बजट 2011-12: अतिवरिष्ठों की करयोग्य आय की सीमा बढ़ाने का औचित्य भला क्या है?

बीते कल (1 मार्च 2011)  की अपनी ब्लाग-प्रविष्टि में मैंने जिक्र किया था कि अपने बजट भाषण में देश के वित्तमंत्री ने आयकरदाताओं की एक नई श्रेणी परिभाषित की है । 80 साल की उम्र पार कर चुके नागरिकों को ‘अतिवरिष्ठ’ (very senior) नाम देते हुए उनके लिए खास एवं खूब रियायत देने का प्रस्ताव पेश हुआ है । मेरी जानकारी में यह एक नितांत नई अवधारणा है । प्रस्ताव के अनुसार उनको अब रुपया 5.00 लाख तक की आमदनी (मान्य कटौतियों को घटाकर बची आय) पर कोई टैक्स नहीं देना होगा । वरिष्ठ नागरिकों के लिए रियायत पहले से ही मौजूद थी जिसे 2.40 लाख से बढ़ाकर 2.50 लाख करने की बात कही गयी है । इतना ही नहीं, ‘वरिष्ठ नागरिक’ (senior citizen) की परिभाषा भी बदली जा रही है; अब 60 (विगत वर्षों में 65) वर्ष पार करते-करते आप वरिष्ठ कहलाएंगे । मुझ जैसे लोग, जो अभी 65 नहीं छू सके हैं, भी वरिष्ठ हो जाऐंगे । ऐसे पुरुषों को अब 9.00 हजार की अतिरिक्त आयकर छूट मिलेगी और महिलाओं को 6.00 हजार की । (महिलाओं को पहले से ही कुछ अतिरिक्त छूट मिल रही थी ।) इसके अलावा नये प्रस्ताव में ‘अतिवरिष्ठों’ को ‘वरिष्ठों’ की तुलना में 25 हजार की और छूट की बात है । इस आधारभूत जानकारी की प्रस्तुति के बाद मैं असली मुद्दे पर आता हूं ।

मेरे मन में यह जानने एवं समझने की उत्कंठा है कि ‘वरिष्ठ’, खास तौर पर ‘अतिवरिष्ठ’ जनों को आयकर में छूट देने के पीछे कौन से तर्कसम्मत आधार (rationale) नीतिनियंताओं के विचार में रहा होगा । नये बजट के अनुसार मैं स्वयं वरिष्ठता का लाभ पाने जा रहा हूं, फिर भी मैं सवाल उठा रहा हूं यह किसी के समझ में शायद ही आये । मैं देश का शायद अकेला करदाता होऊंगा जो ऐसा ‘बेहूदा’ सवाल उठा रहा हो । लेकिन वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले एवं तार्किक चिंतन के हिमायती मुझे पूरी बात समझ से परे लगती है । चूंकि मुझे लाभ मिलने वाला है, अतः मेरे मन में सवाल ही नहीं उठना चाहिए यह बात मेरे चिंतन को नहीं दबाती है । सवाल अपनी जगह है और लाभ-हानि अपनी जगह ।

आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट कर दूं कि जेब में आए पैसे को कोई खोना नहीं चाहेगा । आयकर देना कानूनी बाध्यता है, इसलिए लोग खजाने में इसे देते हैं, लेकिन कम से कम देना पड़े इसकी विधिसम्मत कोशिश भी करते हैं । यदि सरकार खुद ही राहत दे रही हो तो खुशी तो होगी ही । मुझे इस सब पर कोई आपत्ति भी नहीं है । कई ऐसे लोग हैं जो पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को निभाने में आर्थिक कष्ट अनुभव करते हैं । उन्हें यदि राहत मिले तो उनकी जिंदगी कुछ कम दूभर हो जाये । इसलिए यह हिसाब लगाना जरूरी है कि किस श्रेणी के लोगों को राहत पहले मिलनी चाहिए और किसके लिए राहत की जरूरत नहीं है । मैं समझता हूं कुछ लोग इतने सुसंपन्न होते हैं या कुछ की जिम्मेदारियां इतनी सीमित हो चुकी होती हैं कि उन्हें राहत देना आवश्यक नहीं है । यह बात अलग है कि राहत दिये जाने पर वे लपक के उसे स्वीकारेंगे और खुश होंगे । किंतु व्यापक सामाजिक वास्तविकताओं के संदर्भ में उन्हें राहत न मिले तो अनुचित नहीं होगा । सवाल यह है कि राहत किसे पहले मिले । मैं अपनी सोच स्पष्ट करता हूं ।

