मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, दिस डे, दैट डे …

बीते कल ‘मदर्स डे’ था, मई मास का दूसरा रविवार । मीडिया में इसका खूब जिक्र था, खूब प्रचार था । शहरी नवयुवाओं-नवयुवतियों ने खूब उत्साह से इसे मनाया होगा ऐसा मेरा अनुमान है । ग्रामीण अंचलों में इसका ‘क्रेज’ अभी शायद नहीं पहुंचा है । मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, फ्रेंडशिप डे आदि कुछ दिवस हैं जो हालिया वर्षों में पश्चिम से अपने देश में आयातित हुए हैं, कोई दो-ढाई दशक पहले । वैसे देश में दिवसों की कोई कमी कभी नहीं रही । कभी किसी ‘महापुरुष’ के जन्मदिन के नाम पर, तो कभी देश की किसी स्मरणीय उपलब्धि के नाम पर, और कभी किसी राष्ट्रीय/अंताराष्ट्रीय समस्या के प्रति जागरूकता फैलाने के नाम पर, इत्यादि । अधिकांश दिवस राष्ट्रीय महत्त्व रखते हैं, परंतु दिखावे के शौकीन आधुनिक संपन्न शहरी नवयुवाओं-युवतियों के मन में उनके प्रति विशेष आकर्षण नहीं रहता । किंतु ‘सामाजिक संबंधों’ को औपचारिकता का जामा पहनाने वाले उक्त दिवस अवश्य आकर्षण रखने लगे हैं ।

‘मदर्स डे’ नाम से कोई पर्व या उत्सव अपने देश में कभी मनाया जाता रहा हो ऐसा मेरी जानकारी में तो नहीं है । अन्य प्राच्य देशों में भी कहीं इस प्रकार के किसी दिवस का जिक्र सुनने को नहीं मिलता है । मैंने अंतरजाल से जानकारी जुटाई तो पता चला कि आजकल के ‘मदर्स डे’ का इतिहास पुराना नहीं है । वैसे इस बात का उल्लेख किया जाता है कि प्राचीन काल में यूनान में ‘मातृ उत्सव’ मनाने का चलन था । इसे वहां वसंत ऋतु में देवी-देवताओं की जननी ‘रीआ’ (Rhea), धनधान्य एवं वंशवृद्धि की देवी, की पूजा के रूप में मनाया जाता था । रोम में वही देवी ‘ऑप्स’ (Ops) के नाम से पुकारी तथा पूजी जाती थी । ‘एशिया माइनर’ क्षेत्र में उक्त देवी ‘सिबली’ (Cybele) के नाम से पुकारी जाती थी ।

किंतु आधुनिक ‘मदर्स डे’ का मूल उत्तरी अमेरिका में मिलता है । माना जाता है कि करीब 150 वर्ष पूर्व इसी दिन अमेरिका के ‘अपलाचिया’ (Appalachia) नामक पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र (अपेक्षया असंपन्न लोगों का कोयला खदानों वाला भूभाग) की निवासिनी ‘ऐना जार्विस’ (Anna Jarvis) नाम की गृहस्थिन ने अपने समुदाय के लोगों के स्वास्थ्य संबंधी निराशाप्रद हालातों के प्रति लोगों के ध्यानाकर्षण हेतु एक आयोजन संपन्न किया था । उस महिला के मतानुसार चिंतनीय वस्तुस्थिति को एक मॉं से अधिक कोई और ठीक-से नहीं समझ सकता है । फलतः उसने उस दिन को ‘Mother’s Work Day’ (मातृ कार्य दिवस) कहना उचित समझा । उसके कोई 15 सालों के बाद ‘जूलिया वार्ड हाव’ (Julia Ward Howe) नामक गीतकार महिला, जो लोगों के मताधिकार तथा देश में शांति की पक्षधर थी, ने ‘मदर्स डे’ मनाने की परंपरा इस आशय से डाली कि ‘माताओं’ का समुदाय शांति-स्थापना के जनांदोलन में भाग लें । उसके विचार में माताएं देश की विभिन्न समस्याओं के संदर्भ में सार्थक भूमिका निभा सकती हैं ।

सन् 1905 में ऐना जार्विस के देहत्याग के बाद उसकी बेटी, ऐना (मॉं-बेटी एक नामधारी) ने अपने मॉं के सामाजिक कार्यों की स्मृति में माताओं के सम्मान के प्रतीक के रूप में ‘मदर्स डे’ मनाने की परंपरा आगे बढ़ाई । वह कहा करती कि उसे उसकी मॉं बचपन में एक कविता की कुछ पंक्तियां सुनाया करती थी जिनका अर्थ थाः ‘प्रार्थना करती हूं मैं और आशान्वित भी हूं, कभी, कहीं, कोई स्थापित करेगा मातृ-स्मरण हेतु एक दिवस । कहां है कोई दिवस माताओं के नाम, जब कि पुरुषों के लिए समर्पित हैं अनेकों दिवस ।’ (उन पंक्तियों के भाव मेरे अपने शब्दों में । ऐसा लगता है कि पुरुषों के नाम पर विश्व भर में अनेकों दिवसों का प्रचलन है । ऐतिहासिक महापुरुषों की चर्चा करना, उन्हें स्मरण करना सर्वत्र आम बात है, लेकिन ‘महान्’ नारियों की बातें शायद ही कहीं होती हों ।) उस महिला ने कालांतर में ‘मदर्स डे’ के नाम पर एक अभियान छेड़ा, राजनेताओं और व्यवसायियों को अपने पक्ष में किया और 1908 में ‘वेस्ट वर्जीनिया’ में बृहत्तर स्तर पर उत्सव मनाया । उसके प्रयासों के फलस्वरूप 1914 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ‘वुडरॉ विल्सन’ (Woodrow Wilson, 1913-1921) ने मई के द्वितीय सप्ताह के रविवार को ‘मदर्स डे’ घोषित करते हुए एक बिल पर हस्ताक्षर कर दिये । अमेरिका में ‘मदर्स डे’ की स्थापना हो गयी ।

