वंदे मातरम् बोलना क्या देशप्रेम या राष्ट्रभक्ति का प्रमाण है? नहीं!

“वंदे मातरम्”

पिछले कुछ समय से कुछएक स्वघोषित राष्ट्रभक्त “वंदे मातरम्” बोलने-बुलवाने पर जोर दे रहे हैं। जो यह वचन (नारा) नहीं बोलता उसे राष्ट्रभक्ति-विहीन या उससे आगे देशद्रोही तक वे कहने से नहीं हिचकिचाते। इस श्रेणी के कुछ जन मारपीट पर भी उतर जाते हैं। कोई-कोई तो अति उत्साह में यहां तक कह बैठता है कि जो यह वचन नहीं बोलता उसे पाकिस्तान चला जाना चाहिए, गोया कि पाकिस्तान ऐसे लोगों के स्वागत के लिए बैठा हो। वे भूल जाते हैं कि कोई भी देश अपने नागरिक को अन्य देश को जबरन नहीं भेज सकता भले ही बड़े से बड़ा अपराध कर बैठा हो। और सजा भी दी जानी हो तो उसका निर्णय अदालत ही कर सकती है।

मुझे इस कथन या नारे से कोई शिकायत नहीं। किंतु कोई मुझसे कहे कि बोलो “वंदे मातरम्”  तो मैं कदाचित नहीं बोलूंगा। मेरा मानना है कि ऐसे शब्द समुचित अवसर पर सप्रयोजन ही बोले जाने चाहिए। जहां कहीं भी जब कभी बिना मकसद के ऐसे शब्द के बोले या बुलवाये जा रहे हों उसे मेरे मत में मूर्खता समझा जाना चाहिए। ऐसा क्यों यह बात उसे नहीं समझा सकते जो तार्किक तरीके से सोचना ही नहीं चाहता है तथा दुराग्रह से ग्रस्त है।

“वंदे मातरम्” शब्द तो एक प्रशिक्षित तोते से भी बुलवाए जा सकते हैं। 3-4 साल का बच्चा भी इसे स्पष्ट उच्चारित करके बोल देगा। परंतु तोते या बच्चे का ऐसा बोलना किसी गंभीर भाव के साथ हो सकता है क्या? वे शब्द जानते हैं लेकिन उसमें निहित अर्थ नहीं। बच्चे को भी इस कथन के भावार्थ वर्षों बाद ही समझ में आने लगता है।

राष्ट्रभक्ति/देशप्रेम दर्शाता है क्या “वंदे मातरम्”?

यह उक्ति हमको संदेश देती है कि देश की यह भूमि हमें जीवन-धारण के साधन एवं सुविधा प्रदान करती है। इस अर्थ में यह हमारी पालनकर्ता कही जाएगी। जन्मदाता माता जन्म तो देती है किंतु जिन संसाधनों से हमें पालती है वह देश की इसी भूमि से पाती है। अतः देश की भूमि स्वयं एक मां की भूमिका निभाती है। जैसे हम मां का सम्मान करते हैं, उसे प्रणाम करते हैं, उसकी वंदना करते हैं, ठीक वैसी ही भावना हम इस भूमि के प्रति रखें यह संदेश उक्त कथन में निहित हैं। यदि इस वचन को कहते हुए किसी के मन में उक्त भावना न उपजे, मन में देशहित की भावना न जन्म ले, तो इसे कहना निरुद्देश्य हो जाएगा।

किसी व्यक्ति के मुंख से निकले शब्दों से वास्तविकता के धरातल पर कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। हां वे शब्द किसी की भावनाओं को उत्तेजित या उत्प्रेरित जरूर कर सकते हैं। असल महत्व तो व्यक्ति के कृतित्व का रहता है। कहने का मतलब यह है कि व्यक्ति का आचरण यदि आपत्तिजनक हो तो “वंदे मातरम्” कहना सार्थक रह जाएगा क्या? यदि कोई इस वचन को बोलने के लिए दूसरे को मजबूर करे और मारपीट-गालीगलौंज पर उतर जाए तो उसका कृत्य वचन के अनुरूप काहा जाएगा, उसका आचरण जनहित में माना जाएगा? उसका कृत्य वस्तुतः कानून के विरुद्ध दंडनीय नहीं समझा जाएगा क्या? दुर्भाग्य से “वंदे मातरम्” पर जोर डालने वालों का आचरण इसी प्रकार का आपत्तिजनक देखने को मिलता है।

मेरा मंतव्य स्पष्ट है। यदि उक्त वचन बोलने वाले के मन में देश के लिए सम्मान भाव न हो, उसके हित यानी देश के नागरिकों के हित की भावना न हो तो “वंदे मातरम्” एक खोखला, अर्थहीन, मूर्खतापूर्ण वक्तव्य भर रह जाता है। आप ही सोचिए कोई इसे बोलने में तो देर न करे, किंतु घूसखोरी करे, सौंपी गई जिम्मेदारी न निभाए, या लापरवाही वरते या जनविरोधी या देशहित के प्रतिकूल आचरण करे तो उसके “वंदे मतरम्” बोल देने का महत्व ही क्या रह जाता है? इसीलिए मैं इस नारे को जबरन मुंह में ठूंसने का घोर वितोधी हूं।

संसद में चिढ़ाने वाले नारे

मेरी गंभीर शंका यह है कि “वंदे मातरम्”, “भारत माता की जय”, “जयहिंद” जैसे नारे राष्ट्रभक्ति के द्योतक नहीं हो सकते। किसी देश के लिए वचनों से अधिक कर्म माने रखते हैं। यदि संबंधित व्यक्ति का आचरण जनहित या देशहित में न हो तो ये नारे खोखले, आडंबरपूर्ण और निन्द्य माने जाएंगे। विगत 17-18 जून को, जब नवनिर्वाचित सदस्यगण शपथ ग्रहण की प्रक्रिया से गुजर रहे थे तब हमारी संसद में ऐसे नारे लग रहे थे।

नारे लगाने वाले कौन थे? मेरे अनुमान से वे प्रमुखतया सरकार चला रही भाजपा के दूसरी-तीसरी श्रेणी के नेता थे, जो अति उत्साह में भारतमाता से संबंधित नारे ही नहीं उसके भी आगे बढ़कर अपनी धार्मिक आस्था के अनुरूप “जै श्रीराम”, “जै बजरंगबली” जैसे नारे लगाने से बाज नहीं आ रहे थे। (अन्य दलों के सदस्यों ने भी कुछ भिन्न नारे लगाए।) सुनते हैं कि पीठासीन सभापति ने उन्हें नारों से बचने का अनुरोध किया था। लेकिन वह नेता ही क्या जो दूसरों की सुनता हो? गौर करें कि दल के शीर्ष श्रेणी के नेता स्वयं ऐसी हरकतें नहीं करते हैं, किंतु वे अपने दल के दोयम दर्जे के ऐसे नेताओं को नारों से बचने की हिदायत भी नहीं देते। भाजपा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री ने उन्हें रोकना नहीं चाहिए था क्या?

संसद में विद्यमान अन्य धार्मिक आस्थाओं वाले सदस्य इन नारों को सुनना पसंद तो नहीं करते होंगे, लेकिन वे विरोध में कुछ कहना भी ठीक नहीं समझते होंगे। वे कदाचित संसद में शालीनता बरतना ठीक मानते होंगे और इन नारों को नजरअंदाज करते होंगे। वे वस्तुतः ठीक करते हैं, क्योंकि नारे लगाने वाले अपनी बचकानी हरकतों से देश का कोई हित नहीं साधते हैं, बस उन्हें संतुष्टि मिलती है “देखा मैंने नारे लगा दिए”, गोया कि किसी शेर से लड़ने की बहादुरी दिखाई हो।

स्वयं को “सेक्युलर” (धर्मनिरपेक्ष) कहने वाले देश की संसद जैसी जगह पर ऐसे नारों का लगना मेरी नजर में आपत्तिजनक लगता है। जो शासकीय व्यवस्था लोगों को संसद में ऐसी निरर्थक और आस्थाबोधक नारेबाजी की छूट देता है उसे मैं “स्यूडोसेक्युलर” मानना हूं।

संयोगवश किसी सोशल मीडिया चैनल पर मुझे पढ़ने को मिला: “ये नारे मुस्लिम समुदाय को चिढ़ाने के लिए लगाए जाते हैं।” मैं इस बात से सहमत हूं। मुझे मुस्लिम समुदाय के कुछ सदस्यों में यह चिन्ताजनक कमजोरी दिखती है कि वे नारों की अनदेखी करने के बजाय उन्हें अपने सामने पेश चुनौती के रूप में लेने लगते हैं। ऐसी कमजोरी अन्य समुदायों में मुझे नहीं दिखाई देती। गौर करें कि उसी शपथ कार्यक्रम में हैदरबाद के नवनिर्वाचित सांसद ने प्रतिक्रिया-स्वरूप “जै भीम”, “जै हिन्द” और “अल्लाहू अकबर” के नारे लगा दिये। उनके अलावा उ.प्र. के संभल क्षेत्र के सांसद ने तो साफ घोषित कर दिया कि “वंदे मातरम्” का नारा इस्लाम-विरोधी है।

