लोकलुभावन वायदों वाला भारतीय रेलवे बजट 2009 और सम्मोहित जनता

“पहली तारीख है जी पहली तारीख है । खुश है जमाना आज पहली तारीख है । …”

ये बोल हैं किसी बहुत पुराने सिनेमा के गाने के हैं, कुछ सही कुछ गलत जैसा मुझे याद है । न मैंने वह फिल्म देखी और न ही उसकी कहानी मुझे मालूम है । लेकिन मेरा अनुमान है कि कहानी में साधारण आमदनी वाले एक नौकरीशुदा आदमी के मुख से निकले बोल हैं ये बोल । कदाचित् उसका परिवार गिने-चुने पैसों के सहारे किसी तरह महीना बिताता है और जब पहली तारीख पर घर का मुखिया तनख्वाह बटोर कर आता है तो सभी के चेहरे पर खुशियां छा जाती हैं । हाथ में पैसा जो है, जिससे सभी अरमान पूरे होने हैं । उस समय वे अपने कष्ट कुछ समय के लिए भूल जाते हैं । पर वह खुशियां एक-दो दिन या हफ्ता भर में काफूर हो जाती हैं, और फिर चल पड़ता है सिलसिला अगली तनख्वाह के इंतजार का । जिंदगी की तकलीफदेह हकीकत अधिक दिनों तक नहीं छिपी-दबी रह पाती है ।

मुझे गीत के ये बोल याद आये आज के रेल बजट की खबर सुनते समय । कभी किसी एक टीवी चैनल पर तो कभी दूसरे पर भटकता रहा मैं । कहीं संसद में मंत्री महोदया के ‘उद्गार’ सुनने को मिल रहे थे, तो कहीं ‘आम’ लोगों की राय, तो कहीं अन्यत्र रेलवे बोर्ड से मौजूदा समय में या पहले कभी जुड़े विशेषज्ञों की टिप्पणियां । मुझे खेद है कि सब कुछ एक साथ मैं देख-सुन नहीं सकता था । खैर, कुल मिलाकर ‘पब्लिक’ खुश थी । लग रहा था कि लोगों को खुश करने वाले तोहफे ही तोहफे बांटे जा रहे थे । लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा कि जो वायदे पेश किए जा रहे थे वे पूरे हो सकेंगे । पूरे हो भी सकते हैं ? मैं खुद को नाउम्मीद पा रहा था, डर रहा था कि हम देश चलाते समय दूर की (जी हां, समय में दूर की) क्यों नहीं सोच पाते हैं । और मेरे डर को बढ़ा रहे थे वे ‘एक्सपर्ट’

1.
ये सरकार यूपीए की है और इसके पहले भी उसी की थी । सरकार के मुखिया तब भी अपने माननीय मनमोहन सिंह थे और आज भी वही हैं । रेलवे प्रशासन तथा रेलवे बोर्ड भी मेरी जानकारी में कमोबेश वही हैं । बस बदला है तो मंत्री । और उसके साथ ही बदल गये रेलवे के पूर्ववर्ती मंत्री के समय के कई अहम फैसले भी । तब भी यूपीए में शामिल दलों, खास तौर पर कांग्रेस, के लिए बजट क्या खूब था और अब भी क्या लाजवाब है । तब के निर्णय भी अच्छे थे और उनके उलटे आज के निर्णय भी बहुत बढ़िया । विरोधाभास ? और विपक्ष की नजर में तो सत्तापक्ष के फैसले सही और अच्छे हो ही नहीं सकते । मैं समझ नहीं पाता कि अच्छे बुरे की पहचान क्या होती है ?

खैर राजनीतिक दलों की मजबूरियां कुछ ऐसी होती हैं कि अपने पक्ष को सही और दूसरे पक्ष को गलत कहें ।