संयुक्त राज्य अमेरिका के संदर्भ में ‘मदर्स डे’ की अहमियत समझी जा सकती है । अमेरिकी द्वीपों का कोई उल्लेखनीय प्राचीन इतिहास नहीं रहा है । सन् 1492 में कोलंबस द्वारा खोजे जाने के बाद का इतिहास ही सार्थक कहा जा सकता है । यद्यपि उसके पूर्व वहां पर सभ्यताओं का अस्तित्व रहा है, किंतु आधुनिक अमेरिकी देशों के लिए वह विशेष माने नहीं रखता । वास्तव में आज के अमेरिका को प्रमुखतया यूरोप से आये लोगों का एक जमावड़ा ही कहा जा सकता है, जो अपने साथ अपने-अपने देशों या समाजों की संस्कृति, रीतिरिवाज, जीवनदर्शन आदि लेते गये थे । ऐसे में एक स्वतंत्र और बड़े देश के रूप में वहां अपने तीज-त्योहारों की स्थापना करने की ललक लोगों में जगे तो यह स्वाभाविक है । अपने पांच-एक सौ सालों के इतिहास में उसके अपने धर्मोपदेष्टा, समाजसुधारक, और राजनेता पैदा हो चुके हैं और उनकी स्मृति में वहां बहुत कुछ हो रहा हो या किया जा रहा हो तो आश्चर्य नहीं । परंतु वह सब क्या शेष विश्व के लिए उतना ही अहम माना जा सकता है ? दूसरे शब्दों में क्या ‘मदर्स डे’ या तत्सदृश वहां कुछ प्रचलित हो जाये तो क्या उसका ‘आयात’ अन्य देश करें यह आवश्यक है ?

इस संदर्भ में मैं अपने विचार व्यक्त करूं इससे पहले बता दूं कि आगे ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’, ‘वैलेंटाइन डे’ आदि, जिनका आरंभ कहीं किसी भी प्रकार से हुआ हो, आज दुनिया में प्रायः सर्वत्र संपन्न वर्ग में फैल चुके हैं । और इसके पीछे गंभीर व्यावसायिक कारण रहे हैं । ‘मदर्स डे’ के ही संदर्भ में अधोलिखित बात पर गौर करें:
अपनी स्थापना के आरंभिक काल में ‘मदर्स डे’ एक ‘पवित्र’ पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा । लोग चर्चों में जाकर प्रार्थना सभाओं में भाग लेते थे । (इसे ईसाइयों के त्यौहार के रूप में देखा जा सकता है ।) घर से दूर बसे लोग अपनी माताओं को पत्र के माध्यम से याद करते थे । लेकिन जैसा कि अमेरिकी जीवन-पद्धति रही है, किसी चीज के बाजारीकरण में देर नहीं लगती । व्यावसायिक संस्थाओं की गिद्ध-दृष्टि यह पता लगा ही लेती है कि कैसे किसी मुद्दे को आर्थिक लाभ का आधार बनाया जाये । और समय बीतने के साथ ‘मदर्स डे’ के साथ भी ऐसा ही हो चला । इस दिन को मनाने के ‘बेहतर’ तरीके खोजे जाने लगे, शभेच्छा-कार्डों, पुष्पगुच्छों, विविध उपहारों का आदान-प्रदान आदि इस दिवस की विशेषता बनने लगे । अधिकाधिक लोग दिवस मनाने के इन ‘खर्चीले’ तरीकों के प्रति खिंचे आवें इसके लिए ‘दिवस’ को विज्ञापित किया जाने लगा । यह सब ‘मदर्स डे’ की संस्थापिका ऐना जार्विस को नागवार लगा, क्योंकि उसकी नजर में इस दिन का बाजारीकरण करके व्यापारी वर्ग धन कमाने का माध्यम बना रहे थे । उसने असफल कानूनी लड़ाई भी लड़ी, लेकिन जो शुरू हो चुका वह रुका नहीं ।

अपने देश में भी ‘मदर्स डे’ आ गया और इसने यहां भी जड़ें जमा ली हैं । कोई किसी को इसे मनाने से नहीं रोक सकता । किंतु प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है कि इसे मनाने की विवशता कहां से आई । इस पर कुछ और कहना है अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र

मदर्स डे, फादर्स डे, वैलेंटाइन डे, दिस डे, दैट डे …” पर 2 विचार

  1. बहुत बढ़िया जानकारीपूर्ण आलेख . मदर्स डे फादर्स डे जैसी संस्कृति यदि लादी भी गई है तो इसमें मुझे कुछ भी गलत नहीं लग रहा है कि कम से कम हम अपने माता पिता बुजुर्गो को इस बहाने याद कर उन्हें सम्मान तो दे सकते है .

  2. जी ये डे तो आयात कर लिए गए है.बाकी हमारे समाज में तो शुरू से ही माँ बाप,गुरु और बहिन की इज्ज़त करने की परम्परा रही है..!विदेशों में परिवार एकल हो गए है..सो एक दिन मदर्स.. डे मना लेते है..

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