(लोकतंत्र की व्यथाकथा, दो:) अपना जनतंत्र बड़ा किंतु महान् नहीं

पिछली पोस्ट (९ जनवरी) में मैंने इस बात का जिक्र किया था कि विगत कुछ समय से मैंने देश के चुनावों में मतदान करना बंद कर दिया । जब भी मैं अपने इस निर्णय की बात मित्रों-परिचितों आदि से करता हूं तो यह टिप्पणी सुननी पड़ती है कि इससे समस्याओं, यदि कोई हों, का समाधान नहीं हो सकता है । यह तो नितांत नकारात्मक सोच है । मुझसे पूछा जाता है कि अगर लोग ऐसे ही चुनावों से विरत होने लगें तो भला हमारे लोकतंत्र का क्या होगा । मेरा मानना यह है कि यही तो नहीं होने जा रहा है । मुझ जैसे कितने लोग होंगे जो सोचे-समझे कारणों से मत न डालने की ठाने हों ? और यदि सच में लोग मतदान में भाग न लें तो हो सकता है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था सुधर जाये । मैं यह मानता हूं कि लोकतंत्र का मौजूदा मॉडल मेरी दृष्टि में असफल हो रहा है, इसीलिए मैं वोट नहीं डालता । इसमें उत्तरोत्तर सुधार होने के बजाय गिरावट आ रही है ।हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है ऐसा दावा हम करते रहते हैं । यह बात सच भी है और बड़ा होना हमारी विवशता भी है । हमारे बड़े जनतंत्र होने का श्रेय हमारी अनियंत्रित जनसंख्या है । यदि चीन में लोकतांत्रिक शासन पद्धति होती तो हम दूसरे नंबर पर होते । पर ऐसा है नहीं और मजबूरन पहले नंबर पर हैं हम, लगातार बढ़ रही जनसंख्या के कारण । यह मानना पड़ेगा कि हम बड़े भले ही हों किंतु महान् नहीं हैं । महान् कहलाने के लिए जनसंख्या नहीं लोकतांत्रिक मूल्य, उनके प्रति सम्मान और संविधान में लिखित दिशानिदेशक सिद्धांतों की अनुरूप लक्ष्य प्राप्ति होती है, वह संविधान जिसके लिए दावा किया जाता है कि तमाम अन्य देशों के संविधानों से निकाले गये निचोड़ पर उसे लिखा गया है । इन सब बातों में हम कितना सफल हो पाये हैं ? हमारे जनतंत्र को साठ वर्ष होने जा रहे हैं, और इतना समय किसी राष्ट्र के लिए बहुत अधिक भले न हो, किंतु कम भी नहीं है । इस काल में दो पीढ़ियां गुजर चुकी हैं; और इतने समय में सबसे निचले पायदान पर खड़े समाज के कमजोर वर्ग का शैक्षिक, आर्थिक तथा सामाजिक उत्थान हो चुका होता । संबंधित सभी क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियां घट चुकी होतीं । किंतु विसंगतियां घटने के बजाय बढ़ती जा रही हैं । इन सब बातों की विस्तार से चर्चा की जरूरत है, और मैं वह करूंगा भी, आगामी आलेखों में ।

यहां इतना ही कहना है कि हम विफल रहे हैं । देश ने चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान उतार दिया, नाभिकीय विस्फोट में सफलता अर्जित कर ली, उल्लेखनीय आर्थिक विकास दर हासिल कर ली, आदि आदि । परंतु याद रखा जाना चाहिए कि आंकड़े असली तस्वीर नहीं बताते हैं, और बहुधा वे कृत्रिम भी होते हैं दूसरों को प्रभावित करने के लिए । हकीकत के लिए आसमान की ओर नहीं अपने पास की जमींन पर नजर डालनी होती है । आंकड़े तो यह भी कहेंगे कि देश में साक्षरता बढ़ी है, लेकिन यह नहीं बताते कि जिन बच्चों के लिए दावा किया जाता है कि वे प्राथमिक शिक्षा पा चुके हैं उनमें से तो कई अपना नाम तक ठीक से नहीं लिख सकते, पढ़-लिख पाने की बात ही छोड़िये । आंकड़े तो यह भी कहते हैं कि चीन के बाद अपना देश ही है जो आठ-आठ नौ-नौ फीसदी की रफ्तार से प्रगति कर रहा है । परंतु यह कोई नहीं बताता कि देश में एक वक्त के खाने को भी कइयों के पास अनाज नहीं है, भले ही दुनिया के सबसे रईसों में अपने देशवासी भी अच्छी-खासी संख्या में शुमार हों । ऐसी ढेरों बातें हैं जो हमारे जनतंत्र में व्याप्त विसंगतियां दर्शाती हैं । कुल मिलाकर अपनी मौजूदा शासन प्रणाली विफल चल रही है ।

ध्यान दें कि सफल जनतंत्र के लिए इतना पर्याप्त नहीं कि अपने यहां हर वयस्क नागरिक को मताधिकार मिला है और वह निर्भय होकर मत डालता भी है । (कितना सच है यह कहना मुश्किल है, फिर भी मान लेता हूं ।) यह तो शासन व्यवस्था की शुरुआत भर है, उसके बाद तो असली काम बचता है । अपने जनप्रतिनिधिगण तत्पश्चात् का अपना कर्तव्य कितने कारगर तरीके से निभाते हैं इस बात के आधार पर ही जनतंत्र का गुणात्मक मूल्यांकन किया जा सकता है । बाद की कहानी संतोषप्रद नहीं है ।

अभी यहीं पर रुकता हूं, शेष बातें बिंदुवार अगली पोस्टों में । – योगेन्द्र

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