पागलपन की हद पार कर चुकी क्रिकेट की दीवानगी

“अतिसर्वत्र वर्जितम्” – चिंतकों-विचारकों के सर्वकालिक वचन

मैं उन गिने-चुने लोगों में से एक हूं जिसे क्रिकेट में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं । क्रिकेट का बल्ला शायद ही कभी मैंने पकड़ा होगा, कंमेंटरी भी शायद ही गौर से सुनी होगी, और क्रिकेट मैच तो शर्तिया कभी नहीं देखा । यदि किसी ने मुझे क्रिकेट विश्व कप का टिकट भेंट किया होता और साथ में कीमती उपहार भी दिये होते तो भी मैं विनम्र भाव से मना कर देता । 8-9 घंटों की मैच देखने की सजा मुझे स्वीकार्य नहीं । पर यह सब मेरी बात है । कई लोगों को क्रिकेट में बेहद रुचि रहती है, खास तौर पर युवा वर्ग के लोगों को, जिसमें आज की तारीख में युवतियां भी अच्छी-खासी संख्या में शामिल हैं । शौक होना समझ में आता है, लेकिन वह पागलपन की हदें पार कर ले तो वह मेरी नजर में चिंताजनक है । सद्यःसंपन्न विश्व कप मैचों के दौरान मैंने क्रिकेट का जो जनून मैंने लोगों में देखा वह मेरी समझ से परे है ।

चिरकालिक प्रतिद्वंदी पाकिस्तान

विगत बुधवार, 30 मार्च, के भारत-पाकिस्तान (जिसे लोग इंडिया-पाकिस्तान कहना अधिक ठीक समझते हैं) सेमीफाइनल मैच में पागलपन का जो नजारा मैंने देखा वह वाकई दिलचस्प था । जब भी भारत एवं पाकिस्तान के बीच क्रिकेट या हाकी मैच होता है (अन्य कोई मैच तो शायद ही कभी होता हो!), तब ऐसा लगता है कि मानो बॉर्डर पर तोपों-मिसाइलों के साथ दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया हो । यदि वाकई युद्ध छिड़े तो भी उतने लोग इस कदर उत्सुक, बेचैन या चिंतित नहीं होंगे जितने कि क्रिकेट मैच के मामले में । लोगों की दिलचस्पी खेल की बारीकियों, खिलाड़ियों के अंदाज, उनकी कलाकारी आदि में उतनी नहीं रहती है जितनी कि अपने ‘पुस्तैनी प्रतिद्वंदी’ देश को हराकर विजयी मुद्रा अख्तियार करने में । हम कितना ही भारत-पाक मैत्री की बात कर लें, दोनों देशों के मैच में परस्पर ‘दुश्मन’ होने का भाव साफ झलकता है । हम भले ही खुलकर बोलने से परहेज करते दिखें, किंतु पाकिस्तान के प्रति मन में छाए ‘घृणा भाव’ से मुक्त नहीं हो सके हैं । (भारत के प्रति पाकिस्तान का रवैया भी कुछ ऐसा ही है ।) अपने अनुभव से मुझे यही लगता रहा है कि पाकिस्तान बनाम किसी अन्य देश के मैच में हम देशवासियों की दिली इच्छा यही रहती है कि पाकिस्तान हार जाये । सच क्या है इसका दावा मैं नही करता । बीते बुधवार के सेमीफाइनल के प्रति लोगों के बीच जो दिलचस्पी मैंने देखी वह कल, 2 अप्रैल, के फाइनल मैच से कम नहीं थी, जब कि कल का मैच अहम एवं निर्णायक मैच था – विश्व कप विजेता बनने के लिए । जाहिर है कि पाकिस्तान के साथ ‘लड़ाई’ के माने ही कुछ खास हैं !

क्रिकेट – ब्रिटिश राज की निशानी

खैर, यह तो हुई पाकिस्तान के संदर्भ में अनुभव की जाने वाली खास बात । लेकिन हम भारतीयों का क्रिकेट-बुखार तो बहुत व्यापक है, पाकिस्तान मैदान में हो न हो । आगे अपनी बात कहूं इससे पहले बता दूं कि जिज्ञासावश मैंने इंटरनेट से कुछ जानकारी जुटाई । एक वेबसाइट पर मुझे यह रोचक टिप्पणी पढ़ने को मिली (देखें http://www.worldcricketblog.com/world-cricket/why-still-so-few-countries-play-cricket):