शपथ-ग्रहण आयोजन की अधिक जानकारी उदाहरणार्थ द हिन्दू और टाइम्ज़ ऑफ़ इंडिया में मिल सकती है।

क्या है और क्या नहीं है इस्लामविरोधी

मुझे मुस्लिम समुदाय पर कभी-कभी तरस आता है। उनके धर्मगुरु कहते हैं “वंदे मातरम्” इस्लाम के विरुद्ध है, वह वर्जित है, इत्यादि। हजरत साहब के समय में जो चीजें थीं ही नहीं उनका इस्लाम के विरुद्ध होना किस आधार पर तय किया जा सकता है? असल में मुस्लिम धर्मगुरु सुविधा के हिसाब से चलते हैं। जिन बातों में उन्हें सुविधा होती है उसे वे स्वीकार्य मान लेते हैं और जिसके बिना काम बखूबी चल जाता है उसे वे इस्लाम-विरोधी कह देते हैं।

मैं मुस्लिम समुदाय के सामने अपनी कुछ शंकाएं रखता हूं;

(1) उन्हें अपने बच्चों को आधिनुक विज्ञान पढ़ाना चाहिए कि नहीं?

(2) यदि पढ़ाते हैं तो उन्हें यह सिखाया जाएगा कि इस संसार और उसके जीवों की सृष्टि 7 दिन में नहीं हुई, बल्कि वह सब अरबों-करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है। ऐसा करना इस्लामी दर्शन के विरुद्ध नहीं होगा क्या?

(3) यदि बच्चे आधुनिक विज्ञान पढ़ते और स्वीकरते हैं और कालांतर में उसी विज्ञान के आधार पर नौकरी-पेशे में जाते हैं तो ऐसा करना गैरइस्लामी नहीं होगा क्या? क्या ऐसी धर्मविरुद्ध शिक्षा स्वीकारनी चाहिए मुस्लिमों को?

(4) इतना ही नहीं इसी विज्ञान पर आधारित चिकित्सा और उससे जुड़ी दवाइयों का सेवन इस्लाम विरुद्ध नहीं होगा क्या?

(5) क्या आधुनिक टेक्नॉलॉजी पर आधारित सुविधाएं इस्लाम-विरुद्ध नहीं हैं, क्योंकि ये उस आधुनिक विज्ञान की देन हैं जो इस्लाम्मिक दर्शन से मेल नहीं खाता है।

इतने सब गैर-इस्लामिक बातों को स्वीकारने वाले यदि “वंदे मातरम्” बोल देंगे तो कौन-सा अनर्थ हो जाएगा? यह नारा इस्लामी दर्शन को तो नहीं नकारता है न? यह अल्लाह के वजूद को तो नकारता है क्या? मोहम्मद हजरत का निरादर करता है क्या? पांच बार की नमाज की मनाही करता है क्या?  इसाईयत एवं इस्लाम के आध्यात्मिक दर्शन के मूल में तो वही यहूदी दर्शन है, थोड़ा हेर-फेर के साथ! इसाई एवं यहूदी भी क्या इतना विरोध करते हैं?– योगेन्द्र जोशी

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लोकसभा चुनाव 2019 – एक अनूठे ध्रुवीकरण की राजनीति

यों तो मैंने 1957 एवं 1962 के चुनाव देखे हैं (क्रमशः करीब 10 एवं 15 साल की उम्र में), लेकिन लोकतंत्र तथा चुनावों की समझ मैंने 1967 के चुनाव और उसके बाद ही अर्जित की। 1977 के चुनावों तक मैं शायद एक पंजीकृत मतदाता भी बन चुका था। उस समय के चुनावों की परिस्थिति एवं घटनाक्रम मुझे कुछ हद तक याद हैं। उस चुनाव से इस वर्ष के लोकसभा चुनाव की तुलना और संबंधित टिप्पणी मैं अपनी याददास्त पर निर्भर करते हुए कर रहा हूं। वैसे विस्तृत एवं ठीक-ठीक जानकारी अंतरजाल पर मिल ही जाएगी।

इस बार के लोकसभा चुनाव इस अर्थ में दिलचस्प हैं कि इसमें अपने किस्म के एक अनोखे ध्रुवीकरण की राजनीति देखने को मिल रही है। ध्रुवीकरण न जाति के आधार पर है और न ही धर्म अथवा क्ष्रेत्र के आधार पर। यह ध्रुवीकरण है प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध।

जब से क्ष्रेत्रीय दलों का आविर्भाव देश में हुआ और अपने बल पर सरकार बना सकने की कांग्रेस पार्टी की हैसियत समाप्त हो गई, विविध प्रकार के गठजोड़ देखने को मिलने लगे। ध्रुवीकरण की बातें पहले भी होती रही हैं, खासकर मुस्लिम समुदाय को लेकर, लेकिन व्यापक स्तर का ध्रुवीकरण कभी पहले हुआ हो ऐसा मुझे याद नहीं आता एक मामले को छोड़कर। ध्रुवीकरण का वह मामला था 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरुद्ध। लेकिन तब के ध्रुवीकरण और इस बार के ध्रुवीकरण में उल्लेखनीय अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए उस काल की राजनीतिक परिस्थिति पर एक नजर डालने की आवश्यकता होगी।

मेरे समान उम्रदराज लोगों को याद होगा कि 1960 के दशक के लगभग मध्य में जनसंख्या नियंत्रण की बात चली थी (कांग्रेस राज में)। लाल त्रिकोण (▼) और “हम दो हमारे दो” के विज्ञापन यत्रतत्र देखने को मिलते थे। योजना के परिणाम भी ठीक होंगे यह उम्मीद बनने लगी थी। लेकिन 1972 के चुनावों के बाद इस परिवार नियोजन कार्यक्रम का हस्र दुर्भाग्यपूर्ण रहा। कैसे? देखें –

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं बांग्लादेश के “जन्म” के बाद कांग्रेस की स्थिति बहुत अच्छी रही। उसे 1972 के चुनावों में उल्लेखनीय सफलता मिली। किंतु देश का दुर्भाग्य कि उसी समय इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी एक गैर-संवैधानिक शक्ति के तौर पर उभरे। इंदिराजी की एक बड़ी भूल थी कि उन्होंने संजय को सरकारी तंत्र में हस्तक्षेप करने से रोका नहीं। संजय को विद्याचरण शुक्ल, नारायण दत्त तिवारी आदि जैसे नेता चाटुकार के रूप में मिल गये। संजय ने सरकारी कामकाज में दखलंदाजी शुरू कर दी। मैं मानता हूं कि संजय के इरादे बुरे नहीं थे किंतु वह अति-उत्साह एवं उतावली में थे देश को तेजी से आगे बढ़ाने में। इसके लिए विभिन्न विभागों को कठोर कदम उठाने के निर्देश दिए जाने लगे। परिवार नियोजन संजय गांधी का अहम मुद्दा था और उसे लेकर जोर-जबर्दस्ती तक होने लगी। अन्य अनेक कारण भी थे जिससे लोगों के मन में धीरे-धीरे आक्रोश पनपने लगा। उसी बीच छात्र आंदोलन भी चल पड़ा जिसकी अगुवाई जयप्रकाश नारायनजी ने की। तब इंदिराजी ने असंवैधानिक तरीके से आपात्काल घोषित कर दिया। लोगों की धर-पकड़ शुरू हुई। कुछ विरोधियों को जेल में डाला गया तो कुछ भूमिगत हो गए। 1977 में चुनाव होने थे। संजय चाहते थे कि आपात्काल को लंबा खींचा जाए, लेकिन इंदिरा जी ने चुनाव घोषित कर ही दिए (छःठी लोकसभा)।

ये उस काल का विस्तृत एवं सटीक विवरण नहीं है, किंतु इससे वस्तुस्थिति का मोटा-माटी अंदाजा लगाया जा सकता है। मैं तब लगभग 30 वर्ष का था।

उस समय जनता काफी हद तक इंदिराजी की विरुद्ध हो गई। प्रायः सभी राजनीतिक दल इंदिरा जी के विरुद्ध लामबंद हो गये। उन सभी ने मिलकर कांग्रेस के विरुद्ध “जनता पार्टी” के नाम से नया दल बना डाला और उम्मीद के अनुरूप चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को करीब डेड़ सौ सीटों पर समेट दिया। (जनता दल 298 सीट, कांग्रेस 153 सीट)

