एक ‘वीआईपी’ खबरः प्रधानमंत्री का ‘डी.एल.’

पांच रोज पहले की खबर है यह । अपने दैनिक अखबार के मुखपृष्ठ पर छपी संक्षिप्त-सी खबर ‘डीएल नवीनीकरण के लिए खुद गये पीएम’ शीर्षक के साथ । अर्थात् अपने वाहन चालन यानी ड्राइविंग लाइसेंस के नवीकरण हेतु अपने देश के प्रधानमंत्री जी स्वयं ही एक ‘आम आदमी’ की तरह क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आर टी ओ) पहुंचे । यह भी बता दूं कि दैनिक के अंतिम पृष्ठ पर फिर वही समाचार विस्तार से छपा था ।

हिन्दुस्तान दैनिक, १९ जनवरी, २००९
स्रोत: हिन्दुस्तान दैनिक, १९ जनवरी, २००९

मैं कह नहीं सकता कि अन्य किन-किन समाचारपत्रों ने उक्त समाचार को प्रमुखता के साथ या वैसे ही छापा होगा और कितने इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने श्रव्य/दृश्य रूप में उसे प्रस्तुत किया होगा । हां, परसों (२१ जनवरी) के रात्रिकालीन समाचारों में ‘ज़ी न्यूज’ टीवी चैनल ने भी इस बात का जिक्र किया था, और साथ में प्रस्तुत किया अपने दिल्ली के कई परिवहन कार्यालयों पर किये गये स्ट्रिंग ऑपरेशन के परिणाम ।

खबर अपने आप में एक ‘वीआईएन’ यानी ‘वेरी इंपॉटेंट न्यूज’ है । एक वीआईपी या वीवीआईपी से जुड़ी हर खबर खास होती ही है । और अगर वह आम आदमी की तरह किसी काम पर निकल पड़े तो फिर वह खबर कुछ अधिक ही खास हो जाती है । खबर के कई पहलू हैं और उनके कारण मुझे यह खबर वास्तव में खास लगती है ।

मेरे मन में सवाल उठता है कि क्या अपने पीएम साहब वास्तव में एक आम आदमी की तरह लाइन में लगे होंगे । मैं सोचता हूं कि ऐसा तो हुआ नहीं होगा । जिस पीएम की सुरक्षा के नाम पर किसी भी स्थान का ट्रैफिक रोका जा सकता है, और जिसके कारण आम आदमी जाम में फंसा रह सकता है, उसके रहते परिवहन कार्यालय पर उस समय आम आदमी की लाइन कैसे बरकरार रह सकती है ? वहां तो शायद ही कोई और मौजूद हो, सिवाय कर्मचारियों एवं सुरक्षाकर्मियों के । उन सरीखे वीवीआईपी को देख कोई भी आम आदमी कई मीटर दूर बिना कहे ही भाग जायेगा । मैं तो यही सोच पाता हूं कि वे वहां पहुंचे तो होंगे, लेकिन दौढ़भाग का सब काम उनके साथ के सहायकों ने ही किया होगा । अधिकारीगण स्वयं उनके समक्ष पहुंच सेवा में लग गये होंगे । कुछ भी हो, खबर तो बन ही गयी कि वे उक्त कार्यालय पहुंचे थे ।

मैं उनके उस स्थल पर पहुंचने के असली मकसद का अंदाजा नहीं लगा पा रहा हूं । क्या वे अन्य वीवीआईपी और वीआईपी लोगों के सामने एक नजीर पेश करना चाहते रहे होंगे ? क्या यह फ्री इंडिया यानी स्वतंत्र भारत में पहली बार हुआ होगा कि उनके स्तर का कोई वीवीआईपी नया लाइसेंस पाने अथवा उसका नवीकरण करवाने खुदबखुद संबंधित कार्यालय पहुंचा हो ? आम तौर पर तो यही होता है कि खास आदमी आम आदमी की तरह लाइन में लगकर अपना निजी कार्य नहीं करवाता है और अपने मातहतों या अपने ‘आदमियों’ को यह जिम्मेदारी सोंप डालता है । और अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो अव्वल दर्जे का वीआईपी कहलाने का हकदार ही नहीं रहता । वह वीवीआईपी या वीआईपी ही क्या जो खुद लाइन में लगे !

