लोकतंत्र की व्यथाकथा, आठ – नकारात्मक मत, कर्मियों को खबर नहीं

परसों, यानी १८ अप्रैल के दिन, मतदान का पहला चरण संपन्न हो गया । मेरे शहर के निर्वाचन क्षेत्र में भी उसी दिन मतदान हुआ । मैंने किसी को भी वोट न देने का निर्णय लिया था, लेकिन वोट देने के अधिकार के तहत में ‘किसी को भी मत नहीं’ का नकारात्मक विकल्प मुझे चाहिए था । करीब ११:३० बजे मैं अपने मतदान केंद्र पर पहुंचा । सोचा था कि कम से कम दो-चार जने तो लाइन में खड़े होंगे ही । किंतु संयोग से सन्नाटा छाया था । उस स्थल पर केवल दलों के कार्यकर्ता, सुरक्षा में लगे जवान और निर्वाचन-कर्मी ही थे । स्थानीय विद्यालय के मतदान हेतु नियत उस कमरे में पांच कर्मचारी बैठे थे । मैंने जाते ही उन्हें अपने निर्णय के बारे में बताया और उनसे निवेदन किया कि वे निर्वाचन आयोग के नियम २२ और ४९ब के तहत मेरा नाम दर्ज कर लें । लेकिन मुझे यह देख हैरानी हुई कि मतदान-कर्मियों को इस विकल्प के बारे में कुछ भी मालूम न था । मुझे यही कहा गया कि ‘मजिस्ट्रेट’ महोदय के आने पर ही इस विषय में कुछ पता चलेगा और तभी कुछ हो सकेगा । लेकिन वे कब आयेंगे यह बताने में असमर्थ थे । उस समय मतदाताओं की मौजूदगी न होने के कारण उन लोगों से ५-७ मिनट तक मेरी बात आराम से हो सकी । नतीजा खास नहीं रहा । बहरहाल उन्होंने मतदाता सूची में मेरे नाम के आगे मेरे आने की बात दर्ज कर ली और मुझे आश्वासन दिया कि कोई अन्य व्यक्ति मेरे नाम से वोट डालने का प्रयास नहीं करेगा । मैं पांच बजे से पहले एक बार फिर उस स्थल पर दुबारा आने की बात कहते हुए लौट आया ।

मैं एक बार फिर वहां पहुंचा, करीब ४:३० बजे । मतदान की समाप्ति का समय होने जा रहा था । इस बीच ‘मजिस्ट्रेट’ साहब आकर लौट चुके थे, अतः उनसे मेरी भेंट नहीं हो सकी । वहां मौजूद निर्वाचन-कर्मियों के अनुसार उन्हें भी उक्त विकल्प के बारे में मालूम नहीं था । उन्होंने यह चौंकाने वाली बात मुझे बताई कि संबंधित प्रशिक्षण के दौरान नकारात्मक मत के विकल्प की जानकारी किसी ने भी उन्हें नहीं दी । बाद में मुझे पता चला कि इस विकल्प कि जानकारी तो आम जनता को है ही नहीं । ‘अपना अमूल्य वोट अवश्य डालिए’ की बातें तो सर्वत्र सुनाई पड़ रही हैं, किंतु नकारात्मक वोट भी डाला जा सकता है और वह भी तो एक वोट है इस बात का जिक्र कोई नहीं कर रहा । खैर, उस समय निराश होकर मैं इस भरोसे के साथ लौट आया कि मेरे नाम पर फर्जी मतदान नहीं होगा । परंतु दी गयी स्थिति में अपने ‘किसी को भी मत नहीं’ वाले विकल्प के निष्प्रभावी हो जाने का खेद मुझे अवश्य हुआ ।

‘किसी को भी मत नहीं’ के विकल्प का मैं क्यों पक्षधर हूं इसकी चर्चा में पिछले कई पोस्टों से करता आ रहा हूं । कारणों की गठरी है मेरे पास । मेरा यह विचार शायद ही किसी को रास आये । लोग इसे अलोकतांत्रिक कदम मानेंगे, भले ही निर्वाचन के नियमों के अनुसार इसे स्वीकार्य माना गया है । मुझे उम्मींद है कि पांच वर्ष बाद के अगले चुनाव तक वोटर मशीन पर यह विकल्प नजर आने लगेगा । बैलेट पेपर के समय तो यह विकल्प एक प्रकार से उपलब्ध था, पर वोटिंग मशीन पर नहीं । क्यों सरकारें इससे कतराती आ रही हैं ? अवश्य ही कुछ लोग मतदान की जहमत ही नहीं उठाना चाहते हैं । ऐसे लोग अधिकांशतः बुद्धिजीवी होते हैं जो लोकतंत्र के घोर हिमायती होते हैं लेकिन निर्वाचन प्रक्रिया में योगदान के अनिच्छुक रहते हैं । अस्तु उन लोगों को छोड़िए । मेरा अनुमान है कि कई मतदाता ऐसे होते हैं जो मतदान केंद्र पर ही न पहुंचने की तुलना में इसे बेहतर मानते हैं कि वह जायें और किसी न किसी को वोट दे आयें, भले ही मन मारकर, भले ही उन्हें सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नजर आयें । विकल्प ही भला क्या है, वह सोचते हैं । शायद ही किसी को यह मालूम हो कि ‘किसी को भी मत नहीं’ का विकल्प भी तो उपलब्ध है । जब मतदान-कर्मियों को ही नहीं मालूम तो आम जनता को क्या मालूम होगा ? लेकिन अगर लोगों को पूरी जानकारी हो तो अवश्य कई जन इस विकल्प का प्रयोग करते । तब ऐसे मतों की संख्या नगण्य न होने पर हमारे राजनेता उसकी व्याख्या करने में परेशानी महसूस करते और निर्विवाद रूप में यही कहा जाता कि लोगों का उन पर से विश्वास उठ रहा है । मेरी मान्यता है कि जनता ने उनको आयना दिखाना चाहिए और यह विकल्प एक कारगर और संयमित लोकतांत्रिक तरीका हो सकता है ।