दुर्भाग्य से अपने आंतरिक विरोधों के कारण “जनता” सरकार मुश्किल से दो-ढाई साल चली और 1979-80 में फिर चुनाव हुए (सातवीं लोकसभा) जिसमें इन्दिराजी 353 सीटों की “बंपर” जीत के साथ लौटीं।

इस बात पर ध्यान दें कि कांग्रेस/इंदिराजी के विरुद्ध बनी “जनता” पार्टी अधिक दिनों तक टिकी नहीं और अपने घटकों में बिखर गई। क्यों? क्योंकि इस पार्टी का गठन परस्पर बेमेल राजनैतिक विचाराधारा वाले घटक दलों ने भेदभाव मिटाकर किया था महज कांग्रेस को हटाने के लिए। उदाहरणार्थ उसमें बामपंथी दल भी थे और भाजपा (तब जनसंघ) जैसी दक्षिणपंथी भी। लेकिन आपसी विरोध जल्दी ही सतह पर आ गया और पार्टी घटकों में बंट गई।

आज 2019 के चुनावों में फिर से कुछ-कुछ वैसी ही राजनैतिक स्थिति देखने को मिल रही है। तब (1977 में) मुद्दा था “इंदिरा हटाओ“, और आज मुद्दा है “मोदी हटाओ”। लेकिन तब और अब में महत्वपूर्ण अंतर हैं –

∎ (1) 1977 में अधिकांश दल महागठबंधन के बदले एक पार्टी के तौर पर इंदिराजी के विरुद्ध खड़े हो गए। पार्टी बनाने का मतलब पूर्ववर्ती अस्तित्व भुला देना। इस बार क्षेत्रीय स्तर पर छोटे-बड़े गठवंधन बने हैं। महागठबंधन अभी नहीं बना है। बनेगा या नहीं; यदि बना तो उसका स्वरूप क्या होगा यह चुनाव-परिणाम पर निर्भर करेगा। गठबंधन का मतलब है स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखकर एक साथ शासन चलाने की मंशा।

∎ (2) उस दौर में इंदिराजी का विरोध नेताओं तक ही सीमित नहीं था। जनता भी आक्रोषित थी और जनांदोलन के रूप में उसका विरोध व्यक्त हुआ था। इस बार विरोध नेताओं तक ही सीमित है। जनता शान्त है और वह क्या सोचती है यह स्पष्ट नहीं। उनकी सोच चुनाव-परिणामों से ही पता चलेगा।

∎ (3) तब देश में आपात्काल वस्तुतः घोषित हुआ था, जिससे पीड़ित होकर जनता इंदिराजी के विरुद्ध हो गई थी। इस बार आपात्काल नहीं है भले ही विपक्षी अघोषित आपात्काल की बात करते हैं। जनता उनकी बात से सहमत है ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिखता।

∎ (4) 1970 के दशक के उस काल में राजनीति में इस कदर सिद्धांतहीनता नहीं थी। लेकिन आज के दौर में नेता रातोंरात एक विचारधारा त्यागकर एकदम विपरीत विचारधारा स्वीकारते हुए दलों के बीच कूद-फांद मचा रहे हैं।

∎ (5) वैचारिक मतभेद राजनीति में सदा से रहे हैं, किंतु राजनेताओं में एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव उस दौर में नहीं था। उनकी भाषा काफी हद तक शिष्ट और संयत रहती थी। लेकिन मैं देख रहा हूं कि इस चुनाव में भाषायी मर्यादा जैसे लुप्त हो चुकी है। समाचार माध्यमों से ऐसी जानकारी मिल रही हैं और निर्वाचन आयोग की कुछएक के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध कदम भी उठा चुका है।

∎ (6) मुझे जितना याद आता है जातीयता और धार्मिकता के आधार पर खुलकर वोट मांगने का चलन 1970 के दशक तक नहीं था। अब तो अनेक नेता अलग-अलग जातीय समुदायों के प्रतिनिधि के तौर पर खुलकर राजनीति कर रहे हैं।

1977 के इंदिरा-विरोध में हुए और इस बार 2019 के मोदी-विरोध में हो रहे ध्रुवीकरण में उक्त प्रकार के अंतर मेरे देखने में आ रहे हैं।

मुझे लगता है कि जब 1977 के गंभीर राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव के बाद टिकाऊ सरकार नहीं बन सकी तो इस बार क्या उम्मीद की जा सकती है। अभी तो राष्ट्रीय स्तर पर ही महागठबंधन नहीं बन सका है| महत्वाकांक्षाओं के ग्रस्त क्षेत्रीय क्षत्रप क्या किसी एक का नेतृत्व स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के विरुद्ध बहुमत हासिल हो जाए तो भी सरकार गठन की पेचदगी सुलझा पाएगा कोई?

मुझे अपने फल-विक्रेता की बात याद आती है। उसने बारचीत में कहा था, “सा’ब हम मोदी के बदले विपक्ष को वोट तो दे दें, लेकिन ये तो बताइए कि ये सरकार बना भी पाएंगे क्या?” – योगेन्द्र जोशी

क्या नेरेन्द्र मोदी फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे? लगता तो ऐसा ही है!  

आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं —

मैं वाराणसी का वरिष्ठ (उम्र 70+) मतदाता हूं। मतदान छोड़ता नहीं किंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता, मोदीजी के पक्ष में भी नहीं। दरअसल मैं नोटा का प्रबल पक्षधर हूं और उसकी वकालत करता हूं। मैंने एक वयस्क नागरिक के रूप में 1969 और उसके बाद के चुनाव देखे हैं और पिछले दो-तीन दशकों से लोकतांत्रिक प्रणाली में गंभीर और तेजी से गिरावट महसूस करने लगा हूं। फलतः लोकतंत्र के मौजूदा मॉडल से मेरा मोहभंग हो चुका है। किस-किस तरीके की गिरावट देख रहा हूं इसका विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, क्योंकि इस आलेख का विषय वह नहीं है।

मैंने पिछले कुछ दिनों जिज्ञासावश यह जानने-समझने की कोशिश की कि मोदीजी के सत्ता में लौटने की संभावना कितनी है। मेरा अनुमान या आकलन अलग-अलग मौकों तथा स्थानों पर आम लोगों से हुई बातों पर आधारित है। मेरी बात बमुश्किल 10-15 लोगों से हुई होगी, जो सांख्यिकीय (statistical) दृष्टि से अपर्याप्त है। फिर भी मुझे जो लगा वह कुछ हद तक माने तो रखता ही है।

मैं अपने अनुभवों को कालक्रमबद्ध (chronological order) तरीके से पेश कर रहा हूं —

(1)

दो-ढाई महीने पहले मेरे पड़ोस में एक सज्जन ने अपने नये मकान में प्रवेश किया। उस अवसर पर उन्होंने गृह-प्रवेश के पारंपरिक पूजा-सह-भोज का आयोजन किया था, जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया था। उस मौके पर उनके परिवारी जनों के अलावा गांव से भी कुछ लोग आये हुए थे। उनके यहां बैठे हुए कुछ लोगों के बीच राजनीति और आगामी लोकसभा चुनावों की चर्चा हो रही थी। मैं उन लोगों की बातों को ध्यान से सुन रहा था। सभी एक बात पर सहमत दिखे, वह यह कि लोग (यानी विपक्ष के लोग) बिलावजह मोदीजी के पीछे पड़े हैं। मोदीजी को चुनाव जीतना चाहिए। मैंने सुनिश्चित करने के लिए किसी एक से पूछ लिया, “लगता है आप लोग मोदीजी को वोट देने की सोच रहे हैं। आपके गांव में क्या मोदीजी के पक्ष में माहौल है?”

