके लिए “Misfortunes never come single.” अथवा “Misfortunes seldom come alone.” लोकोक्ति उपलब्ध है। इस कहावत को लेकर मैंने एक लेख अपने ब्लॉग में ११ वर्ष पहले लिखा था।

इस वर्ष की शुरुआत से ही पूरी दुनिया कोरोना से पैदा हुई महामारी से जूझ रही है। यह लोगों को रोगी बना रहा है जिसका कोई इलाज अभी उपलब्ध नहीं है जिससे अनेक जन दिवंगत हो रहे हैं। समाचार माध्यम पिछले ३-४ माह से प्रायः सिर्फ कोरोना से जुड़ी खबरें परोस रहे हैं, गोया कि जानने योग्य और कुछ इस संसार में नहीं घट रहा हो। निःसंदेह कोरोना का महाप्रकोप सामुदायिक समस्या बनकर उपस्थित हुआ है लगभग हर राष्ट्र के समक्ष। परंतु मेरी नजर में अधिक दुःखद बात यह है कि इसने तमाम तरह की समस्याएं लोगों के सामने व्यक्तिगत स्तर पर पैदा कर दी हैं। अर्थात् उन समस्याओं का हल खोजना और उनके दुष्परिणाम भुगतना हरएक की व्यक्तिगत नियति बन चुकी है।

इस कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए अन्य देशों की भांति अपने देश ने भी लॉकडाउन का रास्ता अपनाया है। इससे अनेक परेशानियां पैदा हुई है। देखिए क्या-क्या भुगतना पड़ रहा है संसाधन-विहीन आम आदमी को –

(१) उद्योगधंधों का बंद हो जाना जिससे रोज कमा-खाने वालों के समक्ष रोजी रोटी के लाले पड़ने लगे।

(२) जमा-पूंजी जब चुकने लगी और पर्याप्त मदद नहीं मिली तो अपने पैतृक गांव-घरों को लौटने लगे।

(३) आवागमन के साधन ट्रेन/बस उपलब्ध न होने के कारण उन्हें सामान ढोने वाले ट्रकों में भेड़-बकरियों की तरह ठुंसकर निकलना पड़ा।

(४) जिनको वह भी न मिला पाया वे १०००-१५०० किलोमीटर पैदल नापने को विवश हो गए।

(५) मार्ग में कइयों को जान से हाथ धोना पड़ा बिमारी से या दुर्घटना के शिकार बनकर। दुर्घटनाओं का हृदय-विदारक पक्ष यह रहा कि कहीं कमाने वाला मुखिया चल बसा, तो कहीं मांबाप खोकर बच्चे अनाथ हो गये और किसी को प्रसव-पीड़ा सहनी पड़ी, और किसी नवजात को त्यागना पड़ा। इत्यादि।

ये सब बातें विवश करती हैं कहने को “छिद्रेषु …

[२]

कोरोना काल में लिफ्ट का परित्याग

मैं सदा से ही शारीरिक श्रम का पक्षधर रहा हूं। घर-गृहस्थी के छोटेमोटे काम अपने हाथ से करना पसंद करता हूं। जहां तक संभव हो एक-डेड़ किलोमीटर की दूरी पैदल चलना मेरी रुचि के अनुकूल है। उससे अधिक दो-चार किमी तक साइकिल से जाना ठीक समझता हूं। कभी स्कूटर का भी प्रयोग कर लेता था लेकिन अब बढ़ती उम्र और नगर की बेतरतीब यातायात व्यवस्था के चलते उसका प्रयोग बंद हो चुका है। कार का शौक न पहले था और न अब हैसीड़ियां चढ़ने-उतरने में अभी कोई दिक्कत महसूस नहीं करता।

इधर बेंगलूरु में बहुमंजिली इमारत के सातवें तल पर रह रहा हूं। लॉकडाउन घोषित होने से पहले मैं भूतल से उस तल तक चढ़ने-उतरने के लिए सामान्यतः लिफ्ट का प्रयोग कर रहा था। किंतु जब कोरोना महामारी के दायरा बढ़्ने की खबरें जोरशोर से आने लगीं तो उसे गंभीरता से लेने में ही मुझे बुद्धिमत्ता नजर आई। तब से हम पति-पत्नी सीढ़ियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। दिन भर में पत्नी महोदया को एक बार ही ऊपर-नीचे आना-जाना होता है, लेकिन मैं चूंकि दो बार टहलने निकलता हूं अतः मुझे यही कार्य दो बार करना पड़ता है।

बाहर खुले में प्रातःसायं टहलना स्वास्थ्य बनाये के लिए उपयोगी होता है ऐसी राय व्यक्त करते हैं डॉक्टरवृंद। मेरा ख्याल है कि दिन भर में कुछ सीढ़ियां चढ़ना-उतरना भी खुद में शरीर के अस्थि-जोड़ों के लिए लाभप्रद होना चाहिए। जिनके घुटने अभी ठीकठाक चल रहे है उनको दिन भर में सीढ़ियों का भी व्यायाम कर लेना चाहिए।

[३]

कोरोना का संदेश – जनसंख्या नियंत्रण

मेरा मत है कि मौजूदा कोरोना संक्रमण ने एक गंभीर संदेश दिया है। वह है जनसंख्या पर नियंत्रण। हो सकता है देशवासियों को वह नजर न आ रहा हो।

सन् १९६० के दशक में (कदाचित् १९६५ के आसपास) तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की योजना बनाई और उसका कार्यान्वयन भी सुचारु होने लगा। “हम दो हमारे दो” का नारा दिया गया। बसों तथा अन्य साधनों पर “लाल त्रिकोण” के प्रतीक के साथ यह नारा सर्वत्र प्रचरित होने लगा। लोगों में जागरूकता फैलने लगी और वे स्वेच्छया परिवार नियोजन के विविध साधन अपनाने लगे। शनैःशनैः ही सही नीति सही दिशा में चल रही थी।

दुर्भाग्य से १९७० के दशक में इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने एक “असंवैधानिक” शक्ति के तौर पर उभर कर इस कार्य योजना के लिए जोर-जबर्दस्ती का मार्ग अपनाना शुरू किया। लोगों में असंतोष पनपने लगा, और तथा अन्य कारणों से भी वे आंदोलित होने लगे, आपातकाल घोषित हुआ, यह योजना उसका शिकार बनी।

उसके बाद किसी राजनैतिक दल ने हिम्मत नहीं जुटाई योजना को आगे बढ़ाने की। बाद में खुद कांग्रेस लंबे अरसे तक सत्ता में रही लेकिन उसने भी योजना को भुला दिया।

परिणाम? १९६५ के आसपास देश की आबादी करीब ५० करोड़ थी। आज वह करीब १३५ करोड़ आंकी जाती है, २.७ गुना !! परंतु देश है कि चुप्पी साधे है।

गौर करें आगे प्रस्तुत नक्शे पर जो दिखाता है कि कुछ राज्य हैं जिनकी आबादी बढ़ने की दर अन्य इतनी अधिक है उनके नागरिकों को पेट पालने के लिए दूसरे राज्यों की शरण लेनी पड़ती है। लेकिन इन राज्यों को लज्जा फिर भी नहीं आती। जब कोरोना ने विकट स्थिति पैदा कर दी इन नागरिकों को डेढ़—डेढ़ हजार किमी पैदल चलकर तथाकथित घर लौटना पड़ता है तब भी इन राज्यों को लज्जा नहीं आती। (स्रोतः censusindia.gov.in पर उपलब्ध है।)

राज्यों के पास अपने बाशिंदों के पेट भरने के संसाधन न हों तो भी आबादी बढ़ने देनी चाहिए क्या? आंख खुलेगी कब? – योगेन्द्र जोशी

लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार

इस समय हम बेंगलूरु में हैं अपने बेटे के पास। एक मास के नियोजित बेंगलूरु-प्रवास के बाद तारीख २२ मार्च को लौटना था अपने गृहनगर वाराणसी को, किंतु पहले “जनता” कर्फ्यू फिर लॉकडाउन घोषित हो जाने पर यात्रा स्थगित कर दी। इस समय उसका चौथा चरण चल रहा है। बीते २१ ता. को हमारे अनियोजित प्रवास के दो माह हो गये। हवाई सेवा प्रारंभ होने की खबर है लेकिन सर्वत्र भ्रम फैला है।

