‘विहिप’ का ‘फरमान’ – असुरक्षा की सार्वत्रिक भावना

(नवंबर २० की पोस्ट के आगे) वस्तुतः तथाकथित धर्मरक्षकों की चिंता धर्म को परिभाषित करने और उसमें जनसमुदाय को संलग्न होने की प्रेरणा देना नहीं है । जो मैं देखता आ रहा हूं उसके अनुसार धर्म अपना असली अर्थ खोकर एक सामुदायिक पहचान भर बन के रह गया है । जैसे किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता उसकी पहचान बनती है, ठीक वैसे ही धर्म भी मानव समाज में एक वृहत् समुदाय का सदस्य होने की पहचान प्रदान करता है । कभी पहनावा तो कभी नाम और कभी ‘धार्मिक’ कर्मकांड हमें सामूहिक पहचान प्रदान करते हैं । दाढ़ी-मूंछ बढ़ाकर सिर पर पगड़ी धारण कर ली तो सिख हो गये और बिना मूंछ के दाढ़ी बढ़ाकर सिर पर विशिष्ट टोपी पहन ली या बुरका ओड़ लिया तो मुस्लिम हो गये । माथे पर तिलक या बिंदी लगाकर मंदिर प्रसाद चढ़ाने पर हिंदू कहलाने लगे अन्यथा हर ‘संडे’ चर्च में ‘सर्मन’ सुनने चले या गले में क्रास धारण कर लिया तो इसाई । कुछ इसी प्रकार के प्रतीक हमारे हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि होने की पहचान बनाते हैं । बस । हमारा आचरण क्या है यह माने नहीं रखता है । वास्तव में सामूहिक पहचान के कई आधार हम अपनाते हैं । कभी जाति में, तो कभी क्षेत्रीयता में, और कभी भाषा में अपनी पहचान खोजते हैं ।

एक प्रश्न मेरे लिए आज तक अनुत्तरित रहा है । मैं ईसाई ‘धर्म’ का उदाहरण लेता हूं । आरंभ में ही स्पष्ट कर दूं कि मेरी बातें अन्यत्र भी लागू होती हैं । ईसाई धर्मगुरु लोगों का धर्मांतरण क्यों कराना चाहते हैं ? क्या धर्मांतरण करके उन लोगों का व्यक्तित्व बदल जायेगा ? क्या लोग सत्कर्मों में जुट जायेंगे ? क्या वे पाशविक वृत्तियों से मुक्त हो जायेंगे ? क्या उनकी आस्था में रातों-रात परिवर्तन आ जायेगा ? सतही तौर पर भले ही ऐसा दिखे, परंतु वस्तुतः ऐसा कुछ नहीं होने का । सीने से हिन्दुत्व का बिल्ला हटाकर ईसाइयत का बिल्ला लगा लेने से कोई बदल नहीं जायेगा । कोई भी एक बदले हुए इंसान के तौर पर सामने नहीं आ जायेगा । आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी वैसे ही चलनी है । नाम बदल देने से उसके अंदर का आदमी नहीं बदलने का । धर्मपरिवर्तन मन में उपजे ज्ञानोदय से नहीं होता है । जिसे आत्मज्ञान होगा उसे बाह्य प्रेरकों की आवश्यकता नहीं होगी । एक ‘हिन्दू’ हिंदू ही बना रहे, लेकिन उसका हित जिसमें हो वैसा क्या धर्मगुरु नहीं कर सकते ? क्या फर्क पड़ता है हिंदू या ईसाई कहलाने से, यदि व्यक्ति का जीवन सुधर जाये, वह बेहतर इंसान बन जाये, वह आस्थावान हो जाये, इत्यादि । पर नहीं, बात इतनी सीधी नहीं ! वस्तुतः मुझे तो धर्मपरिवर्तन सिद्धांतहीन राजनैतिक दल-बदल की तरह लगता है, जहां फायदा नजर आये उधर चले जाओ, और जरूरत पड़ी तो ‘घर-वापसी’ कर लो । वास्तविक आस्थाएं इतनी कमजोर नहीं हो सकतीं ।