उत्तर था, “हां लगभग सभी इसी मत के हैं”। उन लोगों से बातें तो काफी विस्तार से हुईं किंतु उतना सब मुझे न याद है और न उतना सब प्रस्तुत करने की जरूरत है।

(2)

विगत जनवरी के अंतिम सप्ताह में मेरी पत्नी एवं मैं लखनऊ गए थे एक वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए। पहले दिन वैवाहिक कार्यक्रम-स्थल पर रेलवे स्टेशन से जाने और दूसरे दिन वापस स्टेशन आने के लिए हमने ऊबर (Uber) टैक्सी-सेवा का प्रयोग किया था। रास्ते की एकरसता से बचने के लिए दोनों बार हमने संबंधित टैक्सी-चालक से बातचीत की और स्वाभाविक तौर पर प्रासंगिक विषय – चुनावों – की चर्चा की। चर्चा मोदीजी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने परकेंद्रित थी। वे दोनों मोदीजी के प्रबल समर्थक निकले। वे कह रहे थे “मोदीजी जो कर रहे ठीक कर रहे हैं। उनकी योजनाओं का लाभ तुरंत लोगों को मिले यह हो नहीं सकता, कुछ समय लगेगा ही। लोगों को धैर्य रखना चाहिए।”

वे मोदीजी की ईमानदारी एवं नीयत के क़ायल थे। इस बात पर दोनों का ही जोर था कि मोदीजी अपने घर-परिवार के लिए तो वह सब नहीं कर रहे हैं जो कि आजकल सभी दलों के मुखिया कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि रात्रि द्वीतीय प्रहर में जब हम वाराणसी वापस पहुंचे और ऑटो-रिक्शा से अपने घर वापस आने लगे तो ऑटो-चालक की मोदीजी के बारे में कमोबेश वही राय थी जो लखनऊ के टैक्सी चालकों की थी। उनके विचार रखने और शब्दों के चयन में फर्क स्वाभाविक था। कुल मिलाकर हमें लगा कि वे मोदीजी की कार्यप्रणाली ठीक बता रहे थे और उनकी सत्ता में वापसी के प्रति आश्वस्त थे।

(3)

(वाराणसी) उक्त घटना के दो-तीन रोज के बाद मैं अपने दर्जी के पास से कपड़े लेने गया। दर्जी महोदय उस समय खास व्यस्त नहीं थे और कोई अन्य ग्राहक उस समय वहां नहीं था। ऐसे मौकों पर मैं दुकानदार से थोड़ी-बहुत गपशप भी कर लेता हूं। उसी रौ में मैंने दर्जी से चुनाव की बात छेड़ी और पूछा, “इस बार किसको जिता रहे हैं वाराणसी से?” (मोदीजी का निर्वाचन क्षेत्र था 2014 में; और इस बार भी रहेगा ऐसी उम्मीद है।)

जवाब सीधा एवं सपाट था, “मोदीजी जीतेंगे और फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे।”

“लेकिन मोदीजी पर विपक्ष बुरी तरह हमलावर है जो कहता है कि नोटबंदी तथा जीएसटी (GST) ने व्यापार चौपट कर दिया और श्रमिक बेरोजगार हो गए, इत्यादि-इत्यादि।” मैंने विपक्ष का तर्क सामने रखा।

“देखिए आरोप लगाना तो विपक्ष की मजबूरी है। लेकिन नोटबंदी एवं जीएसटी से कुछ समय परेशानी अवश्य हुई होगी। परंतु यह भी समझिए कि दीर्घकालिक देशहित के लिए कष्ट तो सहना ही पड़ेगा। … सबसे बड़ी बात यह है कि मोदीजी यह सब अपने परिवार के लिए, भाई-बंधुओं के लिए नहीं कर रहे न? उनके परिवारीजन अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और मोदीजी से किसी प्रकार का लाभ लेने की नहीं सोचते हैं। ये राजनेता तो सबसे पहले अपना घर भरते हैं। देखिए कुछ तो विधानसभा, लोकसभा में सबसे पहले अपने भाई-बहनों, चाचा-भतीजों को ही पहुंचाते हैं। ठीक है क्या? मोदी ऐसा तो नहीं करते न?”

दर्जी महोदय राजनीतिक तौर पर काफी सजग थे और वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक आकलन करने की कोशिश कर रहे थे।

(4)

फ़रवरी माह के अंतिम और मार्च के प्रथम सप्ताह हम राजस्थान भ्रमण पर निकले थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छ: जने थे, सब के सब वरिष्ठ नागरिक। चुनाव की बात करना हम वहां भी नहीं भूले। जैसलमेर में मेरी पत्नी और मैं मिठाई की एक दुकान में गये। जैसा मुझे याद है दुकान के बोर्ड पर लिखा था “पालीवाल मिष्ठान्न”. खरीद-फरोख्त के साथ थोड़ी-बहुत बात भी हो गई। “इस बार केन्द्र में किसकी सरकार बनवा रहे हैं?” हमने सवाल पूछा।

दुकान के मालिक का त्वरित उत्तर था, “मोदीजी वापस आएंगे। और भला है ही कौन? ये लोग मिलकर सरकार चला पाएंगे?”

“लगता है आप मोदी के प्रबल समर्थक हैं।” हमने टिप्पणी की।

उन सज्जन का सीधा उत्तर था “हम तो भाजपा वाले हैं, वोट उसी को देंगे।”

बातचीत के बाद हम आगे बढ़ गए। एक फल वाले के ठेले पर हम रुक गए कुछ फल खरीदने के लिए। फल वाले से यों ही पूछ लिया, “कुछ ही दिनों में देश में चुनाव होने हैं। चुनाव में दिलचस्पी लेते हैं कि नहीं?”

फल वाले ने कहा, “दिलचस्पी क्यों नहीं लेंगे भला? वोट भी डालेंगे; देश के भविष्य से जुड़ा है चुनाव तो।”

“आप लोगों ने तो पिछले प्रादेशिक चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में वोट डाला था। इस बार भी कांग्रेस के प्रत्याशी को वोट देंगे न?” हमने टिप्पणी की।

“तब वसुंधराजी से नाखुशी थी प्रदेशवासियों को, किंतु मोदीजी से नहीं। इस बार उन्हीं के पक्ष में वोट पड़ेंगे।

(5)

राजस्थान पर्यटन के दौरान हम जोधपुर भी गये थे। वहां मैं इस विषय पर अधिक लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। परंतु एक व्यक्ति, जो कपड़ों की सिलाई की दुकान चला रहे थे, और उनके साथी से बातें अवश्य हुईं। उनकी दुकान स्टेशन के सामने की सड़क पर 300-400 मीटर की दूरी पर थी। वहां मुझे ऐसे सज्जन मिले जो मोदीजी के घोर विरोधी थे। नोटबंदी एवं जीएसटी (GST) को लेकर वे गुस्से में थे और कह रहे थे कि मोदी ने गरीबों की रोजी-रोटी छीन दी। ऐसा इलजाम विपक्ष लगाता ही रहा है।

उन सज्जन ने मुझसे मेरा परिचय जानना चाहा । बदले में मैंने भी उनसे उनका परिचय ले लिया। संयोग की रही कि उनका जातिनाम भी मोदी ही था। मेरी आम धारणा यह रही है कि अधिकतर भारतीय अपनी जाति के लोगों के प्रति कोमल भाव रखते हैं। लेकिन यहां पर उल्टा ही हो रहा था।

जैसलमेर एवं जोधपुर में हम लोगों को मरुभूमि के रेतीले टीलों (sand dunes) पर जीप से घूमने का मौका मिला (वहां का प्रमुख आकर्षण)। दोनों ही बार हमें मोदी-विरोध सुनने को मिला। उन जीप-चालकों से अधिक बातें करने पर पता चला कि वे मुस्लिम समुदाय से हैं। हमने महसूस किया कि धार्मिक पृष्ठ्भूमि मोदीजी के संदर्भ में अहमियत रखती है। ऐसा अनुभव अन्यत्र भी हमें हुआ।

(6)

हम लोग जयपुर भी घूमने गए थे। वहां मुझे चुनावों के बारे में किसी से बातें करने का मौका नहीं मिला। जयपुर के दर्शनीय स्थलों को दिखाने वाले टैक्सी-चालक से अवश्य बातें हुईं। उसने बताया कि मिर्जापुर (या सोनभद्र, याद नहीं) में उसकी ससुराल है और वाराणसी से खास लगाव रखता है। उसने मोदीजी के पक्ष में ही अपनी राय रखी। संयोग से वह हिन्दू निकला।

(7)

(वापस वाराणसी) एक दिन मैं वाराणसी में अपने घर से बमुश्किल तीन-चार सौ मीटर दूर  प्रातः से दोपहर तक लगने वाली सट्टी में फल-सब्जी खरीदने गया। (सट्टी = थोक एवं फुटकर फलों एवं सब्जियों का बाजार।) मैं वर्षों से हफ़्ते में दो-तीन बार इस कार्य के लिए जाया करता हूं। कुछ फुटकर विक्रेताओं से मेरा अच्छा-खासा परिचय है और मैं उनसे आम ग्राहकों की तरह पेश नहीं आता, बल्कि उनसे थोड़ी-बहुत गुफ्तगू भी कर लेता हूं। उन्हीं में से एक से मैंने पूछ लिया, “कहिए, आपके ’मोदीजी’ के क्या हाल हैं? इस बार भी सरकार बना पाएंगे क्या?”

प्रत्युत्तर में उसने मुझसे ही सवाल कर दिया, ” आप ही बताइए किसको वोट दें? विकल्प कहां है? विपक्ष के नेता मिलकर सरकार बना पाएंगे क्या? बना भी लें तो चला पाएंगे? कितनी टिकाऊ होगी उनकी सरकार? सबके आपने-अपने स्वार्थ हैं।”

सब्जी विक्रेता की बातों में स्पष्ट संकेत था। मोदीजी को वोट न दें तो किसे दें?