मतदान के अगले दिन समाचार सुनने को मिला कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में वोट प्रतिशत बहुत कम रहा, अधिकांश जगहों पर ५० प्रतिशत से कम । खबर थी कि केरल में मतदान करीब ८० प्रतिशत रहा । लक्षदीप आदि में तो उससे भी अधिक । अन्यत्र तस्वीर बुरी नहीं थी, किंतु वाराणसी संसदीय क्षेत्र में मात्र ४३ प्रतिशत ही मत पड़े । निराशाप्रद परिणाम थे ये । कारण कई रहे होंगे । कुछ हद तक तेज धूप और गर्मी भी कारण थे । परंतु मेरी राय में सबसे कड़ा कारण रहा है लोकतंत्र के प्रति बढ़ रहा मोहभंग । यह मोहभंग सर्वत्र समान नहीं है, क्योंकि शासकीय व्यवस्था में कमियां सर्वत्र समान नहीं हैं । मैं उत्तर प्रदेश का निवासी हूं और यहां के बद से बदतर हो रहे हालातों से वाकिफ हूं । प्रदेश तथा केंद्र की सत्ता की होड़ में मौजूदा दलों ने इस प्रदेश को अपनी राजनैतिक कुश्ती का अखाड़ा बना रखा है । प्रदेश का प्रशासन पिछले लंबे अर्से से चरमरा रहा है । उद्योग-धंधे चौपट हो रहे हैं । भ्रष्टाचार वृद्धि पर है और विकास के नाम पर पैसे की बरबादी चल रही है । ऐसे में कई लोगों का राजनैतिक दलों से नाराजगी जायज है और वोट न डालना उसकी अभिव्यक्ति है । खबर मिली है कि जन समस्याओं के प्रति प्रशासनिक लापरवाही, अकर्मण्यता, और संवेदनहीनता के विरोध में कई गांवों में मतदान का सामूहिक बहिष्कार हुआ है । गिरते मतदान प्रतिशत की समीक्षा करते समय इन सभी बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए ।

नकारात्मक मत के विकल्प रहने पर मुझ जैसे कई लोग भी अपना मत व्यक्त कर सकते हैं । उससे मत प्रतिशत बढ़ेगा ही, भले ही विजयी प्रत्याशी के मत वस्तुतः कम हों । नकारात्मक मतों की संख्या अच्छी-खासी होने पर एक गंभीर संदेश भी राजनेताओं और शेष जनता के पास पहुंचता है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है । इस बारे में बहस तो चल ही रही है । मामला उच्चतम न्यायालय में दाखिल भी है । सोचता हूं कि निर्वाचन आयोग से अनुरोध करूं कि अपने निर्वाचन-कर्मियों को नकारात्मक विकल्प की जानकारी अवश्य दें । – योगेन्द्र

लोकतंत्र की व्यथाकथा, आठ – नकारात्मक मत, कर्मियों को खबर नहीं” पर 4 विचार

  1. You should have asked for registering your name in Form 17 which is voter register and reamins in charge of polling officer 2.Though they do not know the relevant rules they are well acquainted with the practical aspects.
    you should have progressed like any any othr voter and after registering in Form 17 would have denied to vote ! It was so simple ! But alas it could not be materialized ! Hard luck !

  2. आपसे सहमति है। संविधान में दिया गये 49-O की समीक्षा अंतरजाल पर उपलब्ध है, उसे कागज पर छापकर यदि उन्हें दिखाते तो शायद आपकी बातों में कुछ जोर आता। खैर आपने यह काम करने का साहस किया, यही काफी है इस बार के लिये। अगली बार आपको नकारात्मक वोट डालने का विकल्प वोटिंग मशीन में ही मिल जाये – ऐसी मेरी कामना है। धन्यवाद!

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