और अब ई.वी.एम. (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर हमला

एक-डेड़ माह पूर्व संपन्न चुनावों में पराजित दो-एक प्रत्याशियों ने अपनी हार का कारण इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को ठहरा दिया । हुआ यह था कि अहमियत रखने वाले कुछ राजनेता (जैसे माननीय चिदंबरम, श्रीमती मेनका गांधी) हारते-हारते जीत गये । मामूली अंतर से हार रहे इन नेताओं ने जब दुबारा मतगणना की मांग की थी और उनकी मांग मान ली गयी तो ये विजयी घोषित हो गये । परिणामों के इस प्रकार उलट जाने के कारण ही शायद कुछ प्रत्याशियों को ई.वी.एम. के प्रति शंका हो गयी होगी । रोचक तथ्य यह है कि मशीन पर लगाया गये उनके आरोपों को अन्य राजनेताओं ने नजरअंदाज करने के बजाय उस शंका के प्रति समर्थन देना आंरभ कर दिया । भाजपा के श्री आडवाणी और सीपीएम के श्री यचूरी आदि जैसे धुरंधर राजनेताओं ने एक बहस ही छेड़ दी है । क्रांग्रेस ने इस शंका को पूर्णतः निराधार कह दिया है । मुझे लगता है कि चुनाव में जिन प्रत्याशियों या दलों को अच्छे परिणाम मिले हैं वे चुप हैं, और नतीजे जिनके पक्ष में नहीं रहे उन्होंने बेचारे ई.वी.एम. पर ही दोष मढ़ना शुरू कर दिया है । अब सवाल यह है कि क्या ये मशीनें गड़बड़ करती हैं, कर सकती हैं ? मुझे अधोलिखित संभावनाएं नजर आती हैं:

1. ई.वी.एम. के कनेक्शन संबंधी चूक
एक भौतिकी-वैज्ञानिक होने के बावजूद मैं इस बात को आसानी से नहीं समझ पाया हूं कि वोटिंग मशीन के मामले में दुबारा मतगणना की आवश्यकता क्यों और कैसे हो सकती है ? इन मशीनों में संचित मतदान संबंधी ‘इलेक्ट्रॉनिक’ आंकड़ों को एकत्रित कर गणना करने वाला कंप्यूटर सही आंकड़े नहीं प्राप्त नहीं कर पाया क्या ? आंकड़ों का प्रवाह मशीन से कंप्यूटर की ओर सुचारु न हो पा रहा हो, और तदनुसार कंप्यूटर को किसी मशीन से आंकड़े ही न मिल पा रहे हों ऐसा संभव है । ऐसा तो आधुनिक आंकिक (डिजिटल) मशीनों के साथ कभी-कभार हो ही जाता है । मशीन की बिजली आपूर्ति में व्यवधान आ पड़े या उसके तथा कंप्यूटर के मध्य आंकड़ों के आवागमन हेतु प्रयुक्त तारों के संयोजन में कहीं कोई रुकावट आ जाये तो ऐसा होगा ही । समुचित पड़ताल के बाद तकनीकी कर्मियों को कमी का कारण समझ में आ ही जाता है और वे व्यवस्था को दुरुस्त कर सकते हैं । किंतु कंप्यूटर को मशीन से आंकड़े तो मिल रहे हों परंतु वे उल्टे-सीधे, गलत-सलत हों ऐसा नहीं संभव है, कम से कम आजकल प्रचलित ‘डेटा ट्रांसफर’ प्रणालियों के सही प्रयोग किये जाने पर । मुझे लगता है दुबारा मतगणना की नौबत तब आती होगी जब कोई ई.वी.एम. अनछुई रह गयी हो, यानी उससे आंकड़े लेने की प्रक्रिया ही छूट गयी हो । मेरा अनुमान है कि संसदीय चुनावों में जहां प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में दस-दस लाख से भी अधिक मतदाता भाग ले रहे हों, वहां एक-एक हजार से अधिक मशीनें प्रति क्षेत्र इस्तेमाल होती होंगी, क्योंकि प्रति एक हजार मतदाता पर कम से कम एक मशीन तो रहती ही है । हजार मशीनों को कंप्यूटर से जोड़ने-हटाने में मानवीय चूक हो तो आश्चर्य नहीं ।

2. आंकड़ा संग्रहण में सॉफ्टवेयर संबंधी त्रुटि
किंतु ई.वी.एम. की कार्यप्रणाली पर शंका करना मुझे जंचता नहीं । डिजिटल सिद्धांतों पर आधारित दो युक्तियों (डिवाइसेज) के बीच आंकड़ों के आदान-प्रदान में किसी प्रकार की त्रुटि न हो इसको सुनिश्चित करने के लिए आजकल दोनों के बीच वांछित आंकड़ों के अलावा कुछ अतिरिक्त संकेतों का भी लेनदेन होता है । इन संकेतों में कूट रूप में ऐसी जानकारी छिपी रहती है जिसके आधार पर स्रोत (सोर्स) से संग्राहक (रिसीवर) को मिलने वाले आंकड़ों की यथार्थता का परीक्षण स्वतः होता रहता है । अगर ऐसा न हो तो आज के युग के सूचना आदान-प्रदान का खेल ही बिगड़ जाये और डाउनलोड-अपलोड जैसी क्रियाएं असफल हो जायें ।

