विंस्टन चर्चिल, भारत की स्वाधीनता, लोकतंत्र और …(भाग 2)

(23 अगस्त की पोस्ट का पूरक अंश)

“Democracy without self-control and restraint turns into anarchy. Discipline is the very essence of democracy.”
– Jawaharlal Nehru (Speech, Pune, 26 July 1939)

मेरे अनुभव

अपने प्राथमिक विद्यालय के दिनों (1952-7) की बातें याद करते हुए मुझे आज के हालातों को देख निराशा होती है । अपनी अल्पशिक्षित मां से मैंने महारानी विक्टोरिया (1819-1901)
और उनके राजकाज की तारीफ सुनी थी । मां का तो विक्टोरिया-काल में जन्म भी नहीं हुआ था । अवश्य ही उन्होंने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना होगा । अंग्रेजी राज की प्रशंसा में वह कहती थीं कि कहीं कोई चोरी नहीं होती थी, पुलिस अपना काम मुस्तैदी से करती थी, घूसखोरी जैसी चीजें नहीं थीं, इत्यादि । ये बातें चर्चिल द्वारा कहे गये कथन (देखें पिछली पोस्ट) के अनुरूप थीं कि अंग्रेज अधिकारियों को वेतन के अलावा ऊपरी आमदनी से बचने की सख्त हिदायत है । मेरे बचपन के दिनों में लोगों के घरों में ताले नहीं लगते थे; दरवाजे पर सांकल-सिटकनी लगती थी । लेकिन जब दूर-दराज से चोरी जैसी घटनाओं की बातें सुनने को मिलने लगी थीं । परिचितों-आगंतुकों के साथ मां की बातों में मुझे सुनने को मिलता था कि फलां-फलां घूस लेने लगा है । फलां इंजीनियर/ओवरसियर ऊपरी आमदनी करता है, इत्यादि । साथ ही वे देश की आजादी की बात पर भी खुश थीं । आज लगता है कि दोनों बातों में एक विरोधाभास था । आज के हालात देखकर मुझे लगता है कि मेरी मां को आजादी की खुशी के साथ यह एहसास होने लगा होगा कि शासन-प्रशासन का स्तर गिरने जा रहा है, जिसकी शंका विंस्टन चर्चिल ने जताई थी ।

मैंने साधारण विद्यालयों में शिक्षा पाई थी, किंतु मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि मेरे उन सभी विद्यालयों में पढ़ाई होती थी । अध्यापक नदारत नहीं रहते थे । मैं समझता हूं कि उस जमाने के अधिकतर लोग सरकारी/अनुदानप्राप्त स्कूलों में ही शिक्षित हुए थे । आज की तरह अंग्रेजी स्कूलों की भरमार तब नहीं थी । आज हालत यह है कि सरकारी स्कूली व्यवस्था ध्वस्त-सी हो चुकी है । स्तरीय शिक्षा पर अब निजी संस्थानों का कब्जा हो चुका है । उन दिनों नकल के किस्से भी इक्के-दुक्के ही होते थे ओर फर्जीवाड़ा नाममात्र को । लेकिन अब सर्वत्र फर्जी काम तथा नकल का बोलबाला है । एक अध्यापक के नाते मैंने महसूस किया है कि तब की तुलना में अधिकतर सरकारी विद्यालयों का स्तर काफी गिर चुका है, भले ही कंप्यूटरों का प्रयोग हो रहा हो ।

