नवगठित केंद्रीय सरकार – यूपीए (संप्रग) की या कांग्रेस की?

काफी जद्दोजेहद के बाद अंततः केंद्र की सरकार गठित हो ही गयी । पिछली बार की तरह इस बार भी कांग्रेस पार्टी ही सरकार का नेतृत्व कर रही है । इस बार उसे अन्य दलों को गठबंधन में शामिल करने में वैसा प्रयास नहीं करना पड़ा जैसा पिछली बार करना पड़ा । इस दफे घटकों की संख्या भी अपेक्षया कम है, और यह उम्मीद की जाती है कि कांग्रेस को अपनी नीतियों को लागू करने में कम दिक्कतें झेलनी पड़ेंगी । वास्तव में इस बार यह देखना दिलचस्प रहा कि पारंपरिक विरोध के विपरीत अन्य दलों ने उसका समर्थन करने का निर्णय लिया । उनमें एक प्रकार से समर्थन देने की जैसे होड़ मची थी । बिन मांगे ही वे समर्थन देने की बात करने लगे । हमें सरकार में शामिल करो या न, हमारा समर्थन तो आपको मिलेगा ही, कोई खास शर्त थोपे बगैर । कहना चाहिए कि कांग्रेस की किस्मत चमक उठी । जो कभी विरोध करते थे उन्हें अपनी औकात का अंदाजा इस कदर पहले के चुनावी दंगलों में नहीं हुआ । लगता है ‘अति सर्वत्र वर्जितम्’ की बात उनके दिमाग में घर कर गयी और अति अहंकार नहीं दिखाना चाहिए ऐसा वे समझने लगे हैं ।

फिर भी कांग्रेस के लिए सब कुछ आसान नहीं था अपने पुराने सहयोगी डीएमके को मनाना उसके लिए आसान नहीं था । डीएमके समर्थन देने के लिए तो तैयार थी, लेकिन सरकार में शामिल होने के लिए केवल अपनी शर्तों पर तैयार थी । कांग्रेस शर्तें न मान सके तो कोई बात नहीं, समर्थन तो हम देंगे ही सरकार से बाहर रहकर ऐसा उक्त पार्टी कहती रही । सरकार में शामिल होने की उसकी शर्त पेचीदा थी – ढेर सारे मंत्रीपद और माननीय करुणानिधि के पूरे कुनबे को उसमें जगह देना । शर्तें आसान नहीं थी, लेकिन बेचारी कांग्रेस करती क्या ? चुनाव के पूर्व के उसके साथ के गठजोड़ की अनदेखी कर पुरानी मित्रता तोड़ने का कलंक अपने माथे नहीं लगने देना चाहती थी । अन्यथा समर्थकों और सरकार में शामिल होने को तैयार दलों की कमी थोड़े ही थी । लेकिन अपनी विश्वसनीयता बनाये रखकर वह संगी-साथियों को यह संदेश देना चाहती थी कि देखो बीच रास्ते में धोखा मत दे बैठना । शर्तें मानकर उसने गठबंधन के स्थायित्व का भरोसा तो दे ही दिया है ।

डीएमके को मुंहमांगा, 7 मंत्रीपद, देने से कांग्रेस को परेशानी तो हुई ही । अपना लोकतंत्र देखिये कि 543 लोकसभा सदस्यों में सिर्फ 18 सदस्यों वाली डीएमके के 39 प्रतिशत सदस्य मंत्री बन गये, 78 की संख्या वाले मंत्रीपरिषद् के करीब 9 प्रतिशत । उससे अधिक सीटों (19) के साथ लोकसभा पहुंची तृणमूल कांग्रेस की फरमाइश को कांग्रेस पार्टी भला कैसे अनुचित मान सकती थी ? उसे भी मनोनुकूल 7 मंत्रीपद देना उसकी विवशता थी । दोनों दलों को ढेर सारे मंत्रीपद देने का मतलब था अपने हाथ में कम पद रखना । बेचारे कांग्रेसी सदस्यों के लिए तब बचता ही क्या । लोकसभा के कुल सदस्य संख्या के करीब 15 प्रतिशत के आसपास मंत्रियों की संख्या रखने के उसके प्रयास का मतलब ही यही होता कि अपने लिए कम पदों से संतोष करना । यह तो उस पार्टी के आंतरिक लोकतांत्रिक स्वरूप में है कि वहां कोई खुलकर असंतोष व्यक्त नहीं करता । सब हाईकमान के वफादार होते हैं और कुछ मिले तो खुश न मिले तो भी खुश । (मन में निराशा हो भी तो उसे कह नहीं सकते न !) इन दलों के साथ समझौते के प्रयास में वह यह भी भूल गयी कि उसका एक मित्र दल नैशनल कांफरेंस छूटा जा रहा । जम्मू-कश्मीर के डा. फारूख साहब ने कह ही दिया कि हमें तो कोई पूछ ही नहीं रहा, सो हम चले आईपीएल मैच देखने ।

खैर किसी प्रकार सरकार तो बन ही गयी । लेकिन एक सवाल मेरे जेहन में अनुत्तरित रह गया । यह सरकार कांग्रेस की है या
यूपीए की ?
मुझे तो यही लगा कि सरकार तो कांग्रेस की ही है और वह दूसरों का साथ पाने में उनकी शर्तें सुन रही थी, तथाकथित सहयोगी दलों की मंत्रीपदों को लेकर सौदेबाजी पर रियायत पाने की कोशिश कर रही थी, और वे दल स्वयं उससे अधिकाधिक एंठने के प्रयास में लगे थे । निर्णय कांग्रेस ले रही थी और उस निर्णय की स्वीकार्यता पर वे दल अपनी राय दे रहे थे । ऐसा लग रहा था कि सरकार बनाना और चलाना तो कांग्रेस का फर्ज है । दलों का रवैया कुछ ऐसा था: देश की चिंता तो कांग्रेस को करना है, हमें तो सत्ता से मतलब जिसमें भागीदारी देना और कितना देना यह कांग्रेस हमें बताये तो हम जवाब दें । क्या इसी को गठबंधन सरकार कहा जाना चाहिए ? क्या सरकार बनाने में सबकी भूमिका एकसमान नहीं होनी चाहिए थी । अवश्य कांग्रेस बड़ी पार्टी है और उसको नेतृत्व की जिम्मेवारी देना समझ में आती है, पर उसके साथ लेनदेन भला कैसा । संबंधित सभी दलों को मिलकर मंत्रीपरिषद् के आकार और उसके सदस्यों का चयन करना चाहिए था । लेकिन यहां तो तस्वीर कुछ वैसी ही उभर रही थी जैसे आजकल शहरों में ‘पेइंग गेस्ट’ की आधुनिक व्यवस्था में होता है । आपका पेइंग गेस्ट आपके परिवार के सदस्य की तरह नजर आता है, पर वह परिवार का सदस्य होता नहीं । जब तक सब ठीक चलता है वह सदस्य की तरह व्यवहार करता है, और जब उसको असंतोष होता है तो वह कोई नई जगह तलाश लेता है । रिश्ता पूरी तरह ‘गिव एंड टेक’ के सिद्धांत पर टिका रहता है । – योगेन्द्र

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