स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त, बधाई !! लेकिन …

आज 15 अगस्त है, स्वाधीन राष्ट्र इंडिया दैट इज भारत का 64वां स्वतंत्रता दिवस ।

इस अवसर पर देशवासियों को मेरी ओर से बहुशः बधाइयां और ढेर सारी शुभकामनाएं ।

– योगेन्द्र जोशी

बधाई एवं मंगलकामनाएं प्रेषित करना मेरे लिए एक औपचारिकता है ।

ऐसे अवसरों पर शुभ-शुभ बोलना चाहिए, बुजुर्गों की यही सलाह रही है । हकीकत कुछ भी हो, मुंह के शब्द शुभ ही होने चाहिए । लेकिन …

लेकिन एक सवाल पिछले कुछ सालों से मेरे मन में हर ऐसे मौके पर उठने लगा है । इन ‘दिवसों’ की क्या वाकई कोई अहमियत है ? क्या मकसद पूरा होता है इन दिवसों को मनाने से ? 15 अगस्त के संदर्भ में तो यह सवाल और भी अहम हो जाता है । अपने देशवासियों को यह बताना क्यों जरूरी है कि यह देश कभी फिरंगियों का गुलाम रहा ? सच पूछें तो उससे पहले भी गुलाम रहता आया है । और कई मानों में तो आज भी गुलाम है ! इतिहास के छात्र के लिए तो यह सब जानना मजबूरी है; उसे तो वस्तुनिष्ठ तथ्यों को जानना ही होता है, चाहे वे सुखद हों अथवा पीड़ाप्रद । लेकिन स्वतंत्रता दिवस मनाकर किसी को भी इस तथ्य की याद दिलाना जरूरी क्यों है ?

आप कहेंगे कि इस दिन ‘जश्न’ मनाकर हम देशवासियों को प्रेरित करते हैं कि हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें, देश पर गर्व करें, उसे प्रगतिपथ पर ले चलें, कुछ ऐसा न कर बैठें कि वापस उस बीती गुलामी के हालतों पर वापस पहुंच जाएं, इत्यादि । यह सब कहना और सुनना आसान है और तर्कसम्मत भी लगता है । लेकिन क्या वाकई यह मकसद पूरा हो पाया है कभी ? क्या यह मकसद आगे भी पूरा हो पाएगा कभी ? क्या इस दिन जो कुछ कहा जाता है वह सब विशुद्ध औपचारिकता से अधिक कुछ और भी होता है ?

मंच से आदर्श भरी बातें कह देना वक्ताओं का और उसे सुन लेना श्रोताओं का फर्ज होता है । कई हिंदू परिवारों में श्रीसत्यनारायण कराई जाती है । न बांचने वाला एकाग्रचित्त एवं गंभीर होता है और न ही वे समस्त लोग जो कथा सुनने का स्वांग भर रहे होते हैं । कुछ वैसा ही इस दिवस पर भी होते हुए दिखता है मुझे । दोनों के कर्तव्य क्रमशः मंच के ऊपर और नीचे आंरभ होते हैं और वहीं समाप्त हो जाते हैं । उसके बाद अन्य 363 (कभी-कभी 364) दिनों की भांति यह दिन भी गुजर जाता है । ध्वजारोहण देख लिया, राष्ट्रगान गा-सुन लिया, ‘माननीय’ वक्ता की सतही देशभक्ति के उद्गार सुन लिये, और फिर देश को भूल अपने-अपने हितों को येनकेन प्रकारेण साधने को लौट पड़े । दूसरे दिन अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पहुंचने पर न वक्ता को यह स्मरण रह जाता है और न श्रोता को ही कि बीते दिवस उसने देश के नाम पर कितनी कसमें खिलाईं या खाईं । अगर याद रहता होता तो इतनी दुर्व्यवस्था चारों ओर देखने को न मिलती ।

दावा किया जाता है कि स्वतंत्रता के बाद देश ने पर्याप्त तेजी से प्रगति की है । आज कहा जा सकता है कि देशवासियों के घरों में टेलीविजन, फ्रिज पहुंच चुके हैं, बहुतों के घरों में कारें आ चुकी हैं, अनेक हाथों में मोबाइल फोन पहुंच चुके हैं, इत्यादि । इन सब का होना बड़ी उपलब्धि नहीं है । यह सब तो देश पराधीन रहता तो भी होता ही । ऐसी प्रगति के पीछे व्यावसायिक संस्थाओं का हाथ होता है । अपने कारोबार को विश्व भर में फैलाना और जन-जन के हाथ में उनको पहुंचाकर मुनाफा कमाना उनका उद्येश्य होता है । देश की पराधीनता से उसका सीधा संबंध नहीं है । अंग्रेजों के जमाने में कुछ भी प्रगति नहीं हो रही थी, यह कहना गलत है । रेलें बिछाना, सड़कें बनाना, स्कूल-कालेज खोलना, अस्पताल बनाना आदि कार्य तो तब भी हो रहे थे । यह ठीक है कि हमने उस को कुछ गति दी । यह कहना कि देश ने परमाणु विस्फोट करके दुनिया को अपनी ताकत दिखा दी है, हम अब चंद्रमा पर पहुंचने को तैयार हैं, देश 8-9 प्रतिशत की आर्थिक प्रगति कर रहा है, इत्यादि, भी बहुत माने नहीं रखते हैं, क्योंकि स्वाधीनता संघर्ष जिन उद्येश्यों को लेकर चला था वह सब यह नहीं । यह सब अवश्य तब अधिक सार्थक होता यदि हम मूल उद्येश्यों से भटक न गये होते ।

