विंस्टन चर्चिल, भारत की स्वाधीनता, लोकतंत्र और …(भाग 1)

(बीते स्वतंत्रता दिवस – 15 अगस्त – पर इस ब्लॉग पर प्रविष्ट लेख का पूरक)

विंस्टन चर्चिल

“Power will go to the hands of rascals, rogues and freebooters. All Indian leaders will be of low calibre and men of straw. They will have sweet tongues and silly hearts. They will fight amongst themselves for power and India will be lost in political squabbles.” (धूर्त, बदमाश, एवं लुटेरे हाथों में सत्ता चली जाएगी । सभी भारतीय नेता सामर्थ्य में कमजोर और महत्त्वहीन व्यक्ति होंगे । वे जबान से मीठे और दिल से नासमझ होंगे । सत्ता के लिए वे आपस में ही लड़ मरेंगे और भारत राजनैतिक तू-तू-मैं-मैं में खो जाएगा । स्रोत: http://in.answers.yahoo.com/question/index?qid=20090306021605AAtqICe)

ये शब्द विंस्टन चर्चिल के बताए जाते हैं, जो उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के पहले कथित तौर पर ब्रिटिश पार्लियामेंट में बोले थे । द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश प्रधान मंत्री रह चुके चर्चिल उस समय विपक्ष में हुआ करते थे । ब्रिटिश राजनीति में उनका विशिष्ट स्थान तो था ही, साहित्य में भी दखल रखते हुए वे नोबेल पुरस्कार पा चुके थे । उपर्युक्त शब्द क्या चर्चिल ने वास्तव में कहे थे इस बात पर जानकारों में मतभेद है ऐसा मुझे ‘विकीकोट्’ की वेबसाइट पर पढ़ने को मिला । (http://en.wikiquote.org/wiki/Winston_Churchill)उपर्युक्त बात चर्चिल ने वस्तुतः कही हों या नहीं, तथ्य यह है कि आज ये घटित होते हुए नजर आ रही हैं । असल में चर्चिल उस समय (1947) भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिए जाने के घोर विरोधी थे । इस संबंध में कुछ अधिक जानने की इच्छा से मैंने इंटरनेट खंगाला तो एक विस्तृत दस्तावेजः
http://www.winstonchurchill.org/learn/speeches/speeches-of-winston-churchill/105-our-duty-in-india
मुझे पढ़ने को मिला । Our Duty in India (March 18, 1931. Albert Hall, London) नाम के करीब 4 हजार शब्दों के इस दस्तावेज में चर्चिल ने भारत को स्वतंत्रता दिए जाने के सख्त विरोध में अपना पक्ष रखा था । चर्चिल बाद तक स्वतंत्रता के विरोधी रहे । मैं इसी से कुछ चुने वक्तव्यों को यहां उद्धरित कर रहा हूं:-

क्या सोच थी चर्चिल की भारत को लेकर?

“ब्रिटिश शासन का अधिकारियों के प्रति कड़ा निर्देश सदा से रहा है कि वे भारत में अपने वेतन/पेंशन तथा भत्तों के अलावा किसी और प्रकार का लाभ उठाने की कोशिश न करें ।”

इस कथन को अगर सिरे से खारिज कर दें तो बात अलग है, अन्यथा यह माना जाना चाहिए कि उनके अधिकारी आज की तरह घूसखोरी, गबन, घपलेबाजी आदि करके अपना घर नहीं भर रहे थे और सभी भारतीयों के प्रति समान व्यवहार करते थे । उनका इस देश पर राज हमें भले ही पसंद न हो, किंतु वह भरसक ईमानदारी का था इसे मानना पड़ेगा । क्या आज प्रशासनिक ईमानदारी रह गयी है कहीं ?

“प्रयास किया जाना चाहिए कि जनप्रतिनिधि होने का दावा करने वाले लोग आम जनता की मौलिक जरूरतों को समझते हों और उनके प्रति समर्पित हों । अतः उनको पहले ब्रिटिश शासन के ही अधीन राज्यस्तरीय राजकाज की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए ताकि वे अपनी काबिलियत सिद्ध कर सकें ।”

आज की शासकीय तस्वीर

मैं चर्चिल की बात से पूरा नहीं तो काफी हद तक सहमत हूं । भारतीय लोग राजतांत्रिक अथवा सामंती व्यवस्था के अधीन सदियों से जीते आ रहे थे । वे लोकतंत्र से परिचित थे ही नहीं । लोकतंत्र की पहली और प्रमुख आवश्यकता है कि लोग बराबरी के स्तर पर एक दूसरे को देखते हों और स्वतंत्र रूप से सोच-विचार के आदी हों । इस देश में बराबरी की भावना तो कभी रही ही नहीं । आम जनों के मन में इस भावना की जड़ें गहरी जमी हैं कि कुछ लोग एवं उनके परिवार राज करने के लिए जन्म लेते हैं, तो अधिसंख्य शासित होने के लिए जन्मते हैं । अपवादों को छोड़ सभी शासित होना अपनी नियति मानते आए हैं ।

यदि आप आज के राजनैतिक दलों पर गौर करें तो देखेंगे कि उनके भीतर तो लोकतंत्र है ही नहीं । वर्तमान काल में प्रायः हर दल एक व्यक्ति की निजी ‘कंपनी’ होती है, जिसमें कार्यकर्ता नामक के कर्मियों को मुखिया के आदेशों/निर्णयों के अनुसार चलना होता है । जो लोग अपने दलों में लोकतंत्र बर्दास्त नहीं कर सकते वे भला देश में क्या लोकतंत्र स्थापित करेंगे । चर्चिल का सोचना था कि जब राज्य स्तर पर नेता अपनी क्षमता एवं स्वच्छ कार्यशैली सिद्ध कर चुकेंगे, तब देश को आजादी दी जाए, लेकिन एक झटके में नहीं ।

