पद्म पुरस्कार, राष्ट्रमंडल खेल, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, बहुत कुछ और भी

26 जनवरी? गणतंत्र दिवस?

अपने देश का गणतंत्र दिवस, अर्थात् 26 जनवरी, कल बीत चुका । इस दिन स्कूली बच्चों को मिठाई खाने को मिलती है, अतः स्वाभाविक है कि उनके लिए यह एक खास खुशी का दिन होता है । इसके अलावा क्या महत्त्व है इस दिन का मैं समझ नहीं पाता । झंडोत्तोलन एवं उसके साथ भाषणबाजी, तथा दिल्ली में इंडिया गेट के पास जश्न मनाने के अलावा क्या कुछ सार्थक भी होता है इस दिन ? मैं इस दिन को ईद-क्रिसमस-होली जैसे त्योहार या बुद्ध-नानक-अंबेडकर जैसी जयंती के तौर पर नहीं देख पाता हूं । मेरी दृष्टि में यह दिन आत्मावलोकन तथा कल के लिए संकल्प लेने का दिन है । किंतु कहीं कोई संकल्प नहीं दिखता । इसके पहले और इसके बाद का इस देश का हर दिन यथावत् गुजरना है यह मैं भली भांति जानता हूं । मुझे कहीं भी संतोष तथा उत्साह का आधार नहीं दिखता है, इसलिए निराशा का अनुभव होता है । मैं देशवासियों से अपनी इस निराशा और उसकी अभिव्यक्ति के लिए क्षमा-याचना करता हूं । मैं अपनी निराशा पर लगाम लगा नहीं सकता; यह मेरी मजबूरी है । परंतु देशवासियों की खुशी, आशा और उत्साह के लिए उन्हें बधाई तथा शुभाकांक्षाएं प्रेषित अवश्य करता हूं ।

मेरी निराशा के अनेकों कारण हैं । उनका विस्तार से वर्णन करना मेरे लिए संभव नहीं, किंतु कुछएक बातें जो बस आजकल में मुझे देखने-जानने को मिलीं उन्होंने मुझे विचलित अवश्य किया है । क्या इस विशाल राष्ट्र के नागरिकों को मालूम भी है कि 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस का मतलब क्या, क्यों और कब से है ? बहुतों को नहीं मालूम ! होली-ईद आदि सबके लिए माने नहीं रखते, लेकिन 26 जनवरी एवं 15 अगस्त तो हर नागरिक के पर्व हैं । पर ऐसा वास्तव में है नहीं । बीते इसी दिन एक समाचार चैनल (टीवी) पर मेरी निगाह पड़ी तो देखा कि उसमें इस जानकारी के बाबत कार्यक्रम बना रही प्रस्तोता दिल्ली पुलिस के कांस्टेबलों/उपनिरीक्षकों/निरीक्षकों के उत्तर एकत्रित कर रही थीं । पूछे गये प्रश्नों के जवाब ? मत पूछिए ! कइयों को पता नहीं । कोई बगलें झांक रहा है, तो कोई उल्टा-सीधा उत्तर दे रहा है, और कोई तो उत्तर के लिए अधिकारियों से बात करने को कहता है, गोया कि कोई गुप्त बात पूछी जा रही हो । प्रस्तोता ने आगे लखनऊ पुलिस के हाल दिखाए – और भी बदतर । शेष कार्यक्रम देखने की मेरी हिम्मत नहीं रही; टीवी ऑफ कर दिया । जब पुलिस के जवानों के ये हाल हों तो आम जन की स्थिति क्या होगी ?

राष्ट्रीय सम्मान: पद्म-पुरस्कार

बीते 26 जनवरी को देश के सर्वोच्च सम्मान के प्रतीक पद्म-पुरस्कार भी वितरित किये गये ‘सुयोग्य’ व्यक्तियों को । सुयोग्य ? क्या परिभाषा है इस योग्यता का ? सदा की भांति ये पुरस्कार भी विवादों से घिरे हैं । सर्वाधिक विवादास्पद कदाचित् एनआरआई संत सिंह चटवाल का है जिसे पद्मविभूषण या पद्मभूषण से लोक कार्य (पब्लिक अफेअर्स) हेतु नवाजा गया है । क्यों, कौन हैं ये चटवाल साहब, क्या है इनके योगदान ‘लोक कार्य’ इस देश के भीतर ? मीडिया की खबरों से उनकी ‘योग्यता’ का पता मुझे नहीं चला पाया । आप में से शायद कोई जानता हो । ये अप्रवासी भारतीय हैं और अमेरिका में होटल व्यवसाय में संलग्न हैं । उनके व्यवसाय का इस देश से क्या लेना-देना ? और ऐसे अप्रवासी भारतीय व्यवसायी अनेकों हैं । इन पर कुछ समय पूर्व 90 लाख डालर के बैंक घोटाले में संलिप्तता का आरोप लगा था और ये पकड़े भी गये । बाद में इन्हें रिहा कर दिया गया । केस पूरी तरह बंद हो चुका या अभी उसमें कुछ बचा है मालूम नहीं । कुछ भी हो विवादास्पद एवं धूमिल छवि वाले को पुरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए । यह माना जा रहा है कि पद्म-पुरस्कार समिति में कोई प्रभावशाली व्यक्ति रहा है जिसने इनका नाम येनकेन प्रकारेण ‘घुसेड़ा’ है । आश्चर्य नहीं है, प्रभावशालिता इस देश में कुछ भी अनर्थ करा सकती है ।

