‘विहिप’ का ‘फरमान’ – क्या अर्थ है धर्म का?

(नवंबर 2 की पोस्ट के आगे) करीब दो सप्ताह पहले मैंने ‘विहिप’ के ‘फरमान’, (उसे आप आदेश, अनुरोध, सलाह, प्रस्ताव आदि जो ठीक समझें कह सकते हैं) का जिक्र किया था । विहिप ने कहा था कि हिंदू कुछ समय में अल्पसंख्यक हो जायेंगे, अतः उन्हें अधिक बच्चे पैदा करके अपनी जनसंख्या बढ़ानी चाहिये । वस्तुतः उनके दो बच्चे अपने लिए और दो ‘राष्ट्र’ के नाम होने चाहिए ।

समाचार पढ़ने पर मेरे मन में अनेकों सवाल उठने लगे । मुझे उनका समुचित उत्तर मिल नहीं पा रहा था । क्या विहिप वाकई परेशान है ? क्या उसने सोच-समझ कर ही नारा दिया है ? अविश्वास का कारण मुझे नहीं दिखा, इसलिए वे सवाल मुझे परेशान करते रहे ।

मेरे मन में उठा पहला सवाल थाः ‘दो अपने और दो राष्ट्र’ के लिए का अर्थ क्या है ? क्या विहिप मां-बाप से दो बच्चे मांग लेगी और उन्हें अपने हिसाब से पाल-पोस कर और शिक्षित-प्रशिक्षित करके राष्ट्र के विभिन्न कार्यों में लगायेगी ? अगर राष्ट्र के नाम बच्चे पैदा कर दिये और उनकी पूरी जिम्मेदारी मां-बाप को ही उठानी पड़ गयी, तो उन लोगों की क्या हालत होगी जो अभी ही दो वक्त का खाना नहीं जुटा पा रहे हैं ? ऐसे परिवारों के लिए तो रोटी, कपड़ा, मकान की समस्या इतनी गंभीर है कि शिक्षा जैसी चीज तो वे सोच तक नहीं सकते । और दुर्भाग्य से उनकी संख्या करोड़ों में है जो अभावों में जी रहे हैं । क्या विहिप उनको उनके बच्चों के दायित्व के आश्वासन का संदेश देना चाहेगी ? यदि हां, तो उसे यह साफ बताना ही चाहिए कि उन बच्चों की जिम्मेदारी उनके संगठन की होगी । इतना ही नहीं, अभी ही ऐसे अनेकों परिवार हैं जो दो बच्चों तक का ठीक-से लालन-पालन नहीं कर पा रहे हैं, फिर भी जिनके छः-छः, सात-सात बच्चे हैं । उन अतिरिक्त बच्चों को आज ही – अभी – विहिप क्यों न अपने ‘पुनीत’ कार्य के लिए उनसे मांग लेती है ? हां, जहां तक ‘राष्ट्र के लिए’ जैसे कथन का प्रश्न है, यह मेरी सकझ से परे है कि वे राष्ट्र के लिए किस प्रकार रचनात्मक भूमिका निभा पायेंगे ? उनका योगदान जनसंख्या वृद्धि के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में हो पायेगा यह मेरी समझ से परे है । जो स्वयं जिंदगी ढो रहे हों और जिनका जीवन स्वयं में सार्थक न हो पा रहा हो वे देश को भला क्या दे सकेंगे ?

अगर विहिप का लक्ष हिंदू समाज का अपेक्षया संपन्न या हाल का नवसंपन्न वर्ग हो, तो उसे यह तथ्य स्वीकारना ही पड़ेगा कि यह वर्ग भले ही सिद्धांततः उसकी बात मान ले (?), पर इतना निश्चित है कि वह आधुनिक सुख-सुविधाएं बटोरने और व्यावसायिक क्षेत्र में आगे बढ़ने की ललक त्याग बच्चों को पालने की जहमत नहीं उठाने वाला । आज स्थिति यह है कि युवा दम्पती जो थोड़ा भी पढ़-लिख गये हैं और अब कुछ हद तक ठीक-से खा-पी ले रहा हैं, अधिक बच्चों के पक्षधर नहीं हैं (अपवादों को छोड़ दें) । और ये ही वे लोग हैं जो बच्चों को पाल-पोस सकने की स्थिति में हैं । किंतु उनका मानना है एक या दो बच्चे पर्याप्त हैं और उन्हीं की परवरिश वे कर सकें यही वे चाहेंगे । तब क्या विहिप की आशा अशिक्षित और असंपन्न लोगों पर टिकी है ?

अपना देश उन देशों में से एक है जहां परिवार नियोजन कार्यक्रम हासिये पर है । कोई राजनेता इस मुद्दे पर बात नहीं करता है, और न ही कोई सामाजिक संगठन प्रभावी तरीके से बात छेड़ता है । सभी दलों को वोट-बैंक चाहिए और भरोसेमंद वोट-बैंक कहां से आता है इसे आप समझ सकते हैं । सरकारी स्तर पर हाल ये है कि बाजपेयी सरकार द्वारा 2000 में स्थापित भारी-भरकम राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग (देखें इसी ब्लॉग के तत्संबंधित पेज को) की एक भी बैठक मौजूदा सरकार के पूरे कार्यकाल में नहीं हुयी (जैसा अंतरजाल से पता चलता है) ।