अब ऊब होने लगी है। वैसे मेरे लिए २४ घंटे व्यस्तता से बिताना कोई कठिन काम नहीं है। परंतु इस अनियोजित प्रवास में मेरी जो आम दैनिक चर्या होती थी उससे वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है।

हम बहुमंजिली इमारतों और उनके बहु-अपार्टमेंटों के विस्तृत परिसर में रह रहे हैं। बाउंडरी से घिरे परिसर के चारों ओर टहलने में आधे घंटे से अधिक समय लग जाता है। टहलना मेरी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा रहा है। टहलते समय परिसर के परिवेश, परिसर-निवासियों के तौरतरीके, मौजूदा महामारी, संबंधित लॉकडाउन, वैश्विक खबरों आदि को देख तरह-तरह के विचार मन में उठते रहते हैं। उनसे जुड़े परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे विचार इस स्थल पर कलमबद्ध हैं।

 

[१] कष्टकर लॉकडाउन

सोशल मीडिया अर्थात् सामाजिक माध्यम पर ऐसे कई किस्से-कहानियां देखने-सुनने को मिल जा रहे हैं जो दिखाते हैं कि लॉकडाउन काल में लोगों को चौबीसों घंटे घर में रुके रहना कितना बेचैन कर रहा है। मनोवैज्ञानिक यह चिंता व्यक्त करते हैं ऐसी स्थिति में कई-कई दिनों तक पड़े रहना कइयों के लिए मानसिक तनाव एवं तज्जन्य मनोरोग का कारण बन सकता है। कुछ लोग टेलीफोन एवं टीवी पर अवश्य समय गुजारते होंगे। आज के युग में शेष दुनिया से संपर्क साधे रहने के कई अन्य साधन भी उपलब्ध हैं।

मेरे मन में यह सवाल रह-रहकर उठता है कि वे लोग जो किसी न किसी ध्येय की प्राप्ति के लिए जिंदगी को दांव पर लगाते हों, जेल की काल-कोठरी में रहने को भी तैयार हो जाते हों, उनकी सहना शक्ति कितनी अधिक होती होगी? जिस हालात में औसत आदमी पागल हो जाए उसमें भी वे बिना मानसिक संतुलन खोये हफ्तों, महीनों या सालों बिता देते हों यह अविश्वसनीय-सा लगता है। देश के स्वाधीनता संघर्ष में देश के अनेक सुपुत्र इस सामर्थ्य के धनी थे। मुझे वीर सावरकर का नाम याद आता है जिनको अंडमान-नीकोबार – अंग्रेजी-काल में कालापानी – में वर्षों कालकोठरी में गुजारने पड़े। कालापानी अर्थात् देश की मुख्यभूमि से हजारों कि.मी. दूर समुद्रस्थ निर्जन द्वीपीय स्थान। वैसी सामर्थ्य एवं इच्छाशक्ति विरलों को ही मिली रहती है। धन्य हैं वे।

[२] मित्रोँ-परिचितों के निधन का दुर्योग

इसे संयोग, वस्तुतः दुर्योग, ही कहा जाएगा कि लॉकडाउन काल में मुझे नजदीकी मित्रों, सहयोगियों एवं रिश्तेदारों से संबंधित शोकसमाचार सुनने को मिले। हादसे तो होते ही रहते हैं लेकिन जिनकी बात मैं कर रहा हूं उनमें एक मेरी पूर्व-सहयोगी, दो पड़ोसी, और दो निकट संबंधी रहे। गौर करने योग्य बात यह थी वे सभी पहले से ही गंभीर रूप से रुग्ण थे और उनकी लंबे जीवन की आशा नहीं थी। दो तो कैंसर-पीड़ित थे, एक हृदयरोगी, और दो जटिल मिश्रित रोगों से ग्रस्त थे। वे महीनों पूर्व भी दिवंगत हो चुके होते, किंतु संयोग यह रहा कि इसी लॉकडाउन काल में उक्त हादसे हुए।

इन लोगों के दिवंगत होने का जो दुःख उनके पारिवारिक सदस्यों को हुआ उससे अधिक कष्ट इस बात का रहा होगा कि वे उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके, क्योंकि दूरस्थ होने और आवागमन के साधन बंद होने के कारण वे मन मसोस कर रह गये। मैं दिवंगत आत्माओं की शांति की प्रार्थना करता हूं, और उनके भाई-बहनों, बेटे-बेटियों आदि निकट संबंधियों के प्रति कष्ट सहने की सामर्थ्य की कामना के साथ सहानुभूति व्यक्त करता हूं। प्रार्थना है कि भविष्य में कोई अनिष्ट समाचार सुनने को न मिले।

[३] भविष्यवाणी के प्रति अविश्वास

मैं ज्योतिष में विश्वास नहीं करता, यद्यपि मेरे खानदान की पूर्ववर्ती पीढ़ियों की जीवनचर्या में पौरोहित्य एवं ज्योतिष शामिल थे। भौतिकी (फिजिक्स) का छात्र, अध्येता और अंततः शोधकर्ता-शिक्षक के तौर पर जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे मेरा विश्वास भविष्यवाचन की सभी विधाओँ-कलाओं से उठता चला गया। भौतिकी में प्रकृति के जिन नियमों का अध्ययन किया जाता है और जिन पर आधुनिक टेक्नॉलॉजी (प्रोद्योगिकी, तकनीकी) आधारित है उनके मद्देनजर मेरे मत में भविष्यवाणी संभव नहीं। किंतु परम आस्था जिसको हो वह तो विश्वास करता रहेगा भले ही विफल भविष्यवाणियों की गठरी ही उसके सामने खोल दी जाए।

इधर वैश्विक कोरोना महामारी को देखकर मेरे मन में भविष्यवाणी के प्रति शंका की बात ताजा हो उठी। जो लोग भविष्यवाणी की किसी भी विधा या कला में विश्वास करते हैं उनको इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि किसी भी भविष्यवेत्ता ने इस महामारी की भयावहता की बात विगत समय में – महीनों, सालों पहले – क्यों नहीं की? अब यदि घटना घट चुकने के बाद कोई यह दावा करे कि उसे इसका अंदाजा पहले ही लग चुका था तो उसकी अहमियत नहीं है।

सोचने की बात है कि इस सदी की, और मैं तो कहूंगा सन् १९०० के बाद, वैश्विक स्तर की ऐसी कोई महामारी मानवजाति को नहीं झेलनी पड़ी है। विश्व में आधुनिकतम चिकित्सकीय व्यवस्था के उपलब्ध होने और लॉकडाउन का रास्ता अपनाने के बावजूद संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं और मृतकों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है। क्या यह कोई छोटी-मोटी दुर्घटना है जिसे भविष्यवक्ता जान ही न पाये हों?

दरअसल भावी घटनाओं का ज्ञान संभव नहीं है केवल उनका अनुमान लग सकता है यदि पर्याप्त आधार उपलब्ध हों। ऐसे सुविचारित तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनसे उक्त मत सिद्ध होता हो। मैं वह सब यहां पेश नहीं कर सकता क्योंकि यह विषय विशद तर्क-वितर्क का है। -योगेन्द्र जोशी

कोरोना ने लगाई लगाम शराब पै – बेचैन हुए शौकीन

पिछले करीब दो माह से देश लॉकडाउन झेल रहा है। देश भर में कुछ जिले है जहां महामारी का प्रकोप गंभीर है। उन जिलों को रेड ज़ोन यानी लाल क्षेत्र नाम दिया गया है। ये वे क्षेत्र हैं जहां तमाम गतिविधियां थम-सी गई है। अत्यावश्यक कार्य के लिए ही किसी व्यक्ति को घर से बाहर निकलने की अनुमति है। खाद्य पदार्थों की आपूर्ति होम-डिलीवरी से की जा रही है। लेकिन शराब जैसी खूबसूरत चीज की आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं की गयी। लॉकडाउन जैसी दशा में घरों में कैद रहने से कोई शख्स जहां उबिया रहा हो वहां गम गलत करने का साधन शराब भी नसीब न हो तो सोचिए बंदे की हालत क्या होगी?

