Why one should opt for NOTA : Its importance in Elections

Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति

Independence Day, August 15

My Good Wishes to all Countrymen

This on the Occasion of Independent Day

Voter’s right: Voting for no Candidate

The term NOTA is an acronym for “None Of The above” option available to voters in elections who find no candidate to their satisfaction. The Ballot Paper earlier and Electronic Voting Machine (EVM) now lists, from top to Bottom in some prescribed order, Names and Symbols of all Candidates fighting an Election. One selects the candidate from that list and puts one’s seal (a Cross Mark) against that candidate’s name on Ballot Paper, or one presses the button against that name on the EVM.

“Conduct of Elections Rules, 1961” gives a voter the Right of NOT Voting in favour of any Candidate. But it also states that the number of such “No Votes” would not affect the outcome of the Election Results. That means

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“सरकार का काम” – कविता  : एक प्रयोग

हिन्दी तथा कुछ और भी

मुझे, तुझे, हम सब को चाहिए सुरक्षा,

सुरक्षा मुहैया कराना सरकार का काम।

मेरी, तेरी, हमारी कोई जिम्मेवारी नहीं,

सुरक्षा करना-कराना सरकार का काम।

हम घर खुला छोड़ दें चल दें कहीं भी

चोरी न हो, उसे रोकना सरकार का काम।

कान में फोन लगाए रेल-पटरी पार करें

तब हमें चेताना-बचाना सरकार का काम

नदी-सागर के बीच सेल्फी लेने लगें हम

अनहोनी से बचाना भी सरकार का काम

उड़ा नियमों की धज्जी वाहन चलाएं हम,

फिर कहें हादसे रोकना सरकार का काम।

सड़कपै बेखौफ वाहन चलाएं लगाएं जाम,

जाम से निजात दिलाना सरकार का काम।

बात-बात पै गुस्से से नुकसान पहुंचाएं हम

उसका मुआवजा भरना सरकार का काम।

सड़क पर कचरा बिखेरें ये हमारी मरजी,

सड़क साफ रहे यह तो सरकार का काम।

पान खाएं पीक थूकें जहां-तहां सड़क पर

सड़क की धुलाई करना सरकार का काम

किस-किस की छूट मिले कहना है मुश्किल

मनमरजी से जीने दे यही सरकार…

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11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी

 

“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से…

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India’s Population Surpasses China’s by 2024 – Should we Rejoice or Regret?

2024 तक भारत की आबादी चीन के बराबर या अधिक हो जायेगी (यू.एन. रिपोर्ट)। इस विषय पर मेरे विचार (आलेख अंग्रेजी में)।

Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति

UN Report on World Population

The United Nations (UN) has recently released its report on World Population Prospects.  The report presents a disappointing picture of many Asian and African countries. Regarding India it says:India’s population is likely to exceed that of China by around 2024. When I came across this news item my reaction to it was something like this:

Should we countrymen rejoice on that news, or just regret?

Rejoice? Yes, after that date, we shall be the biggest country on this planet. We shall then be known to be not only the biggest democracy but also population-wise the biggest country. Would not that be a matter of pride for us?

Regret? The country is already riddled with numerous problems. Ever -increasing population is going to add more and more to them. Have we enough resources to solve the population-caused problems? No. Then this population growth must…

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उत्तर प्रदेश में योगी-राज: अभी तक तो असफल होता दिख रहा है

मेरी कुमाउंनी बोली (उत्तराखंड) में एक कहावत है: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब बताने से पहले सोचता हूं कि इसमें एक कड़ी और जोड़ दूं: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि चेलि थैं कै, चेलिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब कुछ यों समझ सकते हैं: किसी कार्य को निबटाने के लिए सास ने बहू (पुत्रवधु) से कहा; बहू ने उसे करने के लिए बेटी को कहा; अल्पवयस्क बेटी ने कार्य की गंभीरता समझे बिना कुत्ते से कहा; और कुत्ते ने स्वभाव के अनुकूल पूंछ हिला दिया। कार्य जैसा का तैसा रह गया।

