लाइलाज जलवायु परिवर्तन, कोपनहेगन शिखर सम्मेलन, तथा विस्तार अमेरिकी जीवनशैली का

संप्रति सारा विश्व तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहा है, किंतु जो समस्या सर्वाधिक महत्त्व की मानी जा रही है, और जिसे हर देश के लिए चिंता का विषय बताया जा रहा है वह है जलवायु परिवर्तन की बात । पिछले दो-तीन दशकों से वैज्ञानिक दावा करते आ रहे हैं कि मानव-सक्रियता के कारण धरती की सतह पर आवरण रूप में स्थिर वायुमंडल शनैःशनैः गरमाता जा रहा है और उसके फलस्वरूप जलवायु का वैश्विक प्रतिमान (पैटर्न) बदल रहा है । उनके अनुसार आने वाले समय में कई समस्याओं से मानव जाति को जूझना पड़ेगा, और यदि समय रहते समुचित कदम न उठाए गये तो स्थिति बेकाबू हो सकती है । और तब संभव है कि मानव जाति के लिए अपना अस्तित्व ही बचा पाना कठिन हो जाए ।

अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का उपयोग करते हुए मैं स्वयं पिछले तीन-चार सालों से इस विषय का अध्ययन कर रहा हूं । विज्ञानियों के द्वारा दिए जा रहे तर्क, उपलब्ध आंकड़ों की उनके द्वारा की जा रही समीक्षा और प्रस्तुत किये जा रहे निष्कर्षों को समझ पाना मेरे लिए स्वाभाविक रूप से सरल है । मैं उनकी समीक्षा-विधि में विश्वास करता हूं और मानता हूं कि जानबूझ कर विषय के साथ छेड़छाड़ करके भ्रम फैलाने का वे प्रयास नहीं कर रहे हैं । मुझे यह भी ज्ञात है कि विज्ञानियों और आम लोगों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस जलवायु परिवर्तन की बात को सिरे से खारिज करते हैं । काश, उनका मानना सच हो जाता और मानव जाति सुख से विकास की राह पर चलती रहती । विषय की जो समझ मैंने इस बीच हासिल की है उसके आधर पर मैं यही महसूस करता हूं कि मुद्दा गंभीर है, वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, और जलवायु प्रतिमान (पैटर्न) वाकई बदल रहा है, जो कालांतर में पूरे प्राणिजगत् के लिए घातक सिद्ध हो सकता है ।

जलवायु परिवर्तनः ग्रीन-हाउस गैसें

मेरा इरादा इस स्थल पर जलवायु परिवर्तन के कारणों तथा उस पर नियत्रण पाने के तरीकों की व्यापक चर्चा करने का नहीं है । मुझे उन कुछ ज्ञातव्य तथ्यों का जिक्र करना है जिनकी ओर सामान्यतः ध्यान नहीं जाता है, या जिन्हें हल्के-फुल्के में लेकर भुला दिया जाता है । वांछित समाधान खोजते वक्त इन तथ्यों पर भी नजर डालनी चाहिए ऐसा मेरा मत है । अपनी बातें मैं यह कहते हुए आरंभ करता हूं कि कथित जलवायु परिवर्तन के लिए ‘ग्रीन-हाउस गैसें’ जिम्मेदार हैं, जिनमें ‘कार्बन डाई-ऑक्साइड’ प्रमुख है । दरअसल अभी पूरी जिम्मेदारी इसी पर थोपी जा रही है । वस्तुतः इस गैस से कहीं अधिक प्रभाविता वाली गैसें हैं ‘मीथेन’, ‘नाइट्रस ऑक्साइड’, ‘क्लोरोफ्लोरोकार्बन या संक्षेप में सीएफसी’, एवं ‘ओजोन’ । किंतु इनकी मात्रा वायुमंडल में अपेक्षया काफी कम है, उस मात्रा में बीतते समय के साथ कोई विशेष वृद्धि नहीं देखी जा रही है, और ये काफी हद तक वायुमंडल में एक प्रकार से संतुलन की अवस्था में हैं । इसके विपरीत करीब 200 वर्ष पहले आरंभ हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से वायुमंडलीय कार्बन डाई-ऑक्साइड की मात्रा में लगातार वृद्धि देखी गयी है । इसकी मात्रा प्राग्-औद्योगिक काल से अब तक तीस-पैंतीस प्रतिशत बढ़ चुकी है (पहले के 280 पीपीएम से इस समय के 387 पीपीएम तक; पीपीएम माने पार्ट्स पर मिलियन, अर्थात् समस्त वायुमंडलीय गैसों के 10 लाख हिस्सों में कितने हिस्से इस बात की माप) । इस वृद्धि के मूल में है जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम, एवं ‘नैचतल गैस’) का मनमाना प्रयोग, जिन पर मानव जाति अपनी प्रायः संपूर्ण ऊर्जा जरूरतों के लिए आश्रित है और जो इस्तेमाल किये जाने पर वायुमंडल में कार्बन डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं । अन्य ऊर्जा-स्रोतों का उपयोग वैश्विक स्तर पर बमुश्किल करीब पंद्रह प्रतिशत है । कार्बन डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन को संक्षेप में ‘कार्बन उत्सर्जन’ (carbon emission) नाम भी दिया गया है ।