वाह! खुल गयी दुकान

शराब की दुकानों को खोलने की सरकार ने चंद रोज पहले इजाजत क्या दी कि मदिरापान के शौकीनों की जैसे लॉटरी ही खुल गयी। न लॉकडाउन के नियमों का ख्याल किसी को रहा और न ही अपनी तथा अगल-बगल के अन्य जनों के कोरोना से बचाव की चिंता। समाचार माध्यमों ने देश के प्रायः सभी इलाकों के मदिरा विक्रय केन्द्रों के सामने की जिस भीड़ की तस्वीरें पेश कीं उनको शब्दों में बयाँ करना मेरे लिए मुश्किल है।

शराब को लेकर जान तक दाँव पर लगाने वालों को देख मुझे बीते जमाने के अपने अनुभवों की याद हो आई। किसी को गलतफहमी न हो सो इस बाबत बता दूं कि मैं शराब का शौकीन नहीं हूं और न कभी पहले रहा। लेकिन उसे छुआ है और पिया भी है, नियमतः तो नहीं बस यदा-कदा। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य – आप जो ठीक समझें – अपने को जो अड़ोसी-पड़ोसी, यार-दोस्त, सहकर्मी, नाते-रिश्तेदार, मिले वे भी इस खूबसूरत पेय का शौक नहीं अपना सके। इतने सब के बावजूद मैं इसका अंदाजा लगा ही सकता हूं कि शराब के बिना क्या गत होती होगी किसी शौकीन की, शायद “जल बिन मीन” की सी।

जैसा कह चुका हूं मैंने शराब का आस्वादन किया है। शराब का ही नहीं और व्यसनों का भी अनुभव लिया है। बीड़ी-सिगरेट पी रखी है; पान गुटके का सेवन भी कर रखा है, बहुत कुछ जिज्ञासावश, कुछ तो बचपन में ही। कब कौन-सा व्यसन दिमाग में आया और फिर ग़ायब हुआ इसे बताने से पहले यह बता दूं कि सब कुछ अनुभव करने के बाद वयस्क होते-होते इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि नशे की किसी चीज का कोई गंभीर मकसद नहीं, कोई आकर्षण नहीं, फिजूलखर्ची से आगे सब निरुपयोगी ही हैं, सभी मनुष्य की कमजोरी को प्रबिंबित करते हैं, आदि-आदि। जब कभी कोई कहता है कि फलां आदत छूट नहीं रही है तो मेरी टिप्पणी यही होती है कि जब आप छोड़ना ही न चाहें तो छूटेगी कैसे। कोई दूसरा तो आदत के लिए मजबूर कर नहीं रहा होगा। नशा आप शुरू करें तो आप ही को छोड़ना होगा। इत्यादि।

जैसा कह चुका हूं बीड़ी-सिगरेट, गुटखा, शराब-बियर का आस्वादन मैंने भी किया है, लेकिन जिंदगी के अलग-अलग वर्षों में और अल्प अंतरालों के लिए। लेकिन इन नशों का गुलाम बनने से बचता रहा। मौजूदा कोरोना-काल की उपर्युल्लिखित घटना को लेकर मन हुआ कि अपना अनुभव साझा करूं।

आरंभ इस खुलासे से करता हूं कि मेरा जन्म उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल कुमाऊं के एक छोटे-से गांव में हुआ था, आठ-नौ परिवारों का गांव। सभी एक ही पूर्वजों की संतानें थे और आपस में ताऊ-ताई, चाचा-बुआ, भाई-भतीजे जैसे घनिष्ठ रिश्तों से जुड़े थे। गांव में लगभग १०-१२ बच्चे रहे होंगे और उनमें से हम-उम्रों की आपस में दोस्ती सहज तौर पर हुई रहती थी। मैं सन् १९५५ के आसपास की बात कर रहा हूं जब मैं प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था।

बीड़ी का चस्का

मेरा एक दोस्त था। हमें एक बार विचार आया कि क्यों न बीड़ी पी जाए। बड़े लोगों को पीते देखते थे तो अपने को भी इच्छा हो जाती थी। लेकिन बीड़ी मिले कहां से। सो बड़ों को ताके रहते थे और उनके बुझाए हुए बीड़ी के टुकड़े उठा लाते थे और उन्हें सुलगा के पीते थे। पीते क्या थे मुंह में धुआं भरकर हवा में महज फूंक मारते थे। इतना ही हमारे लिए काफी था। यह सब चोरीछिपे होता था। फिर भी पता नहीं कैसे एक दिन मेरी बड़ी बहिनजी तक बीड़ी की गंध पहुंच गयी और वह हमारे सामने अवतरित हो गईं। मेरा मुंह खुलवाकर सूंघा और लगाई डांट। भागे हम वहां से।

इतने से कोई असर हम पर पड़ने वाला नहीं था। हमने किसी प्रकार दोएक रुपये का इंतिजाम किया और ले आये दुकान से ताजा “घोड़ा छाप” बीड़ी का बंडल और “विम्को की एक्का छाप” दियासलाई की डिब्बी। इन्हें हमने अपने घर के निकट सीड़ीनुमा एक खेत की दीवाल के कोटर में छिपा दिया था। (पर्वतीय क्षेत्र में आम तौर पर सीड़ीनुमा खेत ही मिलते हैं।) रोज शाम को हम बीड़ी का आनंद लेने चुपचाप आते थे। लेकिन एक दिन मेरे दोस्त की माताजी को पता चल गया। वे कहीं आसपास काम कर रही थीं और कमवक्त बीड़ी की गंध उन तक पहुंच गयी। वे पहुंची पास और ऐसी डांट लगाई हमें कि बीड़ी-सिगरेट का भूत सर से उतर गया।

समय बीतता गया और मैं प्राथमिक (प्राइमरी) शिक्षा पार कर माध्यमिक (जूनियर) शिक्षा के लिए गांव से बाहर चला गया। उसके बाद मेरी विश्वविद्यालय तक की शिक्षा बाहर ही हुई। समय के उस अंतराल में मुझे किसी प्रकार के व्यसन का न तो ध्यान आया और न ही कोई मौका मिला।

सिगरेट का मजा

स्नातकोत्तर (एम.एससी.) उपाधि पा लेने के बाद मैंने अपने एक सहपाठी एवं मित्र के साथ शोध-पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। इसी दौरान हमें दो चीजों का शौक चर्रायाः पहला था दाढ़ी रखना और दूसरा था सिगरेट पीना। दाढ़ी तो तब से बरकरार है; लेकिन सिगरेट साल भर से कम ही चल पाई। मैं दिन भर में ५-१० सिगरेट से अधिक नहीं पीता था। एक बार मैं एक-डेढ़ माह के लिए बेंगलूरु गया था। तभी एक दिन रात में मुझे बेचैन करने वाला सपना दिखा सिगरेट से जुड़ा हुआ। बस उसके बाद मैंने सिगरेट छोड़ दी। मैंने इस घटना पर आधारित लघुकथा अन्य ब्लॉग में लिखी थी।

ब्रैंडी-अंडे का पेय

शोध पाठ्यक्रम से अर्जित डाक्टरेट की उपाधि पाकर मैं वाराणसी आ गया और वहीं बी.एच.यू. में बतौर शिक्षक मैंने नियुक्ति ले ली। वह मेरी युवावस्था का काल था। मेरी उम्र पच्चीस-छब्बीस वर्ष की रही होगी। मै शरीर से सदा ही दुबला-पतला रहा हूं। एक बार मेरे मन में थोड़ा-बहुत मोटा होने का विचार आया। एक वरिष्ठ साथी ने सलाह दी कि मैं अंडे की जर्दी-अलब्युमिन का ब्रैंडी (brandy) के साथ मिलाकर सेवन करूं। क्या स्वाद रहा होगा इसका अनुमान लगा सकते हैं। करीब महीना भर सेवन किया होगा। शरीर या मस्तिष्क कहीं पर भी उसका असर नहीं पड़ा। छोड़ दिया। किसी अल्कोहॉलीय पेय का यह प्रथम अनुभव था मेरा।

वाराणसी में पान का चलन बहुत अधिक है। मैंने भी इसका आनंद उठाने की कोशिश की। लेकिन पान-सुपाड़ी मुझे रास नहीं आई। जब भी खाऊं गला सूख-सा जाता था, थूक निगलने में परेशानी होने लगती, कान की लौ गरम हो उठतीं। मैंने पान खाना ही बंद कर दिया पूरी तरह। बनारस में रहने के बावजूद पान से दूर ही रहा।

