पदासीन व्यक्ति के चरणस्पर्श: कितना उचित?

feet-touching

यहां आरंभ में दिये गये छबिचित्र पर गौर करें । चित्र किस अखबार में छपा है और किस प्रसंग से संबंद्ध है यह चित्र में ही अंकित है । चित्र में शिल्पकला में निपुण एक उम्रदराज व्यक्ति को देश की माननीया राष्ट्रपति महोदया के चरणस्पर्श करते हुए दिखाया गया है । मुझे तो राष्ट्रपति महोदया भी से चरणस्पर्श की प्रक्रिया को सहज रूप से स्वीकार करती हुयी लगती हैं । दिखाये गये कलाकार महोदय संभवतः माननीया राष्ट्रपतिजी के समवयस्क हों और स्वयं में अपने क्षेत्र में लब्धप्रतिष्ठ एवं सम्मानित व्यक्ति हों । (मैं उन्हें नहीं जानता, और जानने को तो राष्ट्रपति महोदया के बारे में भी मुझे कुछ मालूम न होता, यदि वे देश के सर्वोच्च पद पर न पहुंचीं होतीं !) अखबार में उक्त चित्र देख मेरे मन में एक प्रश्न उठा थाः किसको किसके चरणस्पर्श करने चाहिए थे ?

मुझे याद है कि बचपन में मेरे पिताजी ने मुझे यह समझाया था कि हर किसी के चरणस्पर्श नहीं किये जा सकते हैं । ऐसा केवल रिश्ते में बड़े, अतिनिकट के पारिवारिक संबंधियों, यथा माता-पिता, चाचा-मामा आदि, के साथ ही स्वीकार्य है । अथवा अपने गुरु के चरणस्पर्श किये जाने चाहिए या उस महात्मा के जो अपने आध्यात्मिक एवं दार्शनिक ज्ञान के आधार पर समाज में गुरु के तुल्य का दर्जा पा चुका हो । कुछ इसी प्रकार की बातें उन्होंने कही थीं, और हिदायत दी थी कि हरएक के प्रति आदरभाव को व्यक्त करने का यह रास्ता मैं न अपनाऊं । और मैंने उनके द्वारा सुझाये विचार को ही स्वयं अपनाया और ध्यान में रखा कि ऐरा-गैरा कोई भी मेरे पांव न छुए, मेरे पढ़ाये छात्र भी नहीं ।

मुझे यह भी बताया गया था कि आज का अध्यापक गुरु की श्रेणी में नहीं आता है । परंपरा में जिस गुरु की बात की जाती है वह अपने शिष्य के व्यक्तित्व के विकास का दायित्व निभाता है । वह उसे ऐहिक ही नहीं आध्यात्मिक तथा दार्शनिक ज्ञान भी प्रदान करता है । उसे जीवन के ध्येय के प्रति सजग बनाता है और समाज के प्रति संवेदनशील एवं मानवीय गुणों से संपन्न करने का कार्य करता है । वस्तुतः कुछ अर्थों में गुरु का दर्जा माता-पिता के भी ऊपर रखा गया है, क्योंकि जहां माता-पिता जन्म देने और लालन-पोषण का कार्य निभाते हैं, वहीं गुरु उसके व्यक्तित्व का परिष्कार करता है, उसे देवत्व की ओर ले जाता है । इत्यादि ।

इसके विपरीत आज का अध्यापन एक व्यवसाय है और अध्यापक उस व्यवसाय में शरीक होकर वेतन पाने हेतु नौकरी करता है । उसका दायित्व छात्र-छात्राओं को एक या अधिक विषयों में प्रशिक्षण देना मात्र है, जिनका उपयोग स्वयं छात्र-छात्राएं रोजी-रोटी कमाने और अपने व्यावसायिक हितों को पूरा करने में करता है । अध्यापक को जितना कार्य सोंपा जाता है उसे वह पूरा करता है और बदले में वह पारिश्रमिक बटोरता है । वह अपने नियोक्ता के प्रति जवाबदेह होता है न कि छात्र-छात्राओं या उनके अभिभावकों के प्रति । संबंधित विषय के अतिरिक्त छात्र-छात्राओं का विकास कैसे हो रहा है इसकी जिम्मेदारी उसकी नहीं मानी जाती है । उसे इस बात की भी चिंता नहीं रहती है कि वह उनके समक्ष अनुकरणीय उदाहरण तक प्रस्तुत कर रहा है या नहीं । यही कारण है कि वह अपने निजी कार्य प्राथमिकता के आधार पर पहले संपन्न करता है और तब कक्षाकार्य की चिंता करता है । (मैं स्वयं अध्यापन के क्षेत्र में रह चुका हूं और वहां की कमियों से वाकिफ हूं ।) अवश्य ही ऐसे अपवाद मिल जायेंगे जिनमें किसी अध्यापक ने अपने किसी एक या कुछएक छात्र-छात्राओं पर स्मरणीय छाप छोड़ी हो और उनके जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया हो । ऐसे अध्यापक को संबंधित छात्र-छात्रा गुरु के तुल्य समझें तो यह मान्य होगा, किंतु आम तौर पर उन्हें गुरु कहना उचित नहीं होगा ।