“Countries like Bangladesh, Kenya, Bermuda, Netherlands, Ireland etc etc should not be considered cricket playing countries because they are poor performers. But to save face of cricket boards, they are entered into world cups and other big profile tournaments only so that the sport officials can declare that now many countries play cricket.” (बांग्लादेश, केन्या, बरमूडा, नेदरलैंड, आयरलैंड इत्यादि सरीखों को क्रिकेट खेलने वाले देश नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि इनका खेल निम्नस्तरीय है । लेकिन क्रिकेट बोर्डों की साख रखने के लिए उनको विश्व कपों एवं अन्य नामी-गिरामी टूर्नामेंटों में शामिल किया जाता है, ताकि खेल अधिकारी कह सकंे कि बहुत सारे देश क्रिकेट खेलते हैं ।)

निःसंदेह उपर्युक्त देश क्रिकेट के मामले में कहीं नहीं टिकते हैं । बांग्लादेश के बारे में लोग शायद एकमत न हों । किंतु एक बात तो सभी मानेंगे कि क्रिकेट केवल कुछ ही देशों में खेला जाता है और उनमें से सभी, नेदरलैंड को छोड़कर, ब्रितानी राज के हिस्से रहे हैं । शायद उसी राज के अंतर्गत क्रिकेट ने इन देशों में अपने पांव पसारे, और कालांतर में वहां की जनता को अपने मोहपाश में बांध लिया । ये देश राजकाज की दृष्टि से स्वतंत्र तो हो गये, लेकिन दो चीजों से मुक्ति नहीं पा सके । ये दो चीजें हैं:  क्रिकेट एवं अंग्रेजी ।

क्रिकेट में लेशमात्र भी रुचि न होने के बावजूद मैंने इंटरनेट से यह जानकारी हासिल की कि इस खेल की स्पर्धाओं पर नियंत्रण रखने वाली विश्वस्तरीय संस्था ‘अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद्’ (International Cricket Council, कार्यालय दुबई में) है जिसके केवल 10 ‘पूर्ण’ सदस्य हैं: (1) आस्ट्रेलिया, (2) बांग्लादेश, (3) इंग्लैंड (ब्रिटेन नहीं!), (4) ‘इंडिया’, (5) न्यूजीलैंड, (6) पाकिस्तान, (7) साउथ अफ्रिका, (8) श्रीलंका, (9) वेस्ट इंडीज – उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका के मध्य के द्वीप समूह, और (10) जिम्बाब्वे (पूर्व में रोडेसिया) । (देखें http://en.wikipedia.org/wiki/Cricket)

गौर करें कि ये सभी देश पूर्व में ब्रितानी राज के अधीन थे । मेरी नजर में क्रिकेट अंग्रेजी की भांति हमारी गुलामी की निशानी है, जिसे हम बड़े गर्व से अपनाए रखना चाहते हैं !

उपरिलिखित के अलावा अफगानिस्तान, आयरलैंड, स्कॉटलैंड सरीखे 94 ‘एसोसिएट/एफिलिएट’ सदस्यों की बात भी की जाती है, किंतु क्रिकेट के क्षेत्र में इनका नाम शायद ही कोई लेता है । बहरहाल क्रिकेट वहां लोकप्रिय तो नहीं ही है ।

क्रिकेट – दीवानगी की कोई हद नहीं

क्रिकेट की दीवानगी उस इंग्लैंड में भी नहीं है जिसे इसका जन्मस्थल माना जाता है । इंग्लैंड और प्रायः पूरे यूरोप में फुटबॉल सर्वाधिक लोकप्रिय है । आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड में भी रग्बी की लोकप्रियता क्रिकेट के ऊपर आंकी जाती है । मेरे मतानुसार विश्व के प्रमुख देशों में लोगों की वैयक्तिक रुचि विभिन्न खेलों में देखी जाती है, अपने भारतीय उपमहाद्वीप के देशों की तरह क्रिकेट और केवल क्रिकेट में नहीं । चीन, जापान, रूस, जर्मनी, स्पेन, ब्र्राजील आदि देशों में क्रिकेट की स्थिति वैसी ही होगी जैसी तमाम अन्य खेलों की, जिनमें आम आदमी की खास रुचि नहीं रहती; दीवानगी तो हरगिज नहीं ।