निष्कर्ष –

अब चुनाव घोषित हो चुके हैं, दलों की घोषणाएं मतदाताओं को सुनने को मिल रही हैं। कांग्रेस गरीबों को 72 हजार रुपये सालाना देने का वादा कर रही है। ऐसे वादे मरदाताओं के विचार बदल सकते हैं। परिस्थितियां बदलने पर चुनाव के परिणाम भी बदलेंगे ही।

फिर भी मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी पर्याप्त सीटें नहीं जीत पाएगी। कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है। अन्य दलों का देशव्यापी जनाधार है नहीं। प्रायः सभी क्षेत्रीय (या एक प्रकार से क्षेत्रीय) दल हैं। उनमें परस्पर स्थायी सहमति एवं एकता दिखाई नहीं देती। भविष्य में सहमति बन पाएगी क्या? मुझे लगता है मोदीजी सत्ता में लौटेंगे। हो सकता है रा.लो.ग. (NDA) को बहुमत न मिले, फिर भी जोड़तोड़ करके सरकार बना ली जाएगी।

अवश्य ही मोदीजी की सत्ता में वापसी को कुछ लोग देश का दुर्भाग्य कहेंगे। – योगेन्द्र जोशी

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हादसों का देश भारत – क्या देशवासी कभी सुधरेंगे भी?

कल (19 अक्टूबर) दशहरे के दिन रावण-दहन के मौके पर अमृतसर में एक बेहद गंभीर और दुखद हादसा हुआ।

उस अनिष्ट घटना में बहुत से (शायद 50 से अधिक) जनों की अकाल मृत्यु हो चुकी है और पता नहीं कितने जने आहत हुए हैं।

उस हादसे में दिवंगत हो चुके लोगों की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना और आहतों के त्वरित स्वास्थ्य लाभ की हम सभी कामना कर सकते हैं। प्रभावित पारिवारिक जनों को अप्रत्याशित विकट कष्टप्रद स्थिति का सामना करने का बल मिले यह प्रार्थना सभी करते हैं।

जिम्मेदार कौन?

वह हादसा हुआ क्यों? कौन जिम्मेदार है उसके लिए?

मैं टेलीविज़न समाचार सुन रहा था। दुर्घटना के तुरंत बाद सभी समाचार चैनलों पर उस हृदयविदारक घटना की जानकारी प्रसारित होने लगीं। सभी पर लगभग एक जैसी बातें सुनने को मिल रही थीं। कुछ लोग कह रहे थे कि आयोजकों की गलती से दुर्घटना घटी, तो कोई स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहा था। कहने वाले तो रेल प्रशासन को भी कुछ हद तक जिम्मेदार कह रहे थे।

मुझसे पूछें तो मैं स्थानीय प्रशासन और रावण प्रकरण के आयोजकों को तो जिम्मेदार मानता ही हूं। लेकिन क्या वहां तमाशा देखने वाले लोग खुद जिम्मेदार नहीं? टिप्पणी करने वाले यह भी कह रहे थे कि अपने देश में रेलवे विभाग ने पटरियों की फ़ेंसिंग (बाड़ से घेराबंदी) नहीं की है जो कि विकसित देशों में किया जाता है। फ़ेंसिंग होती तो हादसा न होता।

लेकिन सवाल यह है कि फ़ेंसिंग न होने का मतलब यह तो नहीं कि आप रेल पटरियों का इस्तेमाल मनमाने तरीक से करें। क्या लोगों को यह सामान्य समझ नहीं होनी चाहिए कि पटरियों पर खड़े होकर तमाशा देखना खुद में लगत व्यवहार है? क्या प्रशासन डंडा लेकर लोगों को भगाए तभी वे मानें यही रवैया अपनाया जाना चाहिए? दरअसल रेलवे ट्रैक को पार करना भी पड़े तो भी सोच-समझ कर करना चाहिए, और उसे जल्दी ही पार कर लेना चाहिए ताकि किसी हादसे की गुंजाइश न हो। लेकिन मानता कौन है? रेलवे लाइन पर कुछ जने ऐसे बैठते या चलते हैं जैसे वह कोई सामान्य पैदल मार्ग हो। ऐसे हादसे सुनने को मिलते हैं जिनमें रेलवे लाइन पर कोई हेडफोन कान पर लगाए गाना सुन रहा हो, या फोन पर बात कर रहा हो। कोई-कोई तो रेलगाड़ी आ रही हो और उसके सामने सेल्फ़ी भी लेते देखे जाते हैं।

बुरा लगेगा लोगों को परंतु यह बात सही है कि हम भारतीय सुरक्षा के मामले में बेहद लापरवाह हैं और हर बात पर प्रशासन पर दोष मढ़ने लगते हैं। क्या लोगों को खुद भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए?

जहां तक रेलवे लाइन की फ़ेंसिंग का सवाल है वह मुझे अपने देश में संभव नहीं लगता है। रेलवे के पास संसाधन भी अपर्यप्त हैं और सुरक्षा की उसकी अन्य प्राथमिकताएं हैं। इतना और बता दूं कि विकसित देशों एवं अन्य विकासशील देशों में विकास का अर्थ केवल ढांचागत विकास ही नहीं होता है। अपितु उसके साथ लोगों के व्यवहार, सोच, और कायदे-कानूनों को मानने की प्रवृत्ति भी विकसित होते हैं। यदि लोग लापरवाही वरतना छोड़ दें बहुत-सी दुर्घटनाएं होना ही बंद हो जाएं।

मेरे अनुभव

मैं इंग्लैंड में रह चुका हूं। वहां पर मैंने देखा है कि रेलवे फ़ेंसिंग की आवश्यकता जानवरों के लिए अधिक और आदमियों के लिए कम अनुभव की जाती हैं। लाइन पार करने लिए आवश्यकतानुसार लाइन के ऊपर पुल या नीचे अंडरपास बने रहते हैं। यहां की तरह वहां लोगों की भीड़ भी जहातहां नहीं दिखती है। नियमों को मानते हुए सड़कें या रेलवे लाइन पार करते हैं। पटरियां उन जगहों से गुजरती हैं जहां गाएं एवं अन्य पशुओं को पालने के लिए फ़ार्महाउस बने होते हैं। ढेरों जानवरों के साथ उन्हें देखने वाले ग्वाले बहुत कम होते हैं। चरते-चरते जानवर लाइन पर न आ जाएं इसलिए फ़ेंसिंस की जाती है। अपने यहां फ़ेंसिंस करना भी चाहे तो आसान नहीं। देश में बहुत से इलाके मिल जायेंगे जहां रेलवे लाइन के दोनों तरफ़ रिहायशी मकान बने हों और लोगों का लाइन के आरपार आना जाना लगा रहता है। कम से कम झुग्गी-झोंपड़ियां तो खड़ी रहती ही हैं। ऐसे में रेलवे भी कितना सावधानी वरत सकती है?

मैंने यह भी देखा है कि इंग्लैंड में वहां जहांतहां पटाखे फोड़ना प्रतिबंधित रहता है। वहां भी पटाखों का चलन है जैसे “हैलोवीन” के मौके पर। पटाखों का कार्यक्रम रिहायशी मकानों बीच नहीं होता बल्कि उनके पास खुले मैदानों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इसी प्रकार पतंगें भी सड़कों एव मकानों की छतों से नहीं, बल्कि खुले मैदानों में उड़ाई जाती हैं। और अपने यहां?

हादसों के प्रकार अनेक

मैं जब मुद्दे पर गंभीरता से सोचता हूं तो मुझे लगता है कि रोजमर्रा की बहुत-सी दुर्घटनाएं जो पूरी तरह से मानव लापरवाही के कारण होती हैं। उनके लिए न प्रकृति दोषी ठहराई जा सकती है और न ही मशीनी उपकरण। यदि मशीनें कारण दिखाई देती हैं तो वह भी उसी लापरवाही की वजह से। आगे दुर्घाटनाओं के कुछ मामले गिनाता हूं जो बखूबी रोके जा सकते हैं:

(1) हर्ष-फ़ायरिंग कई लोगों को बंदूकें लहराकर खुशी व्यक्त करने का शौक होता है। वे यारों की शादी पर, किसी चहेते नेता की चुनाव में जीत पर, या ऐसे ही किसी और मौके पर हवा में गोली चलाने लगते है। इस अवांछित कृत्य में कभी-कभी किसी को गोली लग जाती है और खुशी मातम में तब्दील हो जाती है।

(2) पटाखों का चलन शादी-ब्याह, दीवाली-होली आदि मौकों पर पटाखों का चलन दिनबदिन बढ़ता जा रहा है। संकरी गलियां हों या बाजार का इलाका शौकीन लोगों को कोई चिंता नहीं रहती है। मुझे अपने शहर वाराणसी की एक दीवाली का स्मरण है जिसमें लंका नामक इलाके में स्थाई दुकानों के आगे पटाखों की अस्थाई दुकानें सजी थीं। पास ही में लोग पटाखे छोड रहे थे। एक चिनगारी कहीं से एक दुकान में गिरी। तब क्या हुआ होगा अंदाजा लगा सकते हैं।