मुझे पूरा विश्वास है कि वोटिंग मशीनों के लिए जो सॉफ्टवेयर बनाया गया होगा उसमें इस प्रकार की कोई कमी नहीं होगी । चूंकि ये मशीनें बहुत सीमित प्रकार के कार्य के लिए बनी हैं न कि कंप्यूटरों की तरह तरह-तरह के तमाम पेचीदे कार्य संपन्न करने के लिए, अतः मुझे यह भी भरोसा है कि उनका सॉफ्टवेयर पर्याप्त रूप से सरल होगा । इसके अतिरिक्त उसका विभिन्न संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कई बार परीक्षण भी किया होगा, और तभी मशीनों पर प्रयोग हेतु प्रमाणित किया गया होगा ।

3. सॉफ्टवेयर के साथ इरादतन छेड़छाड़
मशीनें भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होती हैं । हां, कभी-कभी वे धोखा दे जाती हैं, और वह भी इरादतन नहीं । वे काम नहीं कर पा रही हैं यह बात भी प्रयोक्ता से छिपती नहीं । आम तौर पर प्रयोक्ता सुधार या त्रुटि-निवारण हेतु समुचित कदम उठा सकता है । लेकिन बेईमानी करने पर यदि कोई तुला हो तो बेचारी मशीनें विवश हो जाती हैं । सैद्धांतिक तौर पर सोचा जाये तो अवश्य ही उसके सॉफ्टवेयर के साथ खिलवाड़ किया जा सकता है । किंतु चुनावों में व्यापक स्तर पर ऐसी कारगुजारी की संभावना बनती भी है ? मुझे नहीं लगता कि वोटिंग मशीन व्यवहार में किसी प्रत्याशी के मनोनुकूल आंकड़े संचित करे इसकी संभावना अत्यल्प है । ऐसा सदैव नहीं होता है कि सैद्धांतिक स्तर जो संभव हो वह हकीकत में भी हो ही जाये । सही अवसरों के बिना ई.वी.एम. के साथ खिलवाड़ करके वांछित परिणाम पाना मुझे आसान नहीं दिखता । सो कैसे इस बारे में मैं अपना मत व्यक्त करता हूं ।

मैंने ई.वी.एम. के बारे में तकनीकी जानकारी नहीं जुटाई है, लेकिन मैं समझता हूं कि हर मशीन के लिए एक ही साफ्टवेयर होना चाहिए । ऐसा न होने का कोई औचित्य नहीं है और ऐसा न होने पर बेईमानी की गुंजाइश भी बढ़ जाएगी । एक बात और यह कि मत अभिव्यक्ति के लिए प्रत्याशियों के नाम और चुनाव चिह्न वाले बटनों को छोड़कर शेष को छिपाने/ढकने की व्यवस्था होनी चाहिए, या विकल्पतः मशीन पर ऐसा कोई बटन होना जिसके माध्यम से मतदान आंरभ होने से पहले ही इन बटनों को स्थाई तौर पर निष्क्रिय कर दिया जाये । परंतु मैं नहीं समझता हूं कि मशीन के साफ्टवेयर में ऐसी विशेषता हो सकती है कि वह किसी प्रत्याशी-नाम के सामने वाले बटन द्वारा डाले गये मत को किसी अन्य के नाम मनचाहे तरीके से दर्ज कर दे । ऐसा तभी मुमकिन है जब मशीन पर उपयुक्त अतिरिक्त बटन बेईमानी के इरादे से लगे हों । क्या ऐसे शंकास्पद बटन मशीनों पर मौजूद रहते हैं ? मेरा खयाल है नहीं । ऐसे में घपले की संभावना चुनाव क्षेत्रों में मशीनों के पहुंचने के बाद नहीं संभव है । गड़बड़ी केवल तभी संभव है जब निर्वाचन क्षेत्र को मशीनें भेजने से पहले साफ्टवेयर कंपनी उनमें प्रत्याशियों की सूची को ध्यान में रखते हुए साफ्टवेयर संबंधी हेराफेरी करे । स्पष्ट है कि इस हालत में कोई मशीन कहीं भी प्रयोग में ली जा सके ऐसा संभव नहीं होगा और बेईमानी असफल सिद्ध होगी । मेरी जानकारी के अनुसार कोई भी मशीन किसी भी क्षेत्र में इस्तेमाल हो सकती है; बस आपको मत-बटनों के आगे संबंधित क्षेत्र के प्रत्याशी-नामों की चिप्पियां चस्पां करनी होंगी । क्या निर्वाचन आयोग इस नीति के साथ कार्य नहीं कर रहा है कि कोई भी मशीन कहीं भी भेजी जा सके और साफ्टवेयर कंपनी उसके बारे में अनभिज्ञ बनी रहे ? यदि ऐसा नहीं है तो बेईमानी संभव है, अन्यथा नहीं ।

