कसाब को फांसी? नहीं, पहले अफजल को। लेकिन अफजल को फांसी देना आसान है क्या?

मामला अफजल और कसाब का

अदालत द्वारा अजमल कसाब को फांसी की सजा सुनाए जाने की बात अब चौदह-पंद्रह दिन पुरानी हो चुकी है (देखें 6 मई 2010: 2611-की-घटना…) । देश के अधिसंख्य लोग उसे जल्दी से जल्दी फांसी के फंदे पर लटकाए जाने के पक्ष में हैं । परंतु यह तो भावुकता की बात है, कानूनी प्रक्रिया तो अपनी सुस्त रफ्तार से चलती है । कसाब के लिए अभी मुंबई उच्च न्यायालय, देश के उच्चतम न्यायालय और अंत में राष्ट्रपति के दरवाजे खुले हैं । सरकार चाहे तो भी अभी उसे फांसी देने में दो-तीन साल लगने ही हैं । किंतु मामला इतना आसान नहीं है । उसके रास्ते में लोकसभा भवन पर 2001 में हुए ‘हमले’ के एक आरोपी, अफजल गुरु, की सजा का रोड़ा जो पड़ा है ।

इस देश के संविधान का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह सरकारी निकम्मेपन और हीलाहवाली के रवैए पर अंकुश लगाने में असमर्थ है । ऐसा प्रतीत होता है कि संविधान सरकारों को इस बात की छूट देता है कि वे किसी भी फाइल को दवा के बैठ जायें, उस पर धूल जमने दें, उसे ठंडे बस्ते में डाल दें आदि-आदि । यही वजह है कि फांसी की सजा पाये लोगों की एक लंबी-चौढ़ी लिस्ट देश में मौजूद है, जिनकी सजा का क्रियान्वयन वर्षों से नहीं हो पाया है । परसों टीवी चैनल पर मैंने सुना कि राष्ट्रपति महोदया के समक्ष पहले से 30 ‘दया याचिकाएं’ (Mercy Appeals) विचारार्थ पड़ी हैं, जिनमें अफजल अंतिम 30वें पर है । कसाब का नंबर (भविष्य में अपील करने पर) उसके बाद आएगा ।

सरकारी टालमटोल

अफजल और कसाब, दोनों ही, आतंकी घटना के आरोपी हैं । अभी तक केंद्र सरकार अफजल के मामले में चुप्पी साधे थी । ‘मामले को यूं ही पड़े रहने दो, जितना टल जाए उतना अच्छा’ की नीति सरकार ने अपना रखी थी । क्यों ? इसका उत्तर हमारी केंद्र और दिल्ली सरकारें ही ठीक से दे सकती हैं । मुझे तो यही लगता है कि फांसी देने की हिम्मत उनमें है नहीं । अदालत फांसी की सजा सुनाती है, सरकारें क्रियान्वयन करने से घबड़ाती हैं । उन्हें इस बात का डर सताने लगता है कि उसके बाद देश में अशांति छा जाएगी, दंगे-फसाद होने लगेंगे, पता नहीं क्या कुछ और न हो जाए, इत्यादि । और यह डर शायद अकारण नहीं है ।

मुझे लगता है कि अपने देशवासियों में यह धारणा घर कर चुकी है कि मौजूदा तथा पूर्ववर्ती सरकारें, दोनों, कमजोर रही हैं, उनमें इच्छाशक्ति का अभाव है, वे कठोर निर्णय लेने से कतराती हैं, जब तक चलता है ऐसे ही चलने दो की सुविधाजनक नीति पर चलती आ रही हैं । चाहे चीन, पाकिस्तान और अमेरिका के सामने अपनी बात मजबूती से रखने की बात हो, अथवा देश के भीतर ही सरकार में रहकर या बाहर उल्टी-सीधी हरकतें करने वाले नेता-परेताओं से सख्ती से निबटने की बात हो, हमारी सरकारें कमजोर दिखती रही हैं । कभी सत्ता खोने का डर तो कभी कानून-व्यवस्था को न संभाल पाने का भय ।

