अमेरिकी नागरिक अल-औलकी की राष्ट्रविरोधी गतिविधि और सी.आइ.ए. की ‘किल लिस्ट’ – एक विचारणीय मुद्दा

न्यू यॉर्क टाइम्स समाचारपत्र में छपी एक खबर के अनुसार अमेरिका में एक बहस छिड़ी है कि अगर कोई नागरिक अपने ही देश के विरुद्ध युद्ध छेड़ दे तो क्या उसे वैसे ही मौत के घाट उतार दिया जाना चाहिए जैसे आप सीमा पर लड़ने आए शत्रु देश के सैनिक को गोली से उड़ा देते हैं । इस बहस का संबंध अमेरिकी नागरिक अनवर अल-औलकी (Anwar al-Awlaki) से है, जिसको किसी कानूनी प्रक्रिया अपनाए बिना मौत के घाट उतारने का अधिकार अमेरिकी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (National Security Council) की सलाह पर सुविख्यात जांच एजेंसी सी.आई.ए. (C.I.A.) को दिया है । मौका मिलते ही जिन्हें मौत दे दी जाए ऐसे लोगों की एक लिस्ट ‘किल लिस्ट’ (Kill List) के नाम से सी.आई.ए. के पास रहती है ।

कौन है यह अल-औलकी ? अनवर अल-औलकी न्यू मेक्सिको में सन् 1971 में जन्मा एक अमेरिकी नागरिक है, जिसने इंजिनियरिंग की औपचारिक शिक्षा के साथ इस्लाम धर्म का ज्ञान अर्जित करके कैलिफोर्निया एवं वर्जीनिया राज्यों में इस्लामी धर्मगुरु (मौलवी) का कार्य किया । अंग्रेजी तथा अरबी भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले अल-औलकी के धार्मिक भाषण प्रभावोत्पादक बताए जाते हैं । अमेरिकी मुस्लिम घरों में उसके भाषणों की सीडी लोकप्रिय रही हैं । कहा जाता है कि किसी समय वह हंसमुख, मिलनसार और धार्मिक मामलों को लेकर उदार दृष्टिकोण रखते वाला इंसान था । न्यू यॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की सन् 2001 की घटना पर उसने तब एक धार्मिक प्रवचन में यह प्रतिक्रिया व्यक्त की थी:
“हम यहां निर्माण के लिए आये हैं, न कि विध्वंश करने । हम अमेरिका और विश्व के एक अरब इस्लामधर्मी लोगों को जोड़ने वाले पुल के माफिक काम करने आये हैं ।”

उस समय वह इस बात का हिमायती था कि अमेरिकी मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वह विश्व मुस्लिम समाज को अमेरिका के प्रति सहयोगात्मक एवं सकारात्मक रवैया अपनाने के लिए प्रेरित करे; उन्हें अमेरिका में रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए; इत्यादि इत्यादि । लेकिन विगत करीब 9 वर्षों में ही उसकी विचारधारा उलट गयी और वह अब अमेरिका के विनाश के लिए समर्पित एक आतंकी बन चुका है । अतिवादी वेब साइटों पर कथित तौर पर प्रकाशित उसके वर्तमान् विचार कुछ यों हैं:
“समूचा अमेरिका एक दुष्ट राष्ट्र बन चुका है । अब मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका हूं कि मेरे लिए अमेरिका के विरुद्ध जिहाद छेड़ना निहायत ज्रूरी है, ठीक वैसे ही जैसे हर सक्षम मुस्लिम का यह कर्तव्य है ।”

कहा जाता है अल-औलकी के अतिवाद के पीछे अमेरिका की वह नीति है जिसके तहत उसने इराक तथा अफगानिस्तान के मुस्लिमों पर खुलेआम हमला किया । पाकिस्तान तथा यमन के मुसलमानों को भी उसने छिपे तौर पर ‘परेशान’ किया हुआ है ।

अल-औलकी पर तब से नजर रखी जा रही थी जब से सेना के मनःचिकित्सक मेजर निडाल मलिक हसन से उसके संबंध प्रकाश में आये । हसन पर नवंबर 2009 में 13 लोगों की जान लेने का आरोप है । तदनंतर उसके संबंध उमर फारूक अब्दुल-मुतल्लब से भी पाये गये, जिस पर विगत दिसंबर में डेट्रॉयट के लिए तैयार एक हवाई जहाज को उड़ानें की साजिश का आरोप है । अभी हाल में टाइम्स स्क्वायर (Times Square) को विस्फोटकों से उड़ाने के प्रयास में फैजल शहजाद नामक पाकिस्तानी मूल का अमेरिकी पकड़ा गया था; उसने भी स्वीकारा है कि अल-औलकी के उग्रवादी विचारों से प्रेरित होकर ही उसने जिहाद की दिशा में कदम बढ़ाये हैं ।

संप्रति अल-औलकी अरब मुल्क यमन में रह रहा है । आतंकवाद के खात्मे में प्रयत्नशील अधिकारियों को कहना है कि वह अरब देशों में अल कायदा की ओर से सक्रिय है । वह अमेरिका के तथा विदेशों में रह रहे उसके नागरिकों के विरुद्ध आतंकियों का जाल बिछाने में लगा हुआ है । उसका व्यक्तिव्य वाकई करिश्माई है । वह इंटरनेट के माध्यम से विश्व के अनेकों युवाओं को आतंकी गतिविधियों की ओर खींच रहा है ।

