हादसों का देश – लापरवाही, नियम-कानूनों की अनदेखी, संवेदनहीनता आदि-आदि का दुष्परिणाम

अनूठा देश

अपना देश वाकई अनूठा है, चामत्कारिक है, अपने किस्म का अकेला है । यहां ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है जिसकी संभावना दुनिया के उन प्रमुख देशों में नहीं के बराबर रहती है जिनके स्तर पर पहुंचने का हम ख्वाब देखते हैं । यह चमत्कारों का देश है, लापरवाही का देश है, कर्तव्यहीनता का देश है, भ्रष्टाचार का देश है, प्रशासनिक संवेदनहीनता का देश है, और इस सब के ऊपर, नियम-कानूनों एवं सलाह-मशविरा को न मानने वाला देश है ।

इस प्रकार के खयाल मेरे मन में तब उठने लगते हैं जब कभी दुर्घटनाओं की बात टेलीविजन चैनलों पर देखता हूं । मेरे मत में अधिकांश दुर्घटनाएं आम आदमी अथवा सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही की वजह से होते हैं । अलग-अलग स्तरों पर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो यह न हों । आम आदमी लापरवाह न हो और प्रशासन संवेदनशून्यता तथा कर्तव्यहीनता का बुरी तरह शिकार न हो तो ये न घटनाएं न घटें । लेकिन किसी से भी कुछ कहना बेकार है । अपने देशवासियों पर तो “भैंस के आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराय” की उक्ति सटीक बैठती है ।

दर्दनाक हादसा

परसों सुबह एक दर्दनाक दुर्घटना की खबर किसी टीवी चैनल पर देखने-सुनने को मिली । बाद में मैंने पाया कि संबंधित खबर एवं वीडियो एनडीटीवी चैनल की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है । (देखें एनडीटीवी समाचार) परसों की खबर थी कि इंदौर के पास पातालपानी नामक झरने के पास एक परिवार पिकनिक मनाने पहुंचा था । संबंधित नदी के बीच धारा में एक चट्टान पर परिवार के पांच सदस्य खड़े होकर फोटो खिंचवाने के लिए उत्सुक थे । इसी बीच पानी का जलस्तर बढ़ने लगा । चट्टानों पर खड़े पर्यटक दौड़कर नदी के किनारे पहुंच गये । लोंगों ने उन्हें भी आगाह किया, लेकिन वे इस गलतफहमी के साथ वहीं पर डटे रहे कि वे सुरक्षित रह जाएंगे । एक-दूसरे को सहारा देते हुए वे वहां पर कुछ देर तक तो खडे़ रह सके । लेकिन नदी थी कि उसने अपना विकराल रूप दिखा ही दिया । नदी का जलस्तर बढ़ता गया और उसका प्रवाह झेलना उन लोगों के सामर्थ्य से बाहर हो गया । परिणाम दुःखद – सभी बह गये और आगे जलप्रपात से नीचे गिर गये । एक लाश तो जल्दी मिल गयी शेष की खोज चलने लगी ।

मुझे इस बात का अंदाजा है कि बरसात में किस प्रकार पहाड़ी नदी का प्रवाह कभी-कभी इतना तेज हो जाता है कि उसमें खड़े रह पाना असंभव-सा हो जाता है । अपने बचपन में मैंने घर (उत्तराखंड) के आसपास की नदियों की भयावहता का अनुभव किया है । हमें हिदायतें होती थीं कि किसी अनुभवी सयाने व्यक्ति की मदद के बिना उसे पार करने का दुस्साहस न करें । बरसात के दिनों में धोखे की बहुत गुंजाइश रहती है । ऐसा हो सकता है कि आप जहां खड़े हों उस क्षेत्र में पानी न बरस रहा हो, किंतु नदी के उद्गम की ओर कहीं अन्यत्र तेज पानी बरस रहा हो । तब वर्षा का वह पानी चारों ओर से पहाड़ी ढलान पर मिट्टी-कंकड़-पत्थर लेते हुए एक साथ उतरकर नदी में जलस्तर अनायास बहुत अधिक बढ़ा देता है । इस बढ़े हुए जलस्तर का अग्रभाग साफ पहचान में आ जाता है और देखना दिलचस्प होता कि कैसे यह पूरी ताकत से उस स्थान तक पहुचता है जहां आप खड़े हों । जिसे इस बात का अंदाजा न हो कि कहीं अन्यत्र पानी बरस रहा होगा वह ऐसे अवसरों पर धोखा खा सकता है ।

