लोकतंत्र की व्यथाकथा, सात – भला किसे चुनें प्रतिनिधि, और क्यों ?

आजकल अखबारों और इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों पर दिखाये जा रहे विज्ञापनों तथा परिचर्चाओं आदि के द्वारा देश के मतदाताओं से अनुरोध किया जा रहा है कि वे अवश्य वोट (vote) डालें और वह भी सोच-समझकर सही व्यक्ति को, साफ-सुथरी छवि वाले व्यक्ति को, ऐसे व्यक्ति को जो जनसेवा के प्रति समर्पित हो । उनसे कहा जा रहा है कि वे जाति, धर्म तथा क्षेत्रीयता के आधार पर मतदान न करें, बल्कि देश के व्यापक हितों को ध्याान में रखें । ऐसी ही ढेर सारी बातें । जब ये सब बातें कही जाती हैं तो मेरे मन में तमाम सवाल उठ खड़े होते हैं ।

मुझे यह नहीं समझ में आता है कि क्योंकर किसी वोटर को यह याद दिलाने की जरूरत पड़ती है कि वह मताधिकार का अवश्य प्रयोग करे । और यह क्यों कहना पड़ता है कि वह सोच-समझकर स्वच्छ छवि के जनसेवक को चुने ? लोकतंत्र के मूल में तो यह धारणा रहती है कि लोग अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं और उसे निभाने की कोशिश करना जानते हैं । वयस्क व्यक्ति को इतनी सब समझ तो होगी ही इस विश्वास के साथ ही उसे मताधिकार मिलता है । अवयस्क को यह समझ नहीं होगी यह मान्यता प्रचलित है । मतदाता प्रत्याशियों के बारे में कम जानकारी रखे यह तो संभव है, किंतु कैसा व्यक्ति चुना जाये इसकी समझ ही न रखे यह कैसे हो सकता है ? और यदि मतदाता नासमझी बरतता है और सही तथा स्वतंत्र निर्णय की योग्यता ही नहीं रखता है तब उसे मताधिकार ही क्यों मिले ? असल बात यह है कि मतदाता सब समझता है और प्रत्याशी चुनने के उसके अपने विशेष कारण रहते हैं । यह उम्मींद करना निहायत मूर्खता होगी कि वह जाति, धर्म आदि के विचारों के आधारों पर वोट देना बंद कर देगा, क्योंकि उसे ऐसा करने की सलाह दी जा रही है । ये सब बातें हमारे संस्कारों में बहुत गहरे बैठी हैं, और मेरा अनुभव बताता है कि उच्चतम स्तर की औपचारिक शिक्षा प्राप्त लोग भी इन विचारों से मुक्त नहीं हो पाते हैं । इतना ही नहीं लोग यह भी देखते हैं कि उनके तात्कालिक हित-साधन किसके हाथों हो सकेगा, भले ही यह व्यापक सामाजिक तथा राष्ट्रीय हितों की कीमत पर हो । यही वजह है कि आपराधिक पृष्ठभूमि का प्रत्याशी भी चुन लिया जाता है ।

मतदाता चुनने में कैसी समस्या आ सकती है मैं इसे अपने संसदीय क्षेत्र (वाराणसी) के उदाहरण से स्पष्ट करता हूं । यहां कुल १५ प्रत्याशी मैदान में खड़े हैं । इनमें से ११ तो नाम भर के लिए प्रत्याशी है, नितांत अनजान, जिनकी जमानत भी शायद ही बचे । वे क्यों चुनाव में खड़े होते हैं मैं इसका सार्थक कारण आज तक नहीं समझ पाया हूं । कुछ लोगों की दृष्टि में वे शौकिया ऐसा करते हैं । कुछ दूसरों के ‘वोट-काटू’ की भूमिका भी शायद निभाते हैं । कदाचित् कुछ भविष्य की चुनावी जमीन की तैयारी के लिए ऐसी असफल शुरुआत को आवश्यक समझते हैं । प्रत्याशी बनने के विविध कारण संभव हैं । अपने चुनाव क्षेत्र में जो नाम चर्चा में हैं और जिनमें से किसी एक को जीतना है वे हैं: १. कांग्रेस के डा. राजेश मिश्रा, २. भाजपा के डा. मुरली मनोहर जोशी, ३. बसपा के श्री मुख्तार अंसारी, और ४. सपा के श्री अजय राय