शासन – अंतर नहीं दिखता

ऊपर्युक्त कहावत हमारे शासकीय तंत्र के चरित्र पर काफी हद तक लागू होती है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता सम्हाले योगी आदित्यनाथ को अब तीन माह होने को हैं। इस अल्पावधि में वे जनता की तमाम उम्मीदों को पूरा करते हुए दिखने लगें ऐसी अपेक्षा मैं नहीं रखता। फिर भी कुछ बातें हैं जिनकी झलक नये शासकीय तंत्र में दिखनी ही चाहिए थीं। मैं यह उम्मीद करता था कि जो भाजपा चुनावों के दौरान जोरशोर से कहती थी कि प्रदेश में जंगलराज चल रहा है और अपराधी खुले घूम रहे हैं उसी दल के नेता और कार्यकर्ता अब अपनी अराजकता दिखा रहे हैं। अगर आप समाचार माध्यमों पर विश्वास करें तो ऐसी वारदातें सुनने-देखने में आई हैं जिनमें किसी न किसी बहाने भाजपा के नेता-कार्यकर्ता कानून व्यवस्था अपने हाथ में लिए हों। बसपा एवं सपा की पूर्ववर्ती सरकारों में आपराधिक छवि वाले उनके कार्यकर्ता असामाजिक कृत्यों में लिप्त रहते थे। अब वैसा ही कुछ भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं। नयी शासकीय व्यवस्था में भाजपा के लोगों को अनुशासित होकर आम जन के समक्ष दल की अच्छी छवि पेश करनी चाहिए थी। ऐसा हुआ क्या?

योगी जी ने जब सत्ता सम्हाली तो उन्होंने गरजते हुए घोषणा की कि अपराधी तत्व प्रदेश छोड़कर चले जायें अन्यथा वे सींखचों के पीछे जाने के लिए तैयार रहें। इस संदेश से अपराधियों के बीच भय की भावना जगनी चाहिए थी। ऐसा हुआ नहीं। आपराधिक घटनाएं कमोबेश वैसी ही हो रही हैं जैसी बीते समय में हो रही थीं। जो सपा शासन आपराधिक वारदातों के लिए बदनाम रही है वह भी अब कह रही है, “कहां हुए अपराध कम?”

मेरी जानकारी में योगी जी का कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं रहा है। पूर्णतः अनुभवहीन व्यक्ति को समुचित निर्णय लेने में दिक्कत हो सकती है। हमारे लोकतंत्र में यह अघोषित परंपरा रही है कि जिम्मेदार पद पर बैठे अनुभवहीन व्यक्ति के लिए पर्दे के पीछे से मार्गदर्शन करने वाला कोई न कोई रहता है। सुना ही होगा कि कैसे महिला ग्रामप्रधानों के कार्य संपादन उनके पतिवृंद करते आए हैं। बिहार में श्रीमती रावड़ी मुख्यमंत्री बनीं (बनाई गयीं) तो उनके पति लालू जी ही दरअसल राजकाज में मदद कर रहे थे। जब अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बिठाया गया था तो उनके पीछे पिता मुलायम जी का मार्गदर्शन था। लेकिन ऐसा कुछ योगी जी के साथ नहीं है यही मैं समझ रहा हूं। ऐसा नहीं कि इतिहास में सदैव अनुभवी ही सफल होते आये हों। कई बार एकदम नया व्यक्ति भी सफल शासक सिद्ध होते हैं। योगी जी उस श्रेणी में हैं ऐसा नहीं लगता।