(3) बिना लाइसेंस वाहन चालन मैंने वाहन चलाना वर्षों पहले छोड़ दिया था। जब मैं चलाता था तब मेरी पहचान में किसी का भी लाइसेंस वाहन-चालन के ठोस परीक्षण पर आधारित नहीं था। आज भी स्थिति वैसी ही होगी ऐसा मेरा ख्याल है। दुनिया के प्रमुख देशों में कड़े सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक परीक्षण का प्रावधान है। लोगों को एक-एक घंटा तक सड़कों पर वाहन-चालन क्षमता दिखानी पड़ती है। लाइसेंस के लिए कभी-कभी दो-दो तीन-तीन बार परीक्षण से गुजरना पड़ता है। साफ जाहिर है कि लाइसेंसधारी को नियम-कानूनों का अच्छा ज्ञान तथा जिम्मेदारी का भाव होता है। इसलिए वहां यातायात के नियमों का उल्लंघन बहुत कम होता है और जब होता है तो जुर्माना भी कम नहीं होता। अपने यहां लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफिक होता है। सड़कों पर हादसे तो होंगे ही।

(4) व्यक्तिगत सुरक्षा के चिंता महानगरों को छोड़ दें तो आप देखेंगे अन्य शहरों में लोग दुपहिया वाहन पर हेल्मेट नहीं पहनते, कार चलाने में बेल्ट नहीं पहनते, सड़क पर गति की सीमा का ख्याल नहीं रखते, शराब के नशे में भी वाहन चलाते हैं, चलाते समय मोबाइल फोन पर बात करते रहते हैं, नींद के झोंके आ रहे हों तो भी वाहन चलाते है, वाहनों में अनुमत संख्या से कहीं अधिक सवारियां ठूंसते हैं, इत्यादि। प्रशासन की जिम्मेदारी होती है की कड़ाई से नियमों का पालन कराएं। प्रशासन परवाह नहीं करता तो क्या किसी को व्यक्तिगत तौर पर समुचित कदम नहीं उठाना चाहिए?

(5) आग की घटनाएं आए दिन दुकानों मे, बहुमंजिली इमारतों में, रिहायशी भवन में आग की घटनाएं सुनने को मिलती हैं। अक्सर “शॉर्ट-सर्किट” को दोष देकर जिम्मेदारी तय हो जाती है। क्यों होते हैं शॉर्ट-सर्किट इसकी परवाह कोई करता है? और ऐसे मौकों पर अग्निशमन के उपकरण मौके पर क्यों नहीं रहते हैं?

(6) आवारा पशु आवारा जानवर, खास तौर पर आवारा कुत्ते, कई दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। आवारा कुत्तों के झुंडों द्वारा जख्मी किए या मारे जाने की खबरें मीडिया में आती रहती हैं। इनको नियंत्रित करने के लिए क्या कभी राष्ट्र के स्तर पर अथवा राज्यों के स्तर पर समुचित प्रयास की बातें सुनी जाती हैं?

(7) अनियंत्रित भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार इस देश को खोखला कर रहा है। अधिकांश समस्याएं तो उसी की देन हैं। जीर्णशीर्ण भवनों का गिरना, निर्माण के समय भवनों और पुलों का गिरना आम बात है। सभी हादसों में गरीब लोग ही मारे जाते हैं जिनके जीवन की कीमत 2-4 लाख रुपया तय कर दी जाती है और मामले कालांतर में रफादफा हो जाते हैं। किसी को जिम्मेदार नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार की अनेक दुर्घटनाएं रोजमर्रा के जीवन में देखने को मिलती हैं। घटना के समय घड़ियाली आंसूं बहाने वाले अनेक मिलेंगे। लेकिन आम जन और प्रशासन उनसे कोई सीख क्यों नहीं लेते? मेरी राय में आम लोग तमाशबीन होते हैं। वे जहां भीड़ हो वहां खतरे हो सकते हैं इसकी अनदेखी करके भीड़ में शामिल हो जाते हैं। क्या इतनी भी समझ नहीं होती कि वे स्वयं बचें?

दुर्घटनाओं के समय शासन चलाने वाले नेता “दोषी व्यक्ति बख्शे नहीं जाएंगे का आलाप शुरू करते हैं” लेकिन किसी को दोषी न ठहरा पाते हैं और न ही किसी जो दंडित करते हैं। अपने यहां के राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी, दोनों ही, असल में गैरजिम्मेदार होते हैं। क्यों न हों? उसी समाज से ही तो वे निकलते हैं जहां लापरवाही को जनता का मौलिक अधिकार समझा जाता है। वे घिसेपिटे तरीके से शासन-प्रशासन चलने के आदी होते हैं। विरला ही कभी थोड़ा नया और सार्थक कार्य करने की कोशिश करता है।

हादसों पर दुःखित होना स्वाभाविक है। लेकिन मुझे इस बात का अधिक दु:ख होता है कि यहां व्यवस्था के लिए उत्तरदायी लोगों को न तो कभी शर्म आती है और न कभी आत्मग्लानि। वे ऐसे हालात में भी देश को विकसित करने का ख्वाब देखते हैं। – योगेन्द्र जोशी

2 अक्तूबर – महात्मा गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है – 1969 में जन्मे महात्मा गांधी यानी बापू का 150वां जन्मदिन। इस दिन के साथ ही उनके जन्म का 150वां वर्ष आरंभ हो रहा है। संयोग से यही दिन देश के दूसरे प्रधान मंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन रहा है (जन्मवर्ष 1904)। किंतु २ अक्टूबर का सार्वजनिक अवकाश एवं उस दिन के तमाम कार्यक्रम बापू को ही केन्द्र में रखकर आयोजित होते रहे हैं। लगे हाथ शास्त्रीजी का भी जिक्र कर लिया जाता है और उनको श्रद्धांजली अर्पित की जाती है। गांधी जी के सम्मान में इस दिन को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया हुआ है।

केन्द्र सरकार ने इस 150वें वर्ष को सोद्देश्य तरीके से मनाने का कार्यक्रम बनाया है और इस कार्य हेतु एक कार्यकारिणी समिति का गठन किया है। देश के विभिन्न राज्यों की सरकारें और केन्द्र सरकार के विभिन्न महकमे इस वर्ष को अपने-अपने तरीके से मनाने के कार्यक्रम बना रहे हैं। उदाहरणार्थ रेलवे मंत्रालय इस मौके पर अपनी रेलगाड़ियों के डिब्बों में “स्वच्छ भारत” का प्रतीक (लोगो) प्रदर्शित करेगा। इसके अतिरिक्त मंत्रालय साफ-सफाई, अहिंसा, सामुदायिक सेवा, सांप्रदायिक सौहार्द्र, अस्पृश्यता-निवारण, तथा महिला-सशक्तिकरण का व्यापक स्तर पर संदेश अपनी गाड़ियों के माध्यम से देने की योजना बना रहा है। (देखें इकनॉमिक टाइम्ज़ की खबर)

गांधी जन्मदिन एवं जन्मवर्ष सरकारी स्तर पर कैसे बनाए जाएंगे इसकी विस्तृत जानकारी न मुझे है और न ही उसकी चर्चा करने का मेरा इरादा है। जन्मदिवस की सार्थकता क्या है और आम नागरिक उसको कितनी गंभीरता से लेते हैं मैं इस पर अपनी टिप्पणी पेश करना चाहता हूं।

दिवसों की बढ़ती संख्या

अगर आप 40-50 वर्ष पूर्व की बात करें तो पाएंगे कि विभिन्न प्रकार के दिवसों की संख्या तब इतनी नहीं थी जितनी आज है। समय के साथ नये-नये दिवस घोषित होते रहे हैं कुछ हमारे राष्ट्रीय दिवस जिनमें से कई तो “महापुरुषों” के जयंतियों के नाम पर हैं, और कुछ राष्ट्र संघ के द्वारा घोषित किए गए हैं। अपने देश से जुड़े दो अंतरराष्ट्रीय दिवस तो पिछले 11 वर्षों में अस्तित्व में आए हैं। ये हैं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस, 2 अक्टूबर, और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21 जून, जो राष्ट्र संघ द्वारा क्रमशः 2007 तथा 2015 में घोषित किए गए।