मैं कभी-कभी उन कारणों को जानने-समझने की कोशिश करता हूं, जिनके चलते इस देश में क्रिकेट की दीवानगी पागलपन की हदें पार कर चुकी है । क्रिकेट का रोग इस देश को वर्षों से लगा हुआ है । मुझे अपनी युवावस्था के दिन याद हैं, जब केवल 5-दिनी टेस्ट क्रिकेट खेला जाता था, और लोग रेडियो से चिपके रहते थे, या स्कूल-कालेज-आफिस आते-जाते चौराहों पर स्कोर जानने या कमेंटरी सुनने के लिए भीड़ लगाते थे । बीच-बीच में चौके-छक्के लगने या खिलाड़ी के आउट होने पर तालियां बजतीं या हल्ला मचता । दिन-ही-दिन में खेल आरंभ और समाप्त होते । लिहाजा तब न पटाखे छूटते थे और न ही समाचारों में क्रिकेट छाया रहता था । प्रायः सभी खिलाड़ी ‘स्टेट बैंक’ जैसी संस्थाओं के कर्मी होते थे, जिनकी आमदनी लाखों करोड़ों में नहीं होती थी । या फिर वे धनी परिवारों से होते थे जैसी नवाब पटौदी । उस जमाने में टेलिविजन भी नहीं था और आम आदमी के मनोरंजन के लिए सिनेमा था या फिर क्रिकेट । आज मनोरंजन के अनेकों साधन हैं, किंतु क्रिकेट की महत्ता घटने के बजाय बढ़ती जा रही है । क्यों ?

क्रिकेट – आर्थिक लाभ की खान

क्योंकि समय के साथ क्रिकेट खेल कम और धन-कमाऊ धंधा अधिक बन चुका है । गरीब देश भारत का क्रिकेट बोर्ड तो दुनिया का सर्वाधिक धनी बोर्ड बन चुका है । क्रिकेट कार्पोरेट व्यवसाय का रूप धारण कर चुका है, जो हर उस व्यक्ति का व्यावसायिक हित साधता है जो उससे जुड़ा है, दर्शक को छोड़कर । खिलाड़ी खेल से नहीं विज्ञापनों से अब मालामाल हो रहे हैं, क्योंकि टेलीविजन घर-घर पहुंच चुका है । खिलाड़ी और टीमें बिकने लगी हैं, सट्टेबाजी और मैच-फिक्सिंग इस ‘बिजनेस’ का हिस्सा बन चुके हैं । खेल खेल नहीं रह गया है । इस धंधे के केंद्र में है दर्शक । वह नहीं न रहे तो पूरा धंधा चौपट । इसलिए उसकी भावनात्मक कमजोरी का भरपूर लाभ उठाकर उसे क्रिकेट का अंधभक्त बनाए रखना आवश्यक है, ताकि वह क्रिकेट के सामने सब कुछ भूल जाए । क्रिकेट एक तरफ और सारी दुनिया दूसरी तरफ । मैं महसूस करता हूं कि दर्शकों का ‘ब्रेन-वाश’ करने की तमाम कोशिशें इस समय चल रही हैं, परोक्ष तौर पर, कुछ ऐसे कि उन्हें पता न चले, जैसे ठगी का धंधा चलता है ।

हर कोई इस समय क्रिकेट के प्रति समर्पित है, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से लेकर आम शहरी तक । ऐसा लगता है कि हमारी विदेश नीति भी क्रिकेट तय करेगी । पिछले कुछ दिनों से मैं टेलीविजन पर समाचारों के लिए तरस गया हूं । हर न्यूज चैनल पर क्रिकेट ! यूं टीवी चैनल जितना समय अकेले क्रिकेट को देते हैं उतना अल्पांश भी किसी और मुद्दे को नहीं । अखबारों के भी दो-तीन पृष्ठ क्रिकेट को ही समर्पित रहते हैं । ‘गेम्ज एंड स्पोर्ट‌स’ के नाम पर भी केवल क्रिकेट । इधर क्रिकेट, उधर क्रिकेट, सर्वत्र क्रिकेट । और बीते दिनों तो प्रथम पृष्ठ भी क्रिकेट की बातों से रंगा देखा है । क्या क्रिकेट को छोड़कर कुछ भी अब हमारे लिए अहम नहीं रह गया है ?

