इंडिया बनाम भारत (शेष): क्या है इंडिया?

इंडिया बनाम भारत की हफ्तों पहले (ब्लॉग पोस्टः अक्टूबर ६) आरंभ की गयी चर्चा अधूरी छूट गयी थी । उन पोस्टों में मैंने इस बात की ओर पाठकों का ध्यान खींचा था कि अपना देश वस्तुतः दो देशों में विभक्त है: इंडिया तथा भारत (बी.बी.सी की भाषा में, जिसके उल्लेख के साथ पहला आलेख लिखा गया था)। इस विभाजन को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकारा जाने लगा है यह भी बाद के लेखों (पोस्ट; अक्टूबर १३ एवं १७) में स्पष्ट किया गया था । मैं दो देश के बदले दो संसार कहना अधिक सार्थक समझता हूं । कहने का तात्पर्य है कि देश या राष्ट्र तो एक ही है, किंतु पूरी सामाजिक स्थिति कुछ ऐसी बन गयी है कि वहां दो संसारों, दो दुनियाओं या दो ‘वर्ल्ड्‌ज’ का अस्तित्व साफ नजर आता है । क्या हैं ये दो संसार और दोनों के मध्य भेद कैसे नजर आता है इसी बात को स्पष्ट करने की आवश्यकता है ।

यह अंतर समझा पाना मुझे सरल नहीं लग रहा है । मैं अंतर तो महसूस करता हूं, परंतु उसे प्रभावी शब्दों में स्पष्ट करने में स्वयं को काफी हद तक असमर्थ पा रहा हूं । मुझे लगता है कि देश की मौजूदा स्थिति पर बारीकी से गौर करने पर कथित अंतर अनुभव किया जा सकता है । सीधे इस अंतर की बात करने से पहले यह कहना चाहूंगा कि सामाजिक विभाजन दो प्रकार का हो सकता है । पहला तो वह है जिसमें व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूह या समुदाय साफ तौर पर एक विभाग का हिस्सा होता है अथवा किसी अन्य विभाग का । धार्मिक आधार पर प्राप्त विभाजन इस श्रेणी का होता है इसे कोई भी स्वीकारेगा । कोई भी व्यक्ति सिख, ईसाई और बौद्ध आदि एक साथ नहीं हो सकता, वह इनमें से एक और केवल एक ही हो सकता है । जातीय विभाजन भी इसी श्रेणी का है । मानव समाज राष्ट्रीयता की दृष्टि से भी इसी प्रकार विभक्त रहता है । किंतु आर्थिक आधार पर उपलब्ध विभाजन इतना स्पष्ट नहीं होता है । एकदम निर्धन से लेकर सुसंपन्न व्यक्तियों अथवा परिवारों के मध्य तमाम वे लोग आते हैं जिनको साफ तौर पर अमीर कहा जाये या गरीब यह बता पाना आसान नहीं होता है । कुछ वे होते हैं जो अमीर तो नहीं कहे जा सकते हैं लेकिन अमीर होने की प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं । दूसरी तरफ वे भी होते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ना आरंभ हो चुकी हो, पर जिन्हें साफ तौर पर गरीब कहने में कुछ मुश्किल होती है । यानी संपन्नता-विपन्नता के सापेक्ष दिखने वाला विभाजन सदैव स्पष्ट नहीं होता है । कुछ ऐसी ही स्थिति मैं इंडिया-भारत के संदर्भ में अनुभव करता हूं ।

मेरी दृष्टि में इंडिया वह है जो अमेरिका बनने को उत्सुक है । वहां लोग ‘वेस्टर्नाइजेशन’ यानी पश्चिमीकरण (आप उसे ‘इंग्लिशाइजेशन’ या ‘अमेरिकनाइजेशन’ भी कह सकते हैं) के दौर से गुजर रहे हैं अथवा काफी हद तक वे नये रूप में ढल भी चुके हैं । वहां आधुनिक होने का मतलब ही पाश्चात्य मान्यताओं को आत्मसात् करना है । वहां की जीवन-शैली को कुछ तबदीली के साथ अपनाने, वहां के साहित्य तथा सांस्कृतिक स्वरूप को उच्चतर मानने, अंग्रेजी भाषा को श्रेष्ठतर मानने और उसके पक्ष में तमाम तर्क प्रस्तुत करने, वहां के खानपान और पहनावे को अपने जीवन में उतारने का उत्साह है । इंडिया मुख्यतः महानगरों में बसता है, किंतु इंडिया बनने के लक्षण अपेक्षया छोटे कस्बों में भी दिखने लगे हैं । वस्तुतः देश का अभिजात और संपन्न वर्ग इसमें साफ तौर पर शामिल है ही, साथ में वे सब भी हैं जो शिक्षा, संपन्नता, व्यवसाय आदि के माध्यम से उसकी ओर रातदिन बढ़ रहे हैं । इंडिया बढ़ रहा है, उसमें नये-नये लोग सम्मिलित हो रहे हैं, वे सब जिनके बाप-दादे कल तक ‘भारत’ में थे और ‘भारतीय’ थे ।