इतना और बता दूं कि वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार यदि इस शताब्दि के अंत तक ‘कार्बन प्रदूषण’ यानी कार्बन डाई-ऑक्साइड प्रदूषण की वृद्धि 480 पीपीएम तक सीमित रहे तो भी कथित तापमान में करीब 2 डिग्री का इजाफा होगा । बढ़ रहे इस तापमान से जुड़े हैं सागरों के जलस्तर का ऊपर उठना, जिसका मतलब है तटीय क्षेत्रों की भूमि का जलप्लावित होना तथा छोटे द्वीपों का सागरों में समा जाना । बढ़ते तापमान के साथ नदियों के स्रोत ग्लेशियरों का पिघलकर सिमटना या लुप्त हो जाना । तब विश्व की कई नदियां करीब-करीब सूख जायेंगी । इसके अतिरिक्त जलवर्षा का स्वरूप भी बदलना, कहीं अतिवर्षण तो कहीं सूखे की स्थिति, आंधी-तूफानों की संख्या एवं उनकी तीव्रता में भी इजाफा । इसी प्रकार के कई प्रभाव देखने को मिलेंगे । उम्मीद की जाती है कि दो डिग्री की तापमान वृद्धि तक हालात संभल सकते हैं, किंतु उसके आगे संभव है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर ही हो जाए ।

कोपनहेगन शिखर बैठक

इस कार्बन प्रदूषण की समस्या का समाधान खोजने में अब विश्व के वैज्ञानिक तथा राजनेता जुट गये हैं, किंतु राजनेताओं की एकजुटता संदेहास्पद है । समाधान खोजने का औपचारिक प्रयास 1997 के ‘क्योटो नयाचार या प्रोटोकॉल’ से आरंभ हुआ और बीच में समय-समय पर आयोजित विभिन्न बैठकों/सम्मेलनों के पश्चात् ‘कोपनहेगन शिखर सम्मेलन’ (COP 15, Dec 7-18) के रूप में आजकल देखने को मिल रहा है ।

विश्व के विभिन्न देश कार्बन प्रदूषण कम करने के लिए सार्थक जिम्मेदारी उठाने के लिए राजी होवें इस आशय से उक्त शिखर-सम्मेलन आयोजित किया गया है । कौन कितना प्रदूषण कम करे इस पर बहस चल रही है । अलग-अलग गुटों में बंटे ये देश अलग-अलग कार्यसूची यानी एजेंडा पेश कर रहे हैं । प्रदूषण की अधिकतम सीमा क्या हो इस पर भी मतभेद है । जहां विकासशील देश 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के मद्देनजर इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विकसित देश प्रदूषण में सर्वाधिक कटौती की जिम्मेदारी लें, क्योंकि वे ही आज के चिंताजनक हालात के लिए उत्तरदायी हैं, वहीं विकसित देश, खासकर अमेरिका, सभी के लिए लगभग समान जिम्मेदारी की बात कर रहे हैं । कई जानकार लोगों को शंका है कि यह सम्मेलन अपने उद्येश्य में सफल नहीं हो पायेगा । अंततोगत्वा क्या होने जा रहा है इसके लिए कल यानी 18 तारीख तक इंतजार करना पड़ेगा ।

जब मुझसे कोई पूछता है कि यह समस्या सुलझ पायेगी कि नहीं, तब मेरा उत्तर साफ ‘नहीं’ रहता है । बहुत कुछ किया जा सकता है, किंतु करेगा कौन ? सिद्धांततः जो हो सकता है मैं उसकी बात करना बेमानी समझता हूं । जिन तरीकों को दुनिया अमल में लाने को तैयार ही न हो उन तरीकों की बात ही क्यों की जाये ? जलवायु परिवर्तन की समस्या को सुलझाना उतना ही कठिन है जितना अपने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाना । यह समस्या उतनी ही लाइलाज है जितना किसी रुग्ण शराबी का इलाज करना जो शराब छोड़ने को ही राजी न हो पर जिसे बारबार शराब छोड़ने की सलाह दी जा रही हो । मैं पूछता हूं कि क्या आप अपनी कार/बाइक कबाड़खाने में पटककर पैदल या बाइसिकिल से चलने-फिरने को राजी हैं ? यदि नहीं, तो समस्या या कोई हल नहीं है । मेरी बात आपकी समझ में आ जाएगी जब आप अधोलिखित बात पर गौर करें ।