कसाब के मामले में जो जनभावना देखने को मिली उससे मौजूदा सरकार को लगने लगा कि उसकी फांसी को रोके रखने का साफ मतलब यही निकलेगा कि सरकार आतंकवाद के सामने असहाय है और आतंकियों को सजा तक नहीं दे सकती । आतंकवाद से लड़ने की उसकी बात बंदरघुड़की से अधिक कुछ और नहीं यह संदेश जनता में जा रहा है । लेकिन कसाब के पहले अफजल का मामला तो निबटे ! अब जब सरकार हरकत में आई तो बहुत कुछ साफ होने लगा । देखिए दिल्ली सरकार की हालत:

दिल्ली राज्य सरकार: हास्यास्पद रवैया

तीन रोज पहले किसी टीवी चैनल पर मैंने दिल्ली की मुख्यमंत्री महोदया, श्रीमती शीला दीक्षित, को यह कहते सुना कि “अफजल के मामले में उनको केंद्र की ‘होम मिनिस्ट्री’ से कोई पत्र नहीं मिला है ।” वे पत्रकारों के इस सवाल का जवाब दे रही थीं कि 2006 में केंद्र से भेजे गये पत्र का उन्होंने उत्तर क्यों नहीं दिया । और जब दो दिन पूर्व गृह मंत्रालय ने यह दावा किया कि वे इस मामले में अभी तक 16 अनुस्मारक (रिमाइंडर) पत्र दिल्ली सरकार को भेज चुके हैं, तो महोदया ने अपनी बात पलटकर कहा कि पत्र तो मंत्रालयों के बीच आते जाते रहते हैं । पत्र आदान प्रदान करना तो विभाग के लोगों का कार्य होता है । मंत्री/मुख्यमंत्री पत्रोत्तर नहीं ‘लिखते’ !

मंत्री महोदया जनता को मूर्ख समझती हैं । जनता भी जानती है कि लिखापढ़ी का कार्य ‘सचिव’ नाम से पुकारे जाने वाले उच्चस्तरीय ‘बाबुओं’ का काम होता है । रोजमर्रा के कार्यों का निस्तारण भी सामान्यतः उनके ही जिम्मे होता है । कंतु गंभीर तथा नीतिगत निर्णय एकल मंत्रियों अथवा मंत्रीमंडल द्वारा लिया जाता है, न कि इन बाबुओं द्वारा । क्या उनका उत्तर मूर्खतापूर्ण नहीं माना जाएगा ?

और इससे भी दिलचस्प बात यह है कि अब जब उनकी सरकार सोते से जगी है तो उन्होंने अफजल को फांसी दी जाए या नहीं इस बाबत कथित तौर पर टालू जवाब दिया हैः “अफजल को फांसी पर चढ़ाए जाने पर उनकी सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी । हां, फांसी देने से पहले दिल्ली में ‘लॉ-एंड-ऑर्डर’ की समस्या तो पैदा नहीं होगी इस पर विचार किया जाए ।” और कल सुनने में आया (याद नहीं किस टीवी चैनल पर) कि उनकी इस टिप्पणी पर दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने फाइल लौटा दी है, यह कहते हुए कि ‘फांसी दी जाये या नहीं’ इस पर स्पष्ट राय व्यक्त की जानी है, न कि संदिग्ध उत्तर देना है । भाजपा ने इस बात पर हल्ला मचाना आरंभ कर दिया है । आज की खबर है कि राज्य सरकार ने फांसी पर हामी भर दी है ।

जनभावना तथा लॉ-एंड-ऑर्डर का भय

‘कानून एवं व्यवस्था’ की बात उठाना अपने आप में सरकार के डर को दर्शाता है । जरा सोचें, फांसी की सजा पाया व्यक्ति दया या माफी की प्रार्थना करता है तो उस व्यक्ति तथा उसके परिवार की स्थिति एवं अपराध के स्वरूप के अनुसार निर्णय होना चाहिए कि नहीं ? यहां यह सब गौण नजर आ रहा है । अगर उस व्यक्ति के नाम पर उत्पात मच सकता है, उपद्रव हो सकते हैं, तो उसे सजा नहीं देनी चाहिए, यही न ? हमारे देश में न्याय इन्हीं संभावनाओं पर निर्भय करता है, न कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर ।

अफजल नाम से तो एक मुस्लिम है । मैं नहीं जानता कि वह और उस सरीखे अन्य लोग केवल धार्मिकता-द्योतक नाम के कारण मुसलमान समझ लिए जाते हैं, या इसलिए कि वे धर्म की समझ रखते हैं और तदनुरूप जीवन जीते हैं । कुछ भी हो उसका इस्लाम धर्मावलंबी होना फांसी के रास्ते की एक रुकावट है । क्यों ? मैं अपना मत व्यक्त करता हूं ।

