‘द न्यू साइंस अव् टेम्टेशन’ अर्थात् प्रलोभन का नवीन विज्ञान, और भ्रष्ट आचरण

‘साइंटिफिक अमेरिकन’ नामक वैज्ञानिक पत्रिका में एक लेख छपा है ‘The New Science of Temptation’, यानी ‘प्रलोभन का नवीन विज्ञान’ । पत्रिका के 3 नवंबर के इंटरनेट संस्करण में यह लेख उपलब्ध है । मनोवैज्ञानिक अध्ययन/अनुसंधान के परिणामों पर आधारित उक्त लेख मुझे रोचक और ज्ञानवर्धक लगा, क्योंकि यह मनुष्य के व्यक्तित्व के एक महत्त्वपूर्ण पहलू को छूता है । लेख के आरंभिक अनुच्छेद के शब्द ये हैं: “The power to resist temptation has been extolled by philosophers, psychologists, teachers, coaches, and mothers. Anyone with advice on how you should live your life has surely spoken to you of its benefits.” (दार्शनिकों, मनोविज्ञानियों, शिक्षकों, अनुशिक्षकों, तथा माताओं के द्वारा प्रलोभन से बचने की सामर्थ्य की प्रशंसा की जाती है । जीवन कैसे जियें इस पर राय देने वाले हर व्यक्ति ने इसके लाभों की बात आप से अवश्य की होगी ।)

लेख में प्रलोभन से बचने की जरूरत और उससे लाभ हानि की बातें तो कही ही गयी हैं, साथ में सामान्यतः प्रचलित इस मान्यता का भी उल्लेख किया है कि मनुष्य अक्सर अपने अंदर छिपे ‘शैतान’ के वश में रहता है, जो उसे लुब्ध करने वाली चीजों को अपने कब्जे में लेने को प्रेरित करता है, भले ही ऐसा करना अनुचित माना जाता हो । यह ‘शैतान’ वस्तुतः आपकी प्रलोभन से न बच पाने की आपकी कमजोरी को व्यक्त करता है । उपदेश अथवा सलाह दी जाती है कि मनुष्य इस कमजोरी को नियंत्रण में रखे । यह माना जाता है कि प्रलोभन तो हर व्यक्ति में होता है । जो लोग प्रलोभन से बच निकलते हैं वे वस्तुतः अपनी इस कमजोरी पर नियंत्रण पा लेते हैं । नियंत्रण पाने के लिए उन्हें प्रयास करना पड़ता है । वे उसके अवांछित परिणामों के बारे में सोचते हैं और अंत में अपने को अलग कर लेते हैं । किंतु सामने आये आकर्षण को तो वे भी महसूस करते ही हैं ।

परंतु उक्त लेख सुविख्यात अमेरिकी विश्वविद्यालय, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, में कार्यरत मनोविज्ञानियों, ग्रीन (Joshua D. Greene) एवं पैक्स्टन (Joseph M. Paxton), द्वारा संपादित एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहता है कि ऐसा सदैव नहीं होता है । वास्तविक जीवन में कई लोग एकाधिक कारणों से स्वयं को प्रलोभन से बचा ले जाते हैं । लेकिन यदि पूरी छूट मिल रही हो और यह विश्वास जग रहा हो कि लालच पैदा करने वाली वस्तु को चुपचाप स्वीकार लेने में कोई हानि नहीं है, तो कई लोग स्वनियंत्रण से बाहर निकल उस वस्तु को अपना लेंगे, भले ही ऐसा करना अनैतिक माना जाता हो । ऐसे अवसरों पर ही किसी के व्यक्तित्व का नैतिक पक्ष स्पष्ट हो पाता है । कथित अध्ययन में कुछ ऐसे ही परिणाम पाये गये हैं । यह पता चलता है कि कुछ लोग प्रलोभन से ही स्वाभाविक तौर पर मुक्त होते हैं और उनके मामले में अपनी कमजोरी पर नियंत्रण पाने की बात लागू नहीं होती है । लेख के शब्दों में Greene and Paxton were interested in why people behave honestly when confronted with the opportunity to anonymously cheat for personal gain. They considered two possible explanations. First, there is the “Will” hypothesis: in order to behave honestly people must actively resist the temptation to cheat. … Alternatively, there is the “Grace” hypothesis: honest behavior results from the absence of temptation. (ग्रीन एवं पैक्स्टन की रुचि यह जानने में थी कि पहचाने न जाने की स्थिति में धोखा देते हुए वैयक्तिक लाभ का मौका मिलने पर {भी} लोग क्यों ईमानदारी से पेश आते हैं । उन्होंने दो संभव कारणों पर विचार किया है । पहला है “संकल्पशक्ति” (“Will”, कई जन “इच्छाशक्ति” कहेंगे) की प्राक्कल्पना; ईमानदारी से पेश आने के लिए व्यक्ति ठगने के प्रलोभन से बचने की सक्रिय चेष्ठा अपनावे । विकल्पतः दूसरा है संतुष्टि की प्राक्कल्पना; व्यवहार में ईमानदारी प्रलोभन के अभाव से स्वतः आती है ।)