अल्कोहॉलीय पेय

अल्कोहॉलीय पेय का दूसरा अनुभव मेरा शेरी (sherry) आस्वादन का है। एक बार मैं शिलांग (मेघालय) किसी गोष्ठी में भाग लेने गया था। वहां स्थानीय स्तर पर निर्मित शेरी के मुझे दर्शन हुए। एक बोतल खरीद ले आया। वाराणसी लौटकर उसका भी सेवन किया दो-चार दिन थोड़ा-थोड़ा करके।

इसके बाद का अनुभव मेरा इंग्लैंड का है जहां मैं दो वर्ष के लिए शोधवृत्ति पर गया था (१९८३-१९८५)। शुरुआत के कुछएक माह मैंने पाकिस्तानी मूल के किसी पंजाबी खान साहब के मकान में किराये पर रहकर बिताए। वे खुद सड़क के पार अपने दूसरे मकान में रहते थे। वे यदाकदा गपशप मारने मेरे पास चले आते थे। उस इलाके में हिंदी-उर्दू बोलने वाला उनको शायद अकेला मैं ही मिला था। वे कभी-कभी “पब” (मयखाना) में बियर पीने की पेशकश करते थे और अपनी वैन से ले चलते थे। मैं एकदम-से मना नहीं करता था और उनकी पेश की हुई एक बियर-गिलास पी लेता था। वे स्वयं दो-तीन गिलास पी जाते थे। सच कहूं तो मुझे कोई मजा नहीं आता था। लेकिन उनका साथ दे देता था। मुझसे एक प्रकार की दोस्ती हो गई थी उनकी।

यह था बियर पीने का मेरा अनुभव। छः-सात माह महीने बाद जब मेरा परिवार भारत से पहुंचा तो मुझे बड़ा आवास किराये पर लेना पड़ा। तब खान साहब का साथ छूट गया और उसी के साथ बियर पीने के मौके भी छूटे।

यूरोपीय समाज तथा वाइन

यूरोपीय देशों में भोजन के समय वाइन (अंगूर से बनी मदिरा) का सेवन आम बात है। मैंने सुना था कि पहले कभी इंग्लैंड जैसे देशों में पानी पीने का चलन नहीं था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जब विश्वविद्यालय के मेरे शैक्षिक विभाग में भोज का कार्यक्रम होता था जैसे क्रिसमस के मौके पर तो उसमें शराब (वाइन),  कृत्रिम-पेय (सॉफ्ट-ड्रिंक), फलों का रस (फ्रूट-जूस), तथा सादा पानी, सभी उपलब्ध रहते थे। मैं वाइन न लेकर फल-रस पीता था। मुझे याद नहीं कि इंग्लैंड में अपने शेष प्रवास के दौरान मैंने वाइन कभी पी थी या नहीं। भारत लौटने पर शराब जैसी हर चीज से मैंने तौबा कर ली। बस अब चाय-काफी की आदत रह गई।

मैंने लंबे अरसे तक कोई व्यसन नहीं पाला सिवाय सिगरेट के और वह भी साल भर से कम। मैंने किसी में भी वह आकर्षण नहीं पाया जो मुझे उससे जोड़े रखता। जब कोई कहता है कि वह अपनी लत नहीं छोड़ सकता तो मेरा कहना होता कि वह कमजोर आत्मसंयम का व्यक्ति है और सार्थक संकल्प नहीं ले सकता है। – योगेंद्र जोशी

कोरोना महाप्रकोप का सकारात्मक प्रभाव

जिंदगी बस यही है

इस समय पूरा विश्व कोरोना-जनित महामारी की चपेट में है। कोरोना नामक विषाणु चीन के वुहान शहर से निकलकर सर्वत्र फैल चुका है। खुद चीन में यह कहां से आया यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। कहा जाता है कि वुहान में चमगादड़ों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों का मांस बिकता है और विषाणु वहां के चमगादड़-मांस से लोगों के बीच फैला। कुछ लोगों का कहना है कि वुहान की एक विषाणु प्रयोगशाला में ही कोरोना का जन्म हुआ और किसी चूक से यह बाहर नगरवासियों में फैल गया। एक मत यह भी है कि आर्थिक तौर पर दुनिया को पंगु करने के लिए चीन ने इसे ईजाद किया और दुनिया में फैलने दिया। ऐसे अनेक मत व्यक्त किए जा सकते हैं। वास्तविकता क्या है यह अभी कोई नहीं जानता। बस इतना सच है कि इस विषाणु ने दुनिया की बहुत बड़ी आबादी को रोगग्रस्त कर दिया है और लाखों को…

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कोरोना वाइरस (विषाणु) – मेरे कार्यक्रम निरस्त, दैनिक चर्या बदल गई

कोरोना संक्रमण

पूरी दुनिया इस समय ऐसी विपदा झेल रही है जिसकी दूर-दूर तक किसी को आशंका नहीं थी। चीन से चले कोरोना (COVID-19) नामक विषाणु ने अनेक विश्व-नागरिकों को तेजी से रोगग्रस्त कर दिया है और उनमें से कई काल के गाल में भी समा गए हैं। यह विषाणु कहां से आया, कैसे पैदा हुआ, जैसे प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित हैं। विश्वसमुदाय में कई जन मिल जाएंगे जो इसे चीनियों के उस खानपान से जोड़कर देखते हैं जिसमें कुछ भी अखाद्य नहीं होता यदि वह विषैला न हो तो। कहते हैं कि वहां कुत्ते-बिल्ली, मेढक-सांप, चूहे-चमगादड़, आदि सभी का मांस भक्षणीय माना जाता है। कदाचित इस विषाणु का स्रोत चमगादड़ है। कदाचित!

लेकिन लोग इस संभावना से आगे चलकर भी देखते हैं। कइयों को शंका है कि यह चीन की किसी चूक का दुष्परिणाम है; अथवा चीन ने यह विषाणु जैविक हथियार के तौर पर ईजाद किया है और जानबूझ कर अनेक देशों के लोगों को संक्रमित कर दिया है। अपनी बात सिद्ध करने को किसी के पास पुख्ता प्रमाण नहीं हैं; बस चीन पर अविश्वास ही उनकी सोच का आधार है।

इसमें दो राय नहीं कि इस विषाणु का फैलाव बड़ी तेजी से हुआ और हो रहा है। यह माना जा रहा है कि यह रोगियों के छींकने पर, सांस की प्रक्रिया में और बोलते वक्त नाक-मुंह से निकले अत्यंत सूक्ष्म जलबिंदुओं (ड्रॉपलेट) में स्थित विषाणुओं से एकदूसरे में फैलता है।

अभी उपचार का कोई कारगर तरीका खोजा नहीं जा सका है। दुनिया के सभी कोनों में भांति-भांति के तरीके अपनाए जा रहे हैं, शायद कोई कारगर सिद्ध हो जाए। प्रभावी दवा के अभाव में एकदूसरे के संपर्क से बचना ही वांछित तरीका है। इसके लिए कई देशों ने “लॉकडाउन” का रास्ता अपना लिया है जिसके तहत लोगों को घरों में सीमित रहने की सलाह दी गई है और कई उद्यमों और कार्यालयों को फिलवक्त अस्थाई बंदी झेलनी पड़ रही है। अपने देश में भी प्रधानमंत्री ने २४ तारीख की अर्धरात्रि से त्रिसाप्ताहिक लॉकडाउन घोषित किया है।

आर्थिक हानि

दैनिक मजदूर इस बंदी के कारण अपने मूल स्थान गांवघरों को लौटने को मजबूर हो चुके हैं। वे लोग बेहद परेशानी झेल रहे हैं। लोगों को सभंलने के लिए २४ घंटे का समय तो मोदीजी को देना ही चाहिए था। निर्णय के कार्यान्वयन में उतावलापन न दिखाते तो रोग के प्रसार में खास फर्क न पड़ता। मैं घर से दूर कुछ करने में असमर्थ हूं। घर पर भी होता तो वृद्धावस्था आड़े आती। चंदे के रूप थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद की जा सकती वह मैं कर रहा हूं।

पूरे विश्व के भयावह आर्थिक हानि और मंदी के दौर से गुजरने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं। आने वाले समय में उक्त विषाणु मानव समाज को किस हालात में छोड़ेगा यह पूर्णतः अनिश्चित है।

मैं स्वयं कैसे इस मौजूदा हालात से तालमेल बिठा रहा हूं इसे बताने का मन हुआ सो लिख रहा हूं।