ओबामा शासन ने सी.आई.ए. को उसे मार गिराने की छूट देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि आम नागरिकों को उपलब्ध अमेरिकी कानूनों की मदद लेने का अल-औलकी को कोई अधिकार नहीं रह गया है । यानी वह किसी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता है । अधिकारी कहते है कि जो व्यक्ति कहे, “… it is a religious duty to attack the United States, … ” (… अमेरिका पर हमला करना धार्मिक कर्तव्य है, …) और जो हिंसा फैलाने में लगा हुआ हो उसके न्यायिक राहत कैसे दी जा सकती है ? वे कहते हैं “American citizenship doesn’t give you carte blanche to wage war against your own country,… If you cast your lot with its enemies, you may well share their fate.” (अमेरिकी नागरिकता आपको अपने ही देश विरुद्ध युद्ध छेड़ने की खुली छूट नहीं देती है ।… अगर आप शत्रुओं से जा मिलते हैं तो आपको उनके जैसे ही फल भुगतने होंगे ।)

अल-ऑलकी के मामले ने बहस छेड दी है कि एक नागरिक के क्या अधिकार होने चाहिए और उसे सजा देने से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए या नहीं ? मुद्दा गंभीर है और हर देश के लिए प्रासंगिक है । कुछ लोगों का मत है कि यमन सरकार के समक्ष अल-औलकी को पकड़ने और उसे अमेरिका के सुपुर्द करने का आग्रह किया जाना चाहिए और उस पर एक दुश्मन की भांति मुकदमा चलाकर कठोर दंड दिया जाना चाहिए । आखिर स्थापित कानूनों का सम्मान तो होना ही चाहिए । मामला घूम-फिरकर मानवाधिकार (Human Rights) से भी जुड़्ता है । कई स्वयंसेवी अमेरिका समेत तमाम सरकारों पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगाती आ रही हैं ।

लेकिन अधिकारी कहते हैं कि यह सब इतना सरल नहीं है । पता नहीं ऐसे लोगों को पकड़ने और केस चलाने में कितना समय लगे । न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर उन्हें जिंदा रहने का अवसर मिला तो वे अपने उद्येश्य में सफल हो सकते हैं । अगर हम चाहते हैं कि विश्व के विभिन्न कोनों में छिपे आतंकी दुश्मनों का यथाशीघ्र सफाया हो तो उन्हें ‘किल लिस्ट’ में रखना ही होगा । अन्यथा बारबार की आतंकी वारदातों को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा । परंतु कई नागरिक उक्त मत से असहमत हैं । वे कहते हैं कि इस प्रकार का ‘न्याय’ आतंकवाद की उग्रता को बढ़ाएगा ही ।

दरअसल हर किसी देश में कानूनी काररवाही धीमी गति से चलने वाली प्रक्रिया होती है । चूंकि मामले के प्रति न्यायालयों का दृष्टिकोण वही नहीं रहता है जो शासन का, इसलिए अक्सर आरोपी को वह दंड नहीं मिलता है जिसे शासन सही समझकर चलता है । आतंकी घटनाओं के आरोपियों में आनन-फानन में काररवाही हो और कठोरतम दंड दिया जाय कम से कम अमेरिकी शासन तो यही चाहता है । और परंपरागत न्यायिक विधि से यह उम्मींद नहीं की जा सकती है । ऐसे में सी.आई.ए. को विशेष अधिकार देकर अमेरिकी सरकार एक संदेश आतंकवादियों को देना चाहती है । और यह काम वह चोरीछिपे नहीं बल्कि खुलकर करती है ।

हमारे देश में भी जनभावना आतंकवादियों के साथ सख्ती बरतने के पक्ष में रहती है । किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकारें और न्यायालय जरूरत से अधिक उदार रवैया अपनाती हैं । यहां भी जब कभी प्रशासन कानूनी तरीके से बचना चाहता है और आरोपी को रास्ते से हटाना चाहता है तो वह भी अपना तरीका ईजाद करता है । यह रास्ता है ‘एन्काउन्टर’ का । “आरोपी तो हमला करके भाग रहा था … ” का सीधा सा वक्तव्य देकर उसको मार डालने के एकमात्र विकल्प का दावा करते हैं । वे खुलकर यह नहीं कहते कि “आरोपी को छोड़ना घातक होता, अतः उसे गोली मार दी ।”

जो काम अमेरिका में खुले सरकारी आदेश के माध्यम से किया जाता वही हमारे यहां चोरीछिपे तरीके से होता है और इस तरीके का ‘नाजायज’ प्रयोग खूब होता है । भारतीय संदर्भ में यह विचारणीय प्रश्न है कि अमेरिकी में सी.आई.ए. को दिए जाने वाले अधिकार के सदृश यहां भी क्या कुछ होना चाहिए ? या अमेरिका में जो किया जा रहा है वह वास्तव में नितांत आलोच्य, निन्द्य, तथा त्याज्य विचार है ? – योगेन्द्र जोशी

अमेरिकी नागरिक अल-औलकी की राष्ट्रविरोधी गतिविधि और सी.आइ.ए. की ‘किल लिस्ट’ – एक विचारणीय मुद्दा” पर एक विचार

  1. मेरा मानना है की हर कानून के ऊपर अपनी रक्षा का अद्धिकार हर कानून देता है. अमेरिका व्यवहारिक देश है और उस से बढ़ कर इस्राईल . अपने घोषित शत्रु ( जिसकी घोषणा स्वयं शत्रु ही कर रहा हो ) को समाप्त करना आत्म रक्षा ही है .

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s