लेख पर नजर पड़ने पर मुझे यह समझने की इच्छा हुई कि तत्संबंधित अनुसंधान कैसे किया गया और प्रस्तुत परिणामों की सामाजिक संदर्भ में क्या व्यापक अर्थवत्ता संभव हैं । उसी सब की संक्षिप्त चर्चा के साथ में अपनी दो-एक टिप्पणियां करने जा रहा हूं ।

अनुसंधानकर्ताओं ने एक कंप्यूटर खेल प्रयोग में लिया । खेल को एक प्रकार का बहुत सरल ‘जुआ’ कहा जा सकता है, जिसमें उपयुक्त बटन दबाने पर कंप्यूटर ‘पर्दे पर उछाले गये सिक्के’ का ‘हेड’ अथवा ‘टेल’ यादृच्छिकतया (randomly) प्रस्तुत करता है । ऐसा करने पर परिणाम क्या होंगे इसे अग्रिम तौर पर वह खिलाड़ी से पूछ लेता है । खिलाड़ी का अनुमान सही सिद्ध होने पर उसे नियत धनराशि ‘इनाम’ में मिल जाती है, अन्यथा वह कुछ नहीं पाता है और न कुछ खोता है । (लाभ हो सकता है पर हानि नहीं !) अध्ययन का असली तकनीकी पक्ष यह था कि खेल के समय खिलाड़ी के मस्तिष्क-तरंगों (brain waves) के मापन के साथ उसकी दिमागी हलचल को भी परखा गया । अध्ययनकर्ताओं ने कुछ स्वयंसेवी सहभागियों को उक्त खेल में शामिल करते हुए उन्हें दो वर्गों में बांट लियाः एक में वे थे जिनके अनुमानों का ब्यौरा कंप्यूटर द्वारा सीधे रखा गया और उसी के आधार पर जिनका इनामी भुगतान किया गया । दूसरा वह वर्ग था जिनको हिदायत थी कि वे अपने अनुमानों के सही-गलत का लेखा-जोखा स्वयं प्रस्तुत करें; उसी के आधार पर उन्हें इनाम दिया गया । जाहिर है कि दूसरे वर्ग के सहभागियों को ठगने का पूरा मौका मिल रहा था, और उन्होंने उसका फायदा उठाया भी ।

अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने ठगने के अवसर के बावजूद अपने अनुमानों के सही-गलत होने का ईमानदारी से ब्यौरा तैयार किया, उनकी दिमागी हलचल हल्की-फुल्की रही और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उनका समय अधिक नहीं लगा । ध्यान रहे कि जब दिमाग उपस्थित परिस्थिति का विश्लेषण करते हुए ‘यह करूं या वह’ का निर्णय लेने लगता है और ऊहापोह की अवस्था से गुजरता है, तब मस्तिष्क-तरंगें तीव्र हो उठती हैं । इसके विपरीत शांत और ऊहापोह से मुक्त दिमाग की तरंगों की तीव्रता अधिक नहीं रहती । जिनकी दिमागी हलचल अधिक थी उनमें से कई ऐसे थे जिन्हांेने विवरण प्रस्तुत करने में झूठ का सहारा लिया था ।

अनुसंधानकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जिन लोगों में प्रलोभन का अभाव था, कम से कम उक्त खेल के समय, उनको अधिक सोचने की जरूरत ही नहीं थी । वे अधिक इनाम पाने के प्रति इतने उतावले नहीं रहे कि उन्हें ऊहापोह की स्थिति से गुजरना पड़े । दूसरी तरफ वे थे जो अधिक से अधिक इनाम की लालसा से ग्रस्त थे । उन्हीं को दिमाग पर अधिक जोर डालना पड़ा । “पता तो चलेगा नहीं, तो फिर क्यों न झूठ बोला जाय, सब चलेगा” की भावना के साथ उन्हें उलझना पड़ा । तब उनमें से कुछ को झूठ का सहारा लेने में भी हिचक नहीं रही, और शेष को ईमानदारी बरतने के लिए सचेत होकर अपनी “संकल्पशक्ति” का सहारा लेना पड़ा, जिसका संकेत उनके मस्तिष्क-तरंगों में मिला ।

उक्त अध्ययन के परिणामों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मानव समाज में मुख्यतः दो प्रकार के लोग होते हैं । एक वे जो लोभ-लालच से कमोबेश मुक्त होते हैं । वे इसी बात से संतुष्ट रहते हैं कि उनका काम चल रहा है । चाहे सरकारी तंत्र हो, व्यावसायिक संस्था हो, परिचित-अपरिचित हों, अथवा अपने ही मित्र-संबंधी आदि हों, किसी को ठगकर अनैतिक लाभ लेने का विचार ही उनके मन में नहीं उठता है । मौके का नाजायज फायदा उठाने के विचार से लड़ने के लिए उन्हें “संकल्पशक्ति” की जरूरत नहीं होती । दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या अपने भारतीय समाज में नगण्य है ऐसा मेरा सोचना है । दूसरे वे लोग हैं जिन्हें लोभ-लालच आ घेरता है और मौका मिलने पर उन्हें स्वयं को रोकने का प्रयास करना पड़ता है, अर्थात् “संकल्पशक्ति” का सहारा । “नहीं, यह गलत है; मुझे यह नहीं करना चाहिए”, और “अरे नहीं, फायदे को छोड़ना बेवकूफी है; नैतिकता-वैतिकता सब दकियानूसी बातें हैं; डरते हैं लोग इसलिए ऐसा कहते हैं” जैसे विरोधी भावों के बीच उन्हें झूलना पड़ता है । अंत में वे इधर या उधर, किसी एक निर्णय पर पहुंचते हैं । कहा जाता है कि जिसकी “इच्छाशक्ति” बलवती होती है वह प्रलोभन से बच निकलता है

अब सवाल उठता है कि वह कौन-सी बातें हैं जो इस इच्छाशक्ति अथवा “संकल्पशक्ति” को प्रभावित करती हैं । मेरे ध्यान में प्रमुखतया तीन बातें आ रही हैं । प्रथम है अंतःकरण । अंतःकरण की बातें सर्वत्र कही जाती हैं । हम सभी यह मानते हैं कि यही अंतकरण व्यक्ति को अनुचित से उचित, अकर्तव्य से कर्तव्य, अनैतिक से नैतिक की ओर ले जाता है । क्या हर व्यक्ति अंतःकरण से प्रेरित होकर अपने को अनुचित से बचाता है ? क्या अंतःकरण सदैव, सबके मामले में समान रूप से प्रभावी रहता है ? कदाचित् नहीं । मैं समझता हूं कि अंतःकरण जैविक गुण के रूप में व्यक्ति को जन्मना प्राप्त होता है । कुछ जन जन्म से ही वैचारिक दृष्ट्या अत्यंत मजबूत होते हैं, अधिकतर नहीं । पारिवारिक पृष्ठभूमि, परिवेश, अनुभवों और अध्ययनों, आदि से यह अधिकाधिक पुष्ट या दुर्बल होता होगा ऐसा सोचना है मेरा ।