दुर्भाग्य से ऐसी गिरावट हर क्षेत्र में देखने को मिल रही है । मैं पुराने दिनों को याद करता हूं । रेलगाड़ियां आज की तरह 15-20 घंटे लेट नहीं होती थीं, उनमें लूटपाट के किस्से कम ही सुनने को मिलते थे, दुर्घटनाएं आज की तरह आम बातें नहीं थीं और जो होती थीं तो उन पर तहलका मच जाता था, इत्यादि । बिमारी में लोग आम सरकारी अस्पतालों में ही जाते थे । लेकिन आज हालत यह है कि मेरे कार्यस्थल रहे विश्वविद्यालय के कर्मचारी तक वि.वि. का बड़ा अस्पताल छोड़ निजी अस्पतालों का रूख करने लगे हैं । पहले बिजली सब जगह नहीं थी, किंतु जहां थी भरोसेमंद थी । आज कब जाएगी और कब आयेगी कहना मुश्किल है । कम से कम अपने उत्तर प्रदेश के हाल तो ऐसे ही हैं । पहले सड़कें कई-कई साल तक चलती थीं, लेकिन आजकल एक ही बरसात में धुल जाती हैं । सड़कों के किनारे गंदगी के ढेर आज की तरह पहले नहीं दिखते थे, और न ही नालियां इस कदर बदबदाती थीं ।

क्या-क्या बयां करूं ? देश के हालात किस गिरावट पर हैं, इसका अंदाजा आप राजधानी दिल्ली और वहां आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के इंतजाम से लगा सकते हैं । इतना कहना काफी है ।

बेमानी हो चुकी आजादी

कैसी आजादी ?”, “हमारी आजादी आधी-अधूरी है ।” जैसे कथन अब आम हो चुके हैं । 15-20 साल पहले तक ऐसे वाक्य नहीं सुने जाते हैं । ऐसा लगता है कि आम जन का आजादी से मोहभंग होने लगा है । जनप्रतिनिधियों के प्रति उनका विश्वास उठ रहा है । क्यों ?

कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि यह देश इंडिया एवं भारत में विभक्त हो चुका है । इंडिया प्रगति पथ पर, विकास के फलों को भोग रहे लोगों की अपनी दुनिया, जो शरीर से तो इस भूभाग के हैं, लेकिन मन से ‘अंग्रेज’ हो चुके हैं । उनके तौर-तरीके, रहन-सहन, भाषा आदि अब विदेशी हो रहे हैं । यूं कहें कि इंडिया का अमेरिकीकरण/अंग्रेजीकरण का दौर चल चुका है । और भारत ? पारंपरिक जड़ताओं एवं अंधविश्वासों में पड़े हुए और गरीबी से जूझते लोग । प्राकृतिक आपदाएं, बिमारियां, कुपोषण, भूख, अशिक्षा, आदि सब उनके हिस्से में हैं । उनके नाम पर सरकारी रुपये-पैसे की लूट इंडिया में मची है । शासन इंडिया का चलता है । पुलिस के लोग सरकार के बधुंआ मजदूर बनकर रह गए हैं । सरकारों को मनमर्जी निर्णय लेने का अधिकार है । जिसने विरोध किया उस पर पुलिस से डंडे बरसा दिये । जितनी निरंकुश, असंवेदन एवं क्रूर आज की पुलिस है, उतनी परतंत्र भारत में भी नहीं रही होगी ।

अपने को जनप्रतिनिधि कहने वाले लोग अपनी स्वार्थसिद्धि में किसी भी सीमा तक जा सकते हैं । वे मनमर्जी के कोई भी निर्णय ले सकते हैं, किंतु कभी भी बेचारी जनता से नहीं पूछते कि वे निर्णय मान्य होंगे । विकास के नाम पर गरीबों से संसाधन छीन धनाड्यों को सौंप देना हमारे लोकतंत्र की खासियत है । सरकारों की प्राथमिकता का आधार समझ से परे है । देख्एि एक तरफ राष्ट्रमंडल खेलों पर अरबों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ अनाज के गोदाम बनाने के लिए पैसे की कमी का रोना रोया जाता है । उत्तर प्रदेश सरकार को देखिए, कि मूर्तियों की स्थापना के लिए 900 करोड़ और बुंदेलखंड के विकास के लिए मात्र 10 करोड़, जैसा सुनने में आता है । गरीबों के सेवक होने का नाटक रचने वाले जनप्रतिनिधियों के आंसुओं को देखिए, कहते हैं कि हम खुद ही अपनी तनख्वाह 80 हजार कर दें ताकि भत्तों और सुविधाओं को मिला डेढ़े-दो लाख पाने लगें । यह मांग उस देश में उठती है जहां के चौथाई परिवारों की कुल आमदनी 5 हजार माहवारी भी नहीं हो पाती है । अंधेर नगरी चौपट राजा की तर्ज पर सरकारें चल रही हैं । क्या ऐसी ही सरकारों के लिए आजादी का सपना देखा गया था ?