मानवजाति सदा से विभाजित रही है । यह विभाजन राष्ट्रों के रूप में तो स्पष्ट दिखता ही है । प्रत्येक राष्ट्र अन्य राष्ट्रों को संदेह की दृष्टि से देखता है और एक मजबूत सीमा में बांधकर सैन्यबल के सहारे स्वयं को सुरक्षित रखता है । राष्ट्रों के भीतर भी परस्पर सशंकित समुदायों के रूप में भी उक्त विभाजन का अनुभव होता रहता है । ये समुदाय कभी धर्म के नाम पर बनते हैं तो कभी जाति के नाम पर; कभी भाषा के नाम पर तो कभी क्षेत्रीयता के नाम पर । चाहे जिस भी कारण से बनें, प्रत्येक समुदाय अपने सामूहिक सुरक्षा के लिए सचेत एवं सचेष्ठ रहता है । हर समुदाय दूसरे समुदाय के संभावित वर्चस्व से भयभीत रहता है । उसे डर रहता है कि दूसरा उसे संसाधनों से वंचित न कर दे, उसकी विशिष्ट जीवनशैली पर अंकुश न लगा दे, आदि आदि ।

जब ‘धर्म खतरे में है’ जैसा नारा सुनने को मिलता है तो वह असल में अन्य समुदायों से मिल रहे वास्तविक (या काल्पनिक ?) भय को ही दर्शाता है । विहिप या अन्य धर्मों के संगठन इसी भय से ग्रस्त हैं और उस भय का सामना संख्याबल से करना चाहते हैं ।

सवाल है कि क्या संख्याबल का इतना महत्त्व है । इतिहास बताता है कि नहीं । हमारे समाज में ब्राह्मणों पर आरोप लगता रहा है कि संख्या में कम होने के बावजूद वे पूरे समाज पर हावी रहे हैं । अन्य जातीय समुदाय अपने संख्याबल से उनको ‘परास्त’ क्यों नहीं कर पाये ? यह देश अंग्रेजों के अधीन रहा । क्या उनकी संख्या भारतीयों से अधिक थी ? नहीं । तब वे राज करने में सफल कैसे रहे ? पचास-एक लाख से कम की आबादी वाले देश इजराइल का अरब-क्षेत्रीय देश कितना नुकसान कर पा रहे हैं ? करीब एकतीस करोड़ की जनसंख्या वाले अमेरिका में लगभग एक करोड़ यहूदी हैं, फिर भी उनका वहां की राजनीति और अर्थनीति पर सबसे अधिक प्रभाव है, क्यों ? अन्य समुदायों का संख्याबल कहां गया ?

वस्तुतः संख्याबल की महत्ता उतनी नहीं जितनी संपन्नता, शिक्षा और बौद्धिक सामर्थ्य की है । समुदाय की बढ़ी हुयी जनसंख्या अभावग्रस्त बनी रहे तो वह उस सुरक्षा में कारगर नहीं हो सकेगी जिसकी तलाश विहिप और अन्य धार्मिक संगठनों को है । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । (समाप्त) – योगेन्द्र

‘विहिप’ का ‘फरमान’ – असुरक्षा की सार्वत्रिक भावना” पर 2 विचार

  1. धर्म कभी खतरे में नहीं होता. धर्म तो मनुष्य को तन और मन से शक्तिशाली बनाता है. अगर कोई कहता है कि धर्म खतरे में है तो यह उसका भ्रम है या वह किसी निजी स्वार्थ के लिए ऐसा कह रहा है. लोगों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए धर्म को अलग-अलग नाम दे दिए. धर्म तो सनातन है. उसका न आदि है न अंत. वह विशुद्ध मानवीय सिद्धांतों पर आधारित है. यह सिद्धांत देश और काल में नहीं बदलते.

    यह कहना कि धर्म महज एक सामुदायिक पहचान से अधिक कुछ नहीं है, धर्म को न समझने से की गई भूल है.

  2. yah bat sahi hai ki dharm privartan hi se kam nahi chlta vichar me bhi parivartan lana jarooi hai. kintu sochne ki bat yah hai ki jo dharm vishvash ke nam par janta se khilwar kare us dharm ko chor hi dena chahiye. hindu dharm pnar janm ke nam par par aawa gavan ki dharna det hai, jabki punar janm kuch aur hai aur aawa gavan kuch aur. aawa gavan me vishvash rakhne wala vekti to hamesha isi bharm me rahta hai ki maine pichle janm kuch acha kiya tha islia ab manaw shareer mila hai kinto usne kiya acha kiya tha iska use pata hi nahi hota. galti us insan ki nahi galti us vishvas ki hai jo insan ko uljha kar uske under dar paid karti hai. aise vishvas ka parivarta to hona hi chahiye. ki vichar hain apke?

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