लॉकडाउन – आवागमन बंद

हम, (पत्नी तथा मैं) इस समय महानगर बेंगलूरु में हैं, अपने बेटे-बहू-पोते के पास अपने स्थाई निवास वाले शहर वाराणसी से करीब २००० किलोमीटर दूर। आये तो थे केवल महीने भर के लिए और बीते माह (मार्च) की २२ तारीख हवाई टिकट से लौटना था। लेकिन अब यहीं फंसकर रह गये हैं। असल में उस दिन (२२ ता.) के लिए अपने प्रधान मंत्री मोदीजी ने एक-दिवसीय “जनता कर्फ्यू” की घोषणा कर दी। वाराणसी के मेरे मित्रों की सलाह थी कि वहां हवाई अड्डे से घर आने के लिए टैक्सी वगैरह की उपलब्धता की समस्या हो सकती है, अतः उस दिन की यात्रा टाल देना ही उचित होगा। हवाई सेवा वाली कंपनी भी बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा निरस्त करने के या यात्रा की तिथि आगे बढ़ाने की सुविधा दे ही रही थी।

हमने भी सोचा कि अगले २३, २४, या २५ ता. निकलना बेहतर होगा। दरअसल हम वाराणसी यथाशीघ्र पहुंचना चाहते थे ताकि २५ ता. से आरंभ हो रहे नवरात्र पर्व पर वहां रहें और नौ-दिवसीय फलाहारी उपवास पर रह सकें जिसकी समुचित व्यवस्था यहां पर नहीं हो पा रही थी। वाराणसी के स्थायी बाशिंदा होने के कारण हमारे लिए वहां वांछित व्यवस्था करना आसान था। उपवास तो अभी भी चल रहा है किंतु रात्रि भोजन में अन्नाहार अपना लिया है। संयोग से २४ ता. की अर्धरात्रि से लॉकडाउन हो गया और यात्रा की संभावना फिलवक्त समाप्त हो गई।

हम बेंगलूरु के जिस बहु-आवासीय परिसर में रह रहे हैं वह काफी बड़ा है। २३ बहुमंजीले इमारतों में अनुमानतः २००० फ्लैट होंगे और निवासियों की संख्या ६००० से अधिक ही होगी।  परिसर के चारों ओर टहलने में करीब आधा घंटा लग जाता है। आजकल बमुश्किल चार-छः लोग टहलते दिखते हैं जब मैं बाहर निकलता हूं। अधिकांश लोग अपने-अपने घरों में दुबके रह रहे हैं।

अभी लॉकडाउन की शुरुआत है, इसलिए लोग ऊब नहीं रहे होंगे। लेकिन सोशल मीडिया में कुछ लोगों की बेचैनी के वीडियो देखने को मिल रहे हैं। इन पर विश्वास नहीं होता, पर यदि ऐसा हो तो आश्चर्य भी नहीं होगा। कुछ लोगों को घर पर समय बिताना (या समय काटना!) वास्तव में कठिन होता है। इसका कारण है रोजमर्रा के कामधंधे से जुड़े कार्यों से मुक्त होने पर कुछ नया करने के उत्साह का अभाव। जब कामधंधे से भिन्न रुचियों का अभाव हो तो क्या करूं, क्या करूं की बेचैनी स्वाभाविक होती है।

दिनचर्या बदल-सी गई है

सौभाग्य से मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। मेरी रुचियों में पर्याप्त विविधता है। इसलिए मेरे लिए २४ घंटे का समय व्यतीत करना कठिन काम नहीं रहता। यहां घर से दूर भी मेरी सुनियोजित दिनचर्या है।

प्रातःकाल थोड़ा विलंब से उठना हो पाता है, छः-पौनेछः बजे। वाराणसी में होता तो पांचः-पौनेपांच बजे तक उठ जाता। उसके बाद शौच-स्नानादि का कार्य संपन्न करता हूं। पश्चात थोड़ा-बहुत्त प्राणायाम एवं यौगिक व्यायाम भी संपादित कर लेता हूं। इस बीच पत्नी महोदया भी स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर नित्यपूजा (संप्रति संक्षिप्त) में लग जाती हैं और मैं नहाने का कार्य पूरा करने स्नानागार चला जाता हूं। चूंकि रोजमर्रा के कपड़े अपने-अपने हाथ से धोने की हम दोनों की आदत है, अतः नहाने में थोड़ा अधिक समय लग जाता है। मेरे नहाने-धोने के दौरान परिवार का कोई एक सदस्य चाय तैयार कर लेता है।

यहां हिंदी समाचार-पत्र मुश्किल से मिलते हैं और आजकल तो वह भी संभव नहीं। कागज पर छपा समाचार-पत्र पढ़ना मुझे आसान एवं आरामदेह लगता है। मेरी आदत वर्षों से ‘दैनिक जागरण’ के वाराणसी संस्करण पढ़ने की बन चुकी है और उसकी ई-प्रतिलिपि (ई-पेपर) से मेरा काम चल जाता है। चाय की चुस्कियों के साथ तथा उसके कुछ समय बाद तक मेरा ई-पेपर पढ़ना जारी रहता है।

घड़ी की सुइयां अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं और इतना सब करते-करते साड़ेदस-ग्यारह बज जाते हैं। तब मैं बाहर निकलता हूं आधा-पौनघंटे के लिए  टहलने। मैं वाराणसी में होता तो यह कार्य प्रातः-काल ही कर चुकता, किंतु यहां यह दोपहर तक हो पाता है। टहलना मेरे नित्यकर्मों का एक अनिवार्य हिस्सा रहता है जिसकी सलाह मुझे अपने डाक्टर से मिली है। आजकल यहां आसमान साफ है लॉकडाउन की मेहरबानी से जिसने प्रदूषण स्तर बहुत घटा दिया है। इसलिए धूप एकदम चटक रहती है, परंतु उससे मुझे कोई परेशानी नहीं होती। दिन का शेष समय लैपटॉप पर लेखन-पठन, टेलीविज़्-समाचार सुनने, अथवा पोते के साथ खेलने आदि में गुजर जाता है। इनके अतिरिक्त घर के भीतर छिटपुट कामों में अन्य सदस्यों को सहयोग देने में भी बीतता है।

कुल मिलाकर लॉकडाउन के इस काल में २४ घंटे का समय व्यतीत करना मेरे लिए कोई समस्या नहीं रहती। मेरा कष्ट इस बात को लेकर है कि यदि में अपने स्थाई निवास वाराणसी में होता तो घर-बाहर के विविध कार्य निबटा रहा होता, जैसे अपने अहाते के छोटेबड़े पौधों या गमलों में लगे पौधों की काटछांट, करने, उन्हें खादपानी देने का काम कर लेता। या घर के भीतर भी घर-गृहस्थी से जुड़े काम निकल ही जाते हैं; उनका भी समाधान निकालता। या किसी पुस्तक अथवा पत्रिका का अध्ययन कर लेता। यहां पर वह सब न पा सकने की विवशता तो है ही। देखिए कब तक यह सब चलता है। – योगेंद्र जोशी

चाणक्य नीति – राजकर्मचारी राजा से कैसा व्यवहार करे (भाग २)

     दो लेखों की शृंखला का यह मेरा दूसरा लेख है। मैंने पिछले एवं शृंखला के पहले लेख में चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना है, के ग्रंथ “कौटिलीय अर्थशास्त्र” का जिक्र किया था जिसमें राजा के और उसके प्रशासनिक तंत्र की कार्य-प्रणाली की विस्तृत चर्चा की गयी है। शासन के विभिन्न पहलुओं जैसे आर्थिक तंत्र, न्यायिक व्यवस्था, लोक-कल्याण, प्रजा के अधिकार एवं दायित्व, आदि के विषय पर ग्रंथकार ने एक निष्ठावान राजनीतिज्ञ के तौर पर अपना मत व्यक्त किया है।

     इस ग्रंथ के विषयानुसार लिखित अधिकरणों में से एक में राजकर्मचारी के दायित्वों, राजा के प्रति शालीन व्यवहार, और राजा के रोष से बचने की सावधानी आदि की बातें बताई गई हैं (कौटिलीय अर्थशास्त्र, अधिकरण ५, अध्याय ४)। उक्त ग्रंथ के संबंधित ३ छंदों (श्लोकों) का उल्लेख मैं पिछले ब्लॉग-लेख (१९ अक्टूबर) में कर चुका हूं। शेष ४ चार श्लोक यहां पर प्रस्तुत…

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गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस – क्या है अहिंसा?