राष्ट्र की प्रगति का अर्थ

किसी राष्ट्र के लिए 63 साल का समय बहुत बड़ा तो नहीं होता, लेकिन यह इतना छोटा भी नहीं कि निराशाजनक हालात बने रहें । विश्व के कई देशों में प्रगति का दौर पिछले 60-70 सालों में ही चला है, और वे हमसे कहीं आगे निकल गये । यह समय इतना बड़ा तो था ही कि जनता की साक्षरता, दो वक्त के भोजन, कुपोषण से मुक्ति, बराबरी का दर्जा, आदि का इंतजाम हो सके । ऐसा करना कौन चाहता था ?

याद रखें कि कोई भी राष्ट्र छः-आठ लेन की सड़कों, गगनचुंबी इमारतों, कारों, टीवी, फ्रिजों, सेलफोनों जैसे उपभोक्ता वस्तुओं की प्रचुरता, आदि से नहीं बनता है । भौतिक साधन-संसाधन का अपना महत्त्व है अवश्य, किंतु वे राष्ट्र को परिभाषित नहीं करते । राष्ट्र बनता है वहां के निवासियों से । निवासियों का चरित्र कैसा है, देश और समाज के प्रति वे कितने समर्पित हैं, साथी नागरिकों के साथ उनका कैसा व्यवहार है, कायदे-कानूनों को कितना सम्मान देते हैं, अपने कर्तव्यों का वे निर्वाह करते हैं कि नहीं, इत्यादि बातें हैं जो राष्ट्र को महान या निम्न कोटि का बनाते हैं । हमें अपनी स्वतंत्रता की अर्थवत्ता का आकलन इन्हीं कसौटियों के सापेक्ष करना चाहिए ।

पिछले कुछ समय से अपनी सरकारें देशवासियों को यह कहकर भ्रमित करती आ रही हैं कि 8-10% की आर्थिक विकास दर से आगे बढ़ रहे हैं और निकट भविष्य में हम विश्व की सबसे बड़ी – कदाचित् तीसरी-चौथी – महाशक्ति बनने जा रहे हैं । मुझे शंका होती है कि प्रगति का यह गुब्बारा भविष्य में कहीं ध्वस्त न हो जाए । माना कि आर्थिक प्रगति है और चामत्कारिक है, तो क्या इससे हमारी सामाजिक समस्याएं सुलझ जाएंगी ? क्या आर्थिक विकास से लोग बेहतर नागरिक बन जाएंगे, प्रशासन कार्यकुशल संवेदनशील हो जाएगा, देश से भ्रष्टाचार मिट जाएगा, न्यायिक व्यवस्था उत्तम एवं भरोसेमंद हो जाएगी, समाज के सर्वाधिक जरूरतमंद को रोटी-कपड़ा मिल जाएगा, सामुदायिक जनसुविधाएं बढ़ जाएंगी । जी नहीं, आर्थिक विकास का इन सबसे कोई सीधा रिश्ता नहीं है । इन सबको पाने के लिए चाहिए व्यवस्था में सुधार । व्यवस्था अच्छी है तो आर्थिक विकास के लाभ देश भर को मिल सकते हैं, अन्यथा इससे धनवान् अधिक धनी तो बन जाएगा, लेकिन की भूखे का पेट नहीं भरने का ।

