India vs. भारत

बीबीसी के संदर्�गत आलेख के साथ का चित्र

बीबीसी के संदर्भगत आलेख के साथ का चित्र

महीनों पहले मुझे बीबीसी के वेबसाइट पर एक आलेख पढ़ने को मिला था । आलेख का शीर्षक थाः हिन्दुस्तान, भारत और इंडिया । लेखक का नाम मुझे कहीं नहीं दिखा । कदाचित् बीबीसी के ही संपादक-दल में से ही किसी ने लिखा होगा । लेख लंबा नहीं है, फिर भी यहां पर उसे उद्धृत नहीं कर रहा हूं (लेख के लिए क्लिक करें) । कुछ चुने हुए अंशों के उल्लेख से ही उसके सार का अनुमान लग सकता है । उसमें यह मत व्यक्त किया गया है कि भौगोलिक रूप से एक यह देश अपने आप में तीन भिन्न-भिन्न देशों से मिलकर बना है । बात आसानी से समझ में शायद न आये । किंचित् धैर्य रखें समझ में आ जायेगा । एक स्थल पर लिखा है

“जो लोग देश की नब्ज को पहचानते हैं और जमीनी हकीकतों से वाकिफ हैं वे जानते (या मानते) हैं कि ये तीनों एक देश के भीतर बसे तीन देश हैं.” और आगे है

“इंडिया वो है जो महानगरों की अट्टालिकाओं में बसा करता था और अब तेजी से छोटे शहरों में भी दिखने लगा है. इंडिया विकसित है.” फिर कहा गया है

“इसके ठीक पास में रहता है भारत । … इंडिया की रोजमर्रा की जरूरतों की आपूर्ति करता है । … (उनके) पास अक्सर न अपना कहने के लिए जमीं होती है और न अपनी कोई छत । वो झुग्गियों में रहता है …” और अंत में जिक्र है हिंदुस्तान काः

“हिंदुस्तान को आप गाँव में रहने वाले लोगों से पहचान सकते हैं ।”

मैं उस लेख के सार से सहमत हूं, पर देश को तीन घटकों से बना हुआ नहीं स्वीकारता । मेरे मत में जिन भारत और हिंदुस्तान की बात उस लेख में कही गयी है वे वस्तुतः परस्पर भिन्न नहीं हैं । दोनों एक ही हैं, दोनों के लोग वही हैं, महज स्थान परिवर्तन के कारण दोनों के कार्य किंचित् भिन्न दिखते हैं और इंडिया के सापेक्ष दोनों समान रूप से तिरस्कृत हैं । दोनों के अस्तित्व की सार्थकता इंडिया के लिए है । जिस तेज विकास की बात इस देश के लिए कही जाती है उसका अर्थ दोनों के लिए प्रायः समान है, उनके लिए अनुपादेय ।

इंडिया तथा भारत एक नहीं हैं । दोनों अलग-अलग नियति वाले समाजों को इंगित करते हैं यह विचार मैं स्वयं लंबे अर्सेे से मेरे मन में घर किये हुए था । बीबीसी के उस लेख से मुझे तसल्ली अवश्य हुयी कि इस प्रकार सोचने वाला मैं अकेला सिरफिरा नहीं हूं । टेलीविजन चैनलों पर मैंने परिचर्चाएं देखी-सुनी हैं, जिनमें लोगों को कुछ यूं कहते हुए पाया है, “ठीक है, इंडिया प्रगति कर रहा है और तेजी से करेगा भी, पर भारत का क्या होगा ?” गोया कि भारत इंडिया नहीं, कुछ और है । और वह वास्तव में अलग है भी ।

क्या अंतर है इंडिया और भारत में इस बात की चर्चा मैं टुकड़ों में बाद में करूंगा । फिलहाल इतना ही अभी कहना है कि दोनों के बीच की विभाजक रेखा बहुत चौढ़ी और धूमिल है । कौन इंडियन है और कौन भारतीय यह कहना कुछ मौकों पर कठिन है । भारतीयों का शनैः-शनैः इंडियन बनने की प्रक्रिया निरंतर चल रही है । हममें से कई बीच की उस अवस्था से गुजर रहे होते हैं जहां थोड़ा इंडियन बन चुके होते हैं तो कुछ हद तक भारतीय बने रह जाते हैं । मां-बाप भारतीय ही रह जाते हैं तो बेटा इंडियन बन चुकता है । विषय गंभीर है, फिर भी अपनी बात एक हद तक स्पष्ट कह सकूंगा ऐसा मैं सोचता जरूर हूं । वार्ता जारी रहेगी । -योगेन्द्र

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