हमारे देश की राजनीति जनभावनाओं के असीमित शोषण पर आधारित है । देश के नेतागण अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के लिए हर मौके का लाभ उठाते हैं । वे भाषा, क्षेत्रियता, जाति और धर्म की बातों – अप्रासंगिक होने पर भी – को उठाकर जनभावना उभाड़ने से नहीं हिचकते हैं । एक आम आदमी, चाहे वह मुस्लिम हो या दलित अथवा मराठी, मर रहा हो तो उन्हें चिंता नहीं होती है । लेकिन जब कोई रसूख वाला हो, वीआईपी बन चुका हो, या मीडिया में चर्चित हो चुका हो (भले ही अपराध के कारण) तो उसके बचाव में उल्टा-सीधा तर्क देना शुरू कर देते हैं । वे कहेंगे “दलित है, इसलिए आरोप लग रहे हैं, या सजा दी रही है ।” या कहेंगे “अल्पसंख्यक है, इसलिए ऐसा हो रहा है ।” या “मराठी है, इसलिए ऐसा कर रहे हैं ।” और इसी प्रकार के तमाम कुतर्क उनकी जबान पर तैरने लगते हैं । अपराधी के बचाव में भी वे आगे आ सकते हैं ।

इस संदर्भ में जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री का वक्तव्य सुनिए, जो कल अपराह्न मैंने किसी टीवी पर सुना । वे कुछ ऐसा कहते हैं “यह कौन-सा नियम है कि अफजल के मामले पर निर्णय पहले लिया जाए, जब कि उसकी दया याचना के मामले में उसके भी पहले 29 लोग लाइन में खड़े हैं ?” वे भूल जाते है कि अफजल का मामला आतंक और राष्ट्रद्रोह से जुड़ा है । इस बात को खुलकर कहा जाना चाहिए कि सरकारें मामलों को टालकर भविष्य के लिए समस्या पैदा करती हैं । हर मामले पर तुरंत ही निर्णय होना चाहिए । जब पानी सिर के ऊपर से निकलने लगता है तब फिर हड़बड़ी में काम होता है ।

अगर कुछ नेता – मुस्लिम नेता कम, हिंदू नेता अधिक ! – अफजल के फांसी के फंदे पर चढ़ाये जाने पर (यदि ऐसा हुआ तो) मुसलमानों की भावनाएं उभाड़ने पर उतर आवें तो मुझे ताज्जुब नहीं होगा । लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर इस देश में सब कुछ हो सकता है । मैं समझता हूं कि यही भय सरकारों को सता रहा है । इस भय के चलते अफजल का मामला लटक तो नहीं जाएगा ? और फिर कसाब का भी ?

फांसीः क्यों, क्यों नहीं?

फांसी की तथाकथित ‘अमानवीय’ सजा (so called inhuman capital punishment) होनी चाहिए कि नहीं यह बहस का विषय है । इसका निर्णय अपने को सर्वज्ञ समझने वाले किसी व्यक्ति के विचारों के आधार पर नहीं किया जा सकता है; हमें व्यापक जनमत को मान्यता देनी होगी । किंतु अभी जब कानून की किताबों में इस सजा का प्राविधान है ही और अदालत अपराधियों को यह सजा सुनाती है, तब उसका क्रियान्वयन (अथवा क्षमादान) त्वरित गति से न करना कानून का निरादर ही कहलाएगा । – योगेन्द्र जोशी

कसाब को फांसी? नहीं, पहले अफजल को। लेकिन अफजल को फांसी देना आसान है क्या?” पर 2 विचार

  1. Dear yaogendra G
    Ram-Ram
    Metra, sawal kashab aur afjal ke phashe ka nhe hai shawal es desh me pel rahe desh ke gaddaro ko samapt kerne ke hai es desh ka kanoon aur desh ka sambedhan hajaroo paiband lage cheethne ke saman hai. Muslim, Eshai aur ab Nakshamvad hamare desh ke bache khuche tukne ko nast karne per tula hai.
    Mitra, soory, I dont no english. mera number 9336903263 hai.
    R P Singh

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