खबर है “मंत्रालय ने स्नैक्स पर लुटाए लाखों”

आप में से बहुतों ने टीवी चैनलों पर देखा/सुना होगा कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों ने पिछ्ले एक-एक साल में केवल नाश्ते-पानी पर ही `45-50 लाख खर्च कर डाले । हिसाब लगाएं तो यह औसतन `10-12 हजार प्रतिदिन पड़ेगा । जो खबर न सुन पाए हों वे बीबीसी पर पढ़ सकते हैं:
http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/07/100725_snacks_ministry_rs.shtml

यह सब अपने लोकतन्त्र की खूबी है । गरीब देश में लोकतन्त्र, छककर किसी भी बहाने देश को चूसने का तन्त्र, शर्मोहया को ताक पर रखकर देश पर मनमर्जी राज करने का तन्त्र ।

आप कहेगे कि भला कुछ लाख नाश्ते में डकार जाना भी कोई लूट है । लेकिन जो दिखाई दे जावे उसमें लूटने में शासकगण हिचक न रहे हों तो जो परदे के पीछे घट रहा हो वहां क्या हो रहा होगा ?

दरअसल अपना लोकतन्त्र नाम भर का ही है । शासन-प्रशासन पर जिनका कब्जा है उनमें न संवेदना है न हया ही । उनके लिए बुन्देलखंड में घास की रोटी खा रहे लोग कोई माने नहीं रखते । उनके लिए अपने कभी न भर पाने पेट को भरना जीवन का ध्येय है ।

इंडिया मौज में है और भारत दाने-दाने को मोहताज है ।

माफ़ करें अगर आपको बुरा लगे तो । मेरा मतलब वही है जो मेरे शब्द कह रहे हैं । राजनेताओं की भांति मैं यह नहीं कहूंगा कि मेरा मतलब वह नहीं था जो मैंने कहा था । – योगेन्द्र जोशी

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