२७ सितंबर: शहीद भगतसिंह का जन्मदिन

भगत सिंह का जन्म कृषकों के एक सिख परिवार में बंगा (लायलपुर-अब पाकिस्तान) में 27 सितंबर 1907 को हुआ था। आपके परिवार में सभी देशभक्त, सुधारवादी तथा देश की आजादी के दीवाने थे। बड़ा होने पर …”
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भगतसिंह का अंतिम पत्र अपने साथियों के नाम:

22 मार्च,1931,

“साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी. हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता. इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह”

मैं समझ नहीं पाता हूं कि वह कौन सी बात थी कि आज से ९०-१०० साल पूर्व कुछ लोग देश, समाज तथा जन्मभूमि के लिए अपने प्राण तक त्यागने को तैयार थे ? वह सब सच था, लेकिन आज के हालात देख विश्वास नहीं होता है कि ऐसे भी लोग कभी इस देश में पैदा हुए थे । आज त्याग की बात तो दूर, देश लूटने से भी कोई बाज नहीं आ रहा है । जिसको जहां मौका मिल रहा है वह केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगा है । इतना भी करने को लोग तैयार नहीं कि अपने हिस्से की जिम्मेदारी ही ईमानदारी से निभाएं, जिसके लिए समाज/शासन उन्हें वेतन देता है । अगर थोड़ी-सी निष्ठा होती, देश के हालात कुछ और होते । सरकारी तन्त्र का शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाता, चिकित्सक ईमानदारी से मरीजों का इलाज करता, पुलिस वाला ईमानदारी से फ़र्ज निभाता, राजनेता आपराधिक वारदातों में न सरीक होते और न ऐसी वृत्तियों में संलग्न तत्त्वों को संरक्षण देते, न्यायिक व्यवस्था में ईमानदारी होती, तो देश की तस्वीर कुछ और होती । काश ऐसा होता !

आज भगतसिंह का जन्मदिन है । बहुत कम लोगों को मालूम होगा । क्रिकेट या सिनेजगत की के किसी विशिष्ठ व्यक्ति ‘सेलेब्रिटी’ अथवा किसी बड़े राजनेता की बार होती तो पता चलता । पर भगत सिंह का खयाल किसे होगा ? उस शहीद के प्रति मेरी श्रद्धा-भावना – योगेन्द्र जोशी

२७ सितंबर: शहीद भगतसिंह का जन्मदिन” पर 9 विचार

  1. शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी (27 सितम्बर, 1907 – 23 मार्च, 1931 )
    कुछ बहरों को सुनाने के लिए एक धमाका आपने तब किया था ,
    एसे ही कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है,
    हो सके तो आ जाओ !!

    सरफरोशी की तमन्ना
    सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजू-ऐ-कातिल में है.

    करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बात-चीत, देखता हूँ मैं जिसे वोह चुप तेरी महफिल में है.
    ए शहीद-ऐ-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है.
    सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

    वक्त आने पे बता देंगे तुझे ए आसमान, हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है.
    खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद, आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल में है.
    सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

    है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर, और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
    खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

    हाथ जिन में हो जूनून कट ते नही तलवार से, सर जो उठ जाते हैं वोह झुकते नही ललकार से.
    और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

    हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न, जा हथेली पर लिए लो बढ़ चले हैं ये क़दम.
    जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफिल में है, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.

    यूं खडा मकतल में कातिल कह रहा है बार बार, क्या तमन्ना-ऐ-शहादत भी किसी के दिल में है.
    दिल में तूफानों की टोली और नसों में इन्किलाब, होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
    दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल में है,

    सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. देखना है ज़ोर कितना बाज़ुय कातिल में है ||

    इंक़लाब जिंदाबाद

    शहीद् ए आजम सरदार भगत सिंह जी को उनके १०३ वे जन्मदिवस पर सभी मैनपुरीवासीयों की ओर से शत शत नमन |

  2. ye koi tippadi nahi balki mere dil ki adhoori baat hai aur aur kabhi
    Bharat aaj kitna badal gaya hai aaj ke loag bhool rahe hai un ajadi ke diwano ko jin ho ne apni jan dekar ek naveen Bharat ke sapne ko sakar kiya tha .Desh aaj dekh ne mai to ajad hai lekin vastaw mai desh aaj bhi gulam banker baitha huwa hai yaha gareeb aur gareeb aur ameer aur ameer hota jar aha hai loag insaniyat ko bhool kar paise ke liye sab bhool rahe hai.. mai ek 10th class mai padne wala student hu aur mai ye chahta hu jo bhawna mere ander hai wo bhawna har Hindustan ke nagrik mai ho. Aaj mai bas itna hi aur mai isliye nahi likh rha hu kyo ki kya pata aap mujhe chota samajh kar meri baat majak mai le
    JAI HIND

    thanks

  3. Mujhe lagta hain bhagat singh jaisa veer sayad hee bharat mein dubara paida hoga.Jab bhee main bhagat singh ka vo baat yaad karta “sarfarosi ki tammna abb hmare dil mein hain dekhna hai jor kitna bajooin katil mein hai”to maan mein ek bijli see krondh jati hai.lakin aajki generation ko sayad unko sahadat bhool rahi hai jisn e bharat ki aajadi ke liye haste haste fasi par jhool gaye..main saheed bhagat singh ko aaj bhee shis jhuka kar naman karta hoon…..Jai Hind Jai Bharat…

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