विसंगतिः कोसना अमेरिका को और अपनाना उसकी जीवन शैली

वायुमंडल में व्याप्त कार्बन प्रदूषण के लिए सबसे अधिक अमेरिका, यानी दुनिया का सर्वाधिक ताकतवर देश यू.एस.ए., को ठहराया जाता है । बात भी सही है । तीन-चार साल पहले तक अमेरिका कार्बन उत्सर्जन के मामले में पहले स्थान पर था और उसके विश्व भर के उत्सर्जन का एक-तिहाई के लिए वही जिम्मेदार था । एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार अब चीन ने ‘बाजी’ मार ली है और दोनों देश मिलकर विश्व के कुल उत्सर्जन का करीब पचास प्रतिशत उत्सर्जन कर रहे हैं (देखें अलग-अलग देशों के कार्बन उत्सर्जन के आंकड़े) । प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की अगर बात करें तो अमेरिका अभी भी आस्ट्रेलिया के बाद शीर्ष पर है और चीन की तुलना में उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन करीब 4 गुना अधिक है और भारत से करीब 17 गुना अधिक । धान दें कि चीन की जनसंख्या अमेरिका से करीब 4.5 गुना अधिक है, अतः उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम ठहरता है । दरअसल मौजूदा कार्बन प्रदूषण के लिए अमेरिका तथा उसके साथ-साथ अन्य विकसित राष्ट्र जिम्मेदार रहे हैं, जिन्होंने ऐसी जीवन शैली अपना डाली जो जीवाश्म इंधनों की अंधाधुंध खपत पर आधारित रही है । अमेरिका ने विकास का एक ऐसा मॉडल दुनिया के सामने रख दिया जिसकी चकाचौंध सबको अंधा कर गई और सभी उस माडल को अपनाकर ‘अमेरिका जैसा’ बनने निकल पड़े । अब जब उस विकास के कुप्रभाव नजर आने लगे हैं तो सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो चले हैं ।

विडंबना यह है कि जिस अमेरिका की भोगवादी संस्कृति की आलोचना की जाती है और जिस अमेरिका में रोजमर्रा की जिंदगी में ऊर्जाखाऊ मशीनों का ही बोलबाला है, उसी अमेरिका के जैसा बनने की चाहत में सभी देश प्रयत्नशील हैं । विकासशील देश चाहते हैं कि उनके यहां भी आठ-आठ लेन की सड़कें हों, उन सड़कों पर दौड़ाने के लिए हर व्यक्ति के पास अपनी निजी कार हो, सभी के लिए हवाई यात्रा करना सुलभ हो, हर व्यक्ति वातानुकूलित घर में रहे, हर घर में कपड़े धोने-सुखाने तथा बर्तन मांजने की मशीनें लगी हों, हर घर में हफ्ते-हफ्ते भर के लिए ‘फ्रोजन-फूड’ एवं अन्य भोज्य पदार्थ भंडारित करने के लिए भारी-भरकम फ्रिज हो, असीमित खर्चें के लिए बिजली की चौबीसों घंटे की निर्बाध आपूर्ति हो, इत्यादि-इत्यादि । ‘लिस्ट’ लंबी है । अमेरिकी जीवन-शैली का सार्थक वर्णन दो-चार वाक्यों में संभव नहीं है । इस बारे में अलग से फिर लिखूंगा । इतना सब कहना आवश्यक है यह बताने के लिए जिस अमेरिकी जीवन-शैली को विकासशील देश अपनाना चाहते हैं वह सब बिना जीवाश्म इंधनों के अभी संभव नहीं है । ऊर्जा के अन्य स्रोत अभी पर्याप्त मात्रा में जुटा पाना आसान नहीं है । इस बारे में अतिआशावाद दिखाना मूर्खता होगी । अतः अगर विकसित देश अपनी जीवन-शैली बदलने को तैयार नहीं और विकासशील देश उसी जीवन-शैली के पीछे भाग रहे हों, तो कार्बन उत्सर्जन तो होते ही रहना है । विकसित होना हो, और वह भी तेजी से, तो उत्सर्जन की चिंता छोड़नी पड़ेगी । तब भला समाधान कहां है ?

जीवन-शैली बदलने की बात खुलकर और पूरे जोर से कोई नहीं कर रहा है । सर्वत्र वैकल्पिक विधियों और अधिक उन्नत दर्जे की तकनीकी विकसित करने की बातें की जा रही हैं । क्या वाकई में वह सब कर पाना सरल और फलदायी होगा ? इस विषय पर अधिक चर्चा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

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