(लोकतंत्र की व्यथाकथा, तीन:) जनतंत्र की इतनी तारीफ क्यों?

(पिछली पोस्ट, १७ जनवरी, के आगे) विगत पोस्टों में मैंने लोकतंत्र (जिसे गणतंत्र, जनतंत्र, और प्रजातंत्र के नाम से भी जाना जाता है) अर्थात् डिमॉक्रेसी से अपने मोहभंग के कारणों की चर्चा आरंभ की थी । लोकतंत्र से इतना अभिभूत क्यों हैं इस विश्व के लोग, खासकर अपने देश के लोग ? क्यों लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था की इतनी हिमायत की जाती है ? क्या अन्य कोई भी व्यवस्था इससे बदतर होती है ? क्या राजतंत्र अनिवार्यतः घटिया दर्जे की व्यवस्था होती है ? क्या अधिनायकवाद का खतरनाक होना स्वयंसिद्ध है ? मैं समझता हूं कि किसी भी देश की जमीनी हकीकत पर तार्किक विचार किये बिना अपनी धारणा बना लेना और उस धारणा के विरोध में कोई भी तर्क न सुनना अनुचित रवैया कहा जायेगा ।

मेरी मान्यता है कि कोई भी शासन-व्यवस्था स्वयं में अच्छी या बुरी नहीं होती है । व्यवस्था की गुणवत्ता उन लोगों पर निर्भर करती है जिन पर उस व्यवस्था को चलाने की जिम्मेवारी होती है । व्यवस्था को कोई प्रभावी और लुभावना नाम देने भर से वह उच्च श्रेणी की नहीं हो जाती है । इस क्षण मुझे शेक्सपियर की नाट्यकृति, ‘Romeo and Juliet’, में जूलियट द्वारा रोमियो को संबोधित करते हुए कहा गया यह वचन याद आता है:
“What’s in a name? That which we call a rose
By any other name would smell as sweet.”

(नाम में धरा ही क्या है ? हम जिसे गुलाब कहते हैं वह किसी और नाम से भी उतना ही महकेगा ।)

अर्थात् किसी व्यवस्था को कोई भी नाम दे दें, कोई फर्क नहीं पड़ता । वह जो है सो ही रहेगा । महत्त्व नाम का नहीं उसके असली स्वरूप और गुणवत्ता का है । हम अपनी शासकीय व्यवस्था को लोकतंत्र कहते हैं, क्योंकि उसकी शुरुआत मतदान से होती है जिसमें हर वयस्क को मतदान का अधिकार है जिसका प्रयोग वह जनप्रतिनिधि चुनने के लिए करता है । किंतु सार्थक लोकतंत्र के लिए इतना पर्याप्त नहीं है । क्या उसके आगे-पीछे और कुछ ऐसा नहीं है जो प्रभावी एवं सफल लोकतंत्र की पहचान कही जा सके ? क्या अपने देश की इस व्यवस्था में अनेकों खामियां नहीं हैं जिन्होंने इसे केवल नाम का लोकतंत्र बना छोड़ा है । मैं अभी यहां पर उनकी सविस्तार चर्चा नहीं कर रहा हूं । वस्तुतः पूरी व्यवस्था कितनी सफल है, उसे सफल बनाने के लिए जिम्मेदार लोग कितने प्रतिबद्ध हैं, वे लोग क्या अपनी स्वार्थसिद्धि में लिप्त हैं, क्या वे येनकेन प्रकारेण सत्ता को अपने कब्जे में रखने को तत्पर हैं, क्या वे समाज की समस्याओं के समाधान के लिए कृतसंकल्प हैं, आदि अनेकों प्रश्न हैं जिनका उत्तर व्यवस्था की गुणवत्ता तथा सार्थकता तय करने के लिए पूछे जाने चाहिए ।

यह मान लेना कि राजतंत्र निर्विवाद रूप से अस्वीकार्य व्यवस्था है स्वयं में मूर्खतापूर्ण विचार है । क्या यह सच नहीं है कि इतिहास में ऐसे राजाओं का नाम लिया जाता है जिनका शासन प्रजा के हितों पर केंद्रित रहा है । हमारे देश के इतिहास में अशोक, विक्रमादित्य, अकबर आदि का उल्लेख उन शासकों के तौर पर मिलता है जिनका राज स्मरणीय रहा है । पौराणिक काल के भगवान् राम के राज की गुणवत्ता के कारण उसे आदर्श व्यवस्था के रूप में रामराज्य के नाम से आज भी जाना जाता है । क्यों ? क्योंकि राजतंत्र भी अच्छा हो सकता है । और इसके विपरीत लोकतंत्र भी असफल हो सकता है, यदि उसके कर्णधार अयोग्य हों ।

मैं आगे की बात देश में लोकतंत्र की स्थापना से संबंधित नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों से करता हूं । उनके वक्तव्य मुझे अंतर्जाल पर मिल गये थे । उन्होंने अपनी पुस्तक में क्या कहा था इसका एक अंश नीचे प्रस्तुत है:
The writing in his famous book ‘The Indian Struggle’ about the post-independence struggle period Netaji said “… If we are to have a socialist economy, socialism cannot be established by the Western Democracy. Socialist reconstruction can be done only by Dictatorship but that Dictatorship should not be of individuals or of the cliques but of general masses… “
(यदि हम समाजवादी अर्थतंत्र चाहते हैं, तो समाजवाद पाश्चात्य लोकतंत्र से स्थापित नहीं हो सकता । समाजवादी पुनर्निर्माण केवल अधिनायकवाद से ही संभव है, लेकिन ऐसा व्यक्ति या गुटों का न होकर आम जनसमुदाय का अधिनायकवाद होना चाहिये ।)
(स्रोत: http://www.yorozubp.com/netaji/75birthday/yajee.htm)