तो क्या होना चाहिए?
1. सभी ई.वी.एम. एक जैसी होनी चाहिए । निर्माण स्थल से बाहर निकलते समय उनमें एक ही साफ्टवेयर रहे और मशीन पर साफ्टवेयर डालने वाली व्यवस्था सील कर दी जाये ।
2. तत्पश्चात् ही निर्वाचन आयोग निश्चित करे कि कोई मशीन किस निर्वाचन क्षेत्र को भेजी जाये ।
3. मशीनों पर प्रत्याशियों के नाम नियत क्रम में बाद में चस्पां किये जायें और प्रयुक्त साफ्टवेयर क्रमसंख्या के अनुसार मतों को दर्ज करे यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए । मतगणना में उसी क्रमसंख्या से मतों का संग्रहण होवे ।
4. मशीन पर अप्रयोजनीय बटनों को ढककर निष्क्रिय कर दिया जाना चाहिए ताकि उनका प्रयोग न होने पावे ।

मैं समझता हूं कुछ ऐसा ही किया भी जा रहा होगा । अगर नहीं तो क्यों का उत्तर निर्वाचन आयोग को देना चाहिए ।

क्या राजनेताओं की शंकाएं ठोस कारणों पर आधारित हैं ? क्या वे ठीक-ठीक बता सकते हैं कि बेईमानी कैसे की गयी है या की जाती है ? महज अपने बहम को सच मानते हुए ‘बेईमानी होती है’ कह देना ठीक नहीं, जब तक कि ‘कैसे’ की विधि स्पष्ट न की जाये । – योगेन्द्र

और अब ई.वी.एम. (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर हमला” पर 2 विचार

  1. भाई साहब हाल ही में इस विषय पर विस्तार से दो भागों में मैंने लिखा है, कृपया इसे देखें…
    http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/06/evm-rigging-elections-and-voting-fraud.html
    इसमें अन्य तकनीकी पहलुओं को भी देखा गया है… वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की आशंका निराधार नहीं है… आप एक सवाल का जवाब दीजिये कि क्या आपको विश्वास है कि आपने जो बटन दबाया था वोट उसी प्रत्याशी को गया होगा? कागज के मतपत्र में तो आपको विश्वास होता है कि आपने सही जगह ठप्पा लगाया है…🙂

    प्रत्युत्तर में टिप्पणी –
    … मैं यह विश्वास करता हूं कि मेरा वोट सही व्यक्ति को पड़ा है । अवश्य ही प्रमाण नहीं है । जिन्दगी में हर जगह सब ठीक चला का प्रमाण नहीं होता । मानव जीवन प्रमाणों पर नहीं विश्वासों पर चलता है । यदि सभी जगह अविश्वास का वातावरण फ़ैला हो तो फिर भगवान ही मालिक है । किसकी ईमानदारी पर भरोसा करें तब ? यार-दोस्त, नाते-रिस्ते, सहयोगी, सभी तो अविश्वास के घेरे में आ जाते हैं ! – योगेन्द्र

  2. भारत घपलों का देश बन गया है. घपले होते ही रहते हैं. आप कैसे मान लेते हैं की इन वोटिंग मशीनों में घपला नहीं हो सकता. सॉफ्टवेर किसी आदमी ने बनाया होगा. उसे दे दो एक दो करोड़. प्रोग्रम्मिंग कर देगा जैसा आप चाहते हो. यह सब असंभव तो नहीं हैं .

    प्रत्युत्तर में टिप्पणी –
    जहां चाह वहां राह । जहां बेईमानी आम जिन्दगी का हिस्सा बन चुका हो वहां मशीनें कुछ नहीं कर सकती हैं । लेकिन बेईमानी मशीनें नहीं करतीं, उन्हें बेईमानी के लिये ढाला जा सकता है । परंतु सॉफ़्ट्वेयर विशेषज्ञ को भी यह तो मालूम होना ही चाहिये कि मशीन कहां इस्तेमाल होगी और किस क्रम के प्रत्याशी के लिये घपला किया जाना है । मशीनें यादृच्छिक (random) तरीके से ‘साइट’ पर भेजी जायें तो अग्रिम तौर पर घपले की व्यवस्था कैसे होगी ? मतदान केंद्र पर घपले के लिये मशीन पर उसे बाहर से नियन्त्रित करने का पुख्ता इंतजाम किया गया हो तो फिर क्या करें ? लेकिन क्या हो रहा है इसकी मॉनिटरिंग संभव है । अगर भ्रष्टाचार की परकाष्ठा हो तो न मशीन और न ही मतपत्र कुछ कर सकता हैं । ऐसी स्थिति में तो भरोसा खो चुके लोकतन्त्र को ही उखाड़ फ़ेंकना चहिये ! – योगेन्द्र

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