मैं जब इन तमाम दिवसों के बारे में सोचता हूं तो मुझे हर किसी दिवस की सार्थकता नजर नहीं आती। वे सार्थक होंगे इस विचार से घोषित किए गए होंगे, लेकिन व्यवहार में वे सार्थक हो पाए हैं इसमें मुझे शंका है। कुछ दिवस तो पारंपरिक रूप से सदियों से मनाए जाते रहे हैं जो समाज के विभिन्न समुदायों (विशेषत: धर्म-आधारित) की आस्थाओं से जुड़े हैं और त्योहारों का रूप ले चुके हैं जैसे अपने देश में राम-नवमी, कृष्ण-जन्माष्टमी, महावीर जयंती एवं नानक जयंती आदि मनाए जाते हैं। ये दिवस कोई खास संदेश देने के लिए मनाए जाते हों ऐसा मैं नहीं समझता।

अपने देश में स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) एवं गांधी जयंती (2 अक्टूबर) राष्ट्रीय अवकाश एवं पर्व के तौर पर घोषित हैं। सैद्धांतिक तौर यह माना जाएगा कि ये दिवस मात्र छुट्टी मनाने और कुछएक रस्मी कार्यक्रमों के आयोजन तक सीमित नहीं हैं बल्कि ये नागरिकों को उनके कर्तव्य-निर्वाह का स्मरण कराते हैं। लेकिन क्या नागरिकवृंद उस संदेश पर ध्यान देते हैं और क्या उस संदेश के अनुसार चलने का प्रयास करते हैं। अवश्य ही इन अवसरों पर विभिन्न सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं में अनेकानेक आदर्शों की बात की जाती है और जनसमुदाय को अपने जीवन में उन्हें अपनाने का उपदेश दिया जाता है। मुझे लगता है कि आदर्शों की बात करना इन मौकों पर वक्ताओं के लिए विवशता होती है। वे स्वयं उन आदर्शों को – आंशिक तौर पर ही सही – अपनाने की इच्छा नहीं रखते इस बात को श्रोता भली भांति समझते हैं, और श्रोताओं की इस समझ को वक्ता भी जान रहा होता है। किंतु रस्मअदायगी चलती रहती है।

बतौर अहिंसा दिवस के गांधी जयंती की सार्थकता

यों तो गांधी दिवस इस देश में एक राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर दशकों से मनाया जा रहा है और साथ में इस दिन की रस्मअदायगी भी चलती आ रही है। किंतु महात्मा गांधी के अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता वाले व्यक्तित्व के चलते इसका महत्व देश तक सीमित नहीं रह गया है। जब से इस दिन को राष्ट्र संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है इसका महत्व इस देश के बाशिंदों के लिए खास तौर पर बढ़ गया है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस देश से गांधी जुड़े रहे यदि वहीं के लोग गांधी के विचारों को भुला दें तो बाहरियों के लिए हम कितने सम्माननीय रह सकते हैं?

मेरे मन में एक सवाल उठता है कि क्या गांधी दिवस के अहिंसा दिवस बन जाने से लोग अहिंसा-भाव के प्रति प्रेरित हो रहे हैं? यहां पर याद दिलाना चाहता हूं कि अहिंसा एवं सहिष्णुता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं किंतु दोनों में घनिष्ठ संबंध है। जहां सहिष्णुता होगी, क्षमाशीलता होगी, दूसरों के प्रति संवेदना होगी, वहीं अहिंसा की भावना प्रबल होगी। किंतु जीवन के 70 वसंत पार करते-करते मैं यही अनुभव कर रहा हूं कि समय के साथ देश में असहिष्णुता बढ़ती गई है। दूसरों के प्रति अपराध करने के विचार प्रबल होते जा रहे हैं। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण तो संसद तथा विधानसभाओं में आपराधिक छवि के जन-प्रतिनिधियों की दिनबदिन बढ़ती संख्या है, जिस तथ्य को उच्चतम न्यायालय एवं निर्वाचन आयोग, दोनों, संज्ञान में ले चुके हैं, परंतु लोकतंत्र के पहरेदार हमारे नेता इसे महत्वहीन मानते आ रहे हैं। क्या यह सब गांधी के विचारों के अनुरूप है? तो कैसे मान लें कि लोकतंत्र के शासकीय पक्ष को चलाने वाले गांधी के विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि गांधी जयंती अपनी अहिंसा संबंधी अर्थवत्ता खोती जा रही है? क्या अहिंसा का विचार केवल मुख से बोले जाने वाले कथनों तक ही सीमित नहीं होता जा रहा है? मेरा मानना है देश में अहिंसा की भावना को महत्व न देने वाले नागरिकों की संख्या कम नहीं है। इसका जीता-जागता प्रमाण है आजकल अक्सर सुनने में आने वाली “मॉब-लिंचिंग” (भीड़-कृत हत्या) की घटनाएं। किसी बात पर किसी मनुष्य पर किसी ने छोटे-बड़े अपराध का शक जताया नहीं कि भीड़ इकट्ठी हो जाती है और “मारो-मारो” के नारे के साथ उस असहाय को मौत की सजा दे देती है। शक के घेरे में आया व्यक्ति अपराधी हो सकता है तो भी भीड़ अपना निर्णय सुना दे यह सर्वथा निंद्य और अन्यायपूर्ण माना जाएगा। ऐसे मौकों पर कोई एक या दो व्यक्ति विवेक खो बैठें तो समझ में आता है। लेकिन जब दो-चार नहीं बल्कि दर्जनों लोग उस कुकृत्य में जुट जाएं तो मैं यही कहूंगा कि पूरी भीड़ न अहिंसा को मानती है और न ही न्याय की व्यवस्था को सम्मान देती है। ऐसा हिंसक व्यवहार मॉब-लिंचिंग तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि पग-पग पर देखने को मिलता है। जब किसी महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो वहां भी अन्य जन घटना को रोकने का प्रयास करने के बजाय उस कुकृत्य में भागीदार बन जाते हैं। कुकृत्यों के उदाहरण आपको देखने-सुनने को मिल जायेंगे। लगता है करुणा भाव एवं उदात्त वृत्ति कहीं तिरोहित हो चुके हैं।

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

पिछले तीनएक सालों से प्रधानमंत्री मोदी ने एक और आयाम गांधी जयंती से जोड़ा है, और वह है स्वच्छता संदेश। उनकी स्वच्छता की बातें लोगों को भा गई हैं। । “स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत” का नारा भी प्रचलन में आ चुका है। फिर भी देखने में आ रहा है कि अनेक लोगों का स्वच्छता के प्रति रवैया कमोबेश अपरिवर्तित है। यह मैं अपने शहर वाराणसी (मोदी का निर्वाचन क्षेत्र) में महसूस कर रहा हूं। सड़क के किनारे मूत्रत्याग की लोगों की आदत जा नहीं रही है। कूड़ादान पांच कदम की दूरी पर हो तो वहां तक जाकर कूड़ा-कचरा फैंकने की जहमत कई लोग उठाना नहीं चाहते। सड़कों पर छुट्टा जानवर जहां-तहां घूमते दिख जाएंगे और उनके गोबर से सड़कें गंदी हो रही हैं। ये जानवर सड़क के किनारे रखे कूड़े के डिब्बों से कचरा सड़क पर आज भी यथावत फैलाते मिल जाते हैं। इस तथ्य के प्रति प्रशासन बेखबर बना रहता है। दरअसल स्थानीय प्रशासन “काम चल जा रहा है” की उदासीन भावना से कार्य करता है। उसमें समस्याओं को हल करने का उत्साह एवं संकल्प ही नहीं दिखता है। सफाई का भाव नागरिकों में भी आधा-अधूरा ही है। अपने घर-आंगन को वे साफ भले ही रखते हों, लेकिन आम सड़क को साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान देने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं।  – योगेन्द्र जोशी

 

 

अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) बनाम हवाई परिवहन को बढ़ा

दो-चार दिन पूर्व मुझे अपने हिन्दी अखबार में एक समाचार पढ़ने को मिला। उसकी कतरन (क्लिप) की आंकिक प्रति यहां प्रस्तुत है।

ऊपरी तौर पर इस खबर पर खुश हुआ जा सकता है। अब आप उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों के बीच हवाई सफ़र कर सकते हैं। बसों या (लेट-लतीफ) ट्रेनों से घंटों की यात्रा के बदले घंटे भर में यात्रा संपन्न कर सकते हैं (बशर्ते आप संपन्न व्यक्ति हों)। इस समाचार पर भला क्या टिप्पणी कि जा सकती है? यह जरूर ध्यान में रखें कि हवाई यात्रा के लिए हवाई अड्डे तक आने-जाने का वक्त अक्सर कई घंटे का होता है। बसों/रेलगाड़ियों को दौड़ते-भागते भी पकड़ सकते हैं किंतु जहाजों के लिए समयसाध्य औपचारिकताएं भी निभानी पड़ती हैं।

