(लोकतंत्र की व्यथाकथा, पांच:) मतदान करना अधिकार है, बाध्यता नहीं

मैं समाचार माध्यमों पर सुनता आ रहा हूं कि लोगों को मतदान करने का लोकतांत्रिक अधिकार मिला है, जिसका उपयोग करते हुए उन्हें अधिकाधिक संख्या में वोट डालना चाहिए । यह भी सुनता हूं कि उन्हें साफ-सुथरे और ईमानदार प्रत्याशी को वोट देना चाहिए । क्या पहचान है अच्छे प्रत्याशी की और कहां से लायें ऐसा व्यक्ति इस बात पर मैं अभी बहस नहीं करने जा रहा हूं । मैं यह जानना चाहता हूं कि यदि आप किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करना चाहें, और ऐसा करने के आपके ठोस कारण होंगे ही, तब आप क्या करेंगे ।

जब ‘हमें वोट डालने का अधिकार मिला है’ जैसी बात कही जाती है तो इसके यह अर्थ कदापि नहीं कि मतदान करना आपकी बाध्यता या अनिवार्यता है । अधिकार का अर्थ है आप स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं किसी के भी पक्ष में । परंतु किसी के पक्ष में खड़ा न होने का विकल्प भी इस अधिकार में निहित है । इसमें किसी को वोट देने की वाध्यता नहीं है । मैंने इस अधिकार में निहित विकल्पों के मद्देनजर ही किसी को भी वोट न देने का निर्णय लिया है, क्योंकि मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से मेरा मोहभंग हो चुका है । वस्तुतः ऐसा में पिछले दो-एक चुनावी ‘पर्वों’ से कर रहा हूं । ऐसा करने के मेरे खास कारण हैं, जिनकी विस्तार से चर्चा मैं करूंगा भी, भविष्य में । अभी यह बता दूं कि मैं बीस-पच्चीस वर्षों से मतदान करता आया हूं और वह भी पूरे उत्साह से । लेकिन मैं देख रहा हूं कि अपने देश की राजनीति में लगातार गिरावट आती जा रही है । एक विशेषज्ञ की भांति मैं राजनीति की बात नहीं कर सकता, किंतु उस विषय पर बिल्कुल भी समझ नहीं रखता ऐसा भी नहीं है । देश में क्या चल रहा है इसे तो मैं कोई चालीस साल से देख ही रहा हूं । अपने अनुभवों और आकलनों पर ही मेरा निर्णय आधारित है, सोच-समझकर लिया गया निर्णय । मेरा विचार किसी के कहने, बहलाने या भ्रमित करने पर आधारित नहीं है । हां, इस निर्णय का कार्यान्वयन कैसे हो यह मेरे लिए अवश्य एक समस्या थी और है ।

जब तक बैलट पेपर का चलन था मेरा काम आसान था । आप बिना ठप्पा मारे या अमान्य तरीके से ठप्पा लगाकर बैलट मतदान बक्से में डाल सकते थे । लेकिन अब प्रचलित वोटिंग मशीनों के साथ समस्या यह है कि उनमें प्रत्याशियों के नामों के साथ ‘कोई नहीं’ का अतिरिक्त विकल्प नहीं रहता है । ऐसी स्थिति में आपको निर्वाचन अधिकारियों के समक्ष अपना तत्संबंधित निर्णय दर्ज कराना होता है, मतदान की गोपनीयता खोते हुए । स्पष्ट है कि इसमें खतरे हो सकते हैं; आपको प्रत्याशियों के रोष या कोप का भागी बनना पड़ सकता है । क्यों हर कोई ऐसा झंझट पालना चाहेगा ? दुर्भाग्य से अभी आप इससे अधिक यही कर सकते हैं कि मतदान करने ही न जायें । लेकिन मैं मतदान करने जाना चाहता हूं, अन्यथा मेरे नाम पर कोई और वोट डाल सकता है । चुनाव आयोग कितनी ही साफ-सुथरी व्यवस्था का दावा करे, मैं इस संभावना को नकार नहीं सकता ।

