बजट 2011-12: काश, इंकम-टैक्स ही न लगता, और न कोई अन्य टैक्स

केंद्रीय बजट 2011-12

कल, 28 फरवरी, केंद्रीय वित्तमंत्री ने देश का बजट पेश कर दिया । पूरा भाषण तो मैंने सुना नहीं, बीच-बीच में कुछएक अंश सुनने से ही मन भर गया । भाषण के बाद आशानुसार प्रायः सभी चैनलों पर उसकी समीक्षा और मूल्यांकन का दौर चल पड़ा, उसे भी तल्लीनता से पूरे समय सुनने का विचार मन में नहीं उठा । फिर आज अखबारों में बजट की समीक्षा । न तो अपने को बहुत कुछ पढ़ने की फुरसत थी और न ही ऐसा करने की दिलचस्पी । सरसरी तौर पर कुछ पढ़ा-सुना बस काम चल गया । दो-एक बातें मुझे दिलचस्प लगीं, उसी कर चर्चा करने का विचार मन में उठा है ।

मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, न ही शौकिया अर्थशास्त्र का कभी कहने योग्य अध्ययन किया है । बजट क्या कह रहा है और उसकी क्या अहमियत है, यह तो समझ में आता है, किंतु उसे बनाने वाले किस सोच के साथ ‘यह किया जाए और फलां चीज न की जाए’ का निर्णय लेते हैं यह मैं नहीं समझ पाता । मैं तो विज्ञान – अधिक सही कहूं तो भौतिकी (फिजिक्स) – का अध्यापक-सह-अनुसंधानकर्ता रहा हूं । मैं भौतिकी के नियमों को लगभग ठीक-से समझ लेता हूं (लोग कह सकते हैं कि मुझे ऐसा भ्रम है!) । भौतिकी के नियम आज एक और कल कुछ और नहीं होते है । उनमें एक प्रकार की शाश्वतता बनी रहती है । भौतिकीविद परस्पर इतना मतभेद नहीं रखते हैं जितना अर्थशास्त्रीगण । मैं समझ नहीं पाता कि किसी साल बजट में एक बात होती है, तो दूसरे साल वह काट दी जाती है । कभी किसी चीज पर कम टैक्स तो कभी अधिक । ‘आम’ आदमी के क्या जरूरी है इस पर लोगों पर में गंभीर मतभेद देखने को मिलते हैं । सरकार के प्रशंसकों को बजट ‘बढ़िया’ दिखता है, आलोचकों को ‘घटिया’ । सच में, बजट के मामले में ‘जितने मुंह उतनी बातें’ वाला कथन चरितार्थ होता है ।

आयकर में राहत

अस्तु, मैं उस बात पर लौटता हूं जिससे मेरा सीधा-सीधा सरोकार है – आयकर यानी इंकम टैक्स, जिसमें घुमा-फिराकर मौजूदा सरकार ने कुछ राहत दी है । बहुत राहत नहीं दी है, जैसा कि लोगों का मत है (मेरा नहीं), जो मानते हैं कि राहत तो कहीं अधिक होनी चाहिए थी । हर कोई कहता है कि आयकर में और छूट मिलनी चाहिए थी । मेरे खयाल में शायद ही कोई इच्छा से आयकर देना चाहेगा, चाहे वह एक साधारण व्यक्ति हो जो किसी प्रकार अपने परिवार की गाड़ी खींच पा रहा हो, या अच्छाखासा खाता-पीता सुसंपन्न व्यक्ति जिसके पास भोगने से कहीं अधिक धन-संपदा हो । उससे भी अगर कहा जाए कि टैक्स-रेट घट गया है और तुम्हारी इतनी बचत होने जा रही है, तो वह खुशी के मारे उछलने लगेगा । पैसा है ही ऐसी चीज कि हाथ में आ जाने के बाद जिसे छोड़ने का मन नहीं करता है । पैसे का अपना अलग नशा होता है । अपने पास इतना है यह सोचकर ही प्रमुदित हो उठता है आदमी का मन । इसलिए छूट कुछ भी मिले कम ही लगेगी । काश, आयकर जैसी चीज ही समाप्त हो जाती!