जनसंख्या वृद्धि दर में जो कुछ कमी आयी है उसके पीछे का कारण अधिकतर लोगों द्वारा स्वेच्छया अपनाये गये सीमित परिवार की भावना है । आज जनसंख्या वृद्धि में सर्वाधिक योगदान उन लोगों का है जो संपन्नता के सबसे निचले स्तर पर हैं । और उनसे अपील करें या न करें, उनकी संख्या अनेकों कारणों से बढ़नी ही है, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम या कोई और । यह भ्रम किसी को भी नहीं होना चाहिए कि वे विभिन्न धर्मों के ठेकेदारों की अपील से परिवार बढ़ा रहे हैं; वृद्धि के उनके अपने कारण हैं और उनके नियंत्रण से बाहर हैं ! कैसे ? सोचियेगा । इस बात पर गौर करें कि अभी ही जो जनसंख्या देश की है उसी का समुचित प्रबंधन नहीं हो पा रहा है । कोई 15-20 प्रतिशत लोग, अपर्याप्त भोजन, बाल-कुपोषण, एक कमरे में छः-छः सात-सात के परिवार के रहने की विवशता, कारगर चिकित्सा-सेवा के अभाव, सार्थक शिक्षा की अनुपलब्धता आदि झेल रहे हैं । अनियंत्रित भ्रष्टाचार रही-सही कसर पूरी कर रहा है । तब बच्चों की अतिरिक्त फौज का क्या हाल होगा ? बात करना बेमानी है !

अब मैं असली सवाल पर आता हूं । क्या होता है धर्म की रक्षा करने का मतलब ? क्या धर्म कोई जीवधारी है, या कोई कीमती वस्तु है जिसे कोई छीन ले जाये, तोड़ डाले अथवा जला डालेे ? मुझे तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखता । या धर्म सद्विचारों, काम-क्रोध जैसी कमजोरियों से मुक्ति, दूसरों के हित की कामना, परोपकार, सत्यनिष्ठा आदि अनेकों कर्तव्यों का लेखा-जोखा है, जिन्हें मनुष्य को अपने व्यवहार में लाना चाहिए ? यदि हां, तो फिर इन कर्तव्यों की अवहेलना करना ही धर्म का ह्रास है । आज कौन है जो धर्म की एतद्सदृश व्याख्या के साथ जीवनयापन कर रहा है ? हर किसी की चिंता ऐहिक सुख-समृद्धि बटोरना और दूसरों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ने की है । जीवन का आध्यात्मिक पक्ष करीब-करीब अर्थहीन हो चुका है । किसी के पास न उसके प्रति आस्था रह गयी है और न ही उस पर मनन करने का समय । क्या भ्रष्टाचार में लिप्त रहना ही धर्म है, क्या एक बच्चों-महिलाओं की कमजोरी अथवा विवशता का लाभ उठाना ही धर्म है, क्या दूसरों पर अपनी विचारधारा थोपना ही धर्म है, क्या दरवाजे पर आये विवश व्यक्ति को झिड़कते हुए भगाना ही धर्म है ? ऐसे अनेकों सवाल पूछे जा सकते हैं ।

यह देश आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा है । भ्रष्टाचार तो विश्व के सभी देशों में व्याप्त है कहकर हम उसका औचित्य नहीं ठहरा सकते हैं । स्वयं को धर्मभीरू और विश्वगुरु कहलाने के इच्छुक देश के लिए तो थोड़ा भी भ्रष्टाचार गंभीर माना जाना चाहिये । परंतु है कोई कर्म-क्षेत्र जिसे भ्रष्टाचार-कदाचार से मुक्त कहा जा सके ? ऐसा नहीं है कि कोई एक या दो अपवाद-स्वरूप इसमें लिप्त हों । पूरा प्रकरण सुसंगठित ढंग से चल रहा है । चाहे अध्यापन हो या चिकित्सा, प्रशासन हो या कानून व्यवस्था का रखवाला पुलिस तंत्र, राजनीति हो या न्यायिक व्यवस्था या व्यवसाय, सभी में दायित्वहीनता तथा निष्ठाह्रास दृष्टिगोचर होती है । तब क्या इन क्षेत्रों में कार्यरत जनों को धर्माचरण में लगे हुए कहा जायेगा ? आप न मानें, परंतु मैं यही कहूंगा कि नहीं, उनका धर्म से सरोकार नहीं हैं । बात समझ में आ सकती यदि वे ‘कैसे दो वक्त का खाना जुटायें’ जैसी मौलिक समस्या से जूझ रहे होते । परंतु वे तो इतना संपन्न हैं हीं कि धर्माचरण उनके लिए संभव है, व्यावहारिक है । किंतु उनके मन में तो ‘और, अभी और’ की अतृप्य कामना तथा ‘अरे, सभी तो ऐसा कर रहे हैं’ की भावना घर किये बैठी है । और इतने सब के बावजूद वे हिंदू, मुस्लिम, सिख आदि, जो भी जन्मना वे रहे हों, बने रहते हैं । आप अपराध कर लें, सजा पा लें, लेकिन जिस धर्म का तमगा आपके गले में लटका हो वह नहीं हटने का । धर्म की कुछ ऐसी ही समझ सर्वत्र व्याप्त है ! कहां है असली धर्म ?- योगेन्द्र
(शेष, अंतिम किश्त, अगली पोस्ट में ।)

‘विहिप’ का ‘फरमान’ – क्या अर्थ है धर्म का?” पर एक विचार

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