अव्वल दर्जे की आबादी वाला देश हिंदुस्तान, आज नहीं तो कल !

आज विश्व जनसंख्या दिवस है, 11 जुलाई ।

लीजिए जश्न मनाइए, विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या भारत (इंडिया?) की । चौंकिए नहीं ! अगर आंकड़ों पर भरोसा (?) करें तो आज के दिन ऐसा नहीं है, पर कल तो हो ही जायेगा । अभी तक चीन की आबादी ही सबसे अधिक है । लेकिन चीन में जनसंख्या बहुत नियंत्रित जल रही है । अब आप वहां लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के न होने को इस बात के लिए श्रेय दें या वहां के औसत नागरिक की समझदारी को, अथवा दोनों को मिलाकर । अभी चीन की जनसंख्या हम (लगभग 115 करोड़) से करीब 18-20 करोड़ अधिक है । जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार जैसी चल रहीं है वैसी चलती रहे तो इस अंतर को हम बीस-एक साल में पाट लेंगे, इतने में नहीं तो पच्चीस-तीस साल में पाटने में सफल हो ही जायेंगे । नंबर एक बनने से चीन को छोड़ भला कौन रोक सकता है हमें । और वह है कि ‘कॉम्प्टीशन्’ से हटने की सोच रहा है । तब नंबर एक ! कहीं किसी बात में तो नंबर एक होने का गर्व कर सकेंगे ।

लेकिन एक शर्त है, कोई व्यापक प्राकृतिक आपदा देश पर कहर न बरपा डाले या भयंकर संक्रामक रोग अपने पांव न पसार बैठे । यदि अवर्षण जैसे कारणों से अकाल या दुर्भिक्ष की स्थिति व्यापक स्तर पर पैदा हो गई तो हमारी सरकारें उसे संभाल नहीं पायेंगी । कहां से भरेंगे लोगों के पेट ? थोड़ा भोजन भंडार पास में हो भी और कुछ बाहर से आयातित हो भी जाये, तो भी अधिसंख्य ग्रामीणों के जीवन के आधार कृषि और पशुधन को कैसे बचाया जाएगा ? हर बीतते वर्ष के साथ जो हालात देश में बनते हुए नजर आ रहे हैं उसमें हमारे समक्ष गंभीर जलसंकट के आसार दिखाई दे रहे हैं । देश के कई हिस्सों में पानी को लेकर अभी ही प्रदर्शन-दंगे हो रहे हैं, दुर्भिक्ष के समय क्या होगा ? गंभीर रोग-संक्रमण होने पर भी हालात बेकाबू हो सकते हैं । सरकारी अस्पतालों की दशा आज ही दयनीय है । आर्थिक दृष्टि से असमर्थ कितने लोगों को संतोषप्रद इलाज वहां मिलता है ? उन्हें अक्सर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है । तब व्यापक संक्रमण के फैलने पर हालात बेकाबू हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा । आप या मैं चाहें या न, तब जनसंख्या पर असर पड़ेगा ही । प्रकृति तो अपने तरीके से निबटेगी ही ।

दुर्भाग्य से अपने देश ने जनसंख्या के मामले को ‘भगवान’ पर छोड़ रखा है । बीते शताब्दि के आठवें दशक के मध्य (1975 के आसपास) तक इस दिशा में आशाजनक स्थिति बन रही थी । मुझे याद है सातवें दशक के अपने छात्रजीवन की और उसके बाद के शोध-सह-शिक्षा के व्यवसाय के आरंभिक वर्षों की । तब सरकारी बसों पर ‘हम दो हमारे दो’ तथा परिवार नियोजन के द्योतक ‘लाल त्रिकोण’ का विज्ञापन दिखाई देता । तब दिल्ली छोड़ अन्यत्र टेलीविजन नहीं पहुंचा था, लेकिन रेडियो पर परिवार नियोजन का संदेश रह-रहकर सुनने को मिलता था । अखबारों, सड़क के किनारे के होल्डरों तथा अन्य स्थलों पर भी संदेश नजर आते थे । केंद्र तथा राज्य सरकारों की नीति एवं योजना की जानकारी लोगों को दी जा रही थी, वे चाहें या न चाहें । बदकिस्मती से परिवार नियोजन के प्रयासों को ऐसा झटका लगा कि बस सब कुछ ‘ठप-सा’ हो गया ।