गांधी जयंती

आज गांधी जयंती है, दो अक्टूबर। गांधी-जन्म के १५० वर्ष पूरे हुए। मैं इस समय गेन्ज़विल (फ़्लोरिडा, अमेरिका) में हूं, कुछ हफ़्तों के प्रवास पर। भारत के राष्ट्रीय समय से यहां की घड़ी ९:३० घंटे विलंबित रहती हैं। यहां इस समय २ अक्टूबर का दिन है और तदनुसार अपने देश में रात्रि है।

जैसा कि परंपरा है गांधीजी के गुणगान करने और उनके विचारों की महत्ता का बखान करने का दिन रहता है यह। देश की खबरें जानने को इंटर्नेट के माध्यम से समाचार पत्रों पर नजर दौड़ाने पर मुझे गांधीजी के विचारों को प्रस्तुत करने, उन्हें प्रसारित करने वाली विज्ञप्तियां दिखती हैं। देश में राजनेताओं, सामाजिक संगठनों, एवं अन्य लोगों ने कैसे यह दिन गांधीजी को समर्पित किया होगा यह तो मुझे कल के समाचारपत्रों से ही पता चलेगा। हमें उनके सुझाए मार्ग पर चलना चाहिए आदि कहकर रस्मादयगी की परंपरा सदैव की भांति निभाई ही गई होगी। जैसा होता आया है विचार व्यक्त करने वाले और सुनने वाले दोनों ही फिर अपने रोजमर्रा की चर्या में लौट जाते हैं। जिसे जैसे जीना है वह इस दिवस के बाद भी अपनी-अपनी सुविधानुसार वैसे ही जीता है, कहीं कोई फर्क पड़ता है ऐसा मुझे नहीं लगता है।

गांधी जी का अहिंसावाद

जिस बात को लेकर गांधीजी की सर्वाधिक चर्चा होती रही है वह है उनका अहिंसावाद। उनके इसी अहिंसावाद को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस विशेष दिन (२ अक्टूबर) को “अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस” घोषित किया था। दुनिया के लिए गांधी का महत्व इसी अहिंसा के विचार तक सीमित है ऐसा मुझे लगता है। इसके आगे भी गांधी की प्रासंगिकता है यह पूरे विश्व के लिए शायद माने नहीं रखता है। किंतु भारत के लिए उनके अन्य विचार अधिक माने रखते हैं जिनकी सार्थकता पर विवाद नहीं हो सकता है। अहिंसा का विचार अच्छा तो है किंतु व्यावहारिक नहीं है ऐसा मैं सोचता हूं। क्यों? इसे स्पष्ट करना मेरे इस आलेख का विषय है। उस विषय पर आऊं इससे पहले उन कुछएक बातों की चर्चा करना समीचीन होगा जो गांधी जी के विचारों में शामिल रहे हैं।

क्या कहते थे गांधी जी?

(१)   वे कहते थे सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए जिसका एक पहलू छुआछूत की परंपरा के रूप में समाज में सदियों से रहा है और आज भी कुछ अंश तक बचा है।

(२)   मनुष्य को अपने निजी कार्य यथासंभव खुद ही करना चाहिए, जैसे अपने लत्ते-कपड़े धोना, शौचालय-स्नानगृह साफ रखना आदि। 

(३)   हमें अपने शारीरिक श्रम का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, जैसे छोटी-मोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का प्रयोग करना।

(४)   हमें अपने परिवेश को स्वच्छ रखना चाहिए। गांधीजी के इसी विचार से प्रेरित होकर देश में (मात्र आंशिक रूप से सफल) ’स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है।

(५)   गांधीजी सादे जीवन के पक्षधर थे। मितव्ययिता अमल में लाना और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बचना उनके विचारों में निहित रहे हैं।

(६)   गांधीजी इस बात के प्रबल पक्षधर थे कि समाज में आर्थिक विषमता एक सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। अर्थात् अतिसंपन्न लोग अपनी संपदा से विपन्न लोगों की सहायता करें। इस विचार में परोपकारिता की भावना निहित है।

(७)   गांधीजी देश को कृषिप्रधान मानते थे और गांवों के उत्थान के हिमायती रहे। छोटे-मोटे उद्योगों विशेषतः घरेलों उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते थे।

(८)   कहा जाता है कि गांधीजी अहिंसावादी के साथ सत्यवादी एवं निष्ठावादी भी थे। अर्थात् अपने जिम्मे के कार्य के प्रति दुराव-छिपाव से मुक्त समर्पण भाव लोगों में होना चाहिए।

(9)    गांधीजी भारतीय भाषाओं को अधिकाधिक प्रयोग में लेने एवं अंग्रेजी पर निर्भरता को कम से कम करने के प्रबल पक्षधर थे।

इस प्रकार की अन्य बातें भी उनके विचारों में रही होंगी। गांधीजी को लेकर मेरे ध्यान में जो आया उसका उल्लेख मैंने किया है।

उनके देहावसान को आज ७२ वर्ष बीतने को हैं। उनकी प्रशंसा तो प्रायः सभी करते रहते हैं किंतु सवाल उठता है कि उनके विचारों को अमल में लाने का प्रयास कितने लोग करते हैं? उदाहरण के तौर पर देशज भाषाओं को लीजिए। जिस अंग्रेजी से देश को मुक्तप्राय करने की बात वे करते हैं वह अब देश पर पूरी तरह हावी हो चुकी है। गांधीजी का गुणगान करना एक बात है, उनके विचार स्वीकारना नितांत अलग बात।

मैं गांधीजी के सतही एवं अगंभीर गुणगान का विरोधी हूं। व्यक्तिगत तौर पर मैं यह मानता हूं कि उनके विचार आदर्शों से प्रेरित थे, जिनको व्यावहारिक जीवन में उतारना इस विविधताओं से भरे वास्तविक संसार में संभव नहीं। अगर कुछ हो सकता है तो वह यह कि जब तक गंभीर परेशानी पैदा न हो इन बातों पर टिकने का प्रयास किया जा सकता है।

अस्तु, मैं गांधीजी के अहिंसावाद पर लौटता हूं।

क्या है अहिंसा

अहिंसा की परिभाषा क्या है? प्राचीन भारतीय चिंतक अहिंसा के प्रति व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनके अनुसार अहिंसा के निहितार्थ आधुनिक पाश्चात्य नॉन-वायलेंस (non-violence) से कहीं अधिक व्यापक रहे हैं। मेरी दृष्टि में इस विषय पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए:

[१]     भारतीय चिंतन में अहिंसा मनसा-वाचा-कर्मणा तीनों प्रकार का माना गया है। कर्मणा अहिंसा का अर्थ है शारीरिक या भौतिक रूप से किसी को कष्ट न पहुंचाना। विश्व के प्रायः सभी समाजों में अहिंसा की “नॉन-वायलेंस  के तुल्य” यही परिभाषा प्रचलन में है। वाचा एवं मनसा हिंसा की बात शायद ही कहीं कोई करता हो। वाचा का अर्थ है बोले गये शब्दों से किसी को दुःख पहुंचाना। इस हिंसा को हम देख-सुन सकते हैं। मनसा का अर्थ है किसी के अहित का विचार मन में लाना। दूसरा कोई इसे नहीं जान सकता है। प्राचीन चिंतक किसी के प्रति अहितकर या अनिष्ट विचारों को मन में लाना भी हिंसा मानते थे, यानी पूर्णतः कल्याणकारी विचारों को ही मन में स्थान देना व्यक्ति का कर्तव्य है।

[२]     प्राचीन मान्यता में अहिंसा की अवधारणा बहुत व्यापक है और मानव समाज से आगे अन्य प्राणियों तक फैली है। जैन मुनियों के लिए यह बात बहुत माने रखती है। बौद्धमतावलंबी और वैष्ण्वों के लिए भी अहिंसा की ऐसी अवधारणा महत्व रखती है। “अहिंसा” परमो धर्म:” कथन का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में यत्रतत्र मिलता है। इस बारे में मैने दो आलेख अपने ब्लॉग में लिखे हैं। (देखें आलेख दिनांक 2017-07-07 एवं दिनांक 2017-07-28)

जिस महाभारत में अहिंसा की वकालत की गई है उसी में तमाम कथाएं भी हैं जिनमें हिंसा का बोलबाला है और स्वयं महाभारत की घटना हिंसक युद्ध का लेखाजोखा है। ऐसा विरोधाभास क्यों है? प्रचीन संस्कृत ग्रंथों में हिंसा की व्यापकता की कथाएं बहुतायत से मिलती हैं। इस विरोधाभास की व्याख्या वस्तुतः कठिन नहीं है।