प्रशासनिक तंत्र

योगी जी ने सत्ता पर काबिज होते ही अनेकानेक निर्देश अपने प्रशासनिक अधिकारियों को दिए। उन निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है इसे वे क्या समझ पाये हैं? और जो अधिकारी निर्देशों के अनुसार नहीं चल रहा हो उसके विरुद्ध क्या कार्यवाही की गयी? लेख के आरंभ में जो मैंने सुनाया, “सास ने बहू से …” वह प्रशासनिक तंत्र पर लागू होता  है। मुख्यमंत्री शीर्षस्थ अधिकारियों को निर्देश देते हैं, वे कनिष्ठ अधिकारियों को, वे अपने मातहतों को, …।” ये सिलसिला चल निकलता है, और सबसे नीचले पायदान पर का व्यक्ति, “अरे ऐसे आदेश तो आते ही रहते हैं” की भावना से पुराने ढर्रे पर ही चलता रहता है। मेरी समझ में यही कारण होगा कि योगी-राज में अभी कोई खास अंतर दिखाई नहीं देता है।  

निर्देशों की बात पर मुझे अपने वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षक के रवैये का स्मरण हो आता है। बात सालों पहले की है जब मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत था। मेरे विषय भौतिकी (फिज़िक्स) की प्रायोगिक कक्षा में वे अक्सर विलंब से पहुंचते थे। तब कहते थे, “अरे यार, भूल गये कि क्लास है।” कभी-कभी प्रयोगशाला-परिचर (लैब अटॆंडेंट) उन्हें बुलाने भी चला जाता था। मैं शिष्टता के नाते कुछ कहता नहीं था, लेकिन उनके भूलने को मैं “सुविधानुसार विस्मृति” (फ़गेटफ़ुलनेस ऑव्‍ कन्वीनिअंस) मानता था। मैं समझ नहीं पाता था कि जिस दायित्व के लिए व्यक्ति ने नियुक्ति स्वीकारी हो उसे उस दायित्व की याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

योगीजी को यह क्यों कहना पड़ता है कि शिक्षक समय पर कक्षा में जायें, चिकित्सक परामर्श कक्ष में समय पर पहुंचें, पुलिस चौकी प्रभारी वारदात की एफ़आईआर दर्ज करें, आदि-आदि। यह तो संबधित अधिकारियों-कर्मियों के दायित्वों में निहित है। यह सब तो उन्हें करना ही करना है अपनी सेवा-शर्तों के अनुरूप। योगी जी को निर्देश निर्गत करने के बजाय यह पूछना चाहिए कि वे दायित्वों के अनुसार कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं। अगर उन्हें अपने दायित्वों का ही ज्ञान न हो और उसमें रुचि ही न लें तो फिर शासकीय सेवा में क्यों हैं?

सरकारी ‘सेवा’ बल्लेबल्ले

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था क्यों घटिया दर्जे की है इसे समझना जरूरी है। सरकारी नौकरी में आर्थिक सुरक्षा उच्चतम श्रेणी की रहती है। ठीकठाक वेतन के अलावा कई प्रकार के लाभ और रियायतें, सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, आदि इस नौकरी की खासियतें हैं। जब इतना सब किसी को मिल रहा हो तो दायित्व-निर्वाह में ईमानदारी तो बरतनी ही चाहिए। परंतु दुर्भाग्य है कि नौकरी के लाभ तो सभी चाहते हैं किंतु बदले में निष्ठा से काम भी करें यह भावना प्रायः गायब रहती है।

निजी क्षेत्रों में व्यक्ति की अक्षमता माफ नहीं होती, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। लेकिन सरकारे नौकरी में निर्देश पर निर्देश दिए जाते हैं, या तबादला कर दिया जाता है, अथवा कुछ काल के लिए निलंबन। तबादला का मतलब यह है कि निकम्मेपन की जरूरत ‘यहां’ नहीं लेकिन ‘वहां’ है। वाह! लोगों को यह एहसास नहीं है कि निलंबन दंड नहीं होता है। यह तो महज एक प्रक्रिया है तथ्यों की छानबीन के लिए, ताकि दंडित करने न करने का निर्णय लिया जा सके। आम तौर पर 90 दिनों के अंतराल पर निलंबन वापस हो जाता है, और मुलाजिम बाइज्जत अपनी कुर्सी पर!