मुझे याद आती है स्वर्गीय संजय गांधी की, तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीया श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रियतर पुत्र और उस समय भावी उत्तराधिकारी की । मझे स्मरण आता है कि वे किसी प्रमुख पद पर नहीं थे, लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों पर उनका जबर्दस्त प्रभाव था । उन्हें देश की निरंतर बढ़ रही जनसंख्या की गंभीर समस्या का एहसास था । जवानी के जोश में वे उससे निबटने के लिए उतावले थे, भले ही वह उन पर सोंपी गयी जिम्मेवारी नहीं थी । अत्युत्साह में वे परिवार नियोजन को जोर-जबरदस्ती से लागू करवाने पर उतर आये । पूरी कहानी बहुत पेचीदा और लंबी है । इतना कह सकता हूं कि सरकारी नौकर-चाकरों को नसबंदी जैसे परिवार नियोजन के मामले जुटाने की हिदायत दी गयी, अन्यथा तनख्वाह और उसके आगे संभवतः नौकरी पर खतरा उनके सामने खड़ा होने लगा । परिवार नियोजन के तरीकों को लेकर जल्दी ही असंतोष फैलने लगा था । विपक्षी दल और गैरराजनैतिक दल आंदोलनों पर उतर आये । इस पूरे प्रकरण तथा कुछ अन्य कारणों से देश में आपात्काल घोषित हो गया था । तत्पश्चात् 1977 में विपक्षी दलों ने एक होकर श्रीमती गांधी को अपदस्थ करके ‘जनता पार्टी’ का राज स्थापित कर दिया । देश में कितना असंतोष छाया होगा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तब की दक्षिणपंथी पार्टी जनसंघ (बाद में वही भाजपा बनी) और वामदलों ने परस्पर हाथ मिला लिया । बाद में क्या-क्या राजनैतिक उठापटक हुई इसकी कहानी अभी छोड़ दें ।

बेचारे संजय गांधी के इरादे तो नेक थे, लेकिन वे अति उत्साह में भूल गये कि आधिकारिक हैसियत न होने के बावजूद विभिन्न सरकारों से उन्होंने जिन कठोर तरीकों का कार्यान्वयन करवाना आरंभ किया वे उल्टे सिद्ध हो सकते हैं । उस समय परिवार नियोजन की बस रास्ते में जो भी आया उसे गिराते-कुचलते तेजी से दौड़ पड़ी थी । और उस तेज रफ्तार बस से लोग इतना भड़क गये कि उसे उन्होंने रास्ते से ही धकेलकर गड्ढे में डाल दिया, कुछ यूं कि बस कभी वापस रास्ते में न आ सके । परिवार नियोजन और आपात्काल को लेकर की गयीं गलतियां 1977 के चुनावों में कांग्रेस की बेहद बुरी हार का कारण बनीं । स्वतंत्र भारत में तब तक एकछत्र राज कर रही क्रांग्रेस को पहली बार ऐसा झटका लगा जिसे वह शायद भूली नहीं है ।

उस समय की घटनाओं ने परिवार नियोजन कार्यक्रम को ही पटरी से उतार दिया दूध का जला छांछ फूंक-फूंककर पीता है की कहावत क्रांग्रेस पर तो लागू होती ही है, और दलों ने भी सबक ले लिया । सबक यह कि परिवार नियोजन और जनसंख्या वृद्धि की बात ही जबान पर मत लाओ । लोग बिदकेंगे और चुनावों में हार होगी । वोट बैंक की राजनीति ने तो उस कार्यक्रम का किसी को नामलेवा ही नहीं रहने दिया । किंतु दिलचस्प बात तो यह है कि स्वयंसेवी संगठन भी कहीं नजर नहीं आते हैं जो इस दिशा में कारगर कुछ कर रहे हों । कहीं कुछ पता तो चले !

