छब्बीस जनवरी अर्थात् गणतंत्र दिवस, और मैं

आज गणतंत्र दिवस है, साठवां गणतंत्र दिवस । हर बीते वर्ष की तरह मनाया जाने वाला दिवस । अगले वर्ष इसी तारीख पर फिर मनेगा, हर बार की भांति रस्मअदायगी निभाते हुए । बड़े-बड़े संकल्पों की बात की जायेगी, देश की उपलब्धियां गिनी और गिनायी जायेंगी । लेकिन क्या है जो होना चाहिये था, जो इस तारीख तक हो ही जाना चाहिये था, इस बात का जिक्र रस्मअदायगी के समय नहीं किया जाता है । ऐसा करना निराशाप्रद जो समझा जायेगा ।

कहने को मैं इन सभी साठों दिवसों का गवाह रहा हूं । लेकिन उनके अर्थ कोई पैंतालीस साल पहले समझने लगा होऊंगा, शायद । उसके पहले समझने की समझ ही कहां थी ! आरंभ में मुझे भी इस दिन कुछ जोश, उत्साह, और उमंग अनुभव होता था । फिर प्रौढ़ावस्था आते-आते ये बातें दिलो-दिमाग से निकलने लगीं और रस्मअदायगी का भाव मन में अधिक रहने लगा । और अब वरिष्ठ नागरिक बनते-बनते इस दिवस में दिलचस्पी ही समाप्त हो चुकी है । अब हर बीते दिन की तरह का ही एक और दिन लगता है यह मुझे ।

मैं निकल पड़ता हूं बाहर सड़क पर देखने कि क्या कुछ अलग है आज । करीब दस बज रहे हैं । घर के गेट से बाहर निकलते हुए सुनता हूं एक रद्दी वाले की आवाज, रोज की भांति, ‘रद्दी पेपर, कापी-किताब, लोहाऽऽ…’ । अपनी गली के दूसरे कोने पर आंखों से ओझल होते देखता हूं उसे, कुछ सेकंड तक, और बढ़ जाता हूं घर के पास की मुख्य सड़क बीएचयू-डीएलडब्ल्यू रोड पर । ‘प्रभात-फेरी’ के रूप में पंक्तिबद्ध स्कूली छोटे बच्चों को आगे बढ़ते हुए पाता हूं नारे लगाते हुए । उनके साथ हैं अध्यापक एवं अघ्यापिकाएं उनको नियंत्रित करने में व्यस्त । मैं खुद से पूछता हूं कि ये बच्चे क्या इस दिन के मतलब समझते होंगे, क्या ये उन नारों के अर्थ जानते होंगे जिन्हें ये जोर-जोर से बोल रहे हैं, आदि । शायद इतना सब उनकी समझ में अभी नहीं आता होगा । या हो सकता है वे मुझसे अधिक समझदार हों इस मामले में और उत्साहित हों इस दिवस की अर्थवत्ता जानने के लिए । हो सकता है ।

मैं आगे बढ़ जाता हूं उसी मुख्य मार्ग पर और गांधीनगर पहुंचने पर बांये घूम जाता हूं, संकटमोचन मार्ग के रास्ते अस्सी (गंगा) घाट तक जाने के लिए । संकटमोचन ले जाने वाली उस सड़क की मरम्मत हुए बमुश्किल दो-ढाई महीना हुआ होगा, लेकिन उसकी हालत ? मेरा मन कह उठता है, भगवान् ही मालिक है इस देश का । ऐसा लगता है कि कंकणों से लदे किसी ट्रक से कंकड़ गिरकर सड़क पर बिखर गये होंगे । कोई कह ही नहीं सकता है कि यह सड़क हाल में कभी बनी होगी । लेकिन मुझे याद है उसे बनते हुए मैंने देखा था । मैं सोचता हूं कि किस रफ्तार से भ्रष्टाचार फैल रहा है इस देश में । हम भले ही और मामलों में लंगड़ाते-घिसटते आगे बढ़ रहे हों, किंतु भ्रष्टाचार में हम तेजी से दौड़ रहे हैं । भगवान् ही मालिक । मैं उस सड़क की तस्वीर खींचता हूं और आगे बढ़ जाता हूं ।

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बस थोड़ी ही दूर पर मिल जाता है सड़क के किनारे पड़े कूड़े का ढेर । नजदीक जाता हूं तो देखता हूं उस लड़की को जो कूड़े से प्लास्टिक चुन रही होती है । आज की रोटी का इंतजाम जो करना है उसे । गणतंत्र दिवस का कोई अस्तित्व नहीं उसके लिए । पता नहीं किस उम्र में उसने पेट भरने के इस रास्ते पर कदम रखे होंगे । अब तो यही उसकी जिंदगी है । मैं उसे भी अपने कैमरे में कैद कर लेता हूं । शायद मेरा कैमरा उसकी तस्वीर खींचने वाला पहला और अंतिम कैमरा होगा । मन वितृष्णा से भर जाता है ।

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आगे बढ़ जाता हूं मैं और पहुंचता हूं संकटमोचन मंदिर के प्रवेशद्वार के पास । यहां भी सड़क के वही हाल ! क्या हो गया है इस देश को, मैं सोचता हूं । अब आगे अस्सी घाट तक जाने का मेरा मन नहीं होता है । मैं वहीं से लौट आता हूं । गणतंत्र की सफलता की याद दिलाने वाले ये ही अनुभव मेरे लिए काफी हैं । क्या करूंगा मैं गंगाघाट तक जाकर ? गंगा नदी के पक्के घाट से नगवा की ओर के कच्चे किनारे पर ताजी और बासी शौच की बदबू का अनुभव ही तो मिलेगा वहां ? स्वच्छ गंगा अभियान के नाम पर करोड़ों बरबाद करने के बाद भी इससे अधिक क्या हुआ होगा वहां, मैं सोचता हूं ।

बेकार है आगे जाना सोचते हुए मैं घर वापस लौट आता हूं । दिन का शेष समय घर पर चुपचाप बीत जाता है मेरा इस पोस्ट को लिखने, कुछ अन्य चीजें पढ़ने-लिखने और चंद मिनट टीवी पर समाचार सुनने में । – योगेन्द्र

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