पुरस्कार के लिए चयनित नामों में एक नाम श्री जानकी बल्लभ शास्त्री का भी था, साहित्य तथा शिक्षा में योगदान के लिए । शास्त्री जी बिहार के वयोवृद्ध वरिष्ठ लेखक बताये जाते हैं । उन्होंने पुरस्कार स्वीकारने से मना कर दिया, यह कहते हुए कि जीवन के इस पड़ाव पर इतने लंबे इंतजार के बाद मिले पुरस्कार को स्वीकारने का कोई औचित्य नहीं है । बात भी सही है । कुछ लोगों को जिंदगी भर के योगदान के बाद पुरस्कार मिलता है, तो खेल तथा अभिनय के क्षेत्रों में पहली-दूसरी कामयाबी पर ही पुरस्कारों की झड़ी लगा दी जाती है । क्रिकेट तो जैसे देश की जान हो । अजब है इस देश का रवैया । आगे इतना और कि पिछले 2008 के ओलंपिक खेलों के कांस्य पदक विजेता सुरेन्दर कुमार (नाम लेने में गलती तो नहीं ?) ने भी पद्म की आस लगाई थी । उसने कहा कि कई अन्य खिलाड़ी ये पुरस्कार पा चुके हैं, जब कि वे उससे अधिक ‘योग्य’ नहीं थे और न ही वरिष्ठ । उसने देश की सरकार से जानना चाहा है कि पुरस्कारों के लिए नामों का चयन होता कैसे है ?

पुरस्कारों का चयन होता कैसे है ? अखबार में मैंने पढ़ा था कि पुरस्कारों के लिए केंद्र सरकार एक समिति गठित करती है, जिस के पास विभिन्न राज्य सरकारें, स्वयंसेवी संगठन, संसद सदस्य आदि ‘योग्य’ व्यक्तियों के नामों की संस्तुति करके भेजते हैं । इतना सब तो ठीक लगता है, लेकिन समस्या यह है कि समिति इन नामों के अतिरिक्त अपनी मनमर्जी से किसी का भी नाम पुरस्कृत नामों की सूची में डाल सकती है । यहीं पर आकर समिति की कार्यशैली संदेहास्पद हो जाती है । किस आधार पर कोई नाम चुना जाता है, सुयोग्यता का आकलन किस आधार पर करती है समिति, किन विशेषज्ञों से राय ली जाती है, इत्यादि प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं । लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाले देश में अपारदर्शिता तथा मनमर्जी को क्षम्य नहीं माना जा सकता ।

पुरस्कारों के नाम पर मुझे विश्व-विख्यात ‘नोबेल’ पुरस्कारों पर ध्यान जाता है । अक्टूबर मास में घोषित इन पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया पूरे साल चलती है । तमाम स्रोतों से नाम आमंत्रित किए जाते हैं और व्यक्तियों की योग्यता का आधार पूछा जाता है । नोबेल समिति अपनी ओर से तमाम सावधानियां बरतती है । हर विषय के विशेषज्ञों के दल का सहारा लिया है, तब जाकर नाम चुने जाते हैं । कठोर प्रक्रिया के बावजूद कभी-कभी वहां भी विवाद उठ खड़ा होता है । और अपने यहां ? पुरस्कार कैसे तय होते हैं यही स्पष्ट नहीं हो पाता ।

(अधिक जानकारी के लिए देखें –
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6134141.html
http://beta.thehindu.com/news/national/article94840.ece
http://www.aromaticflavors.com/padma-awards-did-sant-singh-chatwal-use-influence-to-find-place-list-of-awardees/)

