इंडिया बनाम भारत (शेष): और क्या है भारत?

कल की पोस्ट (१६ दिसंबर) में इंडिया, जैसा मैं उसे देखता हूं, की बात मैंने कही थी । अब भारत की बात । भारत मूलतः देहातों में बसता है, या फिर महानगरों के झोंपड़ी-झुग्गियों में अथवा अतिसामान्य कामचलाऊ घरों में । जहां इंडिया आधुनिक सुखसुविधाओं के लैस ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं में रहता है, भारतीय सड़क के दूसरी ओर के जनसुविधाओं के वंचित टूटे-फूटे मकानों या झोपड़ियों में । किंतु असल अंतर संपन्नता से नहीं है और थोड़ी बहुत संपन्नता के बावजूद भी व्यक्ति इंडिया के बजाय भारत में हो सकता है । जैसा मैंने पहले कहा है, इंडिया एवं भारत के बीच भेद बहुत स्पष्ट नहीं है; उनके मध्य चौड़ी तथा धुंधली विभाजक रेखा है । अधिकांश देशवासी अभी इसी विभाजक रेखा पर हैं । वे जहां इंडिया में प्रवेश करने को आतुर हैं वहीं वे कई परंपराओं को छोड़ पाने में हिचक रहे हैं । लिहाजा वे अभी ‘खिचड़ी’ अवस्था में हैं, और कल वे नहीं तो उनके आगे की पहली या दूसरी पीढ़ी इंडिया में शामिल हो चुकेगी । परिवर्तन एकतरफा और धीमा अवश्य है, किंतु निर्बाध चल रहा है ।

इंडिया और भारत का अंतर सर्वाधिक शिक्षा के क्षेत्र में दृष्टिगोचर होता है । जहां इंडिया के लिए उच्च स्तर के पब्लिक स्कूलों की व्यवस्था उपलब्ध है, वहीं भारत के लिए ध्वस्त-सी हो रही शासकीय व्यवस्था है, जिसमें कहीं-कहीं तो प्राथमिक विद्यालय भवनहीन हैं, जहां एक-एक अध्यापक तीन-तीन पांच-पांच कक्षाओं को पढ़ाता है, और जो पीने के पानी तथा शौचालय की सुविधा से वंचित हैं । स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व जिस सामाजिक बराबरी के सपने देखे जा रहे थे, उसके ठीक विपरीत देश की दोहरी शिक्षा प्रणाली वर्तमान में कार्य कर रही है । एक ओर अंग्रेजी में निष्णात और भारतीय भाषाओं के प्रति लापरवाह नागरिक पैदा हो रहे हैं, तो दूसरी ओर देसी भाषाओं के माध्यम से अर्धशिक्षित युवाओं की जमात तैयार हो रही है, जिन्हें प्रथम वर्ग के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहने के लिए कहा जाता है । (मैंने कभी एक संर्वेक्षण के बारे में पढ़ा था, जिसके अनुसार सरकारी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा पाये करीब ३० प्रतिशत छात्र लिखना तक नहीं जानते हैं !) हमारी आर्थिक व्यवस्था स्तरीय अंग्रेजी ज्ञान पर आधारित है, जो इंडिया को लाभ की स्थिति में बनाये रखती है ।

‘भारत’ का ठेठ बाशिंदा अभी भी परंपराओं से जुड़ा है । वह आधुनिक विज्ञान-प्रदत्त सुविधाओं का लाभ उठाता तो है, लेकिन अपनी हर समस्या को भाग्य का खेल मानकर संतुष्ट हो लेता है । समस्याओं के समाधान के लिए सीधे ‘भगवान्’ की शरण में पहुंचता है । वह इंडिया की चकाचौंध से अभिभूत तो रहता है, किंतु उसे अपने लिए एक ख्वाब मानकर चाहत तक सिमट जाता है । उसके लिए तीज-त्यौहार, नाते-रिश्ते, खानपान, और पहनावा आदि वही हैं जो उसके पूर्ववर्तियों ने अपनाये थे । वे विदेशी तौर-तरीकों को जिज्ञासु नेत्रों से देखते हुए चकित तथा प्रमुदित होता है, किंतु यह भी निश्चय करता है कि यह सब देखने तक ही सीमित रहे, अपनाये जाने के लिए नहीं । या यूं कहिये कि वह भारत छोड़ इंडिया में पहुंचने का साहस नहीं बटोर पाता है ।