मैं उत्सुक हूं यह जानने के लिए कि क्या अपने वर्तमान पीएम इसके पहले भी कभी किसी परिवहन कार्यालय गये होंगे । उन्होंने पहली बार कैसे लाइसेंस लिया होगा या उसके बाद एक या अधिक बार उसका नवीकरण कैसे करवाया होगा ? काश, कोई मेरे इस अज्ञान को दूर कर देता !

जैसा मैंने कहा ‘जी न्यूज’ टीवी चैनल ने स्ट्रिंग ऑपरेशन के नतीजों का प्रसारण भी कर डाला । उन्होंने दिखाया कि दिल्ली में लाइसेंस का पूरा कार्यव्यापार दलालों के हाथों में है । चैनल के अनुसार हालात यह हैं कि एक आम आदमी लाइन में लगे-लगे जब तक खिड़की पर पहुंचता है खिड़की बन्द हो चुकती है, समय से पूर्व । और यदि वह अपना आवेदन देने में सौभाग्य से सफल हो भी जाये, तो बाबू लोग यहां से वहां और वहां से यहां यूं नचाते हैं कि उसे दलालों की अहमियत समझ में आ जाती है । वह अंत में उनकी शरण में पहुंच ही जाता है । भला कौन कई-कई दिन तक उस दफ्तर के चक्कर लगाये ! श्रम, समय और पैसा सभी तो बरबाद जाता है । अधिकांश लोग ‘प्राइवेट’ नौकरी वाले होते हैं, अथवा रोज कुंआ खोद पानी पीने वाले होते हैं । उन्हें भला रोज-रोज कहां छुट्टी मिल सकती है । केवल दलाल ही उनकी मदद कर सकता है । मुझे जिज्ञासा हुयी यह जानने की कि क्या इन दलालों का साक्षात्कार पीएम साहब को भी करना पड़ा होगा । या दलाल खुद समझ गये होंगे कि ‘आम’ की तरह आया यह आदमी निःसंदेह ‘आम’ नहीं है, ‘खास’ है और यह कि वहां से खिसकने में ही उनका भला है ।

बचपन में पढ़ी तथा सुनी कहानियां मुझे बताती रही हैं कि पहले के जमाने में ऐसे भी राजा हुआ करते थे जो अपनी जनता के सुख-दुःख और अपने प्रशासनिक कर्मियों की कार्यकुशलता का पता लगाते रहते थे । वे यदा-कदा भेस बदलकर चुपचाप निकल पड़ते थे, अपनी सुरक्षा की चिंता किये बिना । उक्त खबर पढ़ने पर मेरे मन में यह विचार आया कि कहीं अपने पीएम साहब भी उसी तर्ज पर तो अपने अभियान पर नहीं निकले । लेकिन आज तो जमाना कुछ और ही है । कम से कम अपने देश में तो यह संभव ही नहीं कि पीएम साहब सुरक्षा घेरों से बाहर निकल कर स्वतंत्र हो कुछ कर सकें, चाहें तो भी नहीं । फिर कहां क्या चल रहा है इस बात को जानने के लिए उन्हें राजाओं के उस बाबा आदम के जमाने वाले तरीके को आज के अत्याधुनिक काल में अपनाने की जरूरत ही क्या है ? वे तो सब कुछ जान सकते हैं और जानते भी होंगे । वे सदा तो पीएम नहीं रहे, फिर उन्हें कभी एक आम आदमी की तरह दलालों के दर्शन नहीं करने पड़े होंगे क्या ? हो सकता है हालात तब इतने खराब न रहे हों और वे बिना दलाल के लाइसेंस पा सके हों ।

कुछ भी हो खबर ‘इंपॉटेंट’ थी । हां, यह बात अलग है कि पीएम साहब को एक आम आदमी वाला अनुभव तो नहीं मिल सका होगा । – योगेन्द्र

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