आजकल सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी देखी जाती है। इच्छुक जन हर प्रकार के हथकंडे अपनाते देखे जाते हैं। सत्ता पर बैठे लोग और प्रशासनिक अधिकारी जन अपने-अपने चहेतों को नियुक्ति देते/दिलाते है। जातिवाद, भाई-भतीजाबाद, क्षेत्रवाद आदि की भूमिका अहम रहती है। जब नियुक्तियां ऐसी हों तो अच्छे की उम्मीद क्षीण हो जाती है।

सरकारी नियुक्तियां

नियुक्तियों में शैक्षिक एवं शारीरिक योग्यता (जहां और जैसी उसकी अहमियत हो) तो देखी जाती है, लेकिन किसी भी सरकारी विभाग में नियुक्तियों में आवेदक के बौद्धिक स्तर (इंटेलिजेंस कोशंट) एवं भावात्मक स्तर (इमोशनल कोशंट) का आकलन नहीं किया जाता है। मेरा मानना है कि इन दोनों का गंभीर आकलन नियुक्तियों में होना चाहिए। पुलिस बल में तो इनकी आवश्यकता कुछ अधिक ही है। ऐसे पुलिसकर्मियों की खबरें सुनने को मिलती हैं जिनकी हिरासत से अपराधी चकमा देकर भाग जाते हैं। साफ जाहिर है उनका बौद्धिक स्तर कम ही रहता है। इसी प्रकार वे कभी-कभी एफ़आइआर तक नहीं दर्ज करते हैं, खास तौर पर रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध, क्योंकि वे संवेदनशील नहीं होते हैं। हमें आम जनों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए यह भावना उनके मन में होनी चाहिए कि नहीं? अक्सर देखा गया है कि वे भुक्तभोगी का शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं।

जब संवेदेनाहीन व्यक्ति सरकारी तंत्र में हो तो वह आम जन के प्रति ही नहीं अपितु अपने आधिकारिक कर्तव्यों के प्रति भी लापरवाह होता है। और यही इस उत्तर प्रदेश में हो रहा है। यह धारणा सरकारी मुलाजिमों के दिलों में गहरे बैठ चुकी है कि उन्हें उनके निकम्मेपन के लिए दंडित नहीं किया जायेगा। वस्तुतः प्रशासनिक तंत्र के संदर्भ में लापरवाही, कामचोरी, नकारापन, आदि सभी कुछ जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। एक बार नौकरी में घुस जाओ और जिन्दगी मजे में गुजार लो। बस अपने ऊपर के अधिकारियों को खुश रखो; काम करो या न, बस काम करते हुए-से दिखो।

पिछले 25-30 वर्षों में प्रदेश प्रशासनिक गिरावट के दौर से गुजर चुका है। उसे पटरी पर लाना आसान काम नहीं है। महज निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नही होने का यह योगी जी अभी तक समझ नहीं पाये हैं। उन्हें देखना चाहिए कि काम क्यों नहीं हो रहा है। यदि हो रहा है तो घटिया स्तर का क्यों हो रहा है। कुछ को दंडित करके दिखाएं; निलंबन से कुछ नहीं होने वाला।

निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नहीं होगा। निर्देश देना यानी “सास ने बहू से कहा, बाहू ने …”।

तंत्र वही है। उसका चरित्र अभी तो अपरिवर्तित ही है। इसलिए योगीराज की सफलता संदिग्ध है। – योगेन्द्र जोशी

भारतीय समाचार माध्यमों (टीवी चैनलों, अकबारों) के मालिकों, सपादकों, पत्रकारों का रुदन क्या वाकई गंभीर है?

प्रेस क्लब में पत्रकारों की बैठक

” ’तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्तनशीं था,

उसको भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।’

“शुक्रवार की शाम दिल्ली के प्रेस क्लब में इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और लेखक अरुण शौरी ने जब पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब का ये शेर पढ़ा तो वहाँ मौजूद 500 से ज़्यादा पत्रकारों को मालूम था कि शेर दरअसल किसके लिए पढ़ा गया है। उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट से शेर का स्वागत किया.