इंडिया का अस्तित्व वस्तुतः भारत पर निर्भर है । भारत न हो तो इंडिया की सुखसुविधाएं क्षीण हो जायेंगी और उसकी प्रगति थम जायेगी, क्योंकि इंडियावासियों की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति भारत करता है । नगरीय जीवन में भारतवासी का इंडियावासियों के घरों में बतौर सेवक के कार्य करना किस्मत में रहता है । घरों के झाड़ू-बुहारे तथा भोजन-पानी की व्यवस्था से लेकर वाहनों की साफ-सफाई का दैनंदिन छिटपुट कार्य वही संपन्न करता है । इनमें से कितना इंडिया वाला स्वयं संपन्न करेगा यह यह उसकी मर्जी और सुविधा की बात है, जब कि भारतवासी के लिए यह दैहिक अस्तित्व के प्रति विवशता भरा कृत्य । वह किस कीमत पर कार्य करेगा यह दूसरा पक्ष निर्धारित करता है और उसे शोषण के लिए तैयार रहना पड़ता है । अस्तित्व की लड़ाई में उसका समूचा परिवार जुटा रहता है, यहां तक कि उसकी अवयस्क संतानों को भोजन-पानी के लिए संघर्षरत होना पड़ता है । देश के विकास में उसकी भूमिका अहम है, क्योंकि ऊंची-ऊंची इमारतों, छः-छः आठ-आठ लेन वाली सड़कों, और लंबे-चौड़े पुलों का निर्माण उसी के भरोसे रहता है, जिन सबका भरपूर उपभोग इंडिया के भाग्य में होता है । उसी के जिम्मे सड़कों और नालियों की साफ-सफाई होती है । किंतु इन सब कार्यों में उसे सुरक्षा के आधारभूत उपकरण तक मुहैय्या नहीं होते । कोई हादसा हो जाये तो लाख-डेड़-लाख का मुआवजा देकर उसके पारिवारिक जनों को शांत करा दिया जाता है । उसकी जिंदगी का मूल्य बस इतना ही रहता है, जितना इंडिया में कइयों की कुछ हफ्तों या महीनों की आमदनी होती है

ये सब तो शहरी ‘भारतीय’ की बात हुयी । ग्रामीण क्षेत्र में बसा भारतीय इंडिया के लिए सबसे आवश्यक उपभोक्ता सामग्री पैदा करता है, और वह है अनाज, साग-सब्जी तथा फल-फूल । इनके बिना न भारत रहेगा और न ही इंडिया, परंतु औद्योगिक विकास की दौड़ में देश ने भारत के इस हिस्से को भुला रखा है । हमारा विकास इंडिया के लोगों को ध्यान में रखते हुए हो रहा है । निःसंदेह देश तेजी से विकास कर रहा है । पर उस विकास की कीमत कौन चुका रहा है ? चाहे सड़कों का जाल बिछाया जाना हो, औद्योगिक तथा विद्युत् उत्पादन की इकाइयां स्थापित की जानी हों, नगरीय क्षेत्रों का विस्तार किया जाना हो, जमीन तो हर हाल में चाहिए । और वह जमीन ली जाती है ग्रामीण भारतीय किसान से जिसका रोजी-रोटी का आधार ही वही जमीन है । बदले में उसे मिलने वाला मुआवजा इंडिया तय करता है, अपनी शर्तों पर, बिना यह देखे-भाले कि उस जमीन की भरपाई मात्र पैसे से नहीं हो सकती है । हटाये जाने वाले लोगों का पुनर्वासन कैसे, कब प्रभावी ढंग से होगा इसकी चिंता शासन को नहीं होती । आखिर शासन तो इंडिया के हाथ में होता है । इतना ही नहीं, विकास के लिए वांछित श्रमशक्ति भी भारत ही प्रदान करता है ‘थ्रोअवे प्राइस’ पर । वास्तव में विकास की कीमत इंडिया के लोगों को नहीं चुकानी होती है; न उन्हें जमीन खोनी पड़ती है और न ही उनका मकान ढहाया जाता है । लेकिन विकास का लाभ सबसे पहले उन्हें ही मिलता है । औद्योगिक उत्पादन पहले उन्हीं की आवश्यकता पूरी करता है, पैदा की जा रही बिजली पहले उन्हीं को मिलती है, सड़कों के जाल का उपयोग पहले वे ही करते हैं ।

इतना ही नहीं, आपदाएं चाहे प्राकृतिक हों या मानव-प्रायोजित या विशुद्ध मानवीय लापरवाही से पैदा हुयीं, उनकी मार प्रायः भारत पर ही पड़ती है । सुरक्षित स्थान में रहने तथा सुरक्षित संपदा वाले इंडिया के लोगों को शायद ही कभी इनका सामना करना पड़ता है । चाहे बाढ़ हो अथवा सूखा, उसका कष्ट तो गांव में रहने वाले भारतवासी को ही भोगना पड़ता है, जो कभी-कभी सब कुछ गंवा बैठता है । यात्रियों से ठुंसी रेलगाड़ियों तथा बसों की दुर्घटनाओं का सर्वाधिक खामियाजा भारत के लोगों को भुगतना पड़ता है । आतंकी घटनाएं भी सबसे पहले भारत के रिक्शे वालों, सब्जी वालों, पटरी पर सामान बेचने वालों और भीड़भाड़ वाले बाजारों के आम खरीदारों को प्रभावित करते हैं । हाल का मुंबई कांड अवश्य एक अपवाद था, जिसमें विदेशी तक मारे गये थे और जिस कारण शासन की प्रतिक्रिया भी पहले की तुलना में एकदम भिन्न थी !

तो ये थी कुछ बातें जिनका एहसास मुझे पिछले कुछ समय से हो रहा था । आप मुझसे सहमत होंगे इस बात की संभावना क्षीण है । लेकिन कोई बात नहीं; असहमति तो मानव समाज में सर्वत्र व्याप्त है, परिवारों के भीतर तक । संयोग से अथवा दुर्योग से, मैं भी इंडिया में हूं, किंतु लगता है मन से तो मुझे कुछ तो भारतीय बना रहना चाहिए । मैं कितना इंडियन हूं और कितना भारतीय बचा रह गया हूं कह नहीं सकता । – योगेन्द्र

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