मैं उस श्रेणी के लोगों की बात नहीं कर रहा हूं जिनको बाप-दादों से अच्छी-खासी संपदा मिली हो, जिससे अथवा अपने पेशे से जिनकी आमदनी इतनी हो कि उनके लिए आर्थिक कष्ट की स्थिति ही पैदा न हो । मैं उनकी चर्चा कर रहा हूं जो नौकरी-पेशे से कुछ कमा-धमा लेते हैं और अपनी एवं अपने परिवार की आवश्यकताओं को येनकेन प्रकारेण पूरा कर पाते हैं । मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि एक औसत भारतीय पच्चीस-तीस साल की उम्र पाते-पाते गृहस्थ जीवन में पदार्पण करता है । उसके बाद परिवार में वृद्धि होने लगती है । उसकी जिम्मेदारियां निरंतर बढ़ने लगती हैं । एक ओर उसे अपने बुजुर्गों का दायित्व निभाना होता है तो दूसरी ओर बाल-बच्चों की आवश्यकताएं पूरी करनी होती हैं । समय के साथ ये आवश्यकताएं बढ़ती जाती हैं । बच्चे बड़े होने लगते हैं, उनका भोजन-पानी बढ़ता है, लत्ते-कपड़ों की जरूरत बढ़ती हैं, स्कूल-कालेजों का खर्चा सामने आता है, और इन तमाम बातों के साथ वैयक्तिक इच्छाओं/आकांक्षाओं में वृद्धि होती है । आमदनी भले ही बढ़ती जाती हो, ऐसे दायित्व बढ़ते जाते हैं ।

किंतु समय के साथ स्थिति बदलती है । आम तौर पर लोगों की जिम्मेदारियां 60-65 की आयु तक पहुंचते-पहुंचते घट चुकती हैं, या घटने लगती हैं । बच्चों के लालन-पोषण, उनके शादी-ब्याह आदि जैसे कार्य संपन्नप्राय हो चुकते हैं । मकान आदि की व्यवस्था भी सामान्यतः हो चुकती है । कम से कम वे लोग, जो आयकरदाता की श्रेणी में आते हों, वृद्धावस्था पाते-पाते अपनी अधिकांश जिम्मेदारियां पूरी कर चुकते हैं । मेरा विश्वास है 80 वर्ष की उम्र पार कर चुकने पर ऐसे व्यक्ति के पास बहुत कुछ पाने या करने को नहीं रह जाता है, जिसके लिए अब उसे राहत दी जाए । मेरे मत में किसी बुजुर्ग को इस उम्र में अपने लिए न तो मकान की सोचनी चाहिए और न कार खरीदने की । सीधी-सी बात यह है कि उसके अपने निजी खर्चे भी काफी हद तक घट चुकते हैं । तब चिकित्सा तथा दवा ही मुख्य बन जाते हैं । वह भी बहुत अधिक नहीं, आम तौर पर नहीं । कुछ ही बदकिस्मत होंगे जिनको भारी-भरकम राशि इस मद पर खर्चना पड़ सकता है । वे अपवाद कहलाएंगे, और ऐसे अपवाद तो युवावस्था/प्रौढ़ावस्था के लोगों में भी मिलेंगे । यदि उन जिम्मेदारियों से मुक्त बुजुर्गों को राहत दी जाने की सोची जाती है, तो फिर कम उम्र के लोगों को क्यों न राहत मिले, जिनकी जिम्मेदारियां कहीं अधिक होती हैं, स्वयं के और स्वयं से जुड़े लोगों के प्रति?

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आयकर में छूट किसी व्यक्ति की जवानी एवं प्रौढ़वस्था में अधिक सार्थक और उपयोगी समझी जानी चाहिए न कि तब जब कब्र में पांव लटक रहे हों । ऐसा इसलिए कि व्यक्ति वृद्धावस्था से पूर्व ढेरों दायित्व निभा चुकता है । एक और बात यह है कि जो व्यक्ति इस उम्र में भी आयकरदाता की श्रेणी में आ रहा हो, उसकी आमदनी कमाने-धमाने की उम्र में कम नहीं रही होगी । और तब उसे राहत नहीं दी तो अब देने का औचित्य क्या है ?

निस्संदेह लोगों के अपने-अपने परस्पर बेमेल मत होते हैं, जिनके पक्ष में वे तर्क-कुतर्क, सभी कुछ पेश कर सकते हैं । इसलिए सामाजिक सरोकार के मुद्दे पर कोई भी मत सर्वमान्य नहीं होता । फिर भी ऊपर कही गयी बातें विचारणीय हैं । – योगेन्द्र जोशी

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