कोई मुझसे पूछे कि इन दो विकल्पों से क्या चुनोगेः (1) 12-13%: का आर्थिक विकास दर के साथ दुनिया के सर्वाधिक धनी, संख्या एवं संपदा में, यहीं देखने को मिलने लगें और साथ ही भूखे पेट सोने को मजबूर लोग भी यहीं हों, और (2) मात्र 4-5% की दर से विकास हो, जिससे कोई भी अतिशय धनाड्य न बन पाए, लेकिन किसी को भूखा भी न रहना पड़े ? तो मैं विकल्प (2) को चुनूंगा ।

देश की स्वाधीनता की सार्थकता और लोकतंत्र की सफलता का आकलन करते समय आप इन प्रश्नों पर विचार करें:-
1 – क्या हमारी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था उत्तरोत्तर सुधरती जा रही है? क्या हम स्वतंत्रता के साथ पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था को त्वरित गति से बदलकर नया रूप दे पाये हैं ? क्या यह सच नहीं है कि आज भी हम परतंत्र काल के कानूनों को ढो रहे हैं ?
2 – क्या हमारे जनप्रतिनिधि जनता के हितों के प्रति अधिकाधिक समर्पित होते जा रहे हैं ? क्या वे समाज के समक्ष अपने व्यवहार से अनुकरणीय उदाहरण पेश करते आये हैं ? उनकी संपदा सत्तासीन होने पर तेजी से नहीं बढ़ने लगती है क्या ?
3 – क्या धूमिल अथवा संदेहास्पद छवि वाले लोगों की संख्या राजनीतिक दलों में बढ़ रही है ? क्या इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र है ? अथवा दलों के सदस्य अपने मुखिया के मनोभावों को पढ़ते हुए ‘यस मिनिस्टर’ की तर्ज पर अपना मत व्यक्त करते हैं ?
4 – क्या देश की राजनीति एक संवेदनशील एवं कार्यकुशल प्रशासन स्थापित कर सकी है ? क्या हमारा पुलिसबल आम आदमी की सहायता के लिए तत्पर रहता है ? क्या किसी राजनीतिक दल ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सार्थक प्रयास किये हैं ? कितने उच्चपदस्थ भ्रष्टाचारियों को आज तक दंडित किया गया है ?
5 – क्या देश में एकसमान छोड़ दोहरी शिक्षा व्यवस्था नहीं चल रही है ? क्या हमारा राजकाज उस भाषा में नहीं चल रहा है जिसे 10% देशवासी भी नहीं समझ पाते हैं ?
6 – क्या हमारी न्याय-व्यवस्था लचर और कछुए की गति से नहीं चल रही है ? कितने लोग हैं जो भरोसा कर पाते हैं कि न्याय मिलेगा और वह भी समय पर ?
7 – बीते 63 सालों में क्या हम जनसंख्या पर नियंत्रण कर सके हैं, या उसे भगवान् भरोसे नहीं छोड़ चुके हैं ? क्या लोगों में राष्ट्रभावना जगा पाये हैं ? क्या जातीयता, धार्मिकता एवं क्षेत्रीयता की संकुचित भावना से उबर सके हैं ? या उसमें डूब रहे हैं ?

ऐसे अनेकों सवाल हैं जो पूछे जा सकते हैं । मैं इन पर विचार करता हूं तो सिर भन्ना जाता हैं । सब कुछ भगवान् भरोसे है यह मैं नहीं कई लोग कहते हैं ।

कुल मिलाकर लगता है कि स्वाधीनता से कुछ खास हासिल हुआ नहीं । सड़क पर कूड़ा बीनने वाला बच्चा पहले भी बीन रहा था, आज भी बीन रहा है, और कल भी बीनेगा । मेरी नजर में देश चरित्रहीनता, बेशर्मी, अनुशासनहीनता और अबाधित भ्रष्टाचार के दौर से गुजर रहा है । इन बातों की शंका विंस्टन चर्चिल ने जताई थी । (देखें कल की पोस्ट) – योगेन्द्र जोशी

और चलते-चलते इस समाचार (लिंक) पर नजर डालें:-
http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/07/100707_china_death_va.shtml

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