आप कहेंगे कि भारतीयों का क्रिकेट के प्रति लगाव ही बहुत अधिक है तो हम उसकी बात क्यों नहीं करेंगे । वे चाहते ही क्रिकेट चर्चा या समाचार । लेकिन आप विचार करें कि यह तथाकथित लगाव पैदा किया किसने ? दरअसल सवाल पहले अंडा कि मुर्गी का है । आप बचपन से ही किसी को शराब पिलाए, सिगरेट पिलाएं, नशे की दवाएं खिलाएं और फिर बाद में कहें कि वह तो इनका आदी है । क्या आपने कभी किसी और खेल की बातें उसी प्रकार से की हैं जैसे क्रिकेट की करते हैं । देश के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक जिस उत्साह से और सम्मान भाव से क्रिकेट खिलाड़ियों से मिलते हैं उतना अपने राष्ट्रीय खेल हाकी खिलाड़ियों से भी नहीं मिलते । जैसे कल के फाइनल मैच में राजनीति और अन्य क्षेत्रों की ‘टाप सेलेब्रिटीज’ स्टेडियम में मौजूद थे, उनकी वैसी दिलचस्पी अन्यत्र देखने को मिल सकती है क्या ? आप क्रिकेट को परोसते हुए उसका नशा लोगों में पैदा करते चलें और फिर कहें कि हम क्या करें । क्रिकेट का व्यवसाय में पैसा ही पैसा है, और ऐसे बहाने उसे आगे बढ़ाने में मददगार होते हैं । मीडिया तक उसमें शामिल है । सच यही है, और आप इसे हरगिज नहीं मानेंगे ।

क्या वजह है कि आप क्रिकेट संबंधी प्रसारण को सनसनीखेज बना के प्रस्तुत करते हैं ? क्यों सचिन को क्रिकेट का भगवान कहते हैं ? अपने-अपने क्षेत्रों में महारत हासिल करने वाले कई लोग आज तक पैदा हो चुके हैं । उनके लिए भी कभी ऐसे शब्द इस्तेमाल किया है क्या ? क्रिकेट के फाइनल को महायुद्ध क्यों कहते हैं ? यह युद्ध नहीं एक खेल है, रोमांचक । दुनिया फतह कर ली जैसे उद्गार क्यों मुख से निकलते हैं ? विश्व कप जीतते हैं, कोई फतह नहीं करते, किसी भी क्षेत्र में नहीं । फिर ऐसे शब्द किसको आकर्षित करने के लिए कहते हैं ? और क्रिकेट का विश्व कप तो नाम भर को वैश्विक है, अंग्रेजों के गुलाम रह चुके देशों तक सीमित । किसी और देश को यह जानने की भी फुरसत नहीं होगी कि कौन जीता कौन हारा । देश की प्रतिष्ठा की झूठी बात करते हैं । ओलल्पिक में हमारे हालात पतले रहते हैं, तब प्रतिष्ठा की बात क्यों भूल जाते है । केवल क्रिकेट ही प्रतिष्ठा का द्योतक क्यों है ? क्योंकि इससे पैसा जुड़ा है ! प्रतिष्ठा के लिए अन्य क्षेत्र कहीं अधिक अहम हैं ।

पिछले कुछ दिनों से मैं पुणे प्रवास पर हूं, एक बहु-आवासीय संकुल में अपने मेजमान के साथ । क्रिकेट कप के बीते सेमीफाइनल-फाइनल की जीतों पर रात्रि 11-12 बजे जो शोर-शराबे और आतिशबाजी का दौर चला वह मेरे लिए असह्य था । आसपास बूढ़ों, छोटे बच्चों, मरीजों पर क्या बीत सकती है इसकी किसी को भी चिंता नहीं । दीवाली पर्व पर अपीलें होती हैं कि पटाखे न छोड़े, वायु-ध्वनि प्रदूषण से बचें, आदि । कई शहरों में रात्रि 10 बजे के बाद शोर-शराबे की खास मनाही है । किंतु क्रिकेट के नाम पर सब माफ है । वाह रे स्वतंत्रता की ‘इंडियन’ परिभाषा ! जश्न के नाम पर जिसकी जो मर्जी वह करे ।

क्रिकेट के नाम पर टोटके भी

और जिस बात को लेकर मेरी हंसी रुक नहीं पाती है वह है कि लोगबाग क्रिकेट कप जीतने के लिए हर टोटका अपनाने को तैयार थे । यज्ञ-यागादि, भजन-कीर्तन, पूजापाठ, गंगास्नान और न जाने क्या-क्या का किया गया । क्रिकेट का विश्व कप क्या हो गया जीवन-मरण का खेल बन गया । यदि ये टोटके कारगर ही होते हों तो क्यों नहीं उन्हें देश की ज्वलंत समस्याओं को सुलझाने में किया जाता है ? क्यों नहीं क्रिकेट के लिए चिंतित ये लोग भुखमरी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, अपराध आदि से मुक्ति पाने के लिए इन टोटकों को अपनाते हैं ? ऐसी हरकतों को मैं पागलपन या अव्वल दर्जे की मूर्खता न कहूं तो क्या कहूं ? – योगेन्द्र जोशी

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