बराक ओबामा, अमेरिकी डिमॉक्रेसी और हिंदुस्तानी लोकतंत्र

संयुक्त राज्य अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति, बराक ओबामा, ने चुनाव परिणाम की घोषणा के तुरंत बाद अपने समर्थकों के जनसमूह के प्रति संबोधित उद्गारों का आरंभ इन शब्दों से कियाः “Hello, Chicago. If there is anyone out there who still doubts that America is a place where all things are possible, who still wonders if the dream of our founders is alive in our time, who still questions the power of our democracy, tonight is your answer.” अर्थात् जिनको संदेह है कि बहुत कुछ अब अमेरिका में संभव नहीं, जिनको शंका है कि हमारे संस्थापकों के सपने अब बेमानी हो चुके हैं और जो समझते हैं कि अमेरिकी लोकतंत्र अपनी ताकत खो चुका है, उनकी निराशा का उत्तर आज के चुनाव परिणाम ने दे दिया है ।

और यह उत्तर दिया है by young and old, rich and poor, Democrat and Republican, black, white, Hispanic, Asian, Native American, gay, straight, disabled and not disabled. Americans who sent a message to the world that we have never been just a collection of individuals or a collection of red states and blue states. We are, and always will be, the United States of America. (युवाओं तथा वृद्धों ने, अमीर-गरीब, डिमॉक्रेट तथा रिपब्लिकन, अश्वेत, श्वेत, स्पेनीभाषियों, एशियाइयों, देशज अमेरिकियों, समलैंगिकों, सीधे-सादों, विकलांगों एवं अविकलांगों ने ।)

अपने शब्दों पर जोर डालते हुए ओबामा का कहना था, “… above all, I will never forget who this victory truly belongs to. It belongs to you. It belongs to you.” (सबसे अहम है कि मैं नहीं भूल सकता कि यह विजय वस्तुतः किसकी है । यह विजय तो आपकी है । यह आपकी है ।)

किसने उसे मत दिया और किसने नहीं को ध्यान में रखते हुए उसके अगले वचन थे, “To those Americans whose support I have yet to earn,” he said, “I may not have won your vote, but I hear your voices, I need your help, and I will be your president, too.” अर्थात् मेरे शब्द उन अमेरिकियों के प्रति हैं जिनका सहयोग मुझे अभी पाना है । आपने मुझे वोट न दिया हो, पर मैं आपकी आवाज सुन रहा हूं, मुझे आपकी मदद चाहिए, और विश्वास रखें मैं आपका भी राष्ट्रपति हूं ।

उधर ओबामा की जीत पर बधाई दे चुकने के बाद प्रतिस्पर्धी जॉन मैकेन ने अपने समर्थकों से निवेदन किया, “These are difficult times for our country, and I pledged to him tonight to do all in my power to help him lead us through the many challenges we face. I urge all Americans who supported me to join me in not just congratulating him, but offering our next president our goodwill and earnest effort to find ways to come together.” (इस समय देश कठिन दौर से गुजर रहा है, और मैंने आज की रात उसको [ओबामा को] विश्वास दिलाया है कि मेरी सामर्थ्य में जो बन पड़ेगा वह किया जायेगा, ताकि वह अनेकों चुनौतियों का सामना करते हुए हमें उन्नतिमार्ग पर ले चले । मेरा उन सभी अमेरिकियों, जिन्होंने मुझे सहयोग दिया, से निवेदन है कि वे मेरा साथ न केवल उसे बधाई देने में दें, अपितु अगले राष्ट्रपति को सम्मिलित हो आगे बढ़ने में अपने मैत्रीभाव एवं निष्ठापूर्ण सहप्रयास समर्पित करें ।)

नये चयनित राष्ट्रपति का संबोधन (क्लिक करें) पर्याप्त लंबा है । (उसे विभिन्न वेबसाइटों पर देखा जा सकता है, जैसे The Houston Chronicle के http://www.chron.com/) ऐसे अवसरों पर व्यक्ति निःसंदेह भावुक होता है, और उसके उद्गार भावनात्मक अधिक होते हैं । भविष्य में चयनित राष्ट्रपति का कार्यकाल कितना सफल और जनाकांक्षाओं के अनुरूप होगा यह तो कोई नहीं बता सकता है । हम अभी उसके इरादों और लोगों की उम्मींदों और सहयोग की बात भर सोच सकते हैं ।

यहां पर मेरा इरादा उक्त संबोधन की विस्तृत चर्चा करना नहीं है, और न ही संपन्न चुनावों की अहमियत स्वयं अमेरिका के लिए तथा व्यापक स्तर पर पूरे विश्व के लिए क्या हैं इस बात पर कोई टिप्पणी करना है । मेरी रुचि अमेरिकी ‘डिमॉक्रेसी’ और भारतीय लोकतंत्र के बीच के अंतर पर गौर करने में है । दोनों देश लोकतंत्र कहलाते हैं — विश्व के दो विशालतम लोकतंत्र । किंतु दोनों में कितना फर्क है ! मैं तकनीकी अंतर की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि दोनों देशों के जनसमुदाय तथा राजनेताओं में व्याप्त जनतांत्रिक भावना की बात कर रहा हूं ।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव एक पेचीदी एवं समयसाध्य प्रक्रिया है । राज्यों के अपने मत व्यक्त करने के नियम अलग-अलग हैं । फिर भी पूरी प्रक्रिया अपने किस्म की लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत ही होती है । ओबामा उसी प्रक्रिया से गुजरकर अपने मुकाम पर पहुंचा है । प्रत्याशी बनने के लिए व्यक्ति को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होती है । उसे दूसरों से प्रतिस्पर्धा में आगे आना होता है । वह जनसमर्थन के बल पर उस जगह पर पहुंचता है । उसे किसी व्यक्तिविशेष के आशीर्वाद या कृपा पर निर्भर नहीं होना पड़ता । कोई ‘हाई-कमांड’ नहीं जिसका प्रसाद उसे प्रत्याशी बनाता है ।

किंतु अपने यहां क्या है ? सब कुछ ‘हाई-कमांड’ की इच्छा पर निर्भर करता है । इस बात का कोई महत्त्व नहीं रहता है कि जनसमुदाय उसे प्रत्याशी देखना चाहता है या नहीं । कोई राजनेता यह कहते नहीं हिचकता है कि वह तो फलां-फलां के आशीर्वाद से उस स्थान पर है । दल के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति जब जैसा चाहेगा वैसा वह करेगा । कोई-कोई तो दौड़कर चरणस्पर्श से भी नहीं परहेज करते हैं ! क्या इसी लोकतंत्र पर गर्व होना चाहिए हमें ?

दोनों लोकतन्त्रों के अंतर पर अतिरिक्त चर्चा अगली पोस्ट में रहेगी । – योगेन्द्र

बराक ओबामा, अमेरिकी डिमॉक्रेसी और हिंदुस्तानी लोकतंत्र” पर 2 विचार

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