‘वोट न डालने’ के उक्त विकल्प और उससे संबद्ध गोपनीयता हनन के मामले पर चुनाव आयोग स्वयं संजीदा है । परंतु वह विवश है, क्योंकि चुनाव संबंधी सुधारों के लिए उसे विधायिका का मुंह ताकना पड़ता है, वही विधायिका जो वर्तमान प्रावधानों की कमियों का भरपूर लाभ उठाने की छूट प्रत्याशियों को देना चाहती है और सुधार के कदमों से कतराती है । तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ने तो सन् 2004 में प्रधानमंत्री को प्रस्तावित चुनाव सुधारों की सूची सोंपी थी, जो मेरे अनुमान से प्रधान मंत्री कार्यालय में इस समय धूल खा रही होगी । उसमें 7वें क्रम पर उपरिकथित विकल्प के संबंध में ये शब्द लिखे गये हैं:
“मतदान के नकारत्मक/निरपेक्ष(निष्पक्ष) विकल्प के स्पष्ट उल्लेख के लिए आयोग कानून में संशोधन की संस्तुति करता है । इस प्रयोजन के लिए निर्वाचन प्र्रक्रिया कानून, 1961, के नियम 22 एवं 49B में समुचित संशोधन किये जायें और मतदान पत्र तथा मतदान एकक पर प्रत्याशियों के नामों से संबंधित विवरण वाले स्तंभ पर अंतिम प्रत्याशी की प्रविष्टि के बाद ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ की एक प्रविष्टि होनी चाहिए, ताकि मतदाता सभी प्रत्याशियों को अस्वीकार कर सके, यदि वह ऐसा करना चाहे । ऐसा एक प्रस्ताव पूर्व में भी आयोग ने 2001 में भेजा था (10-12-2001 का पत्र देखें) ।”

मूल अंग्रेजी में:
“The Commission recommends that the law should be amended to specifically provide for negative / neutral voting. For this purpose, Rules 22 and 49B of the Conduct of Election Rules, 1961, may be suitably amended adding a proviso that in the ballot paper and the particulars on the ballot unit, in the column relating to names of candidates, after the entry relating to the last candidate, there shall be a column [*]. None of the above., to enable a voter to reject all the candidates, if he chooses so. Such a proposal was earlier made by the Commission in 2001 (vide letter dated 10.12.2001).”
[* मेरी राय में column के स्थान पर ‘प्रविष्टि’ होना चाहिए ।]

इसी संदर्भ में यह भी ज्ञातव्य है कि ‘पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज’ (People’s Union for Civil Liberties) नामक संगठन ने एक जनहित याचिका माननीय उच्चतम न्यायालय में दाखिल कर रखी है ।

मुझे उम्मींद नहीं है कि हमारे जनप्रतिनिधि इस दिशा में कोई सार्थक कदम बढ़ायेंगे, भले ही यह मतदाता की मांग हो और चुनाव की दिशा में एक कदम हो, क्योंकि यथास्थितिवाद उनके राजनैतिक हित में है ।

मैं इस धारणा को नहीं स्वीकारता कि लोग मतदान करेंगे तभी तो लोकतांत्रिक सुधार होंगे । मतदान तो आज तक होता ही आ रहा है और प्रतिशत बुरा भी नहीं रहता । तब निरंतर की यह गिरावट क्यों ? क्या यह सच नहीं है कि अधिकांश लोगों का मौजूदा राजनेताओं से मोहभंग हो चुका है । उनके प्रति लोगों के मन में अच्छी धारणा नहीं है । कई जन मानते हैं कि जो जनप्रतिनिधि होने योग्य नहीं वे ही चुनाव जीत रहे हैं । अयोग्य एवं भ्रष्ट लोगों को ही राजनैतिक दल टिकट दे रहे हैं । साफ-सुथरा आदमी चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता है । आप वोट किसी को दें, घूमफिरकर वही चुने जाने हैं जिन्हें हम चुनना नहीं चाहेंगे । और कोई साफ-सुथरा समर्पित मिल भी जाये तो उसे अपनी पार्टी के निर्णयों से बंधना होगा अथवा वह अलग-थलग पड़ जायेगा । सुधार/परिवर्तन की संभावना ऐसे में कहां रह जाती है ।

मैं नकारात्मक वोट अपने असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में देखता हूं । आप भी ऐसा कर सकते हैं यदि आप भी मौजूदा व्यवस्था से नाखुश हों । निर्णय सबके अपने तथा स्वतंत्र हैं । मतदान के समय तो मैं अपने मन का कर ही सकता हूं । उसके बाद तो मेरे हाथ से पांच साल (?) के लिए सब कुछ निकल जाना है ।

और भी बहुत कुछ कहना है, अगले चिट्ठे में । – योगेन्द्र

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