मिश्राजी मौजूदा सांसद हैं और कहा जाता है कि उनके कार्यकाल से लोग संतुष्ट नहीं हैं । वे मेरे आसपास के इलाके (वाराणसी दक्षिण) में कभी एक चक्कर भी आये हों इस बात में मुझे शंका है । करोड़ों के खर्च से हाल में बनने के बावजूद खस्ताहाल सड़कों, पांच-दस घंटे तक की बिजली कटौती, पानी, अतिक्रमण तथा सड़क-जाम आदि की समस्याएं हर बीतते वर्ष के साथ गंभीर होती आ रही हैं । गंगा की सफाई के नाम अरबों खर्च हो चुके हैं, किंतु स्थिति बद से बदतर हो रही है । इनके और तत्सदृश अन्य समस्याओं के समाधान में उनका क्या योगदान रहा ? लोग सवाल करते हैं । स्थानीय हैं इसलिए स्वीकार्य हो सकते हैं । ब्राह्मण समुदाय उनका पक्ष ले सकता है । क्या बुराई है जातीयता के आधार में, जब सभी इस पर चल रहे हैं ?

कभी इलाहाबाद के सांसद रह चुके जोशीजी शुरू से ही बाहरी कहे जाते रहे हैं । सुना जाता है कि आरंभ में पार्टी के अंदर दबी जबान से उनका विरोध भी हुआ था । लोग पूछते हैं कि इलाहाबाद से ‘भागकर’ वाराणसी आने की जरूरत उन्हें क्यों पड़ी । आम लोगों को शंका है कि वाराणसी के लिए वे शायद ही कुछ करेंगे, और अपने इलाहाबाद तथा दिल्ली के घरों में ही अधिक बैठे रहेंगे । शैक्षिक आधार पर अवश्य ही वे सबसे ऊपर हैं । पर इतना काफी नहीं है । ‘सांप्रदायिक’ कही जाने वाले दल के प्रत्याशी हैं, इस कारण कई जन उन्हें मत नहीं दे सकते हैं, उन्हें बेदाग मानते हुए भी । कदाचित् बुद्धिजीवी उनका साथ देना चाहेंगे ।

श्री अंसारी यूपी पूर्वांचल के ‘माफिया सरगना’ के तौर पर जाने जाते है । कहा जाता है कि उनके विरुद्ध दर्जनों आपराधिक मामले चल रहे हैं । संप्रति वे जेल के सींखचों के पीछे हैं । आप कहेंगे कि उन्हें वोट नहीं दिया जाना चाहिए । लेकिन मैं समझता हूं कि उन्हें अच्छे वोट मिलेंगे; जीतेंगे या नहीं यह नहीं कह सकता । ये वोट कुछ मुस्लिम मतदाताओं से तो कुछ बसपा के दलित वोट बैंक से आयेंगे । हर मतदाता के चुनाव के अपने किस्म के आधार होते हैं । टीवी पर आप राय-मशविरा देते रहिए, फर्क नहीं पड़ता ! इस समय प्रदेश में बसपा की सरकार है और अंसारीजी अपनी हैसियत दिखाने में समर्थ हो सकते हैं । शायद नियमित बिजली दिला दें । क्या पता शहर की समस्याओं का ‘अस्थाई’ हल वे पेश कर दें । तो क्यों नहीं उन्हीं को वोट दिया जाये ? यह विचार कइयों के मन में उठ सकता है ।