दरअसल भारतीय धार्मिक मतों के दो स्पष्ट पहलू रहे हैं:

(१)     एक है आध्यात्मिक जिसके अनुसार मनुष्य को जीवन-मरण से मुक्त होने का प्रयास उसका कर्तव्य है और उसके लिए व्यक्ति को ऐहिक सुखों-हितों का मोह त्यागकर खुद को सत्य, अहिंसा, प्रेम, आदि के सन्मार्ग पर ले जाना होता है जिससे वह अंततः निर्वाण (बौद्धमत), मुक्त जीवात्मा (जैन मत) अथवा मोक्ष (वैदिक मत) की परम अवस्था को पा सके। अहिंसा उसी संदर्भ में सार्थक है।

(२)     दूसरा है ऐहिक सामाजिक जीवन से संबंधित जो आदर्शों की दिशा में बढ़ तो सकता है किंतु आदर्शों पर चल नहीं सकता। यह वह क्षेत्र है जिसमें अहिंसा की प्रवृत्ति सभी मनुष्यों में नहीं होती है। असल में सत्य-असत्य, प्रेम-द्वेष, हिंसा-अहिंसा, परोपकार-अपकार आदि परस्पर विपरीत प्रवृत्तियां इस संसार में एक साथ अस्तित्व में रहते हैं।

अहिंसा की व्यावहारिकता

मेरा प्रश्न है क्या गांधीजी ने उपर्युक्त तथ्यों पर मनन करने के बाद अहिंसा की बात की थी? मेरे मत में वे इस तथ्य की अनदेखी करते थे कि उनके अहिंसा के सिद्धांत को सभी आत्मसात नहीं कर सकते हैं। अवश्य ही अहिंसा समाज के लिए वांछित है, किंतु हिंसा से समाज मुक्त नहीं हो सकता। हिंसा केवल आत्मरक्षा के लिए ही नहीं बल्कि समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए, आपराधिक प्रवृत्ति के जनों को नियंत्रित रखने के लिए, भी आवश्यक है। इस बात को गांधीजी समझते थे क्या?

मनुस्मृति में अधोलिखित उक्तियां पढ़ने को मिलती हैं:

“सर्वो दण्डजितो लोको …”,

“उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति …”

“दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते …”

(मनुस्मृति, अध्याय ७, श्लोक २२, २७, २८, क्रमशः)

इन कथनों में यह संदेश दिया गया है कि यह जगत् (मानव समाज) दंड द्वारा ही नियंत्रण में रह पाता है। क्या दंडित करने की व्यवस्था हिंसात्मक नहीं है? अवश्य ही शासन दंडित करने का कार्य अपने हाथ में रखता है न कि उसका अधिकार किसी अन्य देता है। किंतु किसी को जैसे भी दंडित किया जाए उसे कहा तो हिंसा ही जाएगा !

यह भी कहा जाता है कि गांधीजी एक प्रकार से जिद्दी थे। वे दूसरों की कम सुनते थे बल्कि “मेरी बात सही है” यह धारणा उनसे मनवाते थे। उनके अहिंसावाद पर लोग जब तक टिप्पण्णी करते वे महात्मा मान लिए गए थे। तब उनका खुलकर विरोध करने का साहस कम ही लोग जुटा पाए। और जो असहमति व्यक्त करते थे उनकी कोई सुनता नहीं था।

एक धारणा यह भी लोगों के मन में बैठ गई थी कि देश की आज़ादी गांधीजी के अहिंसक आंदोलन का फल था। मैं इस धारणा को स्वीकार नहीं करता। मेरे मत में उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ऐसे हालात बन चुके थे कि ब्रितानी हुकूमत को अपना वैश्विक साम्राज्य संभालना मुश्किल हो गया था। उसके अधीनस्थ लगभग सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते चले गये।

इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि गांधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने अहिंसा की बातें की हों। महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर महावीर एवं यीशु मसीह सुविख्यात हैं जिन्होंने अहिंसा का उपदेश दिया। किंतु उनके स्वयं के अनुयायी तक सदैव अहिंसक नहीं रह सके। स्पष्ट है कि अहिंसा वांछित है लेकिन सुलभ नहीं है। हिंसा समाज में सदा से रही है और आगे भी रहेगी।

भारतीय समाज व्यक्ति-पूजक है। यदि कोई असामान्य तौर पर प्रतिष्ठित हो जाए तो जन समुदाय उसमें दोष देखना बंद कर देता है। गांधीजी उसी स्तर पर पहुंचा दिए गये थे। – योगेन्द्र जोशी

साफ-सफाई की ध्वस्त नागरिक व्यवस्था

जिंदगी बस यही है

दैनिक जागरण समाचार-पत्र के २१ अगस्त के अंक में वाराणसी की ध्वस्त सफाई व्यवस्था की कुछ तस्वीरें छपी हैं जिनमें से एक यहां प्रस्तुत है। तस्वीरों के पृष्ठ का लिंक पेश कर रहा हूं:

https://epaper.jagran.com/epaper/21-aug-2019-45-varanasi-city-edition-varanasi-city-page-10.html#

      इन तस्वीरों को देख मेरा मन हुआ कि कचरा निबटारे की अपनी निजी व्यवस्था का और साथ ही घर-घर कूड़ा-उठान से जुड़े अनुभव का जिक्र कर डालूं।

वाराणसी में कूड़े-कचरे के निपटारे की कोई कारगर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। लोग सड़क के किनारे रखे गए बड़े-बड़े कूड़ेदानों अथवा खुले में कूड़ा-कचरा डाल देते थे। नगर-निगम की गाड़ी बीच-बीच में आकर उसे उठा लेती थी। 8-10 वर्ष पूर्व घरों से कूड़ा-उठान की नयी योजना आरंभ की गई थी। मेरे मुहल्ले में इस कार्य का जिम्मा “ए-टु-ज़ेड” नाम की संस्था को मिली थी। संस्था को हर घर से 50 रुपये बतौर शुल्क के इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी गयी थी। इस योजना…

View original post 657 और  शब्द

स्वाधीनता दिवस – अगस्त १५, २०१९

सर्वप्रथम देशवासियों को हर्षोल्लास के इस दिन की हार्दिक बधाई तथा शुभाकांक्षाएं।

अगस्त १५, २०१९, आज इस राष्ट्र का ७३वां स्वाधीनता दिवस रहा। (इस समय रात्रिकाल है।) १९४७ के इसी दिन यह देश ब्रितानी हुकूमत से मुक्त हुआ, और उसी के साथ एक राष्ट्र के रूप में इसकी स्थापना की नींव पड़ी। शुरुआती कुछ समय तक उपद्रव एवं अव्यवस्था बनी रही जो कि उस समय की विकट स्थिति में स्वाभाविक था। वस्तुतः देश विभाजित हो गया था और एक नये राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान (कहने को स्वतंत्रता दिवस १४ अगस्त) का भी जन्म हुआ जिसके साथ आरंभ से ही तनाव, असहयोग, एवं विद्वेष के संबंध ब्रितानी शासक विरासत में दे गये। संबंध इतने कटु रहे कि उसके साथ युद्ध भी झेलने पड़े तब और उसके बाद भी। उसके शत्रुतापूर्ण रवैये के कारण धरती का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर की समस्या का फल आज तक इस राष्ट्र को भोगना पड़ रहा है। स्वयं पाकिस्तान को अपने रवैये की कीमत १९७१ में अपने विभाजन के तौर पर चुकानी पड़ी, जब बांग्लादेश का जन्म हुआ। अस्तु।

शुरुवाती कष्टों के बावजूद देशवासी सुखद भविष्य के प्रति आशान्वित रहे। उस काल के राजनेता एक ध्येय के साथ राजनीति में उतरे थे, वह यह कि देश को विदेशियों से मुक्त कर देशवासियों के हाथ में सोंपना है जिसे वे अपनी आकांक्षाओं, उद्येश्यों के अनुसार चला सकें और देश का समग्र विकास कर सकें। उस समय के राजनेताओं अनेक प्रकार के कष्ट सहे, हर प्रकार के त्याग किए, अपने ध्येय के लिए जान तक उन्होंने दी। अवश्य ही उनमें कुछेक को भविष्य में अपने हित साधने की संभावना दिखी होगी, लेकिन वह अपवाद स्वरूप ही रहा होगा ऐसा मेरा सोचना है। आज़ादी के बाद उन नेताओं ने जनप्रतिनिधि बनकर लोकतंत्र के स्थापना की और शासन चलाने की कोशिशें की। वे शासन चलाने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे, सबको सबकुछ सीखना था शासन चलाने का अनुभव लेना था। शुरुआती सफलताओं-विफलताओं के साथ देश की शासकीय चल निकली। लेकिन समय के साथ क्य हुआ? यह एक गंभीर प्रश्न है जिसकी ओर में संकेत करना चाहता हूं।