इंडिया और भारत में कोई भौगोलिक सीमा रेखा नहीं है, दोनों एक ही भूभाग में बसते हैं । वस्तुतः दोनों परस्पर ऐसे मिले हुए हैं जैसे खिचड़ी में दाल और चावल के दाने । साथ-साथ रहने के बावजूद उनमें अंतर है, सामाजिक स्तर पर, सामुदायिक स्तर पर, सोच में, जीवन जीने की कला में । इंडिया कुछ हद तक पाश्चात्य मूल्यों को अपना चुका है और कुछ हद तक अपना रहा है । उसका अस्तित्व भारत पर टिका है (कैसे यह भी स्पष्ट किया जायेगा, बाद के अनुच्छेदों में), फिर भी वह भारत से अलग दिखना चाहता है । वह देश को इंडिया कहना पसंद करता है, भारत नाम से उसे अलेर्जी है । उसके लिए इंडिया विकास की दौड़ में है, उसकी आर्थिक प्रगति उल्लेखनीय है, वह शीघ्र ही आर्थिक महाशक्ति बनने वाला है, वह ‘ज्ञान-कोष’ के रूप में उभरने वाला है, इत्यादि । इस प्रकार के अनेक कथनों के द्वारा वह अपना संतोष तथा भविष्य के प्रति आशा व्यक्त करता है । उसके लिए यह माने नहीं रखता कि ऐसे अदम्य उत्साह में भारत कहीं पीछे तो नहीं छूटता जा रहा है, कि कहीं इंडिया तथा भारत के बीच की खाई और चौड़ी तो नहीं हो रही है ।

इंडिया का भारत से भेद सर्वाधिक भाषाई स्तर पर दिखता है । इंडिया अंग्रेजी का समर्पित पक्षधर है और मानता है कि देसी भाषाएं उसकी बराबरी नहीं कर सकती हैं और हमारी प्रगति में सहायक नहीं हो सकती हैं । इंडिया को विकास की दौड़ में सफल होने में अंग्रेजी ही सहायक हो सकती है । अतः जहां भी संभव हो वह उसी को प्रयोग में लेता है । उसके लिए भारतीय भाषाएं अंग्रेजी न जानने वालों जनसामान्य के साथ संपर्क के ही उपयुक्त हैं । देखा जा सकता है कि देसी भाषा में आरंभ ‘इंडियावासी’ का साक्षात्कार तुरंत ही अंग्रेजी में बदल जाता है । उसकी दृष्टि में अंग्रेजी साहित्य ही उत्कृष्ट श्रेणी का होता है । तदनुसार वह अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ना पसंद करता है । उसके घर अंग्रेजी पुस्तकें, पत्रिकाएं, समाचार पत्र मिलेंगे, न कि देसी भाषाओं के । वह आयातित जीवन मूल्य अपनाने का हिमायती है और परंपराओं के विरुद्ध ‘डेटिंग’, ‘लिव-इन रिलेशन’ जैसी बातों की हिमायत करता है । हाल के वर्षों में उसने ‘बॉय-फ्रैंड’, ‘गर्ल-फै्रड’ जैसे सामाजिक संबंधों को खुलकर अपना लिया है । स्त्री-पुरुष के संबंधों के संदर्भ में ‘प्रिमैरिटल’ तथा ‘एक्स्ट्रामेरिटल’ रिलेशन को वह जायज करार देता है । वह ‘वैलेंटाइन डे‘, ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’ आदि मनाना इसलिए आवश्यक समझता है, क्योंकि ये पाश्चात्य देशों में मनाये जाते हैं । उसने अब पारंपरिक परिधान छोड़ आधुनिकतम पाश्चात्य परिधान भी अपनाना आरंभ कर दिया है । टीवी चैनलों और ‘मल्टीनैशनल’ कंपनियों के कर्मियों को आप भारतीय परिधान में कम और विदेशी परिधान में अधिक देखेंगे । स्थापित परंपराओं को त्याग वह जन्मदिन नहीं मनाता है बल्कि ‘बर्थडे’ मनाता है, वह भी ‘केक’ काटकर और दिये जलाने के बजाय मोमबत्ती बुझाकर । अभिवादन के नमस्कार आदि शब्द भूलकर ‘गुडमॉर्निग’ पर उतर चुका है और मां-बाप के संबोधन के लिए ‘मॉम’, ‘डैड’ अपनाने में रुचि ले रहा है । ये सब बदलाव सामाजिक प्रतिष्ठा एवं श्रेष्ठता की निशानी बन रहे हैं । अब इंडिया की दुनिया में यह सोच व्याप्त है कि हमें विकसित देशों की बराबरी पर आने के लिए उनकी हर चीज आयात करनी और अपना लेनी चाहिए । उसके लिए यह सवाल बेमानी है कि अन्य देशों के नागरिक भारतीय मूल के ‘योग’ तथा ‘आयुर्वेद’ को अपनाने के अलावा कितना अन्य चीजें नकल में कर रहे हैं । हमारे पारिवारिक संबंध, तीज-त्यौहार, खानपान, परिधान, भाषाएं आदि किस हद तक उनके द्वारा अपनाये जा रहे हैं इस पर वह गौर नहीं करता है । बात सीधी है, श्रेष्ठतर की नकल हीनतर करता है, हीनतर की श्रेष्ठतर नहीं !इस प्रकार की बहुत-सी बातें इंडिया के बारे में महसूस की जा सकती हैं ।

और बचा हुआ भारत कैसा है ? पढ़ें (आगामी) कल की पोस्ट में । – योगेन्द्र

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