मूल उद्येश्य ? क्या थे वे ? मैं अपनी समझ को स्पष्ट करता हूं । कदाचित् आप सहमत न हों । सहमत न होने में ही भलाई है, तब किसी प्रकार की पीड़ा मन में नहीं उपजती है । लेकिन मेरे लिए इन विचारों से मुक्त रह पाना संभव नहीं, क्योंकि वे स्वतःस्फूर्त हैं, न चाहते हुए भी मन में न जाने कहां से प्रवेश कर जाते हैं । हां तो उद्येश्य ? देश में गरीब-अमीर के बीच की खाई को पाटना, हर नागरिक को साक्षर ही नहीं अपितु सुशिक्षित बनाना, उन्हें समाज एवं देश प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाना, अंधविश्वासों में जी रहे लोगों में तार्किक/वैज्ञानिक चिंतन-सामर्थ्य जगाना, जनता को स्वच्छता एवं प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक बनाना, समाज में व्याप्त जातीय-धार्मिक-क्षेत्रीय भेदभाव मिटाना, स्वस्थ-सुदृण-त्वरित न्यायिक व्यवस्था स्थापित करना, शासन-प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त एवं भ्रष्टाचार-विमुक्त बनाना, इत्यादि, वे सभी बातें जिनकी चर्चा होने पर आम नागरिक का सिर आत्मविश्वास के साथ ऊपर उठ सके, न कि वह बचाव में बगलें झांकने लगे ।

लेकिन यह सब हो पाया है ? क्या हमारा लोकतंत्र सही दिशा में अग्रसर हो सका है ? मुझे उत्तर नहीं में ही मिलता है । काश, मैं भी उन भाग्यशालियों में होता जो देश की प्रगति के भ्रम में बखूबी जी रहे हैं !

हम ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाते जरूर हैं, किंतु इसके अर्थ कभी के भूल चुके हैं । आज देश के जो हालात हैं उनसे मैं यही निष्कर्ष निकाल पाया हूं कि अब स्वतंत्रता के अर्थ हैं मर्यादाओं से विमुक्त स्वेच्छाचारिता, जिसमें
अनुशासनहीनता है,
निरंकुशता है,
उच्छृंखलता है,
स्वार्थपूर्ति की खुली छूट है,
कायदे-कानूनों की अनदेखी है
और कार्यसंस्कृति का अभाव है ।
वस्तुतः इसके आगे भी ऐसा ही बहुत कुछ और, जिसे आप सोच सकते हैं

तीन रोज पहले मुझे अपने प्रातःकालीन अखबार में एक बुजुर्ग के उद्गार पढ़ने को मिले थे । शब्द थेः
“… आज के हालात का पता होता तो शायद बापू भी देश की आजादी के पक्ष में न होते । …”
(स्वाधीनता संघर्ष के साक्षी रह चुके वयोवृद्ध श्री सूबेदार मिश्र, अमर उजाला, 12 अगस्त 2010, पृष्ठ 5)

मुझे बचपन में अपनी स्वर्गीया मां से सुनीं कुछ बातें अब याद आती हैं । देश स्वतंत्र हो चुका है इसे कहने के साथ-साथ वह विक्टोरिया-राज की प्रशंसा करना भी नहीं भूलती थीं । इस विषय पर अतिरिक्त बातें अगली पोस्ट में लिखूंगा ।

चलते-चलते यह भी:
“The value of a man should be seen in what he gives and not in what he receives.”
– Albert Einstein (Ideas and Opinions, Rupa, 1992, p 62)
(व्यक्ति क्या देता है इससे उसकी महत्ता आंकी जानी चाहिए न कि वह क्या पाता है इससे । – आल्बर्त आइन्स्ताइन)

और एक तस्वीर भी:

– योगेन्द्र जोशी

स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त, बधाई !! लेकिन …” पर 3 विचार

  1. बहुत मोटी चमड़ी है हिंदुस्तानियों की , हमारे आग नहीं लगती , मूल मुद्दा प्राथमिक शिक्षा का है ,अभी कुछ लोग हैं जो नैतिकता , मूल्यों , राष्ट्र की बातें कर लेते हैं , धीरे-धीरे यह भी समाप्त हो जाएगा । अब किसी को हमें गुलाम बनाने की आवश्यकता नहीं है हम तो सुबह से शाम तक विदेशी वस्तुओं, कंपनियों, विचारों आदि के गुलाम ही हैं—- किस को सुनाएं , कौंन सुनेगा …

    डॉ. रावत

  2. आपका ब्लॉग पढ़ा। अच्छा लगा। हमें स्वतंत्रता दिलवाने वाले आदरणीय जनों द्वारा सोचे गए मूल उद्देश्यों से शायद हम कुछ भटक गए हों। परन्तु भारत की विसंगति में भी संगति की विशॆषता ही उसे अन्य देशों से अलग करती है। भारत में सत्ता लोलुप कुछ लोग हैं पर अब भी ऎसे व्यक्ति हैं जो उनमें रहकर भी ईमानदार और साफ छवि वाले हैं। जिन अधिकारों और स्वतंत्रताओं को प्राप्त करने में युरोपीय देशों और अमेरिका की जनता को वर्षॊं लगे उन्हें हमने एक ही झटके में पा लिया था। शायद यही कारण है कि हममें से कईयों को उन अधिकारॊं का सही अर्थ ही नहीं मालूम है। समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा से लगभग रहित आज के विश्व में तो चीन जैसा घोषित साम्यवादी देश भी चीन के अमीरों और गरीबॊ के बीच बढ़ती खाई को चौड़ा करने में लगा है। वेलफेयर स्टेट की संकल्पना तो शायद अब किताबों में ही देखने को मिलगी। सकारात्मक बदलाव लाना मुश्किल है पर लोग प्रयासरत हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 उन्ही लोगों की हालिया उपलब्धि है।
    सादर
    अभिषेक अवतंस
    आगरा

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