मैं अपने विचार यहां रखने के पूर्व आगे उल्लिखित बातों की ओर पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूं। इनका इस आलेख से क्या संबंध यह बाद की पंक्तियों मेंस्पष्ट होगा।

Pseudo-Democratic: describes a political system which calls itself democratic, but offers no real choice for the citizens. This lack of choice can come from limited amount of diverse parties eligible for a vote, cemented power structures which are not really affected by any vote, no availability of a voting option “none of the above” for voters who favour change to the current political landscape, no direct democratic means, et cetera … [आभासी अथवा छद्म-लोकतंत्र – उस राजनैतिक तंत्र को व्यक्त करता है जो स्वयं को लोकतांत्रिक कहता है, किंतु नागरिकों को वास्तविक विकल्प प्रदान नहीं करता। विकल्पों का यह अभाव मतदान हेतु विविधतापूर्ण योग्य दलों की सीमित उपलब्धता, नियंत्रण की सुदृढ़ (गैर-लचीली) संरचनाएं जो मतों से वस्तुतः प्रभावित नहीं होतीं, उन मतदाताओं के लिए “इनमें से कोई नहीं” के मत-विकल्प की अनुपलब्धता जो मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य बदलने के पक्षधर हों, लोकतांत्रिक साधनों के प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) अभाव, इत्यादि …]

(Source: http://www.online-nations.net/definitions/def-pseudodemocracy.html)

In the preface to a collection of his speeches, Vajpayee once wondered whether democracy had truly taken root in India. “How can democratic institutions work properly,” he asked, “when politics is becoming increasingly criminalized?” [अपने व्याख्यानों के संकलन के प्राक्कथन में बाजपेयीजी (पूर्व प्रधानमंत्री) ने संदेह व्यक्त किया था कि क्या इंडिया (भारत?) में लोकतंत्र अपनी जड़ें वास्तव में जमा पाया है। “लोकतांत्रिक संस्थाएं समुचित तरीके से कैसे कार्य कर सकतीं हैं”, उनका प्रश्न था, “जब राजनीति का उत्तरोत्तर अपराधीकरण हो रहा है?”]

(Source: http://www.project-syndicate.org/commentary/india-s-pseudo-democracy)

मेरी उम्र लगभग वही है जितने वर्ष देश की स्वाधीनता को हुए हैं, केवल कुछ महीनों का आगा-पीछा रहा है। एक वयस्क के नाते पहला चुनाव सन्‍ १९६७ का था जिसे मैंने देखा। उसके बाद के प्रायः सभी चुनाव देखने को मिले, कुछएक में मतदाता के तौर पर मतदान भी किया तो किसी में केवल एक दर्शक रहा। देश में घोषित आपतकाल का भी मुझे अनुभव है। सन्‍ १९७७ के चुनाओं की भी याद है जिसमें देश के कई दलों ने आपसी मतभेद भुलाकर इंदिराजी को हराने के लिए “जनता पार्टी” का गठन किया। कांग्रेस (इंदिराजी) को बुरी हार का सामना करना पड़ा। लेकिन अपने अंतरविरोधों के कारण जनता पार्टी दो-तीन साल में ही बिखर गई। बाद के चुनाव में जीत हासिल कर इंदिराजी फिर सत्ता पर काबिज हुईं। यही समय था जब कांग्रेस के शीर्ष (अध्यक्ष) पद नेहरू-गांधी परिवार का एकाधिकार हो गया।

भारतीय राजनीति  समय के बाद किस प्रकार से बदलती गई और कैसे उसकी गुणवत्ता में उत्तरोत्तर सुधार की जगह गिरावट आती गई इसे मैं हर चुनाव के बाद अनुभव करता गया। समय के साथ क्षेत्रीयता, जातीयता, एवं धार्मिकता पर आधारित दलों का उदय हुआ है। उत्तर-प्रदेश/बिहार में कोई राजभरों की तो कोई कुशवाहा समुदाय की पार्टी बना के बैठा है। मैं नहीं मान सकता कि मुश्किल से १-२ विधायकों या सांसदों वाले ये दल देश का कोई हित साध सकते हैं। छोटे-छोटे दल बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास जरूर कर सकते हैं। उ.प्र. में मायावती की राजनीति दलितों के नाम पर आरंभ हुई थी। चुनाव जीतने के लिए उ.प्र. में मुलायम सिंह ने और बिहार में लालू प्रसाद ने यादव-मुस्लिम (MY formula) का आविष्कार किया। सत्ता पाने के लिए इस प्रकार के प्रयोग देश भर में होते रहे है। ऐसी बातें मेरी नजर में किसी स्वस्थ एवं उद्येश्यपरक लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माने जा सकते।

अब जरा उपर्युल्लिखित बाजपेयी जी के कथन पर गौर करें: “”How can democratic institutions work properly, when politics is becoming increasingly criminalized?” प्रश्न है क्या राजनीति का अपराधीकरण सचमुच में हो चुका है या हो रहा है?

हां, राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है इस बात को आम जनता ही नहीं राजनेता भी मानते हैं। किंतु नेतागण राजनीति में अपराधियों के बचाव में ये कुतर्क – जी हां, कुतर्क – भी देते हैं कि जब तक अदालतें किसी को अपराधी न घोषित करें उन्हें अपरधी नहीं माना सकता। मैं भी इस बात स्वीकारता हूं। इसका भरपूर लाभ अपराधिक छवि वाले उठाते आ रहे हैं। अदालतों की बात करें तो मामले वर्षॊं तक अनिर्णीत रहते हैं और इन लोगों की जगह राजनीति में बनी रहती है।

नेताओं के बात को मैं कुतर्क क्यों कहता हूं यह स्पष्ट कर दूं। ठीक है कि जब तक अदालतें किसी के विरुद्ध निर्णय नहीं सुनाती हैं उन्हें अपराधी नहीं मान सकते। परन्तु इसी के साथ यह भी सच नहीं है क्या जब तक अदालतें किसी को निरपराध नहीं घोषित करतीं उन्हें निरपराध भी नहीं माना जा सकता? ऐसे व्यक्ति को सजा तो नहीं दे सकते हैं, लेकिन यह भी स्वीकारा जाना चाहिए कि उन्हें निरपराध मानकर पुरस्कृत भी नहीं कर सकते! इसलिए राजनीति में शुचिता की बात करने वालों को ऐसे व्यक्तियों को अपने दल में स्थान नहीं देना चाहिए, खास तौर पर जब दर्ज अपराधों की संख्या दर्जनों में हो। लेकिन क्या दल ऐसा कर रहे हैं? । दुर्भाग्य से ये बद्नाम छवि वाले चुनाव में जिताऊ होते हैं इसलिए सभी दल उनको पाल-पोष रहे हैं।

मेरा भारतीय लोकतंत्र से वर्षों पहले मोहभंग हो गया था जिसके बाद मैं हर चुनाव में मतदान करता रहा परंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में वोट डालना बंद कर दिया। मोहभंग के अनेक कारण मेरे पास हैं, किंतु इस समय उनका खुलासा नहीं कर पा रहा हूं। कुछ समय से मैंने नोटा (NOTA) का विकल्प चुन लिया है।

स्वातंत्र्य दिवस को उमंग, उल्लास एवं आशा के साथ मनया जाना चाहिए। मुझे भी खुशी व्यक्त करनी चाहिए। परन्तु मैं ऐसा नहीं कर पा रहा हूं। एक सार्थक, उपयोगी, फलदायक लोकतंत्र की उम्मीद मुझे नहीं हो पा रही है। दिल के एक कोने में निराशा घर कर चुकी है। अस्तु, देशवासियों को पुनश्च शुभेच्छाएं।

इस समय मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपने लैपटॉप को विराम देता हूं। – योगेन्द्र जोशी