2.
लेकिन तरस आता है मुझे जनता पर जो इस बात को लेकर खुश हो जाती हैं कि किराया भाड़ा ही नहीं बढ़ाया जा रहा है, बल्कि कई प्रकार की रियायतें भी उन्हें मिलने जा रही हैं । कौन खुश नहीं होगा अगर रेल यात्रा मुफ्त में करने को मिले ?अच्छा तो लगेगा ही, पर क्या रेलगाड़ी तब चल सकती है ? तब क्या एक दिन उसका भट्ठा नहीं बैठ जायेगा । रेलवे का चहुंमुखी विकास हो यह सभी चाहेंगे, पर उसके लिए आर्थिक योगदान कोई नहीं करना चाहेगा । सत्तासीन हर राजनैतिक दल लोकलुभावन नीतियां अपनाता है, और वह अपनी सत्ता के केवल पांच सालों पर नजर रखता है । लोकलुभावन वादे कहीं देश के दीर्घकालिक हितों के विरुद्ध तो नहीं जायेंगे यह वे सोचते ही नहीं । अक्सर देखने में आता है कि एक सरकार कुछ निर्णय लेती है और अगली सरकार उन्हें निरस्त कर देती है । इस बात पर कोई गौर नहीं करता है कि रेलवे, शिक्षा, औद्योगीकरण, जनसंख्या-वृद्धि आदि जैसे मामलों में दीर्घकालिक योजनाएं होनी चाहिए । यह नहीं कि इस साल एक बात और अगले साल उसका उल्टा । लोकतंत्र में ऐसी मनमानी देश के हित के विरुद्ध ठहरती है । मौजूदा रेल बजट में छिपी खामियां क्या हैं, सुनिए ।

3.
किसी टीवी चैनल पर मैं एक विशेषज्ञ को कहते सुन रहा था कि अंग्रेजी शासन ने सन् 1953 में भारतीय रेल सेवा आरंभ की थी । देश की स्वतंत्रता के समय वे अपने पीछे 50-51 हजार किलोमीटर लंबी रेलवे पटरियों का जाल छोड़ गये । उसके बाद अपनी रेलवे केवल करीब 15 हजार अतिरिक्त पटरियां ही उसमें जोड़ पाई, जब कि इस बीच देश की जनसंख्या में 3-4 गुने का इजाफा हो चुका है और रेलयात्रियों की संख्या बेतहासा बढ़ चुकी है । पूरी व्यवस्था अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गई व्यवस्था पर टिकी है । कहां से हो विकास जब रेलवे के पास पैसा ही नहीं बचता है ?

जी हां लोकलुभावन वायदों ने रेलवे के पास विकास के लिए ज्यादा पैसा नहीं छोड़ा है । किसी और विशेषज्ञ का कहना था कि कुछ वर्षों पहले रेलवे के संचालन की कीमत (ऑपरेटिंग कॉस्ट) कुल आमदनी के करीब 75 प्रतिशत थी । अब यह 90 प्रतिशत के ऊपर चली गयी है । इस बीच मंदी की मार का असर रेलवे को भी झेलना पड़ा है । रेलवे कर्मचारियों की बेतहासा बढ़ी तनख्वाह का असर भी रेलवे पर है । खर्चे बढ़ रहे हैं और आमदनी नहीं । कैसे होंगे वादे पूरे ? सोचिए ।

4.
माननीया मंत्री ने वादा किया है कि वे ढेरों नई रेलगाड़ियां चलाएंगी । अंग्रेजों के जमाने की रेल पटरियों पर पहले ही जबर्दस्त दबाव है । वे क्या झेल पाएंगी नई गाड़ियों के दवाब को ? अधिक दिलचस्प तो यह है कि लंबी दूरी की ‘नॉनस्टाप’ गाड़ियां चलाने की बात की जा रही है । ऐसा करना असंभव नहीं तो नितांत कठिन है । एक विशेषज्ञ महोदय कह रहे थे कि इन तथाकथित ‘नॉनस्टाप’ गाड़ियों को तो बीच-बीच में रोकना ही पड़ेगा तकनीकी कारणों से । यात्रियों के लिए न सही, रेलवे स्टाफ के लिए तो रोकना ही पड़ेगा, जिनकी ड्यूटी में बदलाव करना होता है । इसके अतिरिक्त प्रचलित व्यवस्था में इंजन भी बीच-बीच में बदले जाते हं । गाड़ी के रखरखाव और जांच-पड़ताल के लिए भी ठहराव आवश्यक हो सकता है । लेकिन सबसे बड़ी समस्या तो समय पर गाड़ियों के संचालन का है । आजकल शायद ही कोई गाड़ी समय पर चल पाती है । उनके 20-24 घंटे तक लेट हो जाने की खबरें सुनने को मिलती हैं । तो क्या ‘नॉनस्टाप’ गाड़ी के साथ ये समस्याएं नहीं होंगी । ये चलती रहें इसके लिए क्या अन्य सभी गाड़ियों को रोका जायेगा ? समस्या मार्ग में एकाधिक ठहरावों की नहीं है । अगर यह व्यवस्था हो जाये कि किसी ठहराव पर गाड़ी समय पर पहुंचे और समय पर वहां से छूटे तो ‘नॉनस्टाप’ की जरूरत ही न रहे ।

5.
किसी विशेषज्ञ का यह भी कथन था कि रेल मंत्रालय के अधीन अभी करीब 50 हजार रिक्तियां हैं और हर साल उसमें इजाफा हो रहा है । इससे भी संचालन में कठिनाइयां आ रही हैं । कहीं है इस समस्या से मुक्त होने की बात ?

