लोकतंत्र की व्यथाकथा, ग्यारह – निरर्थक अभियान ‘मतदान अवश्य करो’ का

आगामी लोकसभा के लिए आयोजित करीब एक मास के मतदान कार्यक्रम के बाद अंततः चुनाव प्रक्रिया का अंतिम चरण बीते 13 तारीख संपन्न हो ही गया । जनता जितनी भागीदारी निभाने के लिए अधिकृत थी उतनी उसने निभा ली, कुछ ने किसी प्रत्याशी के पक्ष में वोट देकर तो कुछ ने नकारात्मक मत व्यक्त करके । कुछ ने तो खुलकर बहिष्कार भी कर दिखाया और शेष ने उदासीनता व्यक्त करते हुए चुप बैठना ठीक समझा । अब सरकार किसकी बनेगी और कैसे बनेगी यह दो-चार दिनों में पता चल ही जायेगा । हो सकता है सरकार का गठन किसी भी दल के लिए औरों के ‘अवसरवाद-प्रेरित सहयोग’ के बावजूद आसान काम न हो । लेकिन अंत में जोड़-तोड़ में कोई न कोई तो सफल होगा ही ऐसी उम्मींद की जानी चाहिए । हां, इतना अवश्य है कि कोई भी सरकार आवे, वह पुराने घिसे-पिटे ढर्रे पर ही चलेगी, ‘किसी प्रकार से पांच साल खींचो और जैसे देश की गाड़ी आज तक चलती रही है वैसे चलाते रहे’ की तर्ज पर । देश की तस्वीर न कोई बदलने वाला है, और न किसी में वैसा करने का इरादा है, और न ही किसी में काबिलियत ही है । बस कुर्सी पर बैठने वाले चेहरे नये होंगे, ढर्रा नया नहीं होगा । अस्तु, अपने देशवासियों के प्रति मेरी शुभेच्छाएं ।

इस बार के चुनावों का एक दिलचस्प पहलू मेरी नजर में यह था कि मतदाताओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने हेतु विभिन्न संस्थाओं द्वारा अभियान चलाये गये । फिर भी मतदान प्रतिशत सर्वत्र संतोषप्रद रहा यह कहना ठीक नहीं होगा । ये अभियान मतदाताओं को मतकेंद्रों तक खींच ले जाने में किंचित् भी सफल हुए होंगे इसमें मुझे शंका है । मेरी दृष्टि में तो ये अर्थहीन प्रयास थे । मेरे इस विचार के आधार हैं । मैं समझ नहीं पाया कि किसी व्यक्ति को मतदान के दिन क्यों यह स्मरण दिलाना पड़ता है कि उसे वोट डालना है या डालना चाहिए । किसी व्यक्ति को याद कब दिलाना पड़ता है ? तभी न कि जब उसके ध्यान से कोई बात उतर गयी हो ? जैसे बाजार में खरीदारी करते वक्त किसी सामान का ध्यान न रहे । अपने मित्र से मिलने का वादा आपने किया हो और व्यस्तता के कारण ऐन मौके पर उसका खयाल ही न रहे । ऐसे कह कुछ मौके हो सकते हैं जब किसी को याद दिलाना पड़े । किंतु किसी अध्यापक को यह बताने जरूरत पड़े कि उसके छात्र कक्षा में प्रतीक्षारत हैं, या किसी चिकित्सक को ध्यान दिलाना पड़े कि उसे बहिरंग में पहुंचना है, या ऐसे ही किसी मामले में व्यक्ति को याद दिलाने की बात उठे तो ऐसा प्रयास हास्यास्पद कहा जायेगा । अपने दायित्व से बचने के ऐसे तमाम मामलों के पीछे के कारणों की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए । मतदान कार्यक्रम ऐसा नहीं कि कोई मतदान करना ही भूल जाये । टीवी चैनलों और अखबारों के संपर्क में जो हो उसे मतदान का ध्यान ही न रहे ऐसा सोचना बेमानी है । और जिस बेचारे की पहुंच इन माध्यमों तक हो ही न उसके लिए तो ये निःसंदेह निरर्थक कहे जायेंगे । तात्पर्य यह है कि बार-बार याद दिलाने की वाकई कोई अर्थवत्ता नहीं ।

निःसंदेह ऐसे मतदाताओं की संख्या कम नहीं होगी जो वोट डालने की जहमत से बचते हैं । उन्हें आप आलसी कह सकते हैं । ‘कौन जाये वोट देने’, ‘कौन निकले इस धूप व गरमी में बाहर’ या ‘मेरा एक वोट नहीं भी पड़ेगा तो क्या फर्क पड़ जायेगा’ जैसी भावना के साथ वे मतदान से बचते होंगे । टेलीविजन पर कोई ‘सेलेब्रिटि’ अगर उन्हें याद दिलाए तो वे निकल पड़ेंगे वोट डालने के लिए ऐसी उम्मींद करना मूर्खता होगी । उनके साथ आप जिरह करें तो आप हार जायेंगे । उन्हें राजी करना घर-परिवार के सदस्यों तथा मित्रगणों के लिए संभव भले ही हो, मीडिया के लिए आसान नहीं । इसके अलावा जिस मतदाता से यह उम्मींद की जा रही हो कि वह सोच-समझकर योग्य व्यक्ति के पक्ष में वोट डाले, उसी को आप इतना नासमझ माने कि उसे वोट की याद दिलाना पड़े यह बात मेरे गले से नीचे नहीं उतरती ।