और श्री राय ‘बाहुबली’ के तौर पर जाने जाते हैं । सुनने में आता है कि उनके विरुद्ध भी मामले दर्ज हैं । कल तक वे भाजपा के ‘समर्पित’ कार्यकर्ता थे और सपा के लिए ‘सांप्रदायिक’ । परंतु अब भाजपा में टिकट न मिलने पर वे सपा में आ गये हैं और सपा के लिए ‘सेक्युलर’ हो गये हैं । क्या है उनकी विचारधारा और कितना स्थायित्व है उस विचारधारा में ? कल वे बसपा में चले जायें तो आश्चर्य नहीं । उनकी योग्यता का आकलन आप करिए । उनकी कोई राजनैतिक विचारधारा होगी इसका विश्वास मुझे नहीं । शायद सभी प्रत्याशियों में वे सबसे कमजोर सिद्ध होंगे । फिर भी नतीजा उनके हक में मिले तो आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि अपना देश चमत्कारों का देश है और यहां कुछ भी हो सकता है ।

यह भी मैं बता दूं कि इनमें से कोई प्रत्याशी मेरे पास मत मांगने नहीं आया, मेरे लगभग हर समय घर पर ही रहने के बावजूद । शायद मेरे मोहल्ले में कोई आया ही नहीं । इस मोहल्ले में विश्वविद्यालय तथा अन्य संस्थाओं के कार्यरत/सेवानिवृत्त पढ़े-लिखे लोग रहते हैं । वे अपनी सोच से वोट देंगे (या नहीं देंगे) शायद यह मान लिया गया होगा । कहने का मतलब कि राजनेता मानते हैं कि उनसे ‘वोट दो’ कहने में समय जाया ही होना है, क्योंकि इन मतदाताओं की प्रतिबद्धता निश्चित है । हां, जोशीजी का फोन पर ‘रिकॉर्डेड’ संदेश अवश्य मुझे मिला था । मतदान के पहले तक मेरे मोहल्ले और उसके आसपास चुनाव संबंधी कोई हरकत मुझे नहीं दिखी । पहले के चुनावों में इतनी शांति कभी नहीं रहती थी

मेरे लिए किसे वोट दूं यह निर्णय ले पाना कठिन था । कठिनाई और बढ़ रही थी जब मैं प्रत्याशी के अलावा उसके दल पर भी विचार करना जरूरी समझ रहा था । मेरे मतानुसार हमारे लोकतांत्रिक निर्वाचन व्यवस्था में एक गंभीर विडंबना है । वह यह कि हम प्रत्याशी को चुनते हैं और जैसा मैंने आरंभ में कहा हमसे यह अपेक्षा की जाती है कि हम उसकी छवि को ध्यान में रखें । लेकिन वह व्यक्ति एक दल से संबद्ध होता है । कहने को तो वह अपने क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करता है पर वह असल में अपने दल का प्रतिनिधि बन के बैठ जाता है । उसे अपने दल की नीतियों के अनुसार चलना होता है । वह किस नीति एवं योजना को समर्थन दे इसे उसका दल अथवा दल के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति तय करता है । इस बात का कोई महत्त्व नहीं होता कि स्वयं उसके निर्वाचन क्षेत्र के लोग क्या चाहते हैं । चुने गये प्रत्याशी का कद दल के भीतर यदि कुछ खास न हो तो वह कुछ कर भी नहीं सकता ।

एक बात और है, जिसे में गंभीर मानता हूं । प्रत्याशी खुद भले ही स्वच्छ छवि का हो तो भी उसे चुना नहीं जा सकता है, अगर उसकी पार्टी में आपराधिक तत्व मौजूद हों । किसी प्रत्याशी की योग्यता का आकलन उस दल के सापेक्ष किया जाना चाहिए जिसका वह सदस्य है । और आज की तारीख में कौन-सा दल है जिसमें आपराधिक छवि के लोग न भरे हों । तब किस दल को और उसके प्रत्याशी को चुना जाये । किस दल के बारे आश्वस्त हुआ जा सकता है कि उसका दल दूसरे दल से मौके हिसाब से तालमेल नहीं बिठायेगा ? मैं किसी को भी स्वीकार्य नहीं पाता । कुछ प्रत्याशी तो कूदफांद में भी माहिर होते हैं और किसी भी दल में पहुंच सकते हैं ।

मेरे क्षेत्र के चुनाव कल संपन्न हो चुके हैं । मैंने जो निर्णय लेना था वह ले लिया । अब एक माह का इंतजार है मतपेटिकाओं में बंद रहस्य के उजागर होने का । – योगेन्द्र

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