द्वितीय है विवशता का अभाव । मैं समझता हूं कि कुछ परिस्थितियां मनुष्य को विवश कर देती हैं अनुचित कर बैठने के लिए । जैसे किसी व्यक्ति के साथ ऐसी स्थिति पैदा हो कि उसका परिवार भूखा रहने को मजबूर हो जाए, तब प्रलोभन से बच पाना उसके लिए अत्यंत कठिन होगा । वह आगे बढ़कर अवसर का लाभ ले लेगा । सामान्य परिस्थितियों में वह जो न करता वह कर बैठेगा । उसे आत्मग्लानि भी अनुभव हो सकती है, किंतु अंततः परिस्थितियों को दोष देकर संतुष्ट हो लेगा । कहने का तात्पर्य है कि विवशता का न होना आत्मसंयम में सहायक होता है ।

और तृतीय है भय, जो मेरी दृष्टि में सर्वाधिक महत्त्व का है । ऐसा हो सकता है कि मनुष्य के समक्ष कोई विवशता न हो, उसका अंतःकरण भी उसे न रोके, तो भी प्रलोभन से वह बचा रहे । देखा जाता है कि किसी एक या दूसरी तरह का भय उसे प्रलोभन में पड़ने से रोक लेता है । यह भय कई प्रकार का हो सकता है । एक भय तो प्रतिष्ठा खो बैठने का है । मेरी ओर लोगों की उंगलियां उठेंगी यह सोचकर वह स्वयं को रोक लेता है । कभी बदनामी को एक असह्य सजा के रूप में देखा जाता था । दुर्भाग्य से इस प्रकार के भय की भावना अब समाज में नियम स्वरूप नहीं रह गया है; वह अपवाद बन चुका है । दूसरा भय है कानून का । व्यक्ति को यह भय सता सकता है कि वह प्रलोभन में पड़कर जो अनुचित लाभ हासिल करेगा उसकी भारी कीमत उसे चुकानी पड़ेगी । अतः जोखिम उठाना बुद्धिमत्ता नहीं होगी ऐसा विचार उसके मन में घर कर सकता है ।

लोभ-लालच, उसका अभाव, और उस पर नियंत्रण, आदि की बातें अपने समाज में सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार के संदर्भ में बहुत अहमियत रखती हैं । हमारे समाज में उस वर्ग का आकार नित्यप्रति बढ़ता जा रहा है जो लालच में आकर कुछ भी करने को तैयार है । कहा जाना चाहिए कि उनका अंतःकरण मर चुका है । उनके लिए आत्मग्लानि जैसी चीज बेमानी हो चुकी है, और इस बात की भी कोई अहमियत नहीं रह गयी है कि अन्य जन उनके बारे में क्या सोचते हैं । वस्तुतः स्थिति उलट-सी गयी है । अब लोग ऐसे व्यक्ति के दुस्साहस की सराहना करने लगे हैं, न कि उसकी आलोचना । उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा घटती नहीं, बढ़ती है, जो ऐनकेन प्रकारेण दौलत अर्जित कर लेता है ।

कानून का भय अवश्य कारगर हो सकता, किंतु मौजूदा हालात में हैसियत वालों को पूरा भरोसा हो चला है कि कानून का शिकंजा उनके लिए नहीं । वह तो केवल कमजोर व्यक्ति को ही दंडित करेगा । समर्थ व्यक्ति आश्वस्त रहता है कि लोगों की फौज उसके समर्थन में जुट जायेगी, कि मुंहमांगी रकम पर पहुंचे हुए अधिवक्तागण उसे बचाने का रास्ता खोज लेंगे, और अंततः उसे कोई दंड नहीं दिया जायेगा । वर्तमान न्यायिक व्यवस्था की असफलता या निष्प्रभाविता को देखते हुए कोई भी भरोसे से कह सकता है कि ‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं’

तब आत्मनियंत्रण, इच्छाशक्ति या “संकल्पशक्ति”, जो भी नाम दें, की उम्मींद कहां रह जाती है ? – योगेन्द्र जोशी

‘द न्यू साइंस अव् टेम्टेशन’ अर्थात् प्रलोभन का नवीन विज्ञान, और भ्रष्ट आचरण” पर एक विचार

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