“प्राइवेट टीवी चैनल एनडीटीवी के प्रोमोटरों प्रणय रॉय और राधिका रॉय के घर और दफ़्तरों पर पिछले हफ़्ते सीबीआई के छापों के ख़िलाफ़ दिल्ली के पत्रकारों की ये दुर्लभ बैठक थी और अरुण शौरी के सीधे निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे.”  (http://www.bbc.com/hindi/india-40235229)

मैं न तो मोदी जी का समर्थक हूं और न ही उनका प्रशंसक।

और मैं विरोधी भी नहीं हूं।

मैं विरोधी हूं तो उन सबका जो बातें तो ऊंची-ऊंची करते हैं लेकिन उनका आचरण उसके अनुकूल नहीं रहता। और ऐसे लोग समाज में सर्वत्र, सभी क्षेत्रों में मिल जायेंगे। मीडिया कोई अपवाद नहीं। उसका स्वयं को भिन्न और दोषों से परे दिखाने का प्रयास महज एक ढोंग है।

प्रेस क्लब में पत्रकारिता से संबद्ध जो कार्यक्रम हुआ उसमें शामिल कौन थे? क्या वे वाकई ईमानदार लोग हैं? मुझे शंका है। अवश्य की कुछ जने गंभीर होंगे किंतु मात्र एक छोटा प्रतिशत। जिस प्रकार समाज के अन्य सभी क्षेत्रों में लोग अपने-अपने हितों को साधने में लगे हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर, उसी प्रकार मीडिया में भी अधिसंख्य जनों को अपनी चिंता रहती होगी ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

मैं जब हितों की बात करता हूं तो उसकी बहु-आयामी परिभाषा लेकर चलता हूं। किसी के लिए धन-संपदा बटोरना हित हो सकता है तो किसी अन्य के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा या समाज में विशिष्ठ स्थान पाना; किसी के लिए सत्ता या तत्सदृश ताकत बटोरना और किसी के लिए ईमानदार, समाज के लिए समर्पित, एवं लोकतांत्रिक स्वातंत्र्य का अलमबरदार (झंडा-वाहक) दिखना, इत्यादि। कदाचित मीडिया वाले इस चौथी चीज के शौकीन हों।

ईमानदार कौन ?

इस “इंडिया दैट इज़ भारत” देश में कदाचार सामाजिक चरित्र का हिस्सा बन चुका है। कौन ईमानदार है यह पता ही नहीं चलता। किसी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा सकते हैं लेकिन आम तौर पर किसी पर आरोप सिद्ध हो नहीं पाता। आरोप लगाने वाला भी साफ-सुथरा और जिस पर आरोप लगता है वह भी साफ-सुथरा। दोनों ही संदेह का लाभ (बेनेफ़िट औफ़्‍ द डाउट) पा जाते हैं। पर क्या यह संभव है कि दोनों की छवि साफ हो? तार्किक समीक्षा करने का आदी व्यक्ति इस तथ्य को सहज रूप से जानता है कि दोंनों भ्रष्ट तो हो सकते हैं, लेकिन दोनों ही की छवि एक साथ साफ हरगिज नहीं हो सकती।

मैं ईमानदार होने की बात करने वाले सभी दावेदारों पर शक करता हूं चाहे वे राजनीति में हों या मीडिया में। इसका मतल्ब यह नहीं कि देश ईमानदारों से वीरान है। नहीं। मैं जिस व्यक्ति को देख-परख नहीं लेता उसे आंख मूंदकर ईमानदार नहीं मान लेता भले ही वह मीडिया का व्यक्ति ही क्यों न हो। जब भी कोई आरोपों के घेरे में आता है और उसके विरुद्ध जांच आरंभ होती है तो वह चीख-चीख कर कहने लगता है “मेरे विरुद्ध साजिश रची गयी है”, “यह तो बदले की भावना से किया जा रहा है” इत्यादि। देश में भ्रष्टाचार है यह हर कोई स्वीकारता है लेकिन कोई भ्रष्टाचारी नहीं है। वाकई चमत्कार है ऐसा होना।

