राजनीति में अप्रासंगिक होती मर्यादा – सोमनाथ-अमरसिंह प्रकरण

News - AmarSingh claims

इस समय समाचार माध्यम एक ताजे खबर की बात कर रहे हैं (देखें समाचारपत्र ‘हिंदुस्तान’, 21 मई) । उनके अनुसार समाजवादी पार्टी के महासचिव और अपने बड़बोलेपन के लिए ख्यात श्रीमान अमरसिंहजी का दावा है कि उन्होंने विगत केंद्रीय सरकार को ‘न्यूक्लियर डील’ पर दादा सोमनाथ चटर्जी के आग्रह पर सहयोग दिया था । दूसरी ओर दादा सोमनाथ साफ शब्दों में कहते हैं कि ऐसी कोई बात हुई ही नहीं है । कौन सच बोल रहा है ? और जो झूठ बोल रहा है वह ऐसा कर क्यों रहा है ? कोफ्त होती है देखकर कि अनर्गल प्रलाप हमारे राजनैतिक व्यवहार का अभिन्न अंग अन गया है ।

दरअसल अपने देश की राजनीति में मर्यादाहीन आचरण बढ़ता जा रहा है । ऐसा लगता है कि सत्ता की भूख में राजनेता पागल से हुये जा रहे हैं और इस बात की तनिक भी चिंता अब उन्हें नहीं है कि वे कब, कहां और किससे क्या कह बैठेंगे; और कब अपनी ही बात नकार देंगे । यह ठीक हैं कि चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कुछ सच तो कुछ झूठ का सहारा राजनेताओं को लेना पड़ता है । अपनी तथा अपने दल की प्रशंसा करना, किये गये कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और विरोधियों की कमियों को उजागर करना ये सब लोकतंत्र में स्वीकार्य हैं । ऐसा दुनिया के सभी लोकतंत्रों में देखने को मिलता है । जनता का पक्ष जीतने के लिए लोकलुभावन वादे करना सामान्य बात है — ऐसे वादे जिन्हें वे पूरा कर ही नहीं सकते, चाहते हुए भी नहीं । अपनी बातों को तौले बिना बोल जाना उनकी आदत बन चुकी है, जिसे आम जनता समझती है और जिसके लिए उन्हें माफ भी कर दिया जाता है । इतना सब तो ठीक है ।

लेकिन हालिया चुनावों में जो देखने को मिला वह सचमुच तकलीफदेह और चिंताप्रद है । सामान्य राजनैतिक आचरण में इस बार की जैसी कमी मैंने कभी नहीं देखी, कम से कम इतना अधिक तो नहीं । कौन किसके बारे में क्या बोल जायेगा इसका भरोसा ही नहीं रह गया था । गाली-गलौज की भाषा से तक कई नेताओं को परहेज नहीं रहा । लालूजी तथा रावड़ीजी ने किसके बारे में क्या अपशब्द बोले इसे मीडिया ने खूब प्रचारित किया । मायावतीजी और मेनकाजी के वाग्युद्ध की भी चर्चा कम नहीं रही । गुजरात में मोदीजी क्या बोल रहे थे और उसका प्रियंकाजी उत्तर प्रदेश में क्या जवाब दे रही थीं यह देखना भी कम उबाऊ और अप्रिय नहीं था । समाजवादी दल के नौसिखिये नेता मुन्नाभाई और बहुजन समाजवादी पार्टी के अखिलेशजी भी विशुद्ध फिल्मी अंदाज में बहुत कुछ अपशब्द विरोधियों के लिए बोल गये । इधर राजनीति के नये योद्धा वरुणजी अति उत्साह में यही भूल गये कि वे किन शब्दों को अपनी जबान पर ला रहे हैं । उन्हें तो कुछ कीमत भी चुकानी पड़ी कुछ दिन सरकारी दामाद बनकर । खेद तो इस बात का होता है कि सामान्य शिष्टाचार को ताक पर रखने में अपने प्रधानमंत्री और तब के ‘पीएम इन वेटिंग’ भी पीछे नहीं रहे । अवांछित आचरण छुटभय्ये नेताओं तक सीमित रहता तो माफ किया जा सकता था, लेकिन वरिष्ठ नेता भी ऐसे उच्छृंखल व्यवहार से परहेज की आवश्यकता अनुभव नहीं करते हैं । यह सचमुच अक्षम्य है ।

वापस अमरसिंहजी की बात पर । पिछली सरकार के समय जो हुआ सो हुआ । अब तो आगे की सुध लें । वह क्या विवशता है कि उन्हें अब ‘न्यूक्लियर डील’ पर अपनी सफाई पेश करनी पड़ रही है ? यह जगजाहिर है कि उन्होंने अपना समर्थन दिया; सही-गलत जो भी किया अब अतीत हो चुका है । यह मान लिया जायेगा कि उन्होंने ‘डील’ के सभी पहलुओं पर विचार किया होगा और तब निर्णय लिया होगा समर्थन का । ऐसा करने के पहले सभी स्रोतों से समुचित जानकारी जुटाई होगी । हर समझदार व्यक्ति अपने जीवन में कुछ ऐसा ही करता है, जानकारों से सलाह लेता है और समुचित विचारणा के बाद निर्णय लेता है । कोई राजनैतिक दल ऐसा न करे यह तो सोचा ही नहीं जा सकता है । क्या समाजवादी पार्टी इतनी नादान है कि उसने दादा के कहने भर से ही हांमी भर दी और तत्कालीन सरकार बचाने निकल पड़ी ? यदि अमरसिंहजी ‘दादा के कहने से हमने सहयोग दिया’ जैसी नादानी की बात करते हों तो यह उनकी मूर्खता का संकेत माना जायेगा । और जो राजनेता ऐसी मूर्खता करते हों उनके हाथ में सत्ता न जाये यही प्रार्थना की जानी चाहिए । – योगेन्द्र

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