(लोकतंत्र की व्यथाकथा, छः:) परिवारवाद से उपजे या ऊपर से थोपे गये राजनेता !

मुझे उन लोगों से ईर्ष्या होती है जो यह मानते हैं कि हमारी डिमॉक्रेसी ‘मैच्योर’ हो रही है, राजनैतिक दल और आम जनता अब समझदार होती जा रही है, लोकतंत्र स्वस्थ एवं पुष्ट हो रहा है । मेरी कामना है कि काश! ऐसे आशाप्रद विचार मेरे मन में भी घर कर जाते । लेकिन जो अब मुझे दिखाई दे रहा है और जिस गिरावट को मैं विगत दशकों से देख रहा हूं उसके चलते आंखें मूंदकर लोकतंत्र के सुखद सपने नहीं देख पाता । और यही वजह है कि नकारात्मक वोट की वकालत करता हूं; शायद यह रास्ता अब काम करे ।

अपनी बात की शुरुआत में विगत बुधवार (१ अप्रैल) के दिन प्रसारित ‘रेडियो बीबीसी’ के एक कार्यक्रम से करता हूं । उक्त कार्यक्रम में रेडियो श्रोताओं का देश के जाने-माने चुनाव विश्लेषक श्री योगेन्द्र यादव के साथ टेलीफोन के माध्यम से संपन्न वार्तालाप प्रस्तुत किया गया था । आधे घंटे के उस कार्यक्रम में श्रोताओं ने मौजूदा राजनैतिक वातावरण को लेकर अपनी चिंताएं-शंकाएं मेहमान वक्ता के सामने रखी थीं । बातों का विस्तृत विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, शायद बीबीसी पर अभी भी सुनने को मिल जाये । जो-जो बातें पूछी या कही गयीं उनमें मुझे श्रोताओं का असंतोष ही नजर आ रहा था । उस परिचर्चा में सर्वाधिक महत्त्व की जो बात मैंने सुनी वह यह थी कि अब राजनैतिक दलों में उन ‘नेताओं’ की बाढ़ आ गयी है जिनका पूर्व में कोई राजनैतिक अनुभव नहीं रहा ।

वक्ता का स्पष्ट कहना था कि हमारे लोकतंत्र के आरंभिक दौर में वे लोग जनता के सामने बतौर प्रत्याशी प्रस्तुत होते थे, जिनके राजनैतिक जीवन का आरंभ सामान्य कार्यकर्ता के रूप में होता था । वे लोगों के बीच कार्य करने के अनुभव के साथ आगे बढ़ते थे । जनता की राजनैतिक समस्याओं और आकांक्षाओं से वे परिचित होते थे । जनता के बीच उनकी पैठ होती थी । उनकी योग्यता उनके कार्य एवं अनुभव पर आधारित होती थी, जिसके बल पर वे आगे बढ़ते थे और अपने-अपने दलों में खुद की जगह बनाते थे । वे रातोंरात बड़े नेता के तौर पर खड़े नहीं हो जाते थे ।