मैं ये बातें इसलिए कह रहा हूं कि हाल में एनडीटीवी (NDTV) के मालिक और उनकी पत्नी के ठिकानों पर जांच एजेंसियों का छापा पड़ा। छापा सकारण पड़ा यह जांच एजेंसियां कह रही हैं। यदि वे झूठे आरोपों के आधार पर जानबूझकर ऐसा कदम उठा रही हैं तो यह वास्तव में आपत्तिजनक है। यदि देश में ऐसा ही बहुत कुछ हो रहा है जैसा कि मीडिया के कुछ जनों का मत है तो यह देश के दुर्भाग्य का द्योतक है।

लेकिन मैं कैसे मानूं कि उक्त आयोजन में मीडिया वाले सच ही बोल रहे हैं और जांच एजेंसियां झूठ? एक आम नागरिक के नाते मैं किस पर भरोसा करूं? और क्या उस बैठक में उस समय अनुपस्थित अन्य मीडियाकर्मी भी उनसे सहमत हैं?

आपातकाल ?

मेरी जानकारी में अपने जैसा यह हालिया पहला वाकया है। हो सकता ऐसे ही दो-एक और भी मामले हों। किंतु इतने भर से क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश में पिछली (बीसवीं) शताब्दी के 7वें दशक के मध्य के आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है? उस आपातकाल से देश की मौजूदा दशा की तुलना के लिए एक नहीं कई दृष्टांत सामने होने चाहिए। इस समय कितनों की धर-पकड़ हो रही है? कितने लोग भूमिगत हो चुके हैं? कितनों को सलाखों के पीछे भेजा चुका है? ऐसे प्रश्न तो पूछे ही जाने चाहिए।

यदि आपात्कालीन-सी स्थतियां बन चुकी हों तो उसका ज्ञान इन मीडियाकर्मियों को तभी क्यों हुआ जब उनकी बिरादरी के किसी सदस्य पर आंच आई हो? अभी तक उन गंभीर मामलों में इन लोगों ने चुप्पी क्यों साध रखी थी जो उनके मतानुसार अन्यत्र आपातकाल की याद दिलाने वाली घटित हो चुकी हैं? उन सब का खुलासा क्यों नहीं किया संबंधित व्यक्तियों ने?

जब कोई शंका के घेरे में हो तो उसके विरुद्ध जांच होनी चाहिए कि नहीं? और उस प्रक्रिया में छापा पड़ना भी स्वाभाविक है। एनडीटीवी के मालिक के मामले में जो हुआ है उसे निराधार कह देना जल्दीबाजी होगी। इस पर भी गौर करें कि स्वयं एनडीटीवी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

मीडिया के वरिष्ठ, सुप्रतिष्ठित सदस्यों की बातों को आम जन गंभीरता से लेते हैं यह मेरी व्यक्तिगत धारणा है। इसलिए उन्हें वस्तुस्थिति का आकलन वस्तुनिष्ठ आधार पर करना चाहिए। अपने वैयक्तिक मनोभावों को जन-सामान्य के सम्मुख निर्विवाद सत्य के तौर पर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। अपनी प्रतिष्ठा और आम जन का उनमें भरोसे का लाभ लेकर अतिरंजित बातें करना उन्हें शोभा नहीं देता। उन्हें अहंकार से बचना चाहिए।

वर्तमान सरकार से बहुत-से लोग नाखुश होंगे, बहुतों को असुविधा हो रही होगी, फिर भी यह कहना कि वह आपातकाल की स्थिति रच रही है उचित नहीं होगा। अभी स्थिति भयावह नहीं है! होती तो हमें भी दिखती। फिर बता दूं मैं भाजपा का नहीं हूं। – योगेन्द्र जोशी