इंडिया, भारत एवं अडिगा का ह्वाइट टाइगर

‘द गार्जियन’ की समीक्षा-पृष्ठ का एक अंश

‘द गार्जियन’ की समीक्षा-पृष्ठ का एक अंश

मुझे इस स्थल पर अपने इस मत कि इंडिया भारत नहीं है और दोनों में अच्छा-खासा अंतर है पर चर्चा जारी रखनी थी । उसे मैं अगली बार के लिए टाल रहा हूं और अकस्मात् इस वर्ष के ‘बूकर’ पुरस्कार की खबर पर उतर रहा हूं । इसके कारण हैं । कल ही मेरी दृष्टि वार्तापत्र ‘द हिंदू’ के मुखपृष्ठ पर छपे इस समाचार पर गयी कि इस वर्ष का प्रतिष्ठित ‘बूकर पुरस्कार’ तैंतीस-वर्षीय भारतीय अंग्रेजी लेखक अरविंद अडिगा को उनके प्रथम उपन्यास ‘द ह्वाइट टाइगर’ पर दिया गया है । भला ‘इंडिया बनाम भारत’ का इस समाचार से क्या वास्ता ? वास्ता है और वही इस आलेख का विषय है ।

‘द हिंदू’ में छपी रिपोर्ट के अंत के अनुच्छेदों में यह पाठ्य है-
… Chairman of the Jury Michael Portillo, the Tory politician-turned-critic, colourfully put it. “My criteria were ‘Does it knock my socks off?’ and this one did… the others impressed me … this one knocked my socks off,” Mr. Portillo said. “The novel is in many ways perfect. It is quite difficult to find any structural flaws with it,” he said.

रिपोर्ट के अनुसार अडिगा के उपन्यास में अपने देश की विषमतापूर्ण एवं विसंगतिमय प्रगति की पीड़ादायक कहानी है, जिसने निर्णायक-मंडल के सदस्यों को विचलित कर दिया । इस बात ने मेरी जिज्ञासा जागृत कर दी यह जानने के लिए कि उनन्यास में है क्या । मैंने उपन्यास का नाम पहले नहीं सुना था । इसकी कोई प्रति मेरे पास नहीं है कि उसे पढ़ूं । मैंने संक्षेप में जानकारी पाने हेतु अंतरजाल पर पुस्तक की समीक्षा खोजना चाहा । समीक्षाएं तो ढेरों हैं, किंतु मैंने ब्रितानिया के केवल दो प्रतिष्ठित समाचारपत्रों, ‘द गार्जियन’ तथा ‘द टेलीग्राफ’ पर नजर डालना काफी समझा । कहानी ‘बलराम हलवाई’ नाम के पात्र (ह्वाइट टाइगर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक गरीब तथा अनपढ़ परिवार में जन्मने के बावजूद यह जान जाता है कि वह किस ‘अंधकारमय’ जीवन के साथ जी रहा है और उसको कैसे ऊपर उठते हुए दिल्ली के ‘प्रकाशमय’ संसार में अपनी जगह बनानी है । वह ‘सफलता’ की सीढ़ियां चढ़ने के लिए सभी ‘हथकंडे’ अपनाता है जिसमें संवेदना और सद्व्यवहार के लिए कोई स्थान नहीं है । अंत में वह एक सफल उद्यमी बनकर उभरता है और चीनी प्रधानमंत्री के साथ उद्यमिता के बहाने पत्राचार में जुट जाता है, इस देश की जिंदगी की हकीकत को उजागर करते हुए । कहानी किसी के लिए चिंतन का विषय बन सकती है, तो कुछ अन्य में तिलमिलाहट अथवा बौखलाहट पैदा कर सकती है ।

‘द गार्जियन’ की समीक्षा ने बलराम के चरित्र को यूं दर्शाया है-
He is heading for glory in India’s bright future. He will be one of those who stuffs cash into brown envelopes for policemen and politicians, and not just another victim.

