अस्पृश्यता: मेरे अनुभव

मेरा जन्म उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्र के एक छोटे-से गांव में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के चंद महीनों पहले हुआ था । उत्तराखंड में दलितों की संख्या अपेक्षया कम है । तदनुसार मेरे गांव के आसपास भी उनकी संख्या अधिक नहीं रही है । मैं जिस देहाती माहौल में पैदा हुआ और पला-बढ़ा वह गंभीर रूढ़िवादिता से ग्रस्त था । यों तो अल्मोड़ा-नैनीताल जैसे नगर भी रूढ़िवादिता से मुक्त नहीं रहे हैं, किंतु यह ग्रामीण क्षेत्रों में साफ झलकती रही है । इसका एक गंभीर पहलू था जातीय भेदभाव । यह भेदभाव रोजमर्रा के जीवन में जातीय ऊंच-नीच के तौर पर इतना साफ नजर आता था कि किसी को भी उसका ज्ञान छोटी उम्र में ही हो जाता । कौन किस जाति का है और तदनुसार किसके साथ कितनी निकटता अथवा दूरी रखी जाए इसे सीखने में वक्त नहीं लगता था । सौभाग्य की बात यह थी कि मैंने इस भेदभाव को किसी गंभीर जातीय संघर्ष के रूप में बदलते नहीं देखा । मेरा अनुभव मेरे जीवन के आरंभिक 15-16 वर्षों का है; उसके बाद तो मेरा वहां जाना कभी-कभार दो-एक दिनों के लिए ही हुआ है । अब स्थिति बहुत कुछ बदल चुकी होगी ऐसा मेरा विश्वास है ।

मेरा अनुभव रहा है कि जातीय अंतर को लोग बहुत सहज भाव से लेते थे, कुछ यों कि जैसे यह तो ईश्वर ने ही बनाया है, उसे तो नियति के तौर पर स्वीकारा ही जाना चाहिए, सब एक समान भला कैसे पैदा हो सकते हैं ? जैसे राजा प्रजा से श्रेष्ठतर, धनवान निर्धन से श्रेष्ठतर, शिक्षित अनपढ़ से श्रेष्ठतर होता है, ठीक वैसे एक जाति दूसरे से श्रेष्ठतर होती है । इस तथ्य को सभी निर्विवाद रूप से स्वीकारते थे । जाति के मामले में तो पूरा भारतीय समाज मानसिक जड़ता का इस कदर शिकार है कि वह उसे स्वाभाविक एवं नैसर्गिक मानता है । आज भी आप कितना ही अधिक शिक्षित (सुशिक्षित नहीं!) हों जातीयता से मुक्त नहीं हो सकते ।जातीय अंतर का महत्त्व कितना गंभीर था इसे समझा सकना मेरे लिए आसान नहीं है । इसकी बारीकियां जिसने नजदीक से देखी हैं, वही समझ सकता है । इसको यों समझ सकते हैं कि सबसे ऊपर माने जाने वाले ब्राह्मण भी परस्पर बंटे हुए थे । तथाकथित सर्वाधिक कुलीन ब्राह्मण हर किसी अन्य ब्राह्मण के हाथ का बना भोजन तक नहीं ग्रहण कर सकते थे, उनके साथ वैवाहिक संबंधों का तो प्रश्न ही नहीं उठता था । इस अंतर को आप हुक्के-पानी का अंतर कह सकते हैं । ‘हुक्का’ बराबरी के स्तर पर ही परस्पर बांटा जा सकता है ! मेरा खयाल है कि ब्राह्मणों की 5 या 6 उपजातियां तो रही ही होंगी । हर स्तर के ब्राह्मण अपने से ‘निम्नतर’ वाले के बनाये भोजन से परहेज करता था । कुछ ऐसी ही परंपरा थी । अब यह भेद उतना स्पष्ट नहीं रह गया है, यद्यपि सैद्धांतिक स्तर पर इसका ज्ञान लोग रखते हैं । अन्य सभी जातियों के लिए ब्राह्मण सर्वोपरि थे । उनमें भी ऊंच-नीच की बारीकियां रहते आई हैं । हुक्के-पानी के अंतर के बावजूद साथ-साथ उठना-बैठना अधिकांश जातियों में आम बात थी, दलितों को छोड़कर ।

उस पर्वतीय क्षेत्र में दलितों की स्थिति वस्तुतः दयनीय हुआ करती थी । उनकी आर्थिक स्थिति प्रायः अति कमजोर रहती थी । शारीरिक श्रम ही उनकी जमापूंजी रही है और उनसे विभिन्न श्रमसाध्य कार्य लिये जाते थे । उस जमाने में हमारे इलाके में दलितों को ‘डूम’ (कदाचित् डोम का ही स्थानीय पर्याय) कहा जाता था । लेकिन स्वतंत्रता-प्राप्ति के साथ ही उनको ‘शिल्पकार’ संबोधित किया जाने लगा । फिर भी अनौपचारिक वार्तालाप में ‘डूम’ शब्द काफी समय तक प्रचलन में रहा ।

जातिभेद का सबसे अहम पहलू यह था कि ये दलित अस्पृश्य या अछूत हुआ करते थे । उन्हें छूना ‘ऊपरी’ जातियों के लिए वर्जित था । सुना है कि दशकों पहले उनके छू जाने पर लोग स्नान करके ‘शुद्धि’ प्राप्त करते थे । लेकिन मेरे जन्म से पहले ही ‘शुद्धि’ का तरीका अपेक्षया सरल हो चुका था । गंगाजल की भावना के साथ सामान्य जल के कुछ छींटे उस व्यक्ति के शरीर पर डाल दिये जाते थे जिनसे कोई दलित छू गया हो । दिलचस्प यह था कि ‘कुलीन’ लोगों ने उस स्थिति के लिए भी मान्य तरीका ईजाद कर लिया, जब आसपास जलबिंदु छिड़कने वाला कोई न हो । पेड़-पौधे की ताजी हरी टहनी जैसे साधन को पानी में डुबोकर स्वयं ही अपने ऊपर जल छिड़क लिया जाता था ।

हमारे यहां की स्थिति इतनी विकट नहीं थी जितनी दक्षिण भारत में कभी हुआ करती थी, जैसे मैंने सुना है । कहा जाता है कि वहां दलित की छाया भी अगर सवर्ण के देह को छू जाये तो उसे शुद्धि की प्रक्रिया से गुजरना होता था ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल के बारे में पढ़ते समय मुझे अस्पृश्यता संबंधी अपने अनुभव याद आ गये । चर्चिल के शब्द ये हैं:
“These Brahmins who mouth and patter the principles of Western Liberalism, and pose as philosophic and democratic politicians, are the same Brahmins who deny the primary rights of existence to nearly sixty millions of their own fellow countrymen whom they call ‘untouchable‘, and whom they have by thousands of years of oppression actually taught to accept this sad position. They will not eat with these sixty millions, nor drink with them, nor treat them as human beings. They consider themselves contaminated even by their approach.”
(स्रोतः http://www.winstonchurchill.org/learn/speeches/speeches-of-winston-churchill/105-our-duty-in-india)

– योगेन्द्र जोशी

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