प्रधानमंत्रीः “इंडिया अमेरिका नहीं है”, बेशक! और सरकारः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं”, क्या वाकई?

इंडिया अमेरिका नहीं है

अपनी हालिया अफगानिस्तान यात्रा के दौरान देश के माननीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहनजी ने आतंकवाद के संदर्भ में है कहा था कि इंडिया अमेरिका नहीं है (ऐसी ही खबर सुनने को मिली थी) । ये बात प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे कि अपने देशवासियों को यह गलतफहमी हो कि अब हम विश्व महाशक्ति बन चुके हैं और अमेरिका की बराबरी पर पहुंच चुके हैं । मुझे पूरा विश्वास है कि किसी को भी ऐसी गलतफहमी नहीं रही होगी, न अपने देशवासियों को न ही विदेशियों को । जो कोई भी अमेरिका के बारे में थोड़ा-बहुत जानता है वह भली भांति समझता है कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ अभी अमेरिका से कोसों दूर है । अमेरिका की बराबरी पर यह देश कभी आ भी सकेगा यह संदेहास्पद है । फिलहाल अभी आगामी 2-3 पीढ़ियों तक तो कोई उम्मीद नहीं है । हो सकता है कि 8-10 फीसदी की आर्थिक विकासदर की वजह से कुछ लोग गलतफहमी के शिकार हों ।

निःसंदेह प्रधानमंत्रीजी के उद्गार व्यापक संदर्भ में नहीं थे । दुनिया के तथाकथित सबसे बड़े आतंकी ओसामा को अमेरिका द्वारा मौत के घाट उतारे जाने पर पत्रकारों की जिज्ञासा पर उन्होंने यह बात कही थी । लोग शायद यह जानना चाहते थे कि क्या पाकिस्तान स्थित आतंकियों पर अपना देश भी कुछ वैसे ही कदम उठाने की सोच सकता है जैसे अमेरिका ने उठाए । उनका दो टूक उत्तर “इंडिया अमेरिका नहीं है” इस बात को स्पष्ट करता है कि हमारे पास अमेरिका की भांति संसाधन नहीं हैं । यह भी सच है कि अमेरिका मित्र देशों तथा समुद्र से घिरा है, जब यह देश शत्रु देशों अथवा उन देशों से घिरा है जिनकी मित्रता संदिग्ध है । लेकिन सबसे बड़ी बात जो प्रधानमंत्रीजी के मंतव्य में निहित रही है वह है कि हमारे पास अमेरिका की भांति दृढ़ इच्छाशक्ति तो है ही नहीं । हमारी सोच जब वैसी है ही नहीं तो किसी भी प्रकार की कार्यवाही का सवाल ही नहीं उठता । हम बंदरघुड़की दे सकते हैं, लेकिन उसके आगे कुछ नहीं कर सकते हैं ।

सरकार आतंकवाद पर गंभीर?

मैं आगे कुछ और कहूं इसके पहले इस बात का भी जिक्र कर दूं कि दो-चार दिन पहले सरकार का यह वक्तव्य सुनने को मिला थाः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” क्या वाकई में? गंभीरता का मतलब क्या है? देश के मुखिया, डा. मनमोहन सिंह, सदा ही गंभीर नजर आते हैं । उनके मुख पर आम तौर पर न खुशी के भाव नजर आते हैं और न ही चिंता के । वे किसी भी अवसर पर बोलने से कतराते हैं; चुप्पी साधे रहना उनकी आदत है । गंभीरता के अर्थ क्या उनके इसी रवैये से है?  गंभीर बने रहो, न कुछ बोलो और न कुछ सुनो, न ही कुछ देखो । रोजमर्रा की जिंदगी में लोग ऐसे व्यक्ति को गंभीर कहते हैं, जो खुशी में न खिलखिलाकर हंस सके और न ही तकलीफ होने पर आह भर सके । देश तमाम तरह की घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन वे चुप बैठे रहते हैं । अधिक से अधिक मुझे खेद है का वक्तव्य दे दो, बस ।

लेकिन जब सरकार कहती है “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” तो अवश्य ही उसके अर्थ मात्र शाब्दिक नहीं होंगे । सरकार यह जताना चाहती होगी कि वह आतंकवाद को लेकर मात्र चिंतित ही नहीं है, बल्कि उससे निबटने के लिए कारगर कदम उठाने का संकल्प ले रही है । लेकिन कारगर उपाय क्या हो सकते हैं इस बात का कहीं कोई संकेत नहीं मिलते हैं । अभी तक का जो अनुभव रहा है उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि सरकार का दावा कोरे आश्वासन के अधिक कुछ नहीं हो सकता है । जो कुछ अभी तक होता आया है वही आगे भी होगा । आतंकियों को जहां मौका मिलेगा वे वारदात को अंजाम देंगे ही । वे पक्के इरादे लेकर चलते हैं । उनकी अपनी जान निकल भी जाए तो कोई बात नहीं, बस घटना को अंजाम देना है यह विचार उनके नियंताओं द्वारा उनकी सोच में गहरे बिठा दी जाती है । तब आप कर क्या सकते हैं?

शायद सरकार अपने खुफिया तंत्रों को अधिक सुदृढ़ करने का विचार कर रही है । ऐसा करने से कहां आतंकी घटना होने जा रही है इसकी पूर्व सूचना मिल जाएगी और घटना को रोका जा सकेगा । अवश्य ही ऐसा करना वांछित होगा, पर इतना क्या पर्याप्त होगा? क्या यह आवश्यक है कि किसी संभव वारदात की जानकारी सदैव जुटाई जा सके? क्या खुफिया विभागों में सुयोग्य लोग भरे पड़े हैं, और वह भी पर्याप्त संख्या में? जिस देश में सर्वत्र भ्रष्टाचार फैला हो वहां क्या साफ-सुथरे खुफिया तंत्र की उम्मीद की जानी चाहिए? उनकी ईमानदारी पर भरोसा भी कर लें तो भी क्या आम जनता से पर्याप्त सहयोग मिल सकता है? आम जनता तो रोजमर्रा की जिंदगी में भी लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को नहीं रोक पाती है; उससे भला कितनी उम्मीद करें? सरकारी रवैया यह है कि जब वारदात हो जाती है तो संबंधित सरकारी मुलाजिम हरकत में आ जाते है और सर्वत्र चेतावनी जारी कर दी जाती है, गोया कि अब किस क्षण, कहां पर अगली वारदात होने जा रही है यह पता चल गया हो । लेकिन दो-चार दिनों में ही सब ढीले पड़ जाते हैं, और तब तक आतंकी अगली वारदात के लिए तैयार हो जाते हैं । यही सिलसिला बदस्तूर चलता आ रहा है ।

आक्रामकता का अभाव

आतंकी वारदातों में मोबाइल फोनों की अहम भूमिका पायी गयी है । लेकिन सरकारी तंत्र की गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि हमारे यहां मोबाइल नंबरों का कोई सत्यापन नहीं होता है । कागजों में शायद बहुत कुछ हो रहा होगा, परंतु वास्तविकता में नहीं । नकली दस्तावेजों के आधार पर मोबाइल पा लेना बहुत मुश्किल काम नहीं है । आतंकियों के पास मोबाइल पहुंचते कैसे हैं? इतना ही नहीं, दुपहिया-चौपहिया वाहनों के मालिकों तक का पता पुलिस नहीं लगा पाती है । चंद्रमा में उतरने के ख्वाब देख रहे देश में आज भी यह व्यवस्था नहीं है कि एक क्लिक पर वाहन-स्वामी का नाम-पता-ठिकाना मालूम हो जाए, या उसके चोरी हो चुकने की जानकारी मिल जाए । क्या सरकार की गंभीरता में वांछित ‘डाटा-बेस’ की कोई अहमियत है? केवल कागजी योजनाएं बनाकर बैठ जाना बेमानी है ।

लगता है कि सरकार आतंकी वारदातों के संदर्भ में रोकथाम के तरीके ईजाद कर रही है । ऐसा करना ‘बचाव मार्ग या डिफेंसिव अप्रोच’ है, जो उपयोगी तो है, किंतु पर्याप्त नहीं । अमेरिका भी बचाव के सभी रास्ते अपना रहा है । लेकिन वह साथ में ‘आक्रामक या ऑफेंसिव’ तरीका भी अपनाते आ रहा है । जब भी उसे लगता है कि फलां-फलां खतरे बन सकते हैं तो वह उन्हें ठिकाने लगाने से भी पीछे नहीं रहता है । ओसामा के मामले में उसने बड़ी बारीकी से ऐसा किया और उसका काम तमाम कर दिया । अमेरिका ओसामा का नाम तो नहीं मिटा सकता, लेकिन उसकी कोई निशानी बचने न पाए इसकी पूरी कोशिश की । उसके शव समुद्र में कहां ठिकाने लगाया इसका पता तक नहीं ।

निश्चय ही इंडिया अमेरिका नहीं है । मुझे पूरा विश्वास है कि अमेरिका ने ओसामा को जिंदा न पकड़ने का प्रयास जानबूझ कर किया । ओसामा को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया, ताकि कानूनी लड़ाई का अवसर देकर कोई नयी आफत न मोल लेनी पड़े । ऐसे आतंकी के शव को ज्ञात स्थान पर दफनाना तक अमेरिका को गवारा नहीं था । आतंकियों को कड़ा संदेश देना अमेरिका जरूरी मानता है, भले ही आतंकियों पर उसका असर न पड़े । किंतु रियायत किसी भी हाल में नहीं ।

कड़ा संदेश नहीं

लेकिन ‘इंडिया’ ने आतंकियों को यह संदेश कभी नहीं दिया कि उनके साथ कड़ाई से पेश आया जाएगा । हम केवल उनकी सही-गलत लिस्ट बनाते हैं और पाकिस्तान को पेश करके इंतिजार करते हैं कि वे इस देश को सौंपे जाएंगे । कानूनी प्रक्रिया के समय और उसके बाद भी वे हमारे जेलों में मेहमान की तरह रखे जाएंगे । उनकी सुरक्षा पर लाखों-करोड़ों खर्च किया जाएंगे; उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुना दे, फिर भी उन्हें फांसी नहीं दी जाएगी ।

क्या वजह है कि यह देश कसाब और अफजल को फांसी देने तक की हिम्मत नहीं कर पाता? जब कोई आतंकी घोषित हो चुका हो, उसे फांसी की सजा सुना दी जा चुकी हो, तो फिर उस पर कैसा रहम? यदि हम सजा का कार्यान्वयन नहीं कर सकते तो आतंकियों को क्या संदेश जाता है? उन्हें क्या हम यह बताना चाहते हैं कि हम तुम्हें क्षमा कर सकते हैं? आतंकवाद के प्रति यह किस गंभीरता का द्योतक है? वारदात को रोकना सही है, लेकिन घट चुकी वारदात के लिए जिम्मेदार लोगों को त्वरित सजा निहायत जरूरी है, यदि आप सच में गंभीर हैं तो । क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि कल ऐसे आतंकियों को छुड़ाने के लिए अपहरण जैसी घटना घटे और देश को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़े?

सरकार के ऐसे नरम रवैये के पीछे मुझे एक कारण नजर आता है । आप उसे नहीं मानेंगे; शायद ही कोई मेरी ‘थ्यौरी’ पर भरोसा करेगा । मेरा सोचना कि भारत का हर राजनैतिक दल मुस्लिम समुदाय से डरा सहमा रहता है । अफजल-कसाब मुस्लिम समाज से आते हैं और प्रायः हर दल सोचता है कि इनको फांसी देने पर उक्त समुदाय दंगे-फसाद पर उतर आएगा । न भी दंगा करे तो भी चुनावों में वोट नहीं देगा । सत्ता पर टिके रहने के लिए उनकी अनुकंपा आवश्यक है, अतः उन्हें नाखुश नहीं किया जाना चाहिए । बेचारा मुस्लिम समुदाय वास्तव में क्या सोचता है यह कोई जानने की कोशिश नहीं करता । उन्हें अफजल-कसाब से कुछ लेना-देना नहीं होगा, किंतु हमारे सियासी दल आश्वस्त नहीं रहते हैं । अन्यथा उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुनाए फिर भी वर्षों उस पर अमल न हो यह समझ से परे है, खासकर जब मामला आतंकी वारदात से जुड़ा  हो । क्या कोई आतंकी रहम के काबिल हो सकता है? हमारी सरकारें टालमटोल की नीति पर चलती है, त्वरित निर्णय लेकर जोखिम उठाने का माद्दा किसी भी दल में नहीं है ।

सरकार ऐसा कुछ भी करने में सफल नहीं है जिससे आतंकी संगठन भयभीत हो सकें । इसके विपरीत देश उनसे भयभीत है और बचाव के रास्ते खोजता रहता है । यही सब तो आतंकियों का मकसद है । वे सफल हैं! – योगेन्द्र जोशी

प्रधानमंत्रीः “इंडिया अमेरिका नहीं है”, बेशक! और सरकारः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं”, क्या वाकई?” पर एक विचार

  1. आज समय मिलने पर आपकी कई ताज़ा पोस्टें पढ़ डालीं.
    आपके मौलिक दृष्टिकोण का मैं कायल हूँ और बहुत से मुद्दों पर आप-सी ही सोच रखता हूँ. आपको पढ़कर बहुत अच्छा लगता है.

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