भोपाल त्रासदी, अर्जुन सिंह, और विदेशी मेहमान एंडर्सन

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(http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6488322.html)
और फिर मेरे खयालात:

यह देश चमत्कारी पुरुषों का है, देवी-देवताओं का है, समर्थ जनों का है, जिन पर कोई नियम-कानून लागू नहीं होते हैं । आज से करीब 26 साल पहले मध्यप्रदेश राज्य के भोपाल नगरी में एक घटना घटी थी – घटना जिसे कुछ अज्ञानी दुर्घटना भी कहते हैं – जिसमें 15 हजार (या 25 हजार?) लोग काल के गाल में समा गये थे, और जिसके बाद सहस्रों जनों को रोगग्रस्त जीवन जीना पड़ा था । इसमें किसी की भी कोई गलती नहीं थीं । कर्मफलों में घोर आस्था वाले इस देश में यह तो उनकी नियति थी, उनके पूर्व जन्मों का फल था, जिसे उन्हें देर-सबेर भोगना ही था । संयोग से तब भोगने को मिला । और वे यमलोक सिधार भी गये तो क्या हुआ ? उनकी अहमियत देश के चमत्कारी देवता-तुल्य प्रबंधकों के लिए थी भी क्या ? वे उनके लिए कीड़े-कमौड़ों से कुछ अधिक माने रखते थे क्या ?

फिर भी कुछ उतावले अधिकारियों ने यूनियन कार्बइड के तब के मुख्य कार्याधिकारी (सी.ई.ओ.) वारेन एंडर्सन नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया । घोर अनर्थ ! इस देश के देवता-तुल्य एक पूज्य अतिथि को गिरफ्तार करने की हिम्मत की गयी ? कोई बात नहीं । भूल-सुधार का प्राविधान तो अपने यहां है ही । हर पाप से मुक्ति का मार्ग भी हमें मालूम है । तत्कालीन मुख्यमंत्री, श्रीसम्पन्न अर्जुन सिंह नाम के माननीय महापुरुष, ने पता नहीं किस देवता की प्रेरणा से सुधार का मार्ग खोजा और माननीय अतिथि को अपने प्रशासनिक गणों की सुरक्षा प्रदान करते हुए राज्य के पुष्पक विमान से दिल्ली भेज दिया । अतिथि देवता वहां से अपने लोक, वैकुण्ठ-तुल्य अमेरिका, पहुंच गये । स्मरण करें कि महाकाव्य महाभारत की एक कथा के अनुसार अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन करते वक्त अर्जुन को केवल चिड़िया की आंख नजर आयी थी । उसी प्रकार आधुनिक अर्जुन को भी केवल अपना अतिथि नजर आया था, न कि सड़कों पर पड़ी हजारों लाशें ।

इस देश के वासियों के लिए एक विदेशी देवता के तुल्य होता है । और वह अगर अमेरिकी हो तो कहने ही क्या । और यदि देश के विकास में पूंजी लगाकर योगदान करने वाला हो तो फिर तो उसके सामने नतमस्तक हुए बिना कैसे रहा जा सकता है । आर्थिक प्रगति के लिए त्याग करना तो हमारा परम कर्तव्य है । उसके लिए हजारों जानें चली भी जाएं तो क्या हर्ज । जिस देश की सबसे सस्ती चीज जनसंख्या हो वहां कुछ हजार की मौत कोई माने रखती है क्या ? एक बात और कह दूं । देवताओं को अधिकार है कि वे मनुष्य के प्रति जैसा चाहें वैसा व्यवहार करें । वे नियमों से ऊपर होते हैं । तुमने ऐसा क्यों किया यह सवाल नहीं पूछा जा सकता । जरा इस बात पर गौर कि शनि देवता जब चाहें जहां चाहें किसी पर भी अकारण नाराज हो जाते हैं । आपने कोई अनुचित कार्य न किया हो तो भी उनकी कुदृष्टि आपका चैन छीन सकती है । आप हजार अपराध कर लें कोई बात नहीं, बस उन्हें खुश रखकर अनुकंपा प्राप्त कर लें । देवताओं से यह नहीं पूछा जाता कि आप मुझे किस बात की सजा दे रहे हैं । आप चुपचाप सह लीजिए, लेकिन शिकायत मत करिए । और धरती पर विचरने वाले हमारे आधुनिक देवताओं पर भी यही बात लागू होती है । मत कहिए कि भोपाल-घटना के लिए कोई दोषी था । मत कहिए कि पूज्य एंडर्सन को छोड़ने वाले ने अपराध किया ।

लेकिन फिर भी कुछ जन यह सब कहने पर अड़े हैं । जानते हैं कि कब्र में जिनका एक पैर लटक रहा हो वैसे अर्जुन सिंह और एंडर्सन का आप कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे । विधाता ने उन्हें अमृतत्व से नहीं नवाजा है, और आपकी अदालत कुछ कर सके इसके पहले ही यमराज उन्हें अपने पास बुला लेंगे । नाटक के शेष भाग के मंचन को देखते रहिए! – योगेन्द्र जोशी

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