लोकतंत्र की व्यथाकथा, नौ – चुनाव बहिष्कार और जूता-फेंक विरोध

joota-chappalअपने देश में इस समय १५वीं लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं । मुझे ये चुनाव अन्य वर्षों की तुलना में कई मानों में भिन्न नजर आ रहे हैं । पहली बात तो यह है कि इस बार मतदान प्रतिशत अपेक्षया कम हो रहा है । राजनेताओं की नजर में देश के बृहत्तर हिस्से में अनुभव की जा रही तीष्ण गर्मी इसका कारण है । किंतु चुनाव विश्लेषकों के मत में मतदान के प्रति लोगों में व्याप्त उदासीनता इसका कारण हैं । दूसरी बात यह है इस बार लोगों को अपने ‘अमूल्य वोट’ का प्रयोग अवश्य करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है । ‘वोट दो’ का संदेश इतने व्यापक स्तर पर मैंने कभी नहीं देखा था । समाचार माध्यमों पर इस उद्येश्य के विज्ञापन खूब दिखायी दे रहे हैं । गैरसरकारी गैरराजनैतिक संगठन तथा फिल्मी हस्तियां और स्वयं चुनाव आयोग इस बाबत लोगों से लगातार अपील कर रहा है । फिर भी वोट प्रतिशत ऊपर नहीं उठ पा रहा है । तीसरी अहम बात यह है कि इस बार चुनाव बहिष्कार की घटनाएं भी अधिक हो रही हैं । गांव के गांव ‘मतदान नहीं करेंगे’ का सफल निर्णय लिये बैठे हैं । दिलचस्प तो यह है कि राजनैतिक दृष्टि से देश के सबसे ‘शक्तिशाली’ परिवार के प्रत्याशी को भी लोकप्रियता के बावजूद अपने निर्वाचन क्षेत्र में ऐसा बहिष्कार झेलना पड़ा है । वे कहीं न कहीं मौजूदा व्यवस्था और उसके पीछे के राजनेताओं से ऊब चुके हैं । चौथी बात यह है कि राजनेताओं के खिन्न लोगों ने उनके प्रति अपने असंतोष तथा विरोध को ‘जूता-फेंक’ कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदर्शित करना आरंभ कर दिया है ।

इस समय के चुनाव लोगों को विभिन्न समस्याओं के उत्पन्न अपने आक्रोश को व्यक्त करने का अवसर दे रहे हैं । यही वह वक्त है जब राजनेता लोगों के सामने सुबह से लेकर शाम तक खुद को पेश कर रहे होते हैं । इसी समय वे आपको खोजते हुए आप तक पहुंचते हैं । अन्यथा इन राजनेताओं के दर्शन कहां फिर हो सकते हैं; कहां वे आसानी से मिल सकते हैं भला ?

जूता फेंकने की पहली घटना अपने गृहमंत्री श्रीमान् चिदंबरम के साथ घटी थी और फेंकने वाला था एक पत्रकार । दूसरी घटना हरयाणा में कांग्रेस के युवा प्रत्याशी और उद्योगपति श्री नवीन जिंदल के साथ घटी थी, और इस बार जूते को नहीं, चप्पल को आसमान में तैरने का अवसर मिला । फिर नंबर आया ‘प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग’  आडवाणीजी का जिनका स्वागत खड़ाऊं से करने का प्रयास हुआ । मेरी दृष्टि में उनके लिए खड़ाऊं को ही उपयुक्त माना जाना चाहिए । आखिर खड़ाऊं हमारे साधु-संतों के प्रयोग में सदा से रही हैं और आडवाणीजी जैसे हिंदू संस्कृति के रखवालों के लिए उसका प्रयोग ही उपयुक्त लगता है । और कल की खबर है कि अहमदाबाद में जूता-फेंक का प्रयोग अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जनाब मनमोहन सिंह पर किया गया; प्रयोगकर्ता सूचना प्रौद्योगिकी का छात्र या इंजीनियर बताया जाता है । इन सभी मौकों पर जूता, चप्पल और खड़ाऊं किसी को छू भी नहीं पाये । छू भी लेते तो क्या होता ? शायद कहीं कोई खरौंच लग जाती । आखिर बम-ग्रिनेड की जगह तो वे ले सकते नहीं । लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ है अपने यहां के शासन-प्रशासन में यह संदेश तो वे देते जाते हैं, चाहे उस संदेश की कोई परवाह करे या न करे । मुझे यह समाचार भी आजकल में पढ़ने-सुनने को मिला कि जिला कानपुर देहात में कुछ लोग पुतले पर जूता-फेंक का अभ्यास कर रहे हैं ताकि मौके पर वह भी ऐसे अभियान में भाग ले सकें और अचूक निशानेबाज का खिताब पा सकें ।