जनसंख्या वृद्धि पर अपना देश और अपनी सरकारें कितनी संजीदा हैं इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि 5-6 साल पहले की श्री अटल बिहारी बाजपाई की सरकार ने ‘भारतीय जनसंख्या आयोग’ (http://populationcommission.nic.in/ce.htm) का गठन किया था, सदस्यों की भारी भरकम फौज के साथ । आयोग ने एक वेब-साइट भी तब बना डाली । उस साइट पर नजर डालने पर पता चलता है कि शुरू के एक दो साल, 2002 तक, आयोग थोड़ी हलचल में रहा । और उसके बाद एकदम सन्नाटा । आयोग तथा उसके सदस्यगण लज्जा या संकोच के भाव के दरकिनार कर गहरी नींद में चले गये । उनकी कुंभकर्णी नींद आज तक नहीं खुली । खुली हो तो वेब-साइट पर बताने की जरूरत किसी को नहीं सूझी । अपने देश में तो लोग आयोगों जैसी संस्थाओं के सदस्य इसलिए नहीं बनते कि वे पूरे मनोयोग से संस्था के लक्ष्यों को हासिल करें । सदस्यता तो प्रतिष्ठा की चीज होती है और कभी-कभी उससे जुड़े लाभ भी मिलते हैं । काम जाए भाड़ में अपने को क्या मिल रहा है इस पर नजर डालो !

यू.एन.ओ. द्वारा प्रायोजित ‘वर्ल्ड पाप्युलेशन डे’ है आज, 11 जुलाई । दिवस का उद्येश्य है जहां जनसंख्या बेतहासा बढ़ रही है वहां के लोगों को जागरूक बनाना और उन्हें सुनियोजित परिवार के लिए प्रेरित करना । पर अपने यहां तो कहीं चर्चा ही नहीं सुनाई पड़ रही है । न राष्ट्रपति के मुख से एक शब्द और न ही प्रधानमंत्री का कोई संदेश । टेलीविजन चैनलों पर भी मुझे कुछ नहीं सुनाई पड़ा । कहीं किसी ने दो-एक लफ्ज बोले हों तो पता नहीं चला ।

इस दिन तो जोर-शोर से कुछ होना चाहिए था । खैर, अभी दिन बीता नहीं है । क्या पता तारीख बदलने तक बहुत कुछ सुनने को मिल जाये, और सरकारें जबान खोलें कि वे ठोस क्या करने जा रही हैं ।

मुझे उम्मींद कम ही है । देश की जनसंख्या भगवान भरोसे ही है । उसी ने सबको पैदा किया है और वही सबको खिलाएगा, भला चिंता क्या है ? संत मलूकदासजी कह गये हैं:
“अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम ।
दास मलूका कह गये, सबके दाता राम ।।”

– योगेन्द्र

अव्वल दर्जे की आबादी वाला देश हिंदुस्तान, आज नहीं तो कल !” पर 2 विचार

  1. चलिए जनसंख्या में ही सही, नम्बर वन तो बनेंगे दुनियाँ में। सरकारी तंत्र भी जनसंख्या दिवस की औपचारिकता भी पूरी कर लेगी।

    लेकिन आपके आलेख के मध्य में वर्णित १९७५ के बाद का वो क्रूर कृत्य के एक प्रभावी को नजदीक से जानता हूँ जो अपने माँ बाप का इकलौता बेटा है और उसे ट्रेन से जबरदस्ती उतारकर शादी से पहले ही नसबन्दी करा दिया गया। देहात की बात, उसकी बाद में शादी भी करा दी गयी और वो आज तक निःसन्तान है। नसबन्दी के नाम पर एक वंश की हत्या हो गयी और उस परिवार के बड़े बूढ़े आज भी जार जार रो रहे हैं। मैं जब भी गाँव जाता हूँ या जब भी उनलोगों की याद आती है, तड़प के रह जाता हूँ।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

    प्रत्युत्तर में टिप्पणी:
    निःसंदेह तब ज्यादतियां हुईं थी और कॉंग्रेस को फल भी मिला । दुर्भाग्य से उन ज्यादतियों का दीर्घकालिक दुष्फल देश को यह भुगतना पड़ा कि जनसंख्या का मुद्दा ही चर्चा के बाहर हो गया । भारतीय लोकतंत्र का यह असफल पक्ष है । – योगेन्द्र जोशी

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