अर्थात् ठान लेता है कि उसे क्या करना है आगे बढ़ने के लिए । वह लिफाफों में पैसा भर-भर कर पुलिसकर्मियों तथा राजनेताओं तक पहुंचायेगा, क्योंकि यही यहां की हकीकत है ! वह अपनी जमात के अन्य अभागे जनों की तरह सताया जाने वालों में नहीं शरीक होगा ।

समीक्षा के कुछ अन्य चुने अंशों पर गौर करें-
… he, along with most lowly Indians, inhabits the Darkness, a place where basic necessities are routinely snatched by the wealthy, who live in the Light.

कौन जिम्मेदार है उस जैसे विपन्न लोगों के हालात के लिए ? बलराम को इसका एहसास हो जाता है और वह संपन्नों की जमात में जा मिलने का विचार बना लेता है । समीक्षा में आगे है(कोष्ठकों में मेरे शब्द हैं)-
The home country [India that is Bharat] is invariably presented as a place of brutal injustice [क्रूर अन्याय] and sordid corruption [घृणास्पद भ्रष्टाचार] one in which the poor are always dispossessed and victimised by their age-old enemies, the rich. Characters at the colourful extremities of society are Dickensian grotesques [ugly or shocking], Phiz [reviewer] sketches, adrift in a country that is lurching rapidly towards bland middle-class normality.

देश की आर्थिक प्रगति की विषमता इस अनुच्छेद में स्पष्ट है । एक छोर पर है विपन्न वर्ग जिसके लिए प्रगति की कोई सार्थकता नहीं है, तो दूसरे छोर पर है नवसंपन्न बनता हुआ मध्य वर्ग जिसे प्रथम वर्ग की कीमत पर संपन्नता अर्जित करने में कोई बुराई नहीं दिखती और न उसमें आत्मग्लानि का भाव जगता है कि वह उस विपन्न वर्ग के हितों के लिए प्राथमिकता के आधार पर प्रयास करे ।

‘द टेलीग्राफ’ की समीक्षा में भी कुछ मिलते-जुलते विचार व्यक्त हैं-
He begins in the rural “Darkness”, a world of landlord and peasant. And when he escapes to the “Light” of the cities, it is into a world of servants and masters.

यानी देश के दो पक्ष हैं, एक अंधकारमय तो दूसरा प्रकाशित । एक में मालिक तो दूसरे में सेवक । आगे देखें-
The secret of India, he tells Wen [Jiabao], is the way that its extreme inequality is stabilised by its strong family structures: “Never before in human history have so few owed so much to so many.”

बलराम की नजर में एक छोटा वर्ग एक बड़े वर्ग के प्रति ऋणी है, क्योंकि उसने उस वर्ग के हकों की कीमत पर ही अपनी संपन्नता की मीनार खड़ी की है । और बलराम के ‘सत्य के बोध’ का वर्णन देखिये-
Advancement can be achieved only by patronage and corruption – if you make friends with the local political thugs, you might get a job as a bus conductor – or by Balram’s eventual method: stepping outside the “coop” of conventional morality.

नैतिकता की अवधारणा को पुस्तकों में समेटते हुए भ्रष्टाचार के रास्ते ही आगे बढ़ा जा सकता है । बहुत कुछ और भी है इन समीक्षाओं में जो देश की मौजूदा कटु सच्चाई उजागर करती हैं ।

मैं दावा नहीं कर सकता कि पुस्तक के विषयवस्तु के बारे में मैं ठीक-ठीक अनुमान लगा पाया हूं, परंतु मुझे लगता है उपन्यासकार अपने तरीके से देश की उस तस्वीर को पेश करता है जिसे मैं इंडिया तथा भारत के अंतर के रूप में देखता आ रहा हूं । यही कारण है कि मेरा ध्यान अकस्मात् इस घटना पर गया । अन्यथा पुस्तकों की चर्चा और उनके पुरस्कृत होने की घटना व्यापक सामाजिक संदर्भों में कभी-कभार ही माने रखती है । – योगेन्द्र

इंडिया, भारत एवं अडिगा का ह्वाइट टाइगर” पर 3 विचार

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