आगामी राष्ट्रमंडल खेल

खेलों की बात पर मेरा ध्यान देश में होने वाले आगामी राष्ट्रमंडल खेलों पर जाता है । खेदजनक खबर है कि ‘राष्ट्रमंडल खेल परिसंघ (कॉमनवेल्थ गेम्ज फेडरेशन) के वेबसाइट पर प्रदर्शित मानचित्र में कश्मीर तथा गुजरात के कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान में दिखाया गया है । ये खेल इस बार भारत में आगामी अक्टूबर माह में होने हैं, लेकिन दिल्ली में बैठी संबंधित आयोजन समिति को इस चूक का पता ही नहीं । देश के प्रति चिंता तथा समर्पण के ये हैं हाल । इन खेलों के आयोजन के लिए आवश्यक ढांचागत तैयारी की असंतोषजनक स्थिति पर भी सवाल उठते रहे हैं । परिसंघ के कार्याधिकारी माइक हूपर (Mike Hooper) भी एक बार असंतोष प्रकट कर चुके हैं । ये खेल सफलतापूर्वक संपन्न हो भी पाएंगे इस बात पर कई जनों को संदेह है । आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहे (सच है यह, या एक मजाक?) इस देश के लिए जब यही आयोजन भारी पड़ रहा हो तब सोचिए कि ओलंपिक आयोजित कर सकते हैं हम कभी ?

(अधिक जानकारी के लिए देखें –
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Commonwealth-Games-map-shows-JK-Gujarat-in-Pak/articleshow/5502129.cms
http://www.zeenews.com/news599091.html)

केंद्रीय मंत्रालय

मैं विषय बदलता हूं । इधर कन्या भ्रूण-हत्या के प्रति जनजागरण के लिए तैयार महिला एवं बालविकास मंत्रालय के एक विज्ञापन ने भी विवाद खड़ा कर दिया है । उस विज्ञापन में एक स्थान पर कपिलदेव की तस्वीर है तो दूसरी जगह पाकिस्तान के एक पूर्व फौजी अधिकारी, तनवीर महमूद अहमद की तस्वीर छपी है । सवाल उठता है कि यह तस्वीर किस आधार पर चुनी गयी ? किसकी तस्वीर है यह क्या संबंधित लोगों को मालूम ही न था ? मंत्रालय के किसी व्यक्ति ने ध्यान ही नहीं दिया ? उसे अपने ही एक फौजी की तस्वीर मान लिया गया ? आम आदमी की तस्वीर लगाने का इरादा तो मंत्रालय का रहा नहीं होगा; किसी रिक्शा चलाने या ईंटा ढोने वाले की तस्वीर में तो दिलचस्पी नहीं होगी । अवश्य ही प्रतिष्ठित चेहरे (जैसे कपिलदेव) की जरूरत रही होगी । खैर, भूल हुई, लेकिन मंत्री महोदया सुश्री कृष्णा तीरथ इस पर खेद जताने के बजाय ‘तो क्या हुआ, संदेश तो सही जा रहा न ?’ कहने लगीं । उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ् आडियो-विजुअल पब्लिसिटी, डीएवीपी, को ही जिम्मेदार ठहरा दिया । अंत में प्रधानमंत्री कार्यालय ने हस्तक्षेप किया । बताया जा रहा है कि अब निचले स्तर के किसी कर्मचारी को बतौर बलि के बकरे को तलाशा जा रहा है ।

(अधिक जानकारी के लिए देखें –
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6132016.html)

चर्चा में तो आजकल सबसे अधिक शरद पवार हैं जो कृषि मंत्रालय का भट्टा बैठाने पर तुले हैं खाद्य-सामग्री की बढ़ती कीमतों पर ‘वाहवाही’ लूट रहे हैं । आम आदमी की दिन भर की कमाई भोजन जुटाने में ही खर्च हो जा रही है । परंतु उस तकलीफ का एहसास सत्तासीन लोगों को हो सके तब न ? जिनकी आमदनी लाखों में हो उनके लिए आटा पचास रुपये किलो भी हो जाय तो क्या फर्क पड़ता है ? पवार साहब ने जिन्दगी में कभी गेहूं-धान की बाली भी देखी होगी मुझे शंका है, किंतु कृषि नीति जरूर नियंत्रित करते हैं । इधर विदेश मंत्री श्रीमान् कृष्णाजी भी चर्चा में रहते हैं, किंतु उनसे आगे श्री शशि थरूर हैं जो अमेरिका स्थित यूएनओ कार्यालय की कार्यशैली के रंग में यूं रंगे हैं कि भूल गये कि वे इस देश के धुप्पल में बन गये राज्यमंत्री हैं । अधिक कहना बेमानी है ।

कहानी खतम नहीं हुई । कहने को बहुत कुछ और भी है, अपने ‘विफल गणतंत्र’ को लेकर । लेकिन आज के लिए इतना काफी है । आगे की बातें आगे की पोस्टों में । (आप विफल कहने पर बिफरेंगे जरूर, पर आकलन तो अपना-अपना है भई, क्या करें ?) – योगेन्द्र जोशी

पद्म पुरस्कार, राष्ट्रमंडल खेल, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, बहुत कुछ और भी” पर एक विचार

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s