नोबेल शांति पुरस्कार मानवाधिकार तथा लोकतंत्र समर्थक लिउ जियाओबो को और चीन की नाराजगी

वर्ष 2010 का नोबेल शांति पुरस्कार

इस वर्ष का ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ चीन के 54 वर्षीय लिउ जियाओबो (Liu Xiaobo)  को दिया गया है । विगत 8 अक्टूबर इस बात की घोषणा ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा नार्वे की राजधानी ओस्लो में की गयी । मैंने यह समाचार बीबीसी-हिंदी वेबसाइट पर पढ़ा । यों आज के प्रायः सभी समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक सूचना माध्यमों ने इसकी चर्चा प्रमुखता से की है ।

इस वर्ष के पुरस्कार का समाचार अधिक दिलचस्प एवं महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लियाओबो चीन के नागरिक हैं और पिछले कई वर्षों से वे चीन में मानवाधिकार के हनन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक के विरुद्ध आवाज उठाने वालों में प्रमुख रहे हैं । 1989 में बीजिंग के तियाननमेन चौक में संपन्न हुई विरोध रैली में उनकी विशेष भूमिका रही थी । पिछले ही वर्ष उन्होंने बहुदलीय शासन व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में चाटंर-8 नाम का दस्तावेज तैयार किया था, जिसे चीनी सरकार ने अपराध मानते हुए उन्हें 11 साल की कारावास की सजा दे रखी है ।

नाराजगी चीन की

इस पुरस्कार से चीन बेहद नाखुश है । उसने जियाओबो को गंभीर अपराधी कहते हुए नॉर्वे के राजदूत को बुलाया और तुरंत अपना विरोध दर्ज किया । चीन ने आगाह किया है कि नार्वे के साथ उसके संबंध इस पुरस्कर से बिगड़ सकते हैं । लेकिन नार्वे ने स्पष्ट किया है कि नोबेल समिति एक स्वतंत्र संस्था है, और वह उसके निर्णयों को प्रभावित नहीं कर सकता । कहा जाता है कि चीन ने उस समिति पर काफी दबाव डाला था कि जियाओबो को पुरस्कर न दिया जाये । दरअसल उसकी नजर में, और कदाचित वहां के राष्ट्रवादी जनता की नजर में, यह पुरस्कार चीन को नीचा दिखाने और उसे निर्दय देश के रूप में पेश करने का प्रयास है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस पुरस्कार से विश्व भर में जियाओबो के पक्ष में जनमत बनने लगा है । हांक-कांग में उनके पक्ष में आवाज उठने लगी है । अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी उनको रिहा किए जाने की बात कही है । राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून के अनुसार यह पुरस्कार विश्व भर में मानवाधिकार स्थापना और सांस्कृतिक परिष्करण की आवश्यकता को रेखांकित करता है । वस्तुतः विश्व भर के राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है । जियाओबो की पत्नी लिउ जिया पुरस्कार से अतीव संतुष्ट है और उसने उन सभी की प्रशंसा की है जो जियाओबो के पक्ष में बोलते रहे हैं । अब नई खबर है कि उसे सरकार बीजिंग छोड़कर छोटे शहर जिनझाओ (Jinzhou), जहां जियाओबो जेल में हैं, जाने को विवश कर रही है

लोकतंत्र मानवाधिकार की गारंटी नहीं

उक्त पुरस्कार दो खास बातों को ध्यान में रखते हुए दिया गया हैः पहला शासन के स्तर पर मानवाधिकार हनन का विरोध, और दूसरा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के पक्ष में जनमत बनाना, ताकि चीन की एकदलीय व्यवस्था समाप्त हो । मैं व्यक्तिगत तौर पर मानवाधिकार के पक्ष में हूं और उन सभी को