लेकिन मैं इस स्थल पर हवाई यात्रा के अन्य पहलू पर बात करना चाहता हूं। दरअसल मामला जलवायु परिवर्तन या उसके जुड़े वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) से संबंधित है। आजकल इस विषय पर मीडिया में बहुत-कुछ पढ़ने-सुनने को मिल रहा है। वैज्ञानिकगण, स्वयंसेवी संस्थाएं और दुनिया की कुछ सरकारें पिछले तीन-एक दशकों से इस विषय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करती आ रही हैं। वैश्विक तापन को कैसे रोका जाए इस पर सभी देश समय-समय पर बैठकें करते आ रहे हैं। इस समस्या के लिए कोई व्यक्ति खास कुछ नहीं कर सकता। कायदे-कानून बनाना और उनका क्रियान्वयन करना अंततोगत्वा सरकारों का ही काम  होता है। अस्तु।

हवाई परिवहन को बढ़ावा देना वैश्विक तापन को नियंत्रित करने के उपायों के विरुद्ध जाता है। इसलिए मेरा मत है कि इसे प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। यह बात जरूर है इस तथ्य के बावजूद हवाई परिवहन दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है। खुद अपने देश में हवाई सफर आम होता जा रहा है। एक समय था जब हवाई यात्रा की मात्र कामना ही लोग कर पाते थे और दो-दो तीन-तीन दिन ट्रेनों में बिता के अपने गंतव्य पर पहुंचते थे। तब हवाई सफ़र लोगों की आमदनी के हिसाब से बहुत महंगी होती थी। हवाए सेवाएं भी तब कम ही थीं। परंतु आजकल यह अपेक्षया सस्ती हो चुकी है। अब वाराणसी से बेंगलूरु ट्रेन से जाने के बदले हवाई जहाज से जाना बहुतों के लिए आम बात हो चुकी है।

परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में हवाई परिवहन वैश्विक तापन बढ़ाने में कहीं अधिक प्रभावी है इस बात समझने के लिए वैश्विक तापन से मतलब क्या है यह जानना आवश्यक है। इस धरती पर मौजूद जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, छोटे-बड़े प्राणियों के लिए पृथ्वी की सतह के ऊपर के वायुमंडल की करीब दसएक कि.मी. मोटी तह ही सीधे तौर पर अहमियत रखती है। इस तह का तापमान जीवधारियों को प्रत्यक्षतः प्रभावित करता है, जो किसी जगह दिन भर बदलता रहता है। एक दिन से दूसरे दिन, एक माह से दूसरे माह, भिन्न-भिन्न रहता है। हर वर्ष वस्तुस्थिति फिर-फिर से कमोवेश वैसी ही देखने को मिलती है। किसी स्थान के लिए वर्ष भर का औसत उस स्थान के जलवायु का एक परिचायक होता है। इस औसत वार्षिक तापमान में थोड़े-बहुत उतार चढ़ाव हम सदा से देखते आए हैं। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि कुलमिलाकर दो-ढाई सदियों पूर्व यूरोपीय औद्योगिक क्रांति के बाद से यह औसत तापमान बढ़ता जा रहा है। कहा जा रहा है कि तब से अब तब करीब 1.8° सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है और यह बढ़ते जा रहा है।

मौसम विज्ञानियों के अनुसार बढ़ रहे इस तापमान का कारण वायुमंडल में वायुमंडल में विद्यमान कार्बन-डाईऑक्साइड गैस है। ग्रीनहाउस गैसों के नाम से पुकारी जाने वाली अन्य गैसें (मुख्यतः मीथेन, नाइट्रस-ऑक्साइड, ओजोन तथा जलवास्प) और ऐरोसोल भी वायुमंडल को गर्माने की क्षमता रखती हैं। (ऐरोसोल किसी पदार्थ के हवा में तैरते हुए अतिसूक्ष्म कणों – माइक्रोमीटर से छोटे आकार के – बने होते हैं, जिसके उदाहरण कोहरा, धुंआ, और अति महीन धूलकण हैं।) ये गैसें कैसे वायुमंडल को गर्म रखती हैं इस विषय की विवेचना यहां पर संभव नहीं। यहां बस इतना ही कहना काफी है कि इन सब की जितनी अधिक मात्रा वायुमंडल में बढ़ेगी तापमान बढ़ाने में वे उतने ही कारगर होंगे। अध्ययनों से पता चलता है कि कार्बन-डाईऑक्साइड गैस की वृद्धि जिस तेजी से हो रही है उसकी तुलना में अन्य सभी की नगण्य है। इसलिए इस गैस को ही वैश्विक तापन के लिए जिम्मेदार माना गया है।

सवाल पूछा जा सकता है कि वायुमंडल में उपर्युक्त कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण – संक्षेप में कार्बन प्रदूषण – बढ़ क्यों रहा है। इसका उत्तर सरल है: खनिज इंधनों के प्रयोग से। खनिज कोयला, पेट्रोल-डीजल आदि (पेट्रोलिअम इंधन), और भूगर्भ से प्राप्य गैस खनिज अथवा जीवाश्म इंधन कहे जाते हैं। इन इंधनों के जलने से हमें वह ऊर्जा प्राप्त होती है जिससे मोटर-वाहन, डीज़ल इंजन, हवाई जहाज, बिजली घर, इत्यादि चला करते हैं। जलने की इस प्रक्रिया में कार्बन-डाईऑक्साइड पैदा होती है जो वायुमंडल में घुल जाती है। जाहिर है जिस कार्य में अधिक इंधन जलेगा उससे उतना ही अधिक कार्बन प्रदूषण होगा।

अब लौटिए हवाई परिवहन की बात पर। विभिन्न माध्यमों द्वारा परिवहन पर प्रति यात्री प्रति कि.मी. कितना कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण (संक्षेप में कार्बन प्रदूषण) पैदा होता है इसका मोटा-माटी अंदाजा यूरोपीय देशों के लिए उपलब्ध अधोलिखित आंकड़ों के आधार पर लगाया जा सकता है:

माध्यम यात्री संख्या औसतन कार्बन प्रदूषण/यात्री/कि.मी.
रेलगाड़ी          156           14 ग्राम
छोटी कार            4           42 ग्राम
बड़ी कार            4           55 ग्राम
बस           12.7           68 ग्राम
मोटरबाइक            1.2           72 ग्राम
हवाई जहाज           88          285 ग्राम
समुद्री जहाज            –          245 ग्राम

इन सांख्यिक आंकड़ों को शब्दश: नहीं लिया जाना चाहिए। और भारत जैसे देश पर तो ये लागू भी नहीं हो सकते। हम जानते हैं कि अपने देश में रेलगाड़ियां हों या बसें, यात्री प्रायः ठूंसे ही रहते हैं। इसलिए प्रति व्यक्ति प्रदूषण यूरोप की तुलना में 5-10 गुना कम ही होगा। दूसरी ओर कारों से प्रदूषण कुछ अधिक ही होगा क्योंकि यहां सड़कें सपाट और गड्ढामुक्त नहीं होतीं। यह भी ध्यान दें कि यदि कार में अकेला व्यक्ति सवार हो तब प्रति व्यक्ति प्रदूषण की मात्रा 2-3 गुना अधिक होगी।

हवाई जहाज का मामला कुछ भिन्न है। आम तौर पर ये 90% तक यात्रियों से भरे ही रहते हैं चाहे भारत हो या यूरोप-अमेरिका। इसलिए भारत पर भी ये कमोबेश लागू होंगे। एक बात स्पष्ट कर दूं कि उक्त तालिका छोटे हवाई जहाजों और कम दूरी की उड़ान के लिए हैं। बड़े जहाजों की कार्यकुशलता अपेक्षया बेहतर होती है। यह भी ज्ञातव्य है कि लंबी उड़ानों पर खर्चा कम आता है। इसलिए लंबी दूरी के लिए संबंधित आंकड़ा 100 तक नीचे जा सकता है।

उक्त तालिका से स्पष्ट है कि अपने देश में रेलगाड़ी की तुलना में कम दूरी की हवाई यात्रा पर प्रति व्यक्ति प्रति कि.मी. प्रदूषण 20-30 गुना या उससे अधिक होता है। यह बात तो सुस्पष्ट है कि हवाई यात्रा किसी अन्य साधन की तुलना में काफी अधिक प्रदूषण पैदा करता है इसलिए यह जलवायु के लिए अधिक हानिकर है। अकेले व्यक्ति का कार से आवागमन भी हानिकर ही है। इसलिए इन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।

इस समय सारे विश्व में बढ़ते वैश्विक तापन पर चिंता व्यक्त की जा रही है और उन उपायों की खोज की जा रही है जिससे प्रदूषण नहीं भी घटे तो कम से कम बढ़े तो नहीं। ऐसी दशा में हवाई परिवहन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्या, विशेषतः छोटी दूरियों के लिए? -योगेन्द्र जोशी