किसी अन्य मौके पर उन्होंने क्या कहा इसका उल्लेख भी मैं कर रहा हूं:
“The Fundamental Problems of India” (An address to the Faculty and students of Tokyo University, November 1944): “You cannot have a so-called democratic system, if that system has to put through economic reforms on a socialistic basis. Therefore we must have a political system – a State – of an authoritarian character. We have had some experience of democratic institutions in India and we have also studied the working of democratic institutions in countries like France, England and United States of America. And we have come to the conclusion that with a democratic system we cannot solve the problems of Free India. Therefore, modern progressive thought in India is in favour of a State of an authoritarian character” (The Essential Writings of Netaji Subhas Chandra Bose Edited by Sisir K. Bose & Sugata Bose, Delhi: Oxford University Press, 1997, pp319-20)
(आप तथाकथित जनतांत्रिक व्यवस्था नहीं अपना सकते, यदि उस व्यवस्था ने समाजवादी आधार पर आर्थिक सुधार आगे बढ़ाने हों । इसलिए हमारे पास एक राजनैतिक तंत्र – राज्य – अधिकारवादी होना चाहिये । हमें भारत में जनतांत्रिक संस्थाओं का कुछ-कुछ अनुभव हैं और हमने फ्रांस, इंग्लैंड, तथा संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों के जनतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली का भी अध्ययन किया है । और हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जंनतांत्रिक व्यवस्था से हम स्वतंत्र भारत की समस्याएं नहीं सुलझा सकते हैं । अतः भारत में आधुनिक प्रगतिशील विचारधारा अधिकारवादी राज्य के पक्ष में है ।)
(स्रोत: http://en.wikipedia.org/wiki/Subhas_Chandra_Bose#Political_views)

स्पष्ट है कि नेताजी बोस स्वतंत्रता के बाद तुरंत जनतंत्र के पक्ष में नहीं थे । उन्होंने अवश्य ही कहीं न कहीं अपनी धारणा को विस्तार से स्पष्ट किया होगा । मेरा विश्वास है कि वे (तथाकथित) जनतंत्र के खतरों को भांप गये होंगे । मैंने जैसा सुना-पढ़ा है उसके अनुसार वे समझते थे कि अपने देश के लोगों की मानसिकता अभी जनतंत्र के लिए नहीं ढली है । वे सामंतवादी व्यवस्था के तहत इस कदर दबे पड़े हैं कि स्वतंत्र चिंतन उनकी सोच से बाहर रहा है । वे स्वयं को बराबरी के स्तर पर खड़ा करके जनतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने से आज तक हिचकते आ रहे हैं । मैं स्वयं इन्हीं बातों को मानता हूं । नेताजी शायद यह मानते थे कि हीनभावना तथा गुलाम मानसिकता से उबरने में उन्हें कम से कम एक पीढ़ी के वक्त की जरूरत होगी और यह कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद एक प्रकार का अधिनायकवाद उनको सार्थक जनतंत्र के लिए तैयार कर सकेगा । अतः ऐसी अधिनायकवादी व्यवस्था  स्वतंत्रता के बाद के आरंभिक दौर में अपना देश अपनाये शायद यही वे चाहते थे ।

मैं समझता हूं कि नेताजी के अनुसार यह अधिनायकवाद किसी व्यक्ति का निरंकुश शासन नहीं था, बल्कि यह स्वयं जनता के द्वारा अपनाया गये कठोर अनुशासन की व्यवस्था थी, जिसमें मर्यादित स्वतंत्रता ही लोगों को प्राप्त होती, ताकि वे जंनतांत्रिक मूल्यों को समझ सकें और अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत हो सकें, केवल अपने अधिकारों की ही बात न करें ।

मेरे मतानुसार अपने लोगों को जनतांत्रिक मूल्यों का पाठ पढ़ाये बिना ही इस देश ने एक ‘सतही’ लोकतंत्र अपना लिया । किंतु हकीकत यह है कि करीब छः दशक पुराने इस लोकतंत्र में आम मतदाता आज भी जातीय, धार्मिक अथवा क्षेत्रीय जैसे नकारात्मक आधारों से प्ररित हो किसी प्रत्याशी की योग्यता का आकलन करता है । यह भी तथ्य है कि चुने गये जनप्रतिनिधियों की रुचि स्वस्थ जनतांत्रिक परंपराओं एवं सिद्धांतों की स्थापना में शायद ही कभी रही है, कम से कम वर्तमान समय में तो मुझे ऐसे कोई संकेत नहीं दिखते हैं । वे सिद्धांतों के लिए सत्ता का त्याग करने के बजाय सत्ता के लिए सिद्धांतों का त्याग करना उचित मानते हैं । जिन राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव हो उनसे सफल लोकतंत्र की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? इन तमाम बातों की चर्चा मैं आगामी पोस्टों में करने का इरादा रखता हूं । फिलहाल अभी इतना ही । – योगेन्द्र

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, तीन:) जनतंत्र की इतनी तारीफ क्यों?” पर एक विचार

  1. जनतंत्र से मोहभंग का कारण यह है कि यह जनतंत्र नहीं है। जनतंत्र हर स्तर पर जनतंत्र होना चाहिए। उस के साथ अनुशासन भी जरूरी है। यह तो समर्थतंत्र है।

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