मेरा समर्थन है जो इस दिशा में सक्रिय हैं । किंतु मैं इस बात पर जोर डालता हूं कि मानवाधिकार का बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था से कोई सीधा रिश्ता नहीं हैं । यह कोई गारंटी नहीं है कि ऐसी व्यवस्था मानवाधिकार के लिए समर्पित हो । यह भी जरूरी नहीं है कि राजशाही अथवा एकदलीय शासन-पद्धति में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो ही । वस्तुतः बहुदलीय लोकतंत्र सभी मौकों पर सफल रहेगा यह मानना गलत है । अपना देश भारत इस बात का उदाहरण पेश करता है कि लोकतंत्र यदि अयोग्य हाथों में चला जाए तो वह घातक सिद्ध हो सकता है । अपने देश में मानवाधिकार हनन आम बात है । लेकिन चूंकि उसके शिकार कमजोर और असहाय लोग होते हैं और उसमें बलशाली लोग कारण होते हैं, अतः वे बखूबी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं । हमारे जनप्रतिनिधि जिसको चाहें उसे परेशान कर सकते हैं, प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी किसी भी निरपराध को सलाखों के पीछे भेज सकते हैं, न्यायिक व्यवस्था कमजोरों को न्याय नहीं दिला सकती है, और सरकार अपने विरोधियों पर कभी भी डंडे बरसा सकती है, इत्यादि । ये सब मानवाधिकार के विरुद्ध होते हैं, किंतु जांच-पड़ताल का कार्य करने वाले लीपापोती करके ‘जो हुआ’ उसे ‘नहीं हुआ’ घोषित कर देते हैं ।हमें यह भी समझना चाहिए कि पिछले तीस वर्षों में चीन ने भिभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की है, और कभी भारत से पिछड़ा रहा वह देश अब कहीं आगे निकल चुका है, उसके पीछे उसका अनुशासित एकदलीय शासन है । यदि भारत की तरह का लोकतंत्र वहां भी स्थापित हो जाए तो उसकी भी हालत बदतर हो जाएगी । हमारे यहां के लोकतंत्र में स्वतंत्रता का अर्थ है अनुशासनहीनता, निरंकुशता, नियम-कानूनों के प्रति निरादर भाव, आदि-आदि । हमारे राजनीतिक दलों के कोई सिद्धांत नहीं हैं, केवल सत्ता हथियाना और उस पर टिके रहने के लिए हर सही-गलत समझौता स्वीकारना उनकी प्रकृति बन चुकी है । क्या लोकतंत्र की हिमायत करते समय ऐसी बातों पर ध्यान दिया जाता है ? मैं इस पक्ष का हूं कि लोकतंत्र का समर्थन आंख मूंदकर नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह देखना निहायत जरूरी है कि संबंधित जनता और राजनेता लोकतंत्र की भावना को सही अर्थों में स्वीकारते हैं और उसके प्रति समर्पित हैं कि नहीं ? वास्तव में बुद्धिजीवी उसकी हिमायत महज इसलिए करते हैं कि आजकल लोकतंत्र का पक्ष लेना एक फैशन बन चुका है । कैसा लोकतंत्र, किसके द्वारा प्रबंधित लोकतंत्र, इन बातों पर विचार किए बिना ही वे उसकी हिमायत करते हैं ।

मेरी मान्यता है कि भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल आदि इस क्षेत्र के देश लोकतंत्र के लिए ढले ही नहीं हैं । इन देशों में लोकतंत्र की सफलता संदिग्ध है/रहेगी ।

और अंत में

इस बार के ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ की जानकारी लेते समय मुझे पता चला कि यह पुरस्कार नॉर्वे की राजधानी ऑस्लो में दिये जाते हैं, और पुरस्कार के चयन का कार्य ‘नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट’ (Norwegian Nobel Institute) में अवस्थित ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा किया जाता है । अन्य सभी पुरस्कार-प्राप्त-कर्ताओं का चयन और उन्हें प्रदान करने का कार्य स्वेडन की राजधानी स्टॉकहोम में ही ‘नोबेल पुरस्कार समिति’ द्वारा किया जाता है । आल्फ्रेड नोबेल, जिनके नाम पर यह पुरस्कार दिये जाते हैं वस्तुतः नॉर्वे के थे, किंतु उनका कार्यक्षेत्र प्रमुखतया स्वेडन ही रहा । अपनी वसीहत में लिख गये थे शांति पुरस्कार की चयन-प्रक्रिया आदि नॉर्वे में ही संपन्न होवे । नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट के निदेशक गायर लुंडस्टाड (Geir Lundestad) ने पुरस्कार के संदर्भ में बताया है कि इस बार पुरस्कार के लिए प्रस्तावित नामों की संख्या 237 थी, जो विगत सभी वर्षों की तुलना में सर्वाधिक है । इनमें 38 संस्थाओं के नाम भी शामिल थे । – योगेन्द्र जोशी

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