आज स्थिति यह है कि नेता दलों की जमीन पर ‘पैरासूट’ से सीधे उतरकर उनमें शामिल हो रहे हैं, न कि राजनीति के टेढ़े-मेढ़े, ऊबड़-खाबड़ रास्ते से वहां पहुंच रहे हैं । यही नहीं, वे पहले ही दिन अपने दल में आम कार्यकर्ता से कहीं ऊपर का कद अख्तियार कर ले रहे हैं । कौन हैं ये लोग ? फिल्मों, खेलों और प्रशासन आदि के क्षेत्रों से जुड़े और वहां की सफलता के बल पर प्रशंसकों की भीड़ खड़ी कर चुके अथवा उच्चपदस्थ राजनेताओं से निकट संबध स्थापित कर चुके लोग इस समय देश के राजनैतिक दलों में घुस चुके हैं । घुस ही नहीं चुके उन-उन दलों के प्रत्याशी बनकर मैदान में भी कूदे पड़े हैं । प्रत्याशी नहीं तो पदाधिकारी बन बैठे हैं । क्रिकेटर अजहरुद्दीन और अभिनेता संजय दत्त सरीखे जन रातोंरात बड़े बने नेताओं के उदाहरण हैं । संजय दत्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली तो ‘सपा’ के महासचिव बन गये । वाह राजनीति ! राजनैतिक समझ, अनुभव एवं कार्य इनकी योग्यता नहीं है; ये भीड़-जुटाऊ हैं और लोगों का अंध समर्थन पा सकते हैं । आज प्रायः हर दल में फिल्मी हस्तियों की भीड़ जुटी है, जिन्हें यह नहीं मालूम कि लोग कैसे अपनी रात खाली पेट बिताते हैं, कैसे बिना इलाज काल के गाल में जा रहे हैं, कैसे उनके बच्चे स्कूल जाने के बदले पेट पालने काम पर निकलते हैं, आदि-आदि । उन्हें न आर्थिक नीतियों की समझ है और न ही विदेश नीति की, और न यह जानते हैं कि कैसे प्रशासनिक उदासीनता तथा ज्यादती आम जन को झेलनी पड़ती है । अपने ही दल के संविधान और सिद्धांत से इनका परिचय होगा इसमें मुझे शंका है ।

आज के अधिकांश दलों में दूसरे वे नेता हैं जो विरासत के तौर पर उसमें जगह और अहमियत पा रहे हैं । ये दल ‘फलां एण्ड कंपनी’ की शक्ल लेते जा रहे हैं । बेटे-बेटियों का पदाधिकारी बनने एवं बतौर प्रत्याशी टिकट पाने का हक सबसे पहले उनका है यह धारणा समय के साथ प्रबल होती जा रही है । सफलता न मिली तो वे विद्रोह की मुद्रा में आ जाते हैं । पति चल बसा तो उसकी पत्नी, जिसने कभी घर के बाहर पैर न रखा हो या चार जनों के सामने जिसने मुंह न खोला हो, भी मैदान में उतार दी जाती है । याद करें जब रावड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी थीं तो उनकी योग्यता क्या थी, क्या अनुभव थे ? सीधे किचन से प्रदेश के मुखिया की कुर्सी पर आ बैठीं; तब वह यह भी नहीं समझ पाती थीं कि जिस कागज पर वह विचार कर रहीं हैं उसमें लिखा क्या है ।

इस प्रकार यही देखने को मिल रहा है कि दलों में कई नेता ऊपर से थोपे जा रहे हैं । परिवारवाद की आलोचना अक्सर सुनने को मिलती है, फिर भी सभी दलों में यह न्यूनाधिक चल ही रहा है । वरिष्ठ नेता, जो स्वयं परिवारवाद से पैदा नहीं हुए, इसे उचित मानते हैं । मैं नहीं समझता कि यह सब स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है ।

हमारे इन दलों के वरिष्ठ नेता यह भूल चुके हैं कि अपने समय में स्वयं वे रातोंरात दल में अहमियत नहीं पा गये थे । उनमें से शायद ही कोई राजनैतिक विरासत के बल पर अहम जगह पाया हो । किसी ने बतौर छात्रनेता के शुरुआत की, तो किसी ने स्थानीय मुद्दों पर संघर्ष का रास्ता चुना, और किसी ने अपने व्यवसाय के साथ राजनीति में भी पैर रखकर अनुभव बटोरा, इत्यादि । लेकिन अब ये ही लोग नयी परंपराओं के पोषक बन गये हैं ।

आज की राजनीति में स्वस्थ परंपराओं का अभाव हो चला है । कुल मिलाकर राजनीति में गिरावट आ गयी है ऐसा जनमत उभर रहा है । कौन है इस गिरावट के लिए ? यदि यह कहा जाता है कि राजनेता ही जिम्मेदार हैं तो फिर वे ही सुधार लायेंगे ऐसी उम्मींद कैसे की जा सकती है ? बारबार उन्हीं को मत कैसे दिया जा सकता है ? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मैं नकारात्मक वोट देकर अपना असंतोष व्यक्त करना उचित समझता हूं । – योगेन्द्र

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