माननीय पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम की तलाशी – कुछ भी अजूबा नहीं !

खबर है कि विगत 24 अप्रैल की तारीख दिल्ली के इंदिरा गांधी अंताराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अपने पूर्व राष्ट्रपति माननीय डा. कलाम महोदय की सुरक्षा जांच की गयी । जांच करने वाले थे अमेरिकी हवाई सेवा ‘कांटिनेंटल एअरलाइंस’ के कर्मचारी । कहा जाता है कि भारतीय अधिकारियों ने उन्हें पूरी तौर पर समझाया कि पूर्व राष्ट्रपति सुरक्षा जांच के दायरे में नहीं आते हैं । कई अन्य अतिमहत्त्वपूर्ण गिने-चुने व्यक्तियों की भांति वे इस प्रक्रिया से मुक्त रखे जाने के हकदार हैं । लेकिन भारतीय नियम कानूनों की अनदेखी करते हुए अमेरिकी कंपनी के अधिकारियों ने वही किया जिसे करना वे अपना अधिकार समझते हैं ।

खबर तो बहुत बासी है और मुझे याद नहीं कि अपने समाचार माध्यमों ने इसका पहले कभी जिक्र किया हो । अगर किसी ने दो-चार शब्द छापे हों तो वे चर्चा में नहीं आये । बात खुली आज जब संसद में इस बात को लेकर सदस्यों ने सरकार से समुचित काररवाही करने की बात कही । हो सकता है सरकार को मालूम हो और वह चुप्पी साधे रहना चाहती हो । लेकिन जब विपक्ष ने बात छेड़ ही दी तो उसे तो कुछ कहना ही था । कड़ा विरोध जताने की बात हो रही है ।

अपनी आदत के अनुसार सरकार सदा ही ‘सख्त रवैया’ अपनाने की बात करती है, चाहे वह अमेरिका का मामला हो या पाकिस्तान, चीन और यहां तक कि नेपाल का । पर देश कर कुछ सकता नहीं ! कोई बताये कर ही क्या सकता है कोई ? वह भी अमेरिका के मामले में ? हम ईरान, उत्तर कोरिया या सद्दाम के समय का इराक तो हैं नहीं । हमें अमेरिका को नाराज नहीं करना है, भले ही बातें बड़े जोर-शोर से करें । असल में चुपचाप सब कुछ सह जाना हमारी नियति है । हम बाहरी देशों पर बुरी तरह निर्भर हैं । हमारी युवा पीढ़ी रोजी-रोटी के लिए बाहरी देशों भर निर्भर रहने लगी है । जहां उच्च शिक्षा और व्यावसायिक दक्षता वाले अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया का रूख करते हैं, तो कम योग्यता वाले अरब देश चुनते हैं । कोई इंजिनियर डाक्टर बनकर बाहर जाता है, तो कोई घरेलू नौकर बनकर । कोई उल्टे हमारे यहां नहीं आता न ? हम भला कैसे किसी को नाखुश कर सकते हैं ?

अमेरिका हमारी हैशियत समझता है । अमेरिकियों की नजर में हम भिक्षुक देश हैं । माफ करें आपको अवश्य ही मेरा ऐसा कहना अक्षम्य लगेगा । मैं जानता हूं, परंतु इस शब्द के प्रयोग के बिना मैं अपनी बात कैसे कहूं ? वैसे भी अमेरिका किसी को घास नहीं डालता है । उसके अपने नियम हैं हर क्षेत्र में । खास तौर पर सुरक्षा मामले में तो वह किसी की सुन ही नहीं सकता । आप उसके नियम मानिये; नहीं मानते तो फल भुगतिये । अमेरिका पूरी तरह हांकेगा आपको अपने तरीके से । नहीं मानेंगे तो कुछ न कुछ करने की कोशिश करेगा । लेकिन वह भी देवता तो नहीं कि जो चाहे करने में सफल हो ही जाये । कुछ न कर पाना उसके साथ भी हो सकता है, फिर भी वह अपनी ताकत दिखाने की हर संभव कोशिश करेगा ही ।

सरकार विरोध जतायेगी । अमेरिकी अधिकारी माफी मांग लेंगे, किंतु इसका मतलब यह नहीं कि वे बदल जायेंगे । अहंकार के मामले में अमेरिका की बराबरी कोई कर पायेगा । हम श्रेष्ठतम हैं और हमारा वर्चस्व निर्विरोध सभी ने स्वीकारना चाहिए यही अमेरिकी मानसिकता है । अपने लोग तो यूं भी पाश्चात्य जगत् की श्रेष्ठता को मूक भाव से स्वीकारते आये हैं । तभी तो उनके जैसा बनने की हर कोशिश की जा रही है । ‘मनमोहन’ सरकार पर यह इलजाम तो लगते आ रहे कि उसने अमेरिका के आगे झुकने की नीति अपना रखी है । जब कुछ कारगर कर ही नहीं सकते, तो ऐसे वाकयों की चुपचाप अनदेखी कर देनी चाहिए । – योगेन्द्र

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