मेरी प्राथमिक पाठशाला

मेरी प्राथमिक शिक्षा तत्कालीन उत्तर प्रदेश, और अब उत्तराखंड, के अपने छोटे-से गांव के ही पास की प्राथमिक पाठशाला – जिला बोर्ड द्वारा संचालित प्राइमरी स्कूल – में हुई थी । दो हॉलनुमा कमरों एवं बहु-उद्येश्यीय एक छोटे कमरे और उनके बाहर छतदार बरंडे वाले उस समय के मेरे स्कूल में अधिकांश समय कक्षाएं बाहर खुले मैदान में ही – आम तौर पर पेड़ों की छांव में – होती थीं । कमरों का प्रयोग तभी होता था जब पानी बरस रहा हो अथवा एकदम चटक असह्य धूप फैली हो । तब पहली से पांचवीं तक की दो कक्षाओं की व्यवस्था उन कमरों और बची कक्षा बाहर बरंडे में व्यवस्थित की जाती थीं । कुल अध्यापक तीन । मैंने दस साल पूरा करते-करते पांचवीं कक्षा पास की थी । अब तक तो उस विद्यालय की स्थिति बदल चुकी होगी – शंका होती है कि सरकारी होने के कारण उसके हालात बिगड़ ही गये होंगे । बीस सालों से अधिक ही हो चुका कि मैं वहां जा नहीं पाया । मेरा गांव अब उजड़-सा गया है, केवल दो-चार लोग ही उधर बचे हैं; प्रायः सभी रोजी-रोटी कमाने बाहर निकल चुके हैं । वहां जाने की हिम्मत नहीं होती ।

अस्तु । मैं यह सगर्व कह सकता हूं कि मैंने उस विद्यालय में बहुत कुछ सीखा था । मेरे अध्यापक नियमतः कक्षाएं लेते थे, यद्यपि उन्हें दो-दो कक्षाएं एक साथ लेनी होती थीं । किसी एक कक्षा के छात्रों को लेखन-पठन कार्य सौंपकर वे दूसरे को पढ़ाने लगते थे । लेकिन पढ़ाई होती थी । शैतानी करने और गृहकार्य न करने पर डांट-डपट ही नहीं कभी-कभार मार भी पड़ती थी । काम कमोबेश चलता ही रहता था । अपनी पुस्तक की वह तस्वीर, जिसमें मानव देह की धमनियों और शिराओं को क्रमशः लाल एवं नीले रंग से रंगकर प्रदर्शित किया गया था, मेरे स्मृतिपटल पर आज भी करीब-करीब ताजा है । मुझे याद है कि कैसे हम लोग सादे कागज को पेंसिल से उर्ध्व-क्षैतिज रेखाएं खींचकर छोटे-छोटे खानों में बांटते थे और फिर उनके सहारे अपने जिले (तब अल्मोड़ा) का नक्शा बनाते थे । बाद में उस पर जिले की प्रमुख नदियों, पहाड़ियों, कस्बों-नगरों आदि के नाम अंकित करते थे । शायद कक्षा तीन में यह किया होगा । बाद में कक्षा चार में प्रदेश और कक्षा पांच में देश के नक्शे का अभ्यास भी ऐसे ही किया होगा । भाषा की पुस्तकों में नानक-कबीर-सूर आदि की रचनाओं के अंश पढ़ते थे और शिक्षक से अर्थ सीखते थे (जो, सच कहूं, तब हम लोगों के समझ में नहीं आता था) । हमें हस्तलिपि सुधारने की खास हिदायत दी जाती थी । सुलेख का अभ्यास निरंतर चलता था और उसके लिए जिन पर खास तरीके से चार-चार के समूहों में लाइनें खिंची हों ऐसी कापियां हम प्रयोग में लेते थे । इतना ही नहीं, गीली मिट्टी लेकर खिलौने बनाना भी हमारे अध्ययन में शामिल था । मुझे याद आता है कि मिट्टी की चिड़िया बनाना सर्वाधिक लोकप्रिय था । हम उसके विभिन्न अंगों को तरह-तरह के रंगों से रंगते थे ताकि वह खूबसूरत बने । इन सब कामों पर अंक भी मिलते थे । काम करना जरूरी होता था । विद्यालय-भवन के बाहर अगल-बगल की छोटी-छोटी क्यारियों में कार्य करना भी हमारी शिक्षा का हिस्सा होता था । और हम लोगों के खेलने के लिए उपलब्ध बाहर के छोटे-से मैदान की यदा-कदा साफ-सफाई भी हम छात्रों को ही करना होता था ।

विद्यालय में सुविधाएं सीमित थीं । लेकिन जो कुछ था उसका कारगर उपयोग हम और हमारे शिक्षक करते थे, यह मैं निस्संकोच कह सकता हूं । मेरी शिक्षा की नींव उसी विद्यालय में पड़ी थी, जो मेरी बाद की पढ़ाई-लिखाई का सुदृढ़ आधार बनी । मुझे यह संतोष होता है कि सीमित संसाधनों के होते हुए भी वहां काफी हद तक ईमानदारी थी ।

आज कितने सरकारी विद्यालय होंगे जहां ईमानदारी बची होगी ? कितने लोग होंगे जो अपने बच्चों को स्वेच्छया, न कि मजबूरी में, सरकारी स्कूल में भेजना चाहेंगे ? कितने छात्र होंगे जिनकी बिना ट्यूशन के संतोषप्रद प्राथमिक शिक्षा संभव हो पाती होगी ?

मेरा मानना है कि स्वतंत्र भारत में सरकारी तंत्रों की कार्यप्रणाली में गिरावट आई है और उसके साथ ही शिक्षा का स्तर भी गिरा है । – योगेन्द्र जोशी

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