‘ब्रैह्मिनों’ यानी ताकतवरों का राज

“भारत को ‘ब्रैह्मिनों’ के शासन पर छोड़ देना वहां के कमजोर तबके के प्रति हमारी क्रूरता का द्योतक होगी ।”

चर्चिल ने अपने भाषण में यत्रतत्र ‘ब्रैह्मिन’ शब्द का प्रयोग किया है । वे महात्मा गांधी से बहुत चिढ़ते थे और पंडित नेहरू को शासन पाने के लिए उतावला व्यक्ति कहते थे । चर्चिल को मालूम ही था कि स्वाधीनता संघर्ष केवल ‘ब्राह्मणों’ का अभियान नहीं था; उसकी अगुवाई तो गांधीजी कर रहे थे । अतः प्रसंग से स्पष्ट होता है कि ‘ब्रैह्मिन’ से उनका मतलब दलितेतर जातियों या सवर्णों से था न कि अकेले ब्राह्मणों से । उनका मानना था कि इन लोगों का व्यवहार कमजोर तबके के प्रति निंद्य ही रहेगा जैसा सदियों से होता आया है । गौर करें इन शब्दों परः“…‘ब्रैह्मिन’ जिन्होंने अपने करीब छः करोड़ साथी देशवासियों, जिन्हें वे अस्पृश्य कहते हैं, को अस्तित्व के मौलिक अधिकार से वंचित रखा है और जिन्हें हजारों सालों के दमन से अपनी दुःखद नियति को स्वीकारने का पाठ पढ़ाया है । वे इन छः करोड़ के साथ खा नहीं सकते, उनके साथ पी नहीं सकते, और उन्हें मनुष्य ही नहीं मानते । …” (… Brahmins who deny the primary rights of existence to nearly sixty millions of their own fellow countrymen whom they call ‘untouchable’, and whom they have by thousands of years of oppression actually taught to accept this sad position. They will not eat with these sixty millions, nor drink with them, nor treat them as human beings…) (अविभक्त भारत की जनसंख्या तब करीब 35 करोड़ थी ।)

अस्पृश्यता संबंधी अपने अनुभवों का संक्षिप्त लेखा-जोखा मैंने इसी ब्लॉग के पृष्ठ ‘अस्पृश्यताः मेरे अनुभव’ में प्रस्तुत किया है ।

“हम उन लोगों के लोकतंत्र की मांग नहीं स्वीकार सकते, जो अपने ही साथ के छः करोड़ को सदा के लिए पशुवत् जीने को विवश करते आये हैं ।”

“उनकी दशा दासों से भी बदतर है, क्योंकि उन्हें यह सिखाया गया है कि वे दैहिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्तर के समर्पण एवं दासत्व को स्वीकारें ।” (Their plight is worse than that of slaves, because they have been taught to consent not only to a physical but to a psychic servitude and prostration.)

मैं चर्चिल की इस बात को बखूबी समझता हूं । मैंने बचपन में अपने गांव में प्रचलित अस्पृश्यता को बेहद नजदीक से देखा है । तब उसके अर्थ की गंभीरता समझने की क्षमता मुझमें नहीं थी, किंतु अब लगता है कि वह अमानवीय तो था ही । संयोग/सौभाग्य से स्थिति कुछ हद तक बदली-सी लगती है, लेकिन दलितेतर जातियां के मन में बसी भेद की भावना अभी दूर नहीं हुई है ।

“ब्राह्मिनों (यानी सवर्णों) को सत्ता सौंपने पर भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी, तथा भ्रष्टाचार आदि पनपेंगे ।”

यह सब तो वास्तव में हो ही रहा है । इसे आप महज संयोग कह सकते हैं, अथवा यह मान सकते हैं कि चर्चिल को इस देश की वास्तविकताओं की अच्छी समझ थी ।

तो ये रहीं चर्चिल की कही कुछ बातें । आगे स्वाधीनता तथा लोकतंत्र से जुड़े मेरे अपने कतिपय अनुभवों का संक्षिप्त लेखा-जोखा प्रस्तुत है ।

मेरे अनुभव

अपने देश को स्वतंत्र हुए 63 वर्ष हो चुके हैं और तकरीबन यही मेरी भी उम्र है । बात तब की है जब स्वतंत्रता मिले 8-10 साल हो रहे थे । तब मैं उत्तराखंड के सुदूर क्षेत्र में अवस्थित अपने छोटे-से गांव के पास की सरकारी प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था । (उस पाठशाला का संक्षिप्त वर्णन इस ब्लॉग के ‘मेरी प्राथमिक पाठशाला’ पृष्ठ में शामिल है ।) देश एवं स्वतंत्रता के अर्थ हम बच्चे ठीक से तो नहीं समझते थे, किंतु उसकी चर्चा सुनकर एक प्रकार का गर्व महसूस करते थे । तब गांधी, नेहरू, पटेल, बोस आदि के नाम सुपरिचित लगने लगे थे । जैसा मुझे याद आता है, उन दिनों के.एम. मुंशी तथा बाद में वी.वी. गिरि उ.प्र. के राज्यपाल थे । शायद सम्पूर्णानंद मुख्यमंत्री एवं कमलापति त्रिपाठी शिक्षामंत्री थे । इस सरीखी जानकारी के बाबत हमारी स्थिति आज के सरकारी स्कूलों के बच्चों से कहीं बेहतर थी ।

शेष बातें लेख के अगले (कल प्रकाश्य) भाग में शामिल हैं । – योगेन्द्र जोशी

और भावी आर्थिक महाशक्ति की आज की तस्वीर:

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