हो सकता है कि गिने-चुने कुछ लोग उक्त बहानों के साथ वोट नहीं डालते होंगे, पर सभी ऐसा नहीं करते होंगे । मतदान से विरत रहने के कइयों के ठोस कारण भी हो सकते हैं, जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए ।
पहली संभावना है कि मतदाता के सामने ऐसा कोई कार्य आन पड़े जिसे वह वरीयता देता हो और उसमें संलग्न हो जाये ।
दूसरी संभावना है कि उसे राजनेताओं के रवैये से मतदान में अरुचि हो चुकी हो और आपके अनुरोध की अनदेखी कर देना चाहता हो ।
तीसरा कारण हो सकता है कि वह विरोध या असंतोष में मतदान बहिष्कार करने पर तुल जाये, जैसा कि देश के कई कोनों से सुनने को मिला है ।
चौथा कारण हो सकता है कि वह ‘गुप्त’ नकारात्मक मतदान चाहता हो, जिसकी फिलहाल ‘ईवीएम’ में व्यवस्था नहीं है, या उसे फार्म 17 की जानकारी न हो । मैं स्वयं ऐसे लोगों में शामिल हूं ।
और पांचवां कारण यह हो कि वह वोट देना तो चाहता हो पर किसे इस का निर्णय न ले पा रहा हो और फलतः वोट न डालने का निर्णय ले ले ।

मोटे तौर पर मैंने पांच कारण गिनाये हैं । आप दो-एक और खोज सकते हैं । उक्त प्रथम कारण वैयक्तिक प्रकृति का है और इसकी अहमियत खास नहीं । लेकिन अन्य कारण गंभीर हैं । क्या वजह है कि लोगों में मौजूदा लोकतंत्र के प्रति अरुचि हो रही है ? क्या इस तंत्र की गुणवत्ता पर यह एक आक्षेप नहीं है ? और यदि लोगों को बहिष्कार करना पड़ रहा हो तो यह राजनेताओं की विफलता और उनके प्रति जनविश्वास का अभाव नहीं दर्शाता है ? यदि कोई नकारात्मक मतदान करने का निर्णय ले तो क्या ऐसे ‘गुप्त’ मतदान का विकल्प नहीं होना चाहिये ? अंतिम पांचवां कारण सबसे अधिक महत्त्व का है । यदि कोई योग्यता के आधार पर प्रत्याशी का चुनाव न कर पा रहा हो तो उसकी मदद कौन करेगा ? ‘वोट डालो’ कहना तो आसान है, पर ‘किसे वोट दें’ का जवाब कोई नहीं देता है ।

मेरे गिनाये दूसरे-तीसरे कारण राजनेताओं से जुड़े हैं जिनके बारे में ‘बेचारा’ निर्वाचन आयोग और ‘वोट डालो’ के अभियान से जुड़े लोग कुछ नहीं कर सकते । सुधरना-बिगड़ना उनका काम है; हम तो मात्र अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं । लेकिन चौथे कारण पर आयोग जोर डाल सकता है, क्योंकि ‘नकारात्मक मतदान’ का प्राविधान तो पहले से ही है । और मैं समझता हूं कि जो लोग ‘वोट डालो’ का अभियान चला रहे हैं उन्हें एक कदम आगे बढ़कर निर्वाचन क्षेत्रों के योग्यतम प्रत्याशियों का भी खुलकर नाम लेना चाहिए । उन्हें इतनी हिम्मत जुटानी चाहिए कि योग्य प्रत्याशियों के पक्ष में बात कर सकें । महज ‘वोट डालो’ के नारे से लोकतंत्र का भला नहीं हो सकता ।

अधिक मतदान प्रतिशत आयोग और बुद्धजीवियों को एक प्रकार का संतोष भले ही दे, परंतु इसका चुने जा रहे प्रत्याशियों की योग्यता से कुछ भी लेना-देना नहीं है । ऐसा कोई स्वीकार्य तर्क संभव नहीं है कि अधिक वोटों का डाला जाना बेहतर जनप्रतिनिधि चुने जाने की गांरटी है । यानी जो वोट लोगों द्वारा नहीं डाले जा रहे हों वे वास्तव में वे वोट हैं जो योग्य प्रत्याशी के पक्ष में पड़े होते ऐसा मानने का कोई तार्किक आधार नहीं । कुल मिलाकर वोट कम पड़ें या अधिक, घूम फिर कर किसी न किसी को चुनाव तो हो ही जाना है, परस्पर कम या अधिक अंतर से । क्या फर्क पड़ता है ?

अधिक वोट प्रतिशत लोगों के तंत्र में विश्वास का संकेत तो कहा जा सकता है, किंतु यह चयनित प्रत्याशी की योग्यता का प्रमाण नहीं ! तब महज वोट प्रतिशत बढ़ाने की कवायद बेमानी है । – योगेन्द्र

लोकतंत्र की व्यथाकथा, ग्यारह – निरर्थक अभियान ‘मतदान अवश्य करो’ का” पर एक विचार

  1. आपकी बात से असहमत तो नहीं हुआ जा सकता परन्तु वोट न डालकर हम अपनी आवाज खो देते हैं। यदि ‘नकारात्मक मतदान’ का प्राविधान सही ढंग से हो जाए तो बड़ी संख्या में इसका उपयोग करके हम राजनैतिक दलों को बेहतर प्रत्याशियों को टिकट देने को बाध्य कर सकते हैं।
    घुघूती बासूती

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