6.
मंत्री महोदय का इरादा है कि कुछ चुने हुए कुछ स्टेशनों को इंटरनैशनल या ‘वर्ल्ड क्लास’ स्टैंडर्ड का बनाया जाएगा । मैं समझ नहीं पाता कि ये इंटरनैशनल क्या बला होती है । अंगरेजी में एक शब्द है ‘ऑब्सेशन’ जिसे में हिंदी में ‘सम्मोह’ कहता हूं । (सही लफ्ज क्या हो मैं कह नहीं सकता ।) ऑब्सेशन उस मनोदशा को इंगित करता है जिसमें व्यक्ति किसी विचार, चाहत या आदत के इस कदर वशीभूत हो जाता है कि विकल्प का विचार तक उसे नहीं सूझता है । मुझे लगता है हम हिंदुस्तानी इसी ‘ऑब्सेशन’ के शिकार हैं । हम स्टेशनों की बेहतरी करने की नहीं सोचते । सोचते हैं कि कहीं-कहीं आधुनिकतम व्यवस्था भी दिखाई दे देश में – ‘आइलैंड्ज् ऑव् इक्सेलेंस’ । खैर कोई बात नहीं, पर ये इंटरनैशनल स्टेशन बनेंगे कैसे ? जिस देश के अधिकतर यात्री बोगियों में ठूंसकर चलने को मजबूर हों, स्टेशनों में प्लेटफॉर्मों पर लेटकर जैसे-तैसे घंटों समय बिताने को विवश हों, जहां यात्रियों की भीड़ में आगे बढ़ना कठिन हो, जहां प्लास्टिक की थैलियों और केले के छिलके जहां-तहां फैंकने की यात्रियों की आदत हो, वहां इंटरनैशनल का अर्थ क्या रह जाता है ? हम अपने स्टेशनों का ठीक-ठीक रखरखाव कर लें तो यही बहुत होगा । याद रहे कि विश्व के संपन्न देशों में किसी स्टेशन पर जितने यात्री दिन भर में नहीं आते-जाते हैं, उतने से कहीं अधिक तो अपने यहां एक ही गाड़ी से चढ़ते-उतरते हैं । इस देश की भलाई इसी में है कि हम इस ‘इंटरनैशनल’ के सम्मोह से मुक्त हों ।

7.
एक और वादे का जिक्र भी कर ही लेता हूं । रेलवे का विचार है कि 1500 रुपये माहवारी से कम आमदनी वाले लोगों को 100 किलोमीटर तक के दायरे के लिए मात्र 30 रुपये में मासिक पास दिया जायेगा । सोचने की बात यह है कि किसी व्यक्ति की आमदनी का पता कैसे चलेगा । जिस देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो वहां तो कोई भी सरकारी विभागों से ऐसा प्रमाणपत्र जुटा ही लेगा । बहुत संभव है कि जो असली जरूरतमंद हो वह रह ही जाये । जहां संपन्न व्यक्ति भी प्रतिष्ठा को दांव पर रखकर गरीबी का सर्टिफिकेट लिए हुए बेशर्मी से अवांछित लाभ लेने में न हिचकते हों वहां यह प्रयोग कितना सार्थक होगा इसका उत्तर भविष्य ही देगा ।

टीवी चैनलों के विशेषज्ञों और स्वयं मुझे यही लगा कि यह बजट राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर बनाया गया है । देश के दीर्घकालिक हितों के प्रति सूझबूझ का इसमें अभाव है । शायद आम जनता को ‘मुंगेरीलाल के हंसीन सपने’ दिखाने की कोशिश की गयी है । पिछली बार रेलवे ने ‘गरीबरथ’ गाड़ियां चलाई थीं । अच्छे खाते-पीते लोग ही इन गाड़ियों में चलते हैं यह शायद रेलवे को आज तक पता नहीं होगा । असली गरीब तो इन गाड़ियों में झांकने की भी हिम्मत नहीं करेगा । कहां से लाएगा उतना किराया ? लेकिन जनता को तो भ्रमित किया ही जा सकता है । देश चल रहा है यही बहुत है ! – योगेन्द्र


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