और मुझे तो आज तक किसी ऐसे महात्मा के दर्शन नहीं हुये हैं जिसे देखकर मन में ऐसा सम्मान उमड़ पड़े कि मन अनायास ही चरणस्पर्श के लिए उत्साहित हो जाये ।

वापस उक्त चित्र की विषय-वस्तु पर । अवश्य ही देश की माननीया राष्ट्रपति सम्मान की हकदार हैं । उस कुर्सी की अपनी मर्यादा और गरिमा है और उसके प्रति सम्मान जताने के स्थापित तरीके भी हैं, जिनमें चरणस्पर्श अवश्य ही सम्मिलित नहीं है । असल बात तो यह है कि ऐसा करना पदासीन व्यक्ति के प्रति श्रद्धा का द्योतक समझा जायेगा न कि उस कुर्सी के प्रति व्यक्त श्रद्धा । मेरे मन में यह शंका उठती है कि क्या माननीया राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटील वास्तव में उस व्यक्ति के द्वारा इतनी श्रद्धा की पात्र मान ली गयी होंगी कि वह उनके समक्ष झुककर चरणवंदना करे । क्या वह व्यक्ति श्रीमती पाटील को कहीं भी और कभी भी भविष्य में मिले तो इसी प्रकार सम्मान जतायेगा ? कदाचित् नहीं । मैं समझता हूं (और हो सकता है ऐसा आदमी अकेला मैं ही होऊं) कि उस घड़ी में वह व्यक्ति स्वयं को हीनतर अनुभव करते हुए पुरस्कार को अपने ऊपर की जा रही कृपा के तौर पर देख रहा हो ।

सार्वजनिक स्थलों पर चरणस्पर्श करते हुए लोगों की इस प्रकार की तस्वीरें टीवी चैनलों तथा समाचारपत्रों में अक्सर देखने को मिल जाती हैं । नाचने-गाने के प्रतिस्पर्धा कार्यक्रमों में प्रतिभागियों द्वारा निर्णायकों का चरणस्पर्श ऐसे ही दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं । परंतु इनसे अधिक दिलचस्प घटनाएं राजनैतिक क्षेत्रों की रहती हैं । कई राजनेता अपने दल के उच्चपदस्थ नेताओं का ‘आशीर्वाद’ चरणवंदना के माध्यम से ही अर्जित करते हुए देखे जा सकते हैं । मुझे तो हंसी आती है जब तथाकथित मनुवादियों की घोर आलोचक और बसपा दल की सर्वेसर्वा सुश्री मायावती भी गदगद होकर अपने चरण दूसरे नेताओं से छुआती हैं । हद तो तब होती है जब उम्र में उनके माता-पिता के बराबर के लोग भी चरणस्पर्श हेतु आतुर दिखते हैं । कम से कम मुझे तो ऐसी घटनाएं हास्यास्पद तथा खिन्न करने वाली लगती हैं ।

चरणस्पर्श की परंपरा हिंदू समाज की एक विशेषता है और इस पर मैं आपत्ति नहीं करता । किंतु कब, कहां एवं किसके प्रति ऐसा आदरभाव होवे इसका विचार तो होना ही चाहिये । हमारी परंपरा है कहते हुए इसकी हिमायत करने वालों को तनिक सोचना चाहिये कि वे किसी विदेशी के सामने परंपराएं क्यों भूल जाते हैं । उनके प्रति अभिवादन में हाथ जोड़कर नमस्कार क्यों नहीं करते ? महिलाओं से हाथ मिलाकर मित्रभाव व्यक्त करना हमारी परंपरा नहीं रही है, फिर वे वैसा क्यों करते हैं ? लोग स्कूल-कालेजों में ‘गुड मार्निंग’ की संस्कृति को क्यों बढ़ावा देते हैं ? लोग पारंपरिक तरीके से जन्मदिन क्यों नहीं मनाते हैं, क्योंकर ‘बर्थडे’ केक काटते हैं ?

इस प्रकार की तमाम बातें हैं जो हम भारतीयों की सोच में व्याप्त विसंगतियों की ओर संकेत करते हैं । – योगेन्द्र

पदासीन व्यक्ति के चरणस्पर्श: कितना उचित?” पर 3 विचार

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s