लेकिन मुझे तो खूब छूट मिलने जा रही है । मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि मैं खुश होऊं या उदास । मैं पेंशन-भोगी हूं, उम्र में 60 साल से ऊपर और 65 से नीचे, और करीब नौ साल पहले ही विश्वविद्यालय छोड़कर ‘घर बैठने’ की ‘अक्षम्य मूर्खता’ (यह मैं नहीं, मेरे हितैशी मानते हैं!) के बावजूद सरकारी खजाने से पर्याप्त पेंशन बटोरता हूं । मेरी पेंशन बहुत नहीं है इस अर्थ में कि आजकल सेवानिवृत्त होने वाले उच्चपदस्थ अधिकारी मुझसे डेड़-दो गुना अधिक पेंशन पाते होंगे । फिर भी मैं संतुष्ट हूं, क्योंकि मेरी आमदनी मुझ सपत्नीक के लिए जरूरत से कम नहीं है । वह मेरी नजर में इतनी है कि अपना तो खर्च बखूबी चलता ही है, साथ में परिचित जरूरतमंदों की भी थोड़ी-बहुत मदद कर लेता हूं और हुए कुछएक संस्थाओं को चंदा भी भेजता हूं । यहां तक कि मेरी इच्छा अपनी नियमित दवाइयों का पैसा अपनी संस्था से वसूलने की नहीं होती है । और अंत में पर्याप्त टैक्स भी जमा करता हूं, टैक्स बचत की कोशिश किए बिना । मुझे लगता है कि मुझे अधिक राहत की जरूरत नहीं है । और मेरी तरह कइयों को जरूरत नहीं होनी चाहिए । लेकिन टैक्स में भारी छूट का हकदार तो मैं हो ही चुका, जिसका औचित्य तार्किक चिंतन के आदी एवं वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के मुझ साधारण व्यक्ति की समझ से परे है । सो कैसे बताता हूं ।

‘अतिवरिष्ठ’ नागरिक

पिछले वर्ष पुरुषों, महिलाओं, एवं वरिष्ठ नागरिकों (स्त्री/पुरुष) के लिए क्रमशः रुपया 1.60, 1.90 एवं 2.40 लाख तक की आमदनी (अनुमत कटौतियों को घटाकर बची आय) पर आयकर शून्य था । सरकार ने इस बार ये सीमाएं 1.80 एवं 2.50 लाख क्रमशः 60 वर्ष अथवा कम उम्र वाले व्यक्तियों और वरिष्ठ (60 या अधिक किंतु 81 साल से कम उम्र वाले) नागरिकों के लिए नियत की हैं । 80 साल की आयु पार कर चुके लोगों के लिए वित्तमंत्री ने ‘अतिवरिष्ठ’ नागरिकों (very senior citizens) की एक नई श्रेणी भी परिभाषित की है, और उनके लिए उक्त सीमा 5.00 लाख निर्धारित हुई है । अर्थात् अतिवरिष्ठ नागरिकों को अब 5.00 लाख तक की आमदनी पर कोई टैक्स नहीं देना होगा । उनकी तो बल्ले-बल्ले ।

मैं समझ नहीं पाया कि क्या महिलाओं की उक्त आयकर सीमा अभी 1.90 लाख रहेगी या वह भी घटकर 1.80 हो जाएगी । अब जो सवाल मेरे जेहन में घूम रहा है वह यह है: वह कौन से कारण थे जिनके चलते अभी तक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में विशष छूट दी जा रही थी, और अब जो नहीं रहे कि छूट या तो समाप्त कर दी गयी या एकदम घटा दी गयी । मेरा वैज्ञानिक दिमाग इस बात को नहीं समझ पाता है कि क्यों हर बार नए-नए प्रयोग होते हैं । पुरूषों और स्त्रियों में कभी भेद करना तो कभी भेद मिटाना करीब सवा लीटर के अपने भेजे में नहीं घुसता है ।

खैर, आगे बढ़ता हूं । अब 60 वर्ष पार करते-करते आप वरिष्ठ नागरिक को जाएंगे । कल तक ऐसा नहीं था; आपको 65 तक इंतिजार रहता था । अब वह इंतिजार खत्म । मैं भी अब पहली अप्रैल (अप्रिल फूल्स डे!) से ‘वरिष्ठ नागरिक’ हो जाऊंगा और साथ में पाऊंगा आयकर में हजार-पांचसौ नहीं पूरे 9 हजार की छूट । वाह रे किस्मत! और मुझसे भी अधिक ‘भाग्यशाली’ होंगे वे जो 80 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं या करने जा रहे हैं । वे कहलाएंगे ‘अतिवरिष्ठ’ नागरिक और उनको मिलेगी 25 हजार की अतिरिक्त छूट! यानी वे 5.00 लाख की आमदनी करें तो भी उनको धेले भर का टैक्स नहीं देना होगा । मैं इस छूट को ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाली व्यवस्था के अनुरूप देखता हूं । इस रियायत के औचित्य को मैं समझ नहीं सकता । अंधेरगर्दी ही कहूंगा इसे । क्यों? इसके मेरे पास तर्क हैं, बताता हूं, लेकिन कल की पोस्ट में, 24 घंटों के भीतर ।योगेन्द्र जोशी

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