जूता फेंककर विरोध जताने की घटनाएं विश्व के अन्य कोनों में भी हो चुकी हैं । ऐसी कुछ चुनी हुई अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की घटनाओं की खबर अपने देश के समाचार माध्यमों द्वारा भी यदाकदा प्रसारित की जाती हैं, जैसे काफी पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर इराक में एक पत्रकार ने जूता फेंका था । कुछ समय पूर्व ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में व्याख्यान देते हुए चीनी प्रधानमंत्री बेन जियाबाओ पर भी ऐसा ही एक असफल प्रहार हुआ था । कभी किसी माध्यम से मुझे समाचार पढ़ने को मिला कि स्वेडन की राजधानी स्टॉकहोम में इजरायली राजदूत पर भी ऐसा ही एक असफल जूता-प्रहार हुआ था । विभिन्न देशों में अपने असंतोष को व्यक्त करने के लिए जूता-फेंक प्रदर्शन अवश्य होते होंगे, जिनकी चर्चा स्थानीय समाचार माध्यमों तक ही सीमित रहती होगी । असंतोष के अपने-अपने कारण होंगे ऐसे सभी मामलों में और उन कारणों को सदैव बेबुनियाद करार देना मैं सही नहीं मानता ।

जूता-फेंक की इन तमाम घटनाओं को हमारे राजनेता यह कहकर खारिज कर रहे हैं कि यह तो सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिशें हो रही हैं । वे सोचते हैं कि जैसे वे ऊलजलूल वक्तव्य देकर चर्चा में आने की कोशिश करते हैं ठीक वैसे ही आम आदमी भी करता है । बेचारे राजनेता इससे अधिक सोच ही पाते तो देश के ये हालात ही क्यों होते ! और उनका साथ देने में अपने बुद्धिजीवी भी पीछे नहीं । ऐसे विरोध प्रकट करना अच्छा नहीं; यह शालीनता के विरुद्ध है; उन्हें संयम बरतना चाहिए, आदि आदि ।

‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ सुपरिचित उक्ति है । किसी को ऐसा करो वैसा न करो का उपदेश देना सबसे सरल काम होता है । जब अपने पर आ पड़ती है तब पता चलता है कि वह सब अमल में लाना आसान नहीं होता । मेरी सहानुभूति उन लोगों के प्रति है जो जूता फेंककर राजनेताओं के प्रति अपना विरोध प्रकट करते हैं । देश और जनता की सेवा करने का दावा करने वाले ये नेता जानने की कोशिश नहीं करते हैं कि उनके रहते ये हालात क्यों पैदा हो रहे हैं कि लोगों को अपना रोष या आक्रोश इस भांति व्यक्त करना पड़ता है । क्या यह सच नहीं है कि आम आदमी, जिसकी ‘ऊंचे’ लोगों तक न पहुंच हो, की कहीं सुनवाई नहीं होती है ? किसी वारदात के विरुद्ध उसकी एफआईआर तक पुलिस महकमा दर्ज करने को तैयार नहीं होता, बल्कि उल्टे उसको परेशान किया जाता है, उस पर दबाव डाला जाता है । अपनी शिकायत के लिए दर-दर की ठोकर खानी पड़ती है उसे । न्याय की उम्मींद उसे नहीं रहती । वर्षों तक मामले न्यायालयों में लटकाये रखे जाते हैं । न्यायिक प्रक्रिया को समर्थ व्यक्ति अपने हक में मोड़कर बैठ जाता है । प्रशासन को आम व्यक्ति के प्रति कोई संवेदना नहीं होती । असीमित भ्रष्टाचार की कीमत आम आदमी को ही सर्वप्रथम चुकानी पड़ती है । उसके नाम पर की योजनाओं का लाभ और लोग लूट ले जाते हैं । पूरी दुर्व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन है ?

विरोध जताने का वह कौन-सा तरीका है जो राजनेताओं को समझ में आता है । अहिंसक तथा शांत प्रदर्शन संवेदनशील और अहिंसक समाज में काम करते हैं, सर्वत्र नहीं । आज हालत यह है कि पीड़ित व्यक्ति जब तक हंगामा खड़ा नहीं करता कोई उसकी ओर देखता नहीं । तब रास्ता क्या बचता है ?

क्या यह सच नहीं कि इन राजनेताओं और उनके सहयोगी प्रशासनिक अधिकारियों-कर्मियों के लिए समानान्तर व्यवस्था देश चल रही है ? उन्हें न अस्पताल की दुर्व्यवस्था झेलनी पड़ती है, न स्कूल-कालेजों के प्रवेश के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता है, और न उनको न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं । उनकी संपदा बैठे-बैठे दिन-दूनी रात चौगुनी हो जाती है, जब कि आम आदमी की हालत पतली हो रही है । तमाम ऐसे मामले हैं जिनका कष्ट इन नेताओं को नहीं झेलना पड़ता है । वे अपना काम किसी न किसी तरीके से निकाल ही लेते हैं । क्या उनको नैतिक अधिकार है कि विरोध जताने वाले इन मजबूर लोगों की आलोचना करें । कम से कम मैं तो इन बेचारों का ही पक्ष लूंगा । – योगेन्द्र

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