‘इंडिया दैट इज भारत’ में आयोजित कॉमनवेल्थ का ‘थीम सॉंग’

पहले लेख से असंबद्ध एक जानकारी –

पिछली जुलाई में बेंगलूरु अवस्थित Hidden Reflex कंपनी ने Mozilla की मदद से epic – एपिक – नाम से एक ब्राउजर (मुफ्त, जैसा आम प्रचलन में है) बाजार में उतारा है । आप इसे भी आजमाकर देख सकते हैं । लिंक: http://www.epicbrowser.com

‘कॉमनवेल्थ गेम्ज 2010 थीम सॉंग’

अपने देश इंडिया दैट इज (नॉट!) भारत में पहली बार राष्ट्रमंडल खेल (कॉमनवेल्थ गेम्ज) आयोजित होने जा रहे हैं, अक्टूबर के पूर्वार्ध में (अक्टूबर 3-14)। इसके लिए ऑस्कर पुरस्कार विजेता संगीतकार ए. आर. रहमान ने ‘दिल्ली 2010’ (Delhi 2010) – इन खेलों का आयोजन स्थल – के लिए विषय-गीत (Theme Song) की धुन तैयार की है । गीत के शुरुआती बोल ये हैं:

oh yaaro yeh india..bulaa liya..
diwaana yeh india bulaa liya (bulaa liya)
yeh to khel hain, bada mel hain..
mila diya(mila diya) (2)

ये बोल देवनागरी में यों लिखे जाएंगे:

ओह यारो ये इंडिया… बुला लिया…
दीवाना ये इंडिया बुला लिया (बुला लिया)
ये तो खेल है, बड़ा मेल है…
मिला दिया (मिला दिया) (२
)

पूरे गीत को देवनागरी लिपि में पढ़ने के लिए यहां चटका लगाएं । रोमन में लिपिबद्ध इस गीत को ‘कॉमनवेल्थ गेम्ज’ की वेबसाइट http://www.cwgdelhi2010.org/?q=node/1660 पर पढ़ा जा सकता है, जहां सुनने के लिए इसकी धुन भी उपलब्ध है ।

इस गीत को पढ़ने और इस की धुन सुनने पर मैं बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हुआ । वास्तव में न तो इसके बोल में मुझे कोई दम दिखा और न ही इसकी धुन में । सुनने में आता है कि आयोजन समिति के लोग भी बहुत खुश नहीं हैं । अमेरिका के प्रतिष्ठित ‘ऑस्कर अवार्ड’ जीतने के बाद रहमान साहब का नाम मीडिया में काफी चर्चित रहा । उनसे लोग काफी उम्मीदें बांध चुके हैं । कदाचित् इस बार वे सफल नहीं हुए हैं । या यह भी हो सकता है कि हम जैसे बुढ़ा रहे लोग, जो बीते समय के संगीत सुनने के शौकीन रहे हैं, आजकल की पीढ़ी के मनपसंद संगीत में दम न देख पाते हों । खैर, विषय-धुन तो यही बजेगी ।

इंडिया एंड इंडिया, लेकिन भारत नदारत

आगामी राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर मेरे मन में कई सवाल-शंकाएं उठती हैं । एक आलेख उम्मीद है कि भविष्य में उस विषय पर जल्दी ही लिखूंगा । इस स्थल पर तो ‘थीम सॉंग’ को लेकर कुछ कहने का मन है ।

अब सभी लोग – बुद्धिजीवी, राजनेता, राजनीति एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ और कई आम जन – मानने लगे हैं कि यह देश दो में बंटा हैः पहला ‘इंडिया’, जो अमेरिका जैसा बनने की चाहत में देश की वास्तविकताओं को नजरअंदाज करके दौड़ लगा रहा है, और दूसरा अभावग्रस्त ‘भारत’, जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और जिसके लिए इंडिया का विकास बहुत माने नहीं रखता है, क्योंकि उसके लाभ समाज के एक वर्ग-विशेष को ही अधिक मिलना है । लेकिन बात सर्वत्र इंडिया की होती है

पिछले कुछ काल से में ‘भारत’ सुनने के लिए तरस गया हूं, क्योंकि भारत का नामलेवा कोई नजर नहीं आता है । टेलीविजन चैनलों पर इंडिया, विज्ञापनों में इंडिया, क्रिकेट में इंडिया, हाकी में इंडिया, इंडिया की टीम, इंडियन खिलाड़ी, कॉमनवेल्थ गेम्ज में इंडिया, आर्थिक मुद्दों की चर्चा में इंडिया, इंडिया प्रॉग्रेसिंग, ‘इंडिया विल बिकम अ सुपरपावर’, ‘इंडिया शाइनिंग’, और भी क्या-क्या कहां-कहां । मुझे लगता है कि जल्दी ही वह दिन भी आएगा जब भावी पीढ़ियों के बच्चे पूछेंगे “ममी, ह्वेअर इज द कंट्री भारत ।” “आइ डॉन्ट नो, पर्हैप्स इट इज इन अफ्रिका ।” भारत यानी एक पिछड़ा देश, भूखा, नंगा… । “डॉन्ट कॉल इट भारत, कॉल इट इंडिया; ओ यस, दैट साउंड्ज नाइस… ”

उक्त ‘सॉंग’ में न तो भारत दिखता है और न ही भारतीयता के कोई भाव । यों इसमें कोई स्मरणीय भाव हैं भी नहीं । या हो सकता है अपनी ही नजर इतनी कमजोर हो चुकी हो कि मुझे भाव नजर ही न आ रहे हों । गलती मेरी ओर से ही हो रही होगी, शायद ।

इन खेलों का आयोजन इंडिया के लोगों द्वारा इंडिया के लोगों के लिए किया जा रहा है, जो दुनिया को “हम किसी से कम नहीं” दिखाना चाहते हैं । गरीब भारत की क्या हिम्मत हो सकती है भला ऐसे ‘भव्य और कीमती’ आयोजन कर सके । उस बेचारे के पास तो अनाज को सड़ने से बचाने के लिए निहायत जरूरी गोदाम तक बनवाने की हिम्मत नहीं है !

रोमन में लिपिबद्ध ‘ओ यारो ये इंडिया…’

उक्त गीत में भारत तो गायब है ही, साथ में यह रोमन/लैटिन में लिपिबद्ध है । आजकल अब हिंदी रोमन में लिखने का फैशन चल चुका है । देवनागरी जैसी क्लिष्ट लिपि कौन सीखे भला । रोमन/लैटिन लिपि तो हर किसी को सीखनी ही है, क्योंकि स्वतंत्र भारत में अंग्रेजी पहले से भी अधिक ‘पापुलर’ हो चुकी है । सर्वत्र अंग्रेजी छाई हुई है । देवनागरी लिपि का ज्ञान न हो तो चलेगा, लेकिन रोमन लिपि का ज्ञान न हो तो ? न बाबा न, तब तो जिंदगी दूभर हो जाएगी । जब अकेले रोमन लिपि से काम चल सकता है, तो उसी से क्यों न काम लिया जाए ? मुझे लगता है कि अब लोग देवनागरी में लिखना भूलते जा रहे हैं । नई पीढ़ी के ऐसे ‘हिंदीभाषियों’ की संख्या बढ़ती जा रही है जो हिंदी की वर्णमाला ही नहीं लिख सकते । मुझे याद आता है कि एक बार एनडीटीवी के श्री विनोद दुआ ने अपने टीवी कार्यक्रम पर इस बाबत अपने अध्ययन की जानकारी पेश की थी । (आप भी अपना वर्णमाला-ज्ञान एक बार चेक कर लें ।)

इस थीम सॉंग की एक और खासियत मुझे नजर आई । वह यह कि गीत के बोल हिंदी-अंग्रेजी के मिश्रण से बने हैं । आजकल हिंदी – बेहतर होगा हिंग्लिश कहना – बिना अंग्रेजी के तड़के या छौंके के नीरस और निरर्थक समझी जाती है । थोड़ी भी अंग्रेजी किसी ने अगर सीख ली तो वह उसे अपनी हिंदी में ठूंसे बिना चैन नहीं पाता है । अंग्रेजी वाली हिंदी देसी और शुद्ध हिंदी किसी अन्य ऐतिहासिक काल अथवा क्षेत्र की लगने लगती है ।
मेरे समझ में नहीं आता है कि क्यों नहीं पूरा गीत ही अंग्रेजी में लिखा गया । आखिर विदेशियों को हिंदी तो आती नहीं, वे तो अंग्रेजी ही नहीं जानते हैं । अफ् कोर्स हर विदेशी इंग्लिश नहीं जानता, किंतु कॉमनवेल्थ देशों के निवासी तो जानते ही हैं; सौभाग्य से वे अंग्रेजी हुकूमत में रहे हैं, और वहां अंग्रेजी की फसल तब से लहलहाते आ रही है । बहरहाल अपने ‘इंडिया दैट इज (नॉट!) भारत’ में तो गेहूं-धान की फसल उगाने पर उतना जोर नहीं जितना अंग्रेजी की फसल उगाने में । तब क्या यह अच्छा नहीं होता कि पूरा ही गीत अंग्रेजी में होता । जब आगामी गेम्ज का हर काम अंग्रेजी में ही होना है, जैसे उसका लोगो, तब इस गीत बेचारे को ही आधा-अधूरा हिंदी का परिधान क्यों पहनाया गया ? न अंग्रेजी वालों के लिए यह है और न ही हिंदी वालों के लिए; यह ता उनके लिए है जो दोनों जानते हों, कम या ज्यादा ।

स्वतंत्र हिंदुस्तान में टिप्पणी करने का सबको अधिकार है । मैंने भी उसका प्रयोग करते हुए टिप्पणी कर डाली । अब तो कुछ होना भी नहीं । पहले भी लिखा होता तो क्या हो जाता ! मैं जानता हूं, लेकिन यह दिल है कि मानता नहीं और कुछ लिखने बैठ गया । अब तो खेलों का इंतजार है । येनकेन प्रकारेण खेल संपन्न हो जावें यही देशवासी प्रार्थना कर रहे हैं । यों जब देखो जहां देखो अपशकुन खूब नजर आ रहे हैं । – योगेन्द्र जोशी

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