पिकनिक पर गये उस अभागे परिवार को बरसात में पहाड़ी नदी के इस व्यवहार का अंदाजा नहीं रहा होगा । लेकिन आसपास खड़े लोगों ने उन्हें आगाह तो किया ही था । वे अपने दुस्साहस के शिकार हुए । इसे मैं लापरवाही का परिणाम मानता हूं । दुस्साहस जीवन के ध्येय के लिए तो समझ में आता है, किंतु महज मौजमस्ती के लिए मूर्खता ही मानी जानी चाहिए ।

दुर्घटनाएं और दुर्घटनाएं

कल-परसों ही कहीं एक बस इसी प्रकार नदी में बह गयी एक बच्चे को छोड़कर सभी बच गये, लेकिन बस उलटते-पलटते बीच धारा में फंस गयी । इसी प्रकार चंद रोज पहले किसी लेखपाल महोदय के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ । नदी पार करते-करते पानी का स्तर बढ़ गया और उनकी जीप मझदार में फंस गयी । भला हो आसपास के लोगों का कि वे उनकी मदद कर सके । असल में छोटी नदियों में सामान्यतः पानी काफी कम रहता है । कई जगहों पर साल के अधिकांश समय के लिए पत्थरों की दीवार खड़ी करके नदी के ऊपर सड़क बना ली जाती है । पानी उसके नीचे पत्थरों के बीच छोड़ी गयी खाली जगहों से होते हुए बह जाता है । बरसात में कभी-कभी जलस्तर के अनायास बढ़ जाने पर पानी उस सड़क के ऊपर बहने लगता है । तब सड़क अधिक दिनों तक नहीं टिक पाती है । लेकिन जब तक वह कामचलाऊ दिखती है, वाहन चलते हैं और प्रवाह तेज होने पर वह अनियंत्रित होते हुए सड़क के किनारे पहुचकर पलट जाती है । ऐसे मौकों पर वाहनचालक का गलत अनुमान या अति साहस ही हादसे का कारण होता है

चिंता एवं पीड़ा की बात यह है कि अपने यहां हर प्रकार के हादसे होते रहते हैं । कल ही नौइडा/गाजियाबाद में एक कार चलते-चलते सड़क पर आठ-दस फुट नीचे धंस गयी । चलते-चलते चालक को लगा कि सड़क धंस रही है, और जब तक वह कुछ समझ पाता सड़क पर कार के नीचे गड्ढा हो चुका था । बाद में क्रेन की मदद से कार निकाली गयी । यही गनीमत रही कि बेचारा वाहनमालिक चालक बच गया । बताते हैं कि अभी चंद रोज पहले ही उस सड़क का निर्माण था । इसमें दो राय नहीं कि ठेकेदार तथा सरकारी अभियंताओं की घोर लापरवाही और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार का ही यह परिणाम था । लेकिन अपने देश के सरकारी तंत्र में यह सब क्षम्य है । किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता । न शर्मिंदगी न आत्मग्लानि । धन्य हैं ऐसे राष्ट्रभक्त नागरिक !

आजकल पूरे उत्तर प्रदेश में सड़कें खुदी हुई हैं, या यों कहिए कि प्रदेशवासियों की किस्मतें खुदी हैं । बनारस में सदाबहार गड्ढेदार सड़कें रहती हैं और लोग उनसे भलीभांति परिचित रहते हैं । इसलिए गंभीर दुर्घटनाएं कम ही होती हैं । फिर भी पूरे शहर का मुआयना करने निकलें तो आप को कहीं न कहीं कोई वाहन गड्ढे में धंसा दिख ही जाएगा । क्यों होता है ऐसा, यह सोचने की बात है ।

कल-परसों ही एक लगभग पूर्णतः निर्मित इमारत ढह गयी, कहां यह ठीक-से याद नहीं आ रहा । कहा जाता है उसमें प्लास्टर का कार्य चल रहा था । पानी बरसा और इमारत ढह गयी । संवाददाता दिखा रहा था कि उसमें प्रयुक्त बालू-सीमेंट कैसे भुरभुरी होकर गिर रही थी । एक दो जने गिरफ्तार किए गये हैं, लेकिन बिल्डर भाग गया । गिरफ्तारी सरकारी स्तर की रस्मअदायगी के लिए की जाती है, ताकि लोगों को लगे कि कुछ हो रहा है । कुछ दिनों बाद बात भुला दी जाती है, और पकड़े गये लोग अगली दुर्घटना को अंजाम देने निकल पड़ते हैं, पूरी बेहयाई के साथ । वा रे मेरा ‘महान्’ देश !

प्रशासनिक भ्रष्टाचार

राजमार्गों/सड़कों पर कारों-बसों आदि की दुर्घटनाओं के समाचार आम बातें हैं । दो वाहन आपने-सामने से टकरा गये, बस अनियंत्रित होकर पुल से नीचे गिर गयी, चालक को झपकी आने से कार गड्ढे में गिर गयी या पेड़ से जा टकराई, जैसी खबरें समाचार माध्यमों पर देखने-सुनने को मिलती रहती हैं । या खबर मिलेगी की हाइटेंशन तार की चपेट में आने से बस आग का गोला बन गयी । इस प्रकार की घटनाएं अपने देश में आम हैं, जब कि प्रमुख देशों में वे शायद ही कभी घटती हैं, और जब घटती हैं तो उन्हें संजीदगी से लिया जाता है । हमारे नेता हों या सरकारी मुलाजिम बेशरमी से कहते हैं कि हादसे तो होते रहते हैं । अपने देश में आदमी के जान की कोई अहमियत नहीं । अधिक से अधिक लाख-दो-लाख के मुआवजे की कोरी घोषणा कर दी और बात खत्म । मुआवजा भी सरकारी मुलाजिम डकार जाते हों तो कोई आश्चर्य नहीं ।

पिछले कुछ समय से रेल हादसों की बाढ़ आ गयी है । लेकिन न तो रेलमंत्री और न ही प्रधानमंत्री के चेहरे पर चिंता एवं आत्मग्लानि के भाव उभरते दिखई देते हैं । उनका रवैया साफ रहता है – हमारा क्या नुकसान हुआ है जो हम आंसू बहाएं । वाह रे भारत के राजनेतागण ! इनकी अपनी सुरक्षा के लिए न धन की कमी रहती है और न त्वरित कार्य-निष्पादन की । लेकिन जब रेल सुरक्षा की बात होती है तो उनकी लापरवाही की कोई सीमा नहीं रहती है । लेबल-क्रासिंग पर वाहन रेलगाड़ियों से टकरा जाती हैं, लेकिन किसी को समुचित कदम उठाने की चिंता कहां ?

आजकल अग्निकांडों की खबरें भी खूब मिलती हैं । कल ही दिल्ली के कनाटप्लेस में एलआइसी की बहुमंजिली इमारत में आग लग गयी । ऐसे अवसरों पर जब कुछ समझ में नहीं आता है तो कह दिया जाता है कि शार्ट-सर्किट से आग लगी । बेचारी बिजली पर दोष मढ़ना सबसे आसान है । गलती तो बिजली की है, फिर भला कोई आदमी दोषी कैसे हो सकता है ? शार्ट-सर्किट हो या कुछ, आजकल ऐसे साधन उपलब्ध हैं जो तुरंत चेतावनी दे देते हैं । भवनों में आग बुझाने के साधन तैयार रहने चाहिए । ऐसी बातें कही तो जाती हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं होता । किसे दोष दें इस लापरवाही के लिए ? सरकारों को या आम आदमी को या दोनों को ? किंतु लापरवाही तो भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है !

सभी प्रमुख देशों में वाहन-चालन का लाइसेंस तभी मिलता है जब आवेदक लिखित तथा प्रायोगिक परीक्षा पास कर लेता है । इन परीक्षणों को गंभीरता से लिया जाता है । आवेदक को कभी-कभी दो या अधिक बार परीक्षा देनी पड़ती है । (पढ़िये मेरा एक अनुभव) परंतु अपने देश में लाइसेंस का मामला गंभीरता से नहीं लिया जाता है । मैं किसी व्यक्ति को नहीं जानता जिसने ‘ड्राइविंग टेस्ट’ देकर लाइसेंस पाया हो । लाइसेंस लेना सब्जीमंडी से आलू खरीदने जैसा है । दलाल को आर्डर दीजिए, और घर बैठे लाइसेंस लीजिए । कम से कम वाराणसी में तो यही चलता है । यह व्यवस्था लापरवाही का संकेतक नहीं है क्या ? कौन है जिम्मेदार ? दरअसल सरकारी तंत्र और आम आदमी, दोनों ही । परिणाम यह है कि लाइसेंस-धारक को स्टियरिंग घुमाने, एक्सीलरेटर दबाने और ब्रेक लगाने से अधिक जानकारी वाहन-चालन के बारे में नहीं होती है । ऐसे चालकों द्वारा दुर्घटना होना आश्चर्य की बात नहीं है ।

भगवान भरोसे

कुल मिलाकर यह देश भगवान भरोसे चल रहा है । यहां सभी नियम-कानून कागजों तक सिमटकर रह जाते हैं । व्यवहार में हर कोई ‘मेरी मरजी’ की नीति पर चलता है । तब आये दिन हादसे होना कोई नहीं रोक सकता है । या खुदा, लोगों की अक्ल का ताला